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ये कैसी ठगी!


टिप्पणी
अगर आपका ए.टी.एम. कार्ड जेब में रखा हो और आपके मोबाइल पर जानकारी मिले कि आपके खाते से रुपए निकाले गए हैं। ये रुपए आपने नहीं किसी और ने निकाले हैं और वह भी किसी दूसरे शहर के ए.टी.एम. से। जाहिर है, आप बहुत ठगा हुआ महसूस करेंगे। किसी अनाम ठग से नहीं, बल्कि बैंक नामक उस जानी-पहचानी संस्था से, जिसमें करोड़ों लोगों ने भरोसा करके अपनी संचित राशि जमा कर रखी है।
जयपुर में हाल ही ऐसी कुछ घटनाएं हुई हैं। देश के अन्य कई शहरों में भी इस तरह की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इनकी तादाद भले ही अभी बहुत बड़ी न लगती हों, लेकिन ये ही हालात रहे तो हर दिन होने वाली चोरी और ठगी की वारदात की तरह आम हो जाएंगी। ऐसी सूरत में लोगों का बैंकों की ए.टी.एम. प्रणाली से तो भरोसा उठ ही जाएगा, बैंकिंग संस्था को भी बड़ा झाटका लग जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आखिर इन घटनाओं को साइबर अपराध मानकर बैंकें अपने ग्राहकों को केवल कानून और पुलिस के भरोसे कैसे छोड़ सकती है? बैंकों को इससे ऊपर उठकर सोचने की जरूरत है। बैंकों की चिन्ता में यह प्राथमिकता से शुमार होना चाहिए कि ए.टी.एम. क्लोनिंग की समस्या से कैसे निजात मिले। इस समस्या के तकनीकी उपाय तो होंगे ही। साइबर विशेषज्ञों का मानना है कि हर साइबर समस्या का निदान साइबर-जगत में ही मौजूद है। क्यों नहीं देश की सारी बैंकें चाहे वे सरकारी हों या निजी मिलकर इस समस्या का उपाय करें। उत्कृष्ट साइबर विशेषज्ञों के जरिए ऐसा सिस्टम बने जो ए.टी.एम. कार्ड की क्लोनिंग को लॉक कर सके। या तो क्लोनिंग ही संभव न हो और अगर हो तो वह किसी भी ए.टी.एम. मशीन पर कारगर न हो। तकनीक में सब कुछ संभव है। ए.टी.एम. कार्ड की पासवर्ड प्रणाली की समीक्षा करनी होगी। पासवर्ड की बजाय थम्ब इम्प्रेशन जैसे आधुनिक विकल्प मौजूद हैं, जो ज्यादा सुरक्षित हैं। बैंकों को नेट बैंकिंग की प्रणाली को भी दुरुस्त करना पड़ेगा। इसकी खामियों का फायदा उठाकर भी साइबर ठगी की जा रही है।
कुल मिलाकर बैंकों को अपने ग्राहकों को भरोसा दिलाना होगा कि उनके ए.टी.एम. कार्ड का कोई दुरुपयोग नहीं कर सकता। आजकल हर व्यक्ति ए.टी.एम. कार्ड रखता है। बैंक स्वयं भी ग्राहकों को यह कार्ड रखने का दबाव बनाती हैं। निश्चय ही यह कार्ड ग्राहकों को एक सहूलियत प्रदान करता है। लेकिन ऐसी घटनाएं उसे यह सहूलियत त्यागने को मजबूर कर देंगी। खाताधारी की नासमझाी या गलती से उसके साथ धोखा होता है तो बात समझ में आती है, लेकिन पूरी तरह सजग होते हुए अगर वह ऐसी साइबर ठगी का शिकार होता है तो बैंकें भी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। या तो बैंकें भरपाई करें या फिर मुकदमे का सामना करें।

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3 comments:

Bajrang Lal choudhary said...

आदरणीय जोशीजी,
सादर नमस्कार
बैंकों की हालत जितना हम अनुमान लगा रहे हैं उससे अधिक दयनीय है । जिम्मेदारी दे नाम पर सुन्य है । Cloning ग्राहक की जेब में तो हो नहीं सकती निश्चय ही ATM में ही हो सकती है । फिर जिम्मेदारी बैंक की ही होनी चाहिये । ग्राहक इतने शिक्षित नहीं हैं जो ऐसे किसी उपकरण को पहचान लें । ATM के कारण बैंकों को अपार लाभ हो रहा है । इस विशय में बहुत कुछ गोलमाल है परन्तु Media की नजर में क्यों नहीं आता । मैं पत्रिका का ३० साल पुराना पाठक हूं परन्तु पिछले दिनों आपके संवाददाता दो बार इस तरह पेश आये कि उनसे घृणा ही हो गयी । फिर भी Patrika अन्य अखबारों से तो अछा है । bajranglal.choudhary@yahoo.in

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन 7 फरवरी वर्षगांठ और वैवाहिक वर्षगांठ सब एक साथ मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Kailash Sharma said...

बहुत सार्थक और विचारणीय आलेख...