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मनमानी के स्कूल

टिप्पणी
 नन्हे-मुन्नों को स्कूल में दाखिले की समस्या घर-घर की है। कम-से-कम मध्यमवर्गीय हर शहरी परिवार का तो यही दुखड़ा है। अपने बच्चे का निजी स्कूल में नर्सरी दाखिले की खातिर उनके पसीने छूट जाते हैं। एक स्कूल से दूसरे स्कूल, दूसरे से तीसरे स्कूल...। भटकते-भटकते सांस फूल जाती है। स्कूल संचालकों का रवैया हैरान कर देता है। एडमिशन फॉर्म नदारद। कहीं उपलब्ध तो फॉर्म का शुल्क भारी-भरकम! कहीं जबरदस्ती थोपे गए कायदे। शुल्क अदा करके फॉर्म भरो तब तक एडमिशन फुल! पिछला दरवाजा हरदम खुला है।
एडमिशन के क्या नियम-कायदे- कोई बताने वाला नहीं। कुल कितनी सीटें थीं, कितनी भरी गई—कोई पारदर्शिता नहीं। कोई नियम-कायदे स्पष्ट नहीं। सब-कुछ गोलमोल। और इसमें चक्करघिन्नी बने बेचारे अभिभावक। राज्य सरकार उन्हें पूरी तरह इन निजी स्कूल संचालकों के हवाले छोड़ कर चैन की नींद सो रही है। जयपुर सहित राज्यभर में ज्यादातर निजी स्कूलों के यही हालात हैं। भोपाल, इंदौर, रायपुर जैसे बड़े शहरों के हालात भी कमोवेश यही हैं। अभिभावकों की कोई सुनने वाला नहीं। भले ही इनकी तादाद लाखों में है। दिल्ली में सरकार ने सुध ली तो इस बार पासा ही पलट गया। अभिभावकों की बजाय निजी स्कूल संचालकों के पसीने छूट गए। सरकार के खिलाफ सारे निजी स्कूल लामबंद हो गए। खूब चीख-पुकार मचाई। हाईकोर्ट गए, लेकिन दाल नहीं गली। जब भी निजी स्कूलों पर शिकंजा कसने की बात आती है—स्कूलें स्वायत्तता का रोना रोने लगती है। सरकारी दखलंदाजी का शोर मचाती है। यही नहीं शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट की चेतावनी दे डालती है। कौन नहीं जानता दुकानों की तरह खुली हुई ज्यादातर निजी स्कूलों को न स्वायत्तता की चिन्ता है और न ही शिक्षा की गुणवत्ता की। हर कोई जानता है उनकी वास्तविक चिन्ता कहां अटकी और भटकी रहती है। हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार है। नर्सरी या प्री प्राइमरी दाखिला शिशु-शिक्षा की नींव है। नींव को मजबूती देने का दायित्व जितना अभिभावकों का है उतना ही स्कूल संचालकों का भी है। अगर ये संचालक अपना दायित्व नहीं समझते तो सरकार को अपनी भूमिका निभानी होगी। दिल्ली सरकार की तरह ही शिकंजा कसना होगा तथा नर्सरी दाखिले के लिए सख्त नियम-कानून तय करने होंगे। सख्ती करते ही स्कूल संचालक लामबंद होंगे। दिल्ली की तरह ही तर्क देंगे कि सरकार को उनकी स्वायत्तता में दखल का कोई अधिकार नहीं। क्यों नहीं है? सरकार से सस्ती जमीन लेते समय उन्हें यह याद क्यों नहीं आता? सरकार को अधिकार है—पूरा अधिकार है।
केवल अल्पसंख्यक स्कूलों को ही संवैधानिक कवच प्राप्त है। सभी स्कूलों को मनमानी करने की छूट नहीं दी जा सकती। आखिर क्यों अभिभावकों को अपने नन्हे-मुन्नों के लिए दर-दर भटकना पड़े। इन स्कूलों को प्रवेश के नियम, तारीख, समय-सीमा, सीटों की संख्या, फीस का ढांचा सब कुछ पारदर्शी रखना होगा। आखिर ये स्कूलें शिक्षा के ज्ञान-केन्द्र के तौर पर खुली हैं। इसी रूप में इनकी मान्यता है न कि उपभोक्ता सामग्री बेचने वाली दुकान के रूप में। अगर इन्हें दुकानदारी ही करनी है तो कोई दूसरा धंधा अपनाएं। स्कूलों को शिक्षा और शिक्षार्थी के प्रति ही समर्पित होना होगा—चाहे वह सरकारी सहायता  प्राप्त निजी स्कूल हो या गैर सहायता प्राप्त।

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