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सहजीवन पर बहस

सहजीवन (लिव-इन-रिलेशनशिप) पर सुप्रीम कोर्ट की राय और राधा-कृष्ण के उल्लेख से देश में बहस छिड़ी हुई है। पाठकों की लगातार प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं। इस बारे में पत्रिका का सर्वे (27 मार्च) भी मत-विमत की आधार भूमि बना है।

कोटा से डॉ. वैभव गुप्ता ने लिखा- 'सर्वे में हालांकि 82 फीसदी लोगों ने शादी किए बगैर महिला-पुरुष का साथ रहना अनुचित माना है। लेकिन शेष 18 फीसदी लोगों का सहजीवन को उचित ठहराना सोचने को मजबूर करता है कि हमारा भावी सामाजिक ढांचा कैसा बनने जा रहा है। जिस देश में विवाह को एक संस्कार समझा जाता हो, विवाह-पूर्व शारीरिक सम्बन्ध अपवित्र माने जाते हों, वहां 18 फीसदी लोगों की ऑन रिकार्ड स्वीकृति हमें एक ऐसी सच्चाई से रू बरू कराती है जिससे हम आंख मूंदे रखना चाहते हैं। जरा हमारी मौजूदा जीवन-शैली तो देखें। साफ है सहजीवन आज नहीं तो कल सामाजिक सच्चाई बनकर रहेगी।'

जयपुर से श्याम शरण बियानी ने लिखा- 'लिव-इन-रिलेशनशिप पर पत्रिका के सर्वे से प्रमाणित है कि विवाह एक मजबूत और सार्थक संस्था है, जिसे कोई तार-तार नहीं कर सकता। मैं बुजुर्गों और महिलाओं की बात नहीं करता। विवाह से पूर्व शारीरिक सम्बन्धों को 76 प्रतिशत युवाओं ने भी नकार दिया। हम युवाओं पर अक्सर भटक जाने का आरोप लगाते हैं। मेरी समझा में आज के युवा अत्यन्त समझादार और जिम्मेदार हैं। उनके नाम पर भविष्य के समाज की ऊल-जलूल कल्पनाएं करना निरर्थक हैं।'

अहमदाबाद से हरीश पारिख ने लिखा- 'आधुनिक लिव-इन-रिलेशनशिप की पौराणिक राधा-कृष्ण से तुलना करने पर मुझा जैसे कई धार्मिक व्यक्तियों को ठेस पहुंची है। गुलाब कोठारी ने 'बहस तो करें' (26 मार्च) में सही लिखा कि राधा-कृष्ण के स्वरू प को समझाने के लिए एक जन्म काफी नहीं है। एक दार्शनिक और आध्यात्मिक सम्बन्ध की वर्तमान के भोग-पिपासु और वासनामय रिश्तों से तुलना करना अनुचित है। 'भोपाल से मोहनदास आसुदानी ने लिखा- 'हमारे धार्मिक ग्रंथों में राधा का कहीं उल्लेख नहीं है। राधा की कल्पना लौकिक अवतरण है। श्रीकृष्ण से सम्बन्धित प्रमुख ग्रंथ 'महाभारत' और 'श्रीमद् भागवत महापुराण' में कहीं राधा का उल्लेख नहीं है। हरिवंश और विष्णु पुराण में भी राधा का नाम तक नहीं है। सातवी-आठवीं शताब्दी के बाद रचे गए ग्रंथों में जाकर राधा का उल्लेख आता है। राधा और कृष्ण स्त्री और पुरुष के परस्पर प्राकृतिक प्रेम, सहज आकर्षण और आवश्यकता के प्रतीक हैं।'
उदयपुर से भूपेन्द्र सिंह ने लिखा- 'जिस तेजी से प्रेम-विवाह विफल हो रहे हैं तथा जिस तादाद में तलाक के मामले बढ़ रहे हैं उसे देखते हुए लिव-इन-रिलेशनशिप में क्या खामी है? पति-पत्नी में अंडरस्टैंडिंग न हो तो कैसा विवाह? नीरस रिश्तों को ढोने से कोई फायदा नहीं। लिव-इन-रिलेशनशिप का ट्रेंड दो जनों के बीच अंडरस्टैंडिंग मजबूत करने का माध्यम है।'
इंदौर से डॉ. डी.सी. भारद्वाज ने लिखा- 'विवाह से पूर्व एक दूसरे को समझा लेना बहुत जरू री है। 40 फीसदी विवाह सिर्फ इसलिए टूटते हैं कि पति-पत्नी के बीच भावनात्मक सहयोग की कमी है। शायद इसीलिए पश्चिम के लेखक व दार्शनिक बर्टेन्ड रसेल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'मैरिज एण्ड मोरेल्स' में 'ट्रायल मैरिज' का विचार प्रस्तुत किया था। आज का लिव-इन-रिलेशनशिप इसी विचार का क्रियारूप है। 'इंदौर से ही दिनेश अहिरवार के अनुसार- 'पश्चिम की जीवन और विचार शैली से प्रभावित होकर हम कई बेसिर-पैर के निर्णय कर रहे हैं जो हमारी सेहत (संस्कृति) के लिए ठीक नहीं है। जापान, चीन जैसे देश इसीलिए तरक्की कर सके क्योंकि इन देशों ने अपने मूलभूत विचार और जीवन पर कभी दूसरे देशों को हावी नहीं होने दिया।'
बीकानेर से दुर्गेश्वरी पारीक ने लिखा- 'स्त्री-पुरुष के बीच रिश्तों को चाहे जिस ढंग से निभाएं पलड़ा स्त्री का ही हमेशा कमजोर रहता है। न्यायालय ने सहजीवन को स्वीकृति देकर कम-से-कम कानूनी तौर पर तो स्त्री के अधिकार को सुरक्षित कर दिया है।'

भरतपुर से नम्रता राजवंशी ने लिखा- सबसे ज्यादा भुगतना बच्चों को पड़ेगा। ऐसे युगलों से उत्पन्न संतान के समक्ष सामाजिक मान्यता का संकट सदैव उपस्थित रहेगा- भले ही कानूनी स्थिति कुछ भी हो।'

बेंगलूरु से दुष्यन्त मेहता ने लिखा- 'जरूरत है आज के युवाओं की स्थिति को सहानुभूतिपूर्वक समझाने की। कॅरियर, प्रतिस्पद्र्धा, तनाव और महानगर की भागमभाग जिंदगी में उन्हें कहां फुरसत है- शादी के बारे में सोचने की। शादी के बगैर साथ रहकर युवा जोड़े एक दूसरे को सुकून और संबल देते हैं। प्लीज, उनका सुकून मत छीनिए।'

जबलपुर से देवेश श्रीवास्तव के अनुसार- 'लिव-इन-रिलेशनशिप महज वासनापूर्ति का नाम है। फिर तो समलैंगिकता और पार्टनर के अलावा भी दूसरे व्यक्ति से सैक्स संबंधों को मान्य करना होगा।'

जोधपुर से प्रो. शारदा माथुर ने लिखा- 'विवाह एक संस्कार ही नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व भी है। समाज में रहते हुए आप उससे मुंह नहीं फेर सकते। आपकी जो हैसियत या शख्सियत है उसमें समाज का भी योगदान है। विवाह पुरखों का कर्ज उतारना है तो पुरखों का धर्म निबाहना भी है। इसलिए जब तक विवाह संस्था का कोई बेहतर विकल्प नहीं मिले- इसे बचाना जरूरी है। सहजीवन बेहतर तो क्या, विवाह का अभी काम-चलाऊ विकल्प भी नहीं बन पाया है।'

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