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क्यों हो जनमत सर्वे पर रोक?

किसी राजनीतिक दल को लेकर जनता का एक समूह क्या विचार रखता है, उसको व्यक्त करने से रोकना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करना ही माना जाएगा। जनमत सर्वेक्षण एक रैण्डम पद्धति है। यह सारी दुनिया में 'सेफोलॉजी' के रूप में मान्य है।

  वर्ष 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ओपिनियन पोल्स (जनमत सर्वेक्षणों) पर रोक लगाना चाहती थी। बाकायदा अध्यादेश लाने की तैयारी हो चुकी थी। लेकिन अटार्नी जनरल सोली सोराबजी की राय के बाद सरकार ने अपना इरादा त्याग दिया। सोली सोराबजी ने जनमत सर्वेक्षणों पर प्रतिबंध के खिलाफ राय व्यक्त की थी।
वर्ष 2009 में मनमोहन सिंह सरकार एग्जिट पोल के साथ ही ओपिनियन पोल पर भी प्रतिबंध लगाने की इच्छुक थी। लेकिन अटार्नी जनरल मिलन बनर्जी ने सरकार को सलाह दी कि अगर ओपिनियन पोल्स प्रतिबंधित किए गए तो सुप्रीम कोर्ट उसे रद्द कर देगा। क्योंकि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा। सीधे तौर पर यह संविधान की धारा 19 (1) ए का उल्लंघन माना जाएगा। इसके विपरीत वर्ष 2013 में अटार्नी जनरल जी.ई. वाहनवती ने केन्द्र सरकार को जनमत सर्वेक्षणों पर रोक लगाने की सलाह दी। चुनाव आयोग पहले से ही यह मांग करता रहा है। यूपीए सरकार को भी इस बार जनमत सर्वेक्षणों पर प्रतिबंध अपने अनुकूल लग रहा है। लिहाजा चुनाव-पूर्व जनमत सर्वेक्षणों पर रोक को लेकर जी-तोड़ कवायद की जा रही है। इसी के चलते चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों से इस बारे में राय मांगी। मुख्यत: कांग्रेस प्रतिबंध के पक्ष में और भाजपा प्रतिबंध के खिलाफ है। कई अन्य छोटे दल तथा प्रादेशिक पार्टियां जनमत सर्वेक्षणों के पक्ष और खिलाफत में अपनी-अपनी राय व्यक्त कर चुकी हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि जो दल प्रतिबंध का समर्थन कर रहे हैं, वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ हैं। जो विरोध कर रहे हैं वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकार हैं। दलों का समर्थन या विरोध राजनीतिक कारणों से है तथा अवसरवादिता के अलावा कुछ नहीं है। लेकिन यह मुद्दा केवल मीडिया के लिए ही नहीं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से सरोकार रखने वाली सभी संस्थाओं और व्यक्तियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इस पर गंभीरता से चर्चा की जरूरत है। जो सवाल सीधे तौर पर उठते हैं, वे हैं—
क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में ओपिनियन पोल्स पर प्रतिबंध लगना चाहिए?
क्या जनमत सर्वेक्षण मतदाताओं की स्वतंत्र राय को प्रभावित करते हैं?
क्या जनमत सर्वेक्षणों पर प्रतिबंध का मतलब सीधे तौर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक है?
पहली बात, जनमत सर्वेक्षणों पर प्रतिबंध क्यों लगे? क्या दुनिया में किसी भी देश में जनमत सर्वेक्षणों पर प्रतिबंध है? सिर्फ फ्रांस में चुनाव से24 घंटे पहले जनमत सर्वे पर रोक है। यदि वहां कोई मीडिया संस्थान सर्वे के निष्कर्ष प्रकाशित ही करना चाहता है तो उसे सर्वे के नमूने और आंकड़ों की विश्लेषण पद्धति का खुलासा करके इजाजत लेनी होती है। अलबत्ता, यह जरूर कह सकते हैं कि भारत जैसे विशाल और विविध दलीय देश में जनमत सर्वेक्षण अभी उतने सटीक नहीं है। लेकिन क्या इन्हें अपनी त्रुटियों से सीखकर निखरने, अधिक वैज्ञानिक और तार्किक होने का अवसर नहीं मिलना चाहिए?
दूसरी बात, क्या जनमत सर्वेक्षण सचमुच मतदाताओं की स्वतंत्र राय को प्रभावित करते हैं। व्यवहार में तो ऐसा नहीं देखा गया। बल्कि कई बार तो उल्टा ही देखा गया है। सबको मालूम है ,2004 में जब सारे जनमत सर्वेक्षण एन.डी.ए. सरकार की वापसी का संकेत कर रहे थे तब यू.पी.ए. की सरकार सत्ता में आई। शायद ही कोई सर्वे एजेन्सी ऐसी होगी, जिसका कोई भी निष्कर्ष हमेशा शत-प्रतिशत सही साबित हुआ है। साफ है, जिसको जिसे वोट देना है वह उसी को देगा। मतदाता कई कारणों को आधार बना कर मतदान करता है। उस पर अकेले सर्वे का असर नहीं पड़ता। थोड़ा बहुत पड़ता भी है तो इतना कम कि उससे मतदान परिणाम प्रभावित नहीं होता।
तीसरी बात, जनमत सर्वेक्षणों पर रोक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखा जाना चाहिए या नहीं। क्यों नहीं। सोली सोराबजी और मिलन बनर्जी जैसे दिग्गज कानून विशेषज्ञों ने यूं ही सरकार को राय नहीं दी थी। 1999 में चुनाव आयोग ने कुछ दिशा-निर्देश तय करके जनमत सर्वे को प्रतिबंधित कर दिया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में मामला चला गया। कोर्ट ने कहा, आयोग को प्रतिबंध लगाने का हक नहीं। वह सिर्फ संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनावों पर नियंत्रण या देखरेख की शक्ति रखता है। किसी राजनीतिक दल को लेकर जनता का एक समूह क्या विचार रखता है, उसको व्यक्त करने से रोकना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करना ही माना जाएगा। तर्क दिया जाता है कि किसी क्षेत्र के लाखों लोग क्या सोचते हैं, यह सर्वेक्षणों में चंद लोगों की राय से कैसे जान सकते हैं। जनमत सर्वेक्षण एक रैण्डम पद्धति है। यह सारी दुनिया में 'सेफोलॉजी' के रूप में मान्य है। सभी देशों में इसी विधि से सर्वेक्षण किए जाते हैं। ऐसे में सर्वेक्षणों को प्रतिबंधित करना जनता की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करना है।
महत्त्वपूर्ण बात यह कि क्या यह प्रतिबंध जनमत सर्वे तक ही सीमित रहेगा? इस बात की क्या गारण्टी कि अखबारों में छपने वाले चुनाव-विश्लेषण, रिपोर्टें, समीक्षाएं और सम्पादकीयों पर भी प्रतिबंध की गाज नहीं गिरेगी? जब बात मतदाताओं को प्रभावित करने की ही हो तो मीडिया पर प्रतिबंध की सूची में सबसे पहले आने का खतरा होगा। जिस दल या नेता के खिलाफ रिपोर्टिंग होगी, वही मीडिया के खिलाफ हो जाएगा और प्रतिबंध की मांग करेगा।
जनमत सर्वेक्षणों पर रोक का  मजबूत तर्क यह है 'पेड न्यूज' की तरह 'पेड ओपिनियन पोल' पर भी रोक लगनी चाहिए। जिस तरह 'पेड न्यूज' पर रोक का आशय 'न्यूज' पर रोक नहीं है, उसी तरह 'पेड ओपिनियन पोल' पर प्रतिबंध का आशय भी 'ओपिनियन पोल' पर प्रतिबंध नहीं होना चाहिए। दोनों में फर्क जरूरी है। 'पेड ओपिनियन पोल' या स्पॉन्सर्ड ओपिनियन पोल पर प्रतिबंध का शायद ही कोई विरोध करेगा। जनमत सर्वेक्षणों के सर्वमान्य मापदंड बनाए जा सकते हैं, जिनका पालन जरूरी हो, तो भी स्वीकार्य होगा। लेकिन स्वतंत्र 'ओपिनियन पोल' पर प्रतिबंध लगाना स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर रोक लगाने के समान ही खतरनाक साबित होगा।

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1 comments:

रविकर said...

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीयचर्चा मंच पर ।।