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मीडिया का मित्र सोशल वीडियो

कैमरे ने सब कुछ बयान कर दिया और दोषियों को सींखचों के पीछे पहुंचा दिया।  कल्पना कीजिए पीडि़त बच्चों के माता-पिता कैमरे के फुटेज लेकर सीधे कानून का दरवाजा खटखटाते तो क्या होता। बहुत संभव है, पुलिस उन्हें टरका देती। मामला ही दर्ज नहीं करती। जैसा कि अक्सर होता है।

कुछ दिनों पहले यह खबर आपने पढ़ी होगी जिसमें कुछ वीडियो-चित्र भी छपे थे। इन चित्रों में आन्ध्र प्रदेश के एक स्कूल का प्रधानाचार्य तीन नेत्रहीन बच्चों को बेरहमी से पीट रहा था। बच्चे दर्द से चिल्ला रहे थे और रहम की गुजारिश कर रहे थे। मगर प्रधानाचार्य इन बच्चों को बेदर्दी से छड़ी लेकर पीटे जा रहा था। सभी बच्चे दस साल से भी कम उम्र के थे। खास बात यह कि प्रधानाचार्य स्वयं नेत्रहीन था। स्कूल के किसी कर्मचारी ने इस घटना की वीडियो रिकार्डिंग कर ली। वीडियो यू-ट्यूब पर साझाा हुआ तो लोगों को इस घटना का पता चला। प्रधानाचार्य और उसका साथ देने वाले स्कूल के सचिव को गिरफ्तार कर लिया गया।
इसी तरह कोलकाता के एक घर में महिला ट्यूटर ने तीन साल के मासूम बच्चे को बुरी तरह पीटकर जख्मी कर दिया। फिर बच्चे की मां को धमकाया कि पुलिस में शिकायत करने की गलती मत करना लेकिन जब कैमरे के चित्र मीडिया में प्रकाशित हुए तो ट्यूटर के होश ठिकाने आ गए। गिड़गिड़ाई, खूब माफी मांगी। मामला पुलिस में दर्ज हो गया। दरअसल, ट्यूटर की सारी करतूत घर में लगे सीसी टीवी कैमरे में कैद हो गई थी। एक तरफ केन्द्र सरकार बच्चों को पीटने वालों के खिलाफ कानून को कड़ा बनाने की तैयारी कर रही है वहीं दूसरी तरफ ऐसी घटनाओं में बढ़ोतरी बेहद दुखद है।
  कहने की जरूरत नहीं, अगर उपरोक्त घटनाओं के वीडियो या सीसी टीवी चित्र नहीं होते तो इन घटनाओं की किसी को भनक तक नहीं लगती। मीडिया को भी नहीं। न जाने कब से नेत्रहीन बच्चे प्रधानाचार्य के जुल्म सह रहे थे। तीन साल का मासूम भी ट्यूटर का जुल्म बयान करने में सक्षम नहीं था। कैमरे ने सब कुछ बयान कर दिया और दोषियों को सींखचों के पीछे पहुंचा दिया। सवाल है क्या अकेले कैमरे ने? क्या कैमरे में कैद केवल तस्वीरें ही पीडि़तों को न्याय दिलाने में पर्याप्त थी? या इन तस्वीरों के सार्वजनीकरण ने भी यह काम किया? कल्पना कीजिए पीडि़त बच्चों के माता-पिता कैमरे के फुटेज लेकर सीधे कानून का दरवाजा खटखटाते तो क्या होता। बहुत संभव है, पुलिस उन्हें टरका देती। मामला ही दर्ज नहीं करती। जैसा कि अक्सर होता है। पीडि़त ही बार-बार चक्कर काटते, परेशान होते। कई तरह के सवाल-जवाब उन्हीं से किए जाते। अपराधियों का बाल तक बांका नहीं होता। इन परेशानियों की कल्पना करके ही अनेक पीडि़त चुप लगाकर बैठ जाने में ही अपना भला समझाते हैं। भले ही उनके पास प्रामाणिक सबूत हों। शायद इन्हीं परिस्थितियों ने सोशल नेटवर्किंग को बहुत मजबूत कर दिया है। और कुछ नहीं तो आम जन तक तो उनकी शिकायत पहुंच ही जाएगी, यही सोच ऐसी कई घटनाओं को प्रामाणिक तौर पर सामने ला रही है जो पहले संभव नहीं थी, या बहुत मुश्किल थी।
  इसीलिए पिछले कुछ वर्षों में वीडियो या सीसी टीवी कैमरों का प्रचलन तेजी से बढ़ा है। सीसी टीवी का इस्तेमाल जहां आम तौर पर प्रतिष्ठानों, दुकान-शोरूम तथा महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक स्थलों पर अधिक है वहीं वीडियो कैमरे का इस्तेमाल आम हो चला है। मोबाइल फोन में वीडियो बनाने की सुविधा के कारण हर कोई वीडियो शूट कर लेता है। सामान्य श्रेणी के वीडियो भी घटनाओं की त्वरित रिकार्डिंग में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा जाते हैं। शौकिया तौर पर की गई वीडियोग्राफी और उसे सोशल नेटवर्किंग पर साझाा करने का प्रचलन लोकप्रियता की हदें छू रहा है। वीडियो रिकार्डिंग करके उसे मोबाइल फोन के जरिए आसानी से यू-ट्यूब पर साझाा किया जा सकता है। इसलिए केवल भारत में लाखों वीडियो रोजाना अपलोड किए जा रहे हैं। यू-ट्यूब पर दुनिया में हर मिनट लगभग सौ घंटे से भी अधिक समय के वीडियो साझाा किए जा रहे हैं। इनमें अनेक वीडियो अभिव्यक्ति और सूचनाओं का मजबूत माध्यम बनते जा रहे हैं। यह मुख्यधारा के मीडिया के लिए मित्रवत और महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। दिल्ली में चलती मेट्रो ट्रेन के खुले दरवाजे का वीडियो इसी का परिणाम है। मुम्बई में पहली बारिश में रिलायंस की मेट्रो में पानी टपकने का वीडियो भी पिछले दिनों राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खी बना था। ऐसी कई घटनाएं मीडिया में प्रकाशित और चर्चित हुई हैं जो किसी पत्रकार या मीडिया फोटोग्राफर की बजाय आम जन से सीधे या सोशल नेटवर्किंग के जरिए सामने आईं। मुख्य धारा के मीडिया के लिए यह शुभ संकेत है। इससे सूचनाओं के स्रोत का दायरा विस्तृत हो गया है। जो व्यक्ति पाठक या दर्शक है वही व्यक्ति पत्रकार भी हो सकता है। 'सिटीजन जर्नलिज्म' की अवधारणा यही है जो मीडिया को एक नई पहचान दिलाती है। मगर एक दूसरा पहलू भी है। सोशल नेटवर्किंग पर रोजाना लाखों की तादाद में वीडियो साझाा किए जा रहे हैं। कौन प्रामाणिक है और कौन नहीं, यह फैसला करना बहुत मुश्किल है। कई वीडियो अपरिपक्व व आधी-अधूरी सूचनाओं पर भी आधारित होते हैं। ऐसे में तथ्यों की प्रामाणिकता की जांच जरूरी है। मीडिया कर्मियों को इस संबंध में सचेत रहने की आवश्यकता है। हालांकि ऐसी तकनीकों पर दुनिया भर में काम चल रहा है जिनसे असली व नकली वीडियो की पहचान हो सकेगी। मानव अधिकारों के लिए कार्य करने वाली संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने सिटीजन एविडेंस लैब नामक एक वेबसाइट शुरू की है। इस वेबसाइट के जरिए इंटरनेट पर उपलब्ध वीडियो की प्रामाणिकता को जांचा जा सकेगा। अभी यह शुरुआती चरण में है। इसे कितनी सफलता मिलेगी, कहा नहीं जा सकता। फिर भी इंटरनेट के मायाजाल में तैरती करोड़ों वीडियो फिल्मों की सत्यता जानने की दिशा में यह एक स्वागत योग्य प्रयास है। ऐसे प्रयास जब तक पूरी तरह सफल न हों, तब तक सोशल नेटवर्किंग के जरिए मीडिया में फुटेज का उपयोग करते समय सावधानी तो बरतनी ही होगी।

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