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प्रेस की स्वतंत्रता और हमले


प्रेस की स्वतंत्रता के कई बिन्दु हैं। स्वतंत्र अभिव्यक्ति का परिवेश, मीडिया के लिए मजबूत वैधानिक ढांचा, पारदर्शिता, पत्रकारों की सुरक्षा आदि कई पक्ष हैं जिनसे प्रेस की स्वतंत्रता का स्तर आंका जाता है। इनमें पत्रकारों की सुरक्षा काफी महत्वपूर्ण है।

हाल ही प्रेस स्वतंत्रता दिवस (3 मई) आया और चला गया।  चुनावी हलचल के बीच शायद इस पर किसी का ध्यान ही नहीं गया। प्रेस की स्वतंत्रता के लिए दुनिया में यह दिन खास तौर पर याद किया जाता है। यूनेस्को ने 3 मई 1991 में नामीबिया के विंडोक शहर में विश्व-सम्मेलन आयोजित किया था। सम्मेलन में शामिल सभी देशों ने मिलकर प्रेस की स्वतंत्रता के सिद्धान्त मंजूर किए थे। तब से ही विश्व भर की सरकारों को प्रेस की स्वतंत्रता के प्रति वचनबद्धता की याद दिलाने के लिए 3 मई विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है। मीडिया संगठनों और पत्रकारों के लिए ही नहीं, लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था रखने वाले हर व्यक्ति के लिए यह दिवस मायने रखता है।
प्रेस की स्वतंत्रता के कई बिन्दु हैं। स्वतंत्र अभिव्यक्ति का परिवेश, मीडिया के लिए मजबूत वैधानिक ढांचा, पारदर्शिता, पत्रकारों की सुरक्षा आदि कई पक्ष हैं जिनसे प्रेस की स्वतंत्रता का स्तर आंका जाता है। इनमें पत्रकारों की सुरक्षा काफी महत्वपूर्ण है। दुनियाभर में पत्रकारों पर बढ़ते हमलों की घटनाएं प्रेस की स्वतंत्रता की राह में सबसे बड़ी बाधा है। पिछले साल भर का रिकार्ड देखें तो पाएंगे कि विश्व में पत्रकारों पर जहां जानलेवा हमले किए गए, वहीं उन्हें जान से मारने की धमकियां भी कम नहीं मिलीं। 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' के 2014 के विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक के अनुसार 180 देशों में प्रेस की स्वतंत्रता के हनन के मामले साल-दर-साल बढ़ रहे हैं। मौजूदा प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 3395 से बढ़कर 3456 पर पहुंच गया है। इसका मतलब है दुनिया के विभिन्न देशों में प्रेस की स्वतंत्रता के हनन की घटनाएं1.8 फीसदी दर से बढ़ रही है। 'हफिंगटन पोस्ट' के अनुसार इस साल अब तक दुनिया के विभिन्न हिस्सों में 14 पत्रकार हमलों में मारे जा चुके हैं। जबकि पिछले वर्ष कम-से-कम 70 पत्रकारों की हत्या की गई थी। अफगानिस्तान, टर्की, और सीरिया आदि तो ऐसे देश हैं जहां पत्रकारिता करना सबसे खतरनाक पेशा बन गया है। अफगानिस्तान में गत माह ही एसोसिएट प्रेस की दो महिला पत्रकारों को गोली मार दी गई जिसमें प्रेस फोटोग्राफर एन्जा नेडरिगंस मारी गईं और केथी गेनन बुरी तरह से घायल हो गईं। सी.पी.जे. (कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स) के डिप्टी एडिटर रॉब मोने के अनुसार— 'विश्व में प्रत्येक आठ दिनों के दरम्यान कम से कम एक पत्रकार मार दिया जाता है। कई जगह  हालात इतने खतरनाक हैं कि अत्यन्त अनुभवी और दक्ष पत्रकार भी या तो मारा जाता है या फिर हमले में घायल हो जाता है, जैसा कि अफगानिस्तान में हाल ही इन दो महिला पत्रकारों के साथ हुआ।'
ताजा हमला पाकिस्तान के मशहूर पत्रकार हामिद मीर पर हुआ, जिन पर कट्टरपंथियों ने गोलियां बरसाईं। वे बुरी तरह घायल हो गए। उनका इलाज चल रहा है लेकिन तालिबानी धमकियां उन्हें अभी भी लगातार मिल रही हैं। ब्रिटेन की संस्था आई.एन.एस.आई. (इंटरनेशनल न्यूज सैफ्टी इंस्टीट्यूट) ने गत वर्ष पांच देशों की सूची में भारत को पत्रकारों के लिए दूसरा खतरनाक देश बताया था।
कुछ माह पहले देश में छत्तीसगढ़ में माओवादियों ने जाने-माने पत्रकार साईं रेड्डी की निर्मम हत्या कर दी। साईं रेड्डी रमन सिंह सरकार द्वारा प्रायोजित सलवा जुडूम तथा माओवादियों के हिंसक आन्दोलन दोनों के खिलाफ माने जाते थे। साईं रेड्डी की हत्या पर हाल ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने  बयान जारी कर कहा कि 'गलतफहमी वश' उनकी हत्या हो गई। मुम्बई के खोजी पत्रकार ज्योतिर्मय डे को अंडरवल्र्ड के माफियाओं ने मार डाला था। वहीं मध्यप्रदेश के पत्रकार चन्द्रिका राय की परिवार सहित निर्मम हत्या कर दी गई। इसी तरह उत्तर प्रदेश में राकेश शर्मा, शशांक शुक्ला, जकाउल्ला और लेखराम भारती नामक पत्रकार अलग-अलग वारदातों में मारे जा चुके। छत्तीसगढ़ में पत्रिका के रायगढ़ ब्यूरो प्रवीण त्रिपाठी पर जानलेवा हमला किया गया। ये सभी घटनाएं पिछले साल-दो-साल की हैं।
पत्रकारों पर हमलों की घटनाएं तो अनगिनत हैं जिनमें वे या तो बाल-बाल बच गए या फिर घायल हुए। इसी तरह पत्रकारों को धमकाने या परिवार को आतंकित करने की घटनाओं में भी बेशुमार वृद्धि हुई है। गत दिनों 'द ट्रिब्यून' के संवाददाता देवन्दर पॉल के घर पर पेट्रोल बम से हमला किया गया जिसमें वे बाल-बाल बच गए। इस वर्ष जनवरी माह में कोलकाता में सरकारी सचिवालय के बाहर पत्रकारों की पुलिस ने उस वक्त पिटाई कर डाली, जब वे पं. बंगाल सरकार के एक कार्यक्रम को कवर करने गए थे। पत्रकारों ने जब विरोध जताया तो उन्हें पुलिस के एक आला अधिकारी ने धमकाया— 'तुम लोग मेरा पावर नहीं जानते? हमें हर व्यक्ति को हड़काने का अधिकार है।' पुलिस अफसर ही क्यों, गृह मंत्री सुशील कुमार शिन्दे भी सोलापुर की एक सभा के दौरान सरेआम मीडिया को 'कुचलने' की धमकी दे चुके हैं। हालांकि बाद में बात बढ़ती देख वे पलट गए कि उनका मतलब सोशल मीडिया से था। लेकिन इलेक्ट्रानिक मीडिया ने उनकी पोल खोल दी। टीवी पर कई बार उनका धमकी भरा ऑडियो-विजुअल प्रसारित किया गया। द्वारिका के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती ने एक पत्रकार को उस वक्त थप्पड़ जड़ दिया जब उसने नरेन्द्र मोदी के बारे में राजनीतिक सवाल पूछा।
इसमें दो राय नहीं अपनी साख को लेकर इस वक्त मीडिया के समक्ष सर्वाधिक चुनौती भरा दौर है। इसके बावजूद मीडिया की स्वायत्तता और सुरक्षा को लेकर कोई संशय नहीं होना चाहिए। मीडिया पर हमले अतिवादी गुटों, आतंकियों, बाहुबलियों के अलावा सरकारों द्वारा प्रायोजित व समर्थित भी होते हैं। अक्सर इनके बहुत सूक्ष्म रूप और तरीके रहते हैं। प्रेस स्वतंत्रता जैसे दिवस न केवल सरकारों को उनकी वचनबद्धता की याद कराते हैं बल्कि दुनिया भर के मीडिया संगठनों को स्वतंत्र अभिव्यक्ति के प्रति संकल्पित भी करते हैं।

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