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नक्सली हैं या आतंकी

जयपुर से हरीश मित्तल ने लिखा- 'सचमुच विचलित कर देने वाली फोटो (पत्रिका, 8 अक्टूबर) थी वह! सम्पादकीय पेज पर झारखंड के पुलिस इंस्पेक्टर फ्रांसिस इंदूवार की सिर कटी खून से लथपथ लाश का चित्र देखकर कौन विचलित नहीं हुआ होगा। माओवादी नक्सलियों ने इंस्पेक्टर का अपहरण करके बड़ी बेरहमी से उनका गला रेत दिया था। नक्सली विचार धारा का वैसे तो मानवता से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन यह तो हैवानियत की हद है।'
सेवा निवृत्त सिविल इंजीनियर गंगाधर शर्मा (जयपुर) ने लिखा- 'क्या हत्यारे नक्सलियों को इंस्पेक्टर की पत्नी सुनीता इंदूवार का करुण क्रन्दन सुनाई पड़ेगा? या फिर वे 14 वर्षीय उस बालक का आक्रोश सुनेंगे जिसने रोते हुए कहा- 'उन्होंने मेरे पापा को मारा, मैं भी बड़ा होकर उन्हें मारूंगा। या फिर गढ़चिरौली में 18 शहीद पुलिसकर्मियों की विधवाओं, बच्चों और परिजनों का आर्तनाद सुनेंगे, जिन्हें नक्सलियों ने गोलियों से भून दिया था। आखिर निर्दोष व्यक्तियों की हत्याएं करके नक्सली संगठन भारतीय व्यवस्था में कैसा बदलाव लाना चाहते हैं। क्या नक्सलियों और खूंखार आतंककारियों में कोई फर्क है?'
प्रिय पाठकगण!
झारखंड में इंस्पेक्टर इंदूवार की हत्या के दो दिन बाद ही महाराष्ट्र में नक्सलियों ने एक साथ 18 पुलिकर्मियों को मौत के घाट उतार दिया। देश के कई हिस्सों में पिछले दिनों नक्सलियों की खूनी वारदातें बढ़ रही हैं। पाठकों की राय में सरकार की ढुलमुल नीति के कारण ही नक्सलियों के हौसले बढ़ते जा रहे हैं। गृहमंत्री पी। चिदम्बरम ने इंदूवार की हत्या के तुरन्त बाद बयान दिया कि हम अपने ही लोगों (नक्सलियों) से युद्ध नहीं कर सकते। नक्सलियों ने गृहमंत्री की इस उदारता का जवाब अगले ही दिन 18 पुलिसकर्मियों की हत्या करके दिया। पाठकों का दृष्टिïकोण है कि केन्द्र सरकार व राज्य सरकारें और कितने बेकसूरों की हत्याओं का इंतजार कर रही हैं।

जोधपुर से गोपाल अरोड़ा ने लिखा- 'झारखंड और महाराष्टï्र में दो दिन के भीतर नक्सलियों के हमले में 19 पुलिसकर्मी शहीद हो गए। पिछले दस वर्र्षों में छह हजार से अधिक लोग नक्सली हमलों का शिकार हो चुके हैं। 15 राज्यों के 150 जिले इनके खौफ से भयभीत हैं। नक्सली भारत में नासूर बन चुके हैं। अगर अब भी सरकार नहीं चेती तो पड़ोसी देश में तालिबानियों ने जिस तरह अपना वर्चस्व स्थापित किया, नक्सलवादी पूरे भारत में अपना वर्चस्व कायम कर सकते हैं।'

अजमेर से दयानंद विश्वविद्यालय की छात्रा कु। प्रियंका माथुर के अनुसार- 'यह सही है कि नक्सली आमतौर पर पुलिसकर्मियों पर ही हमला बोलते हैं, लेकिन पुलिसवाले इनसान नहीं हैं क्या? उनके भी बीवी-बच्चे हैं।

पाली से रूपनारायण सोनी ने लिखा- 'नक्सली किसी के सगे नहीं है। वे दावा तो गरीबों की हिमायत का करते हैं, लेकिन उनके मकसद में जो भी बाधक होता है वे उसे रास्ते से हटा देते हैं।'
हनुमानगढ़ से दीपक बंसल ने लिखा- 'माओवादी नक्सलवादी संगठन अपनी राह से पूरी तरह से भटक गए हैं।' चेन्नई से मोहन एस। राघवन ने लिखा- 'हिंसा की बुनियाद पर बने किसी भी संगठन का लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई स्थान नहीं हो सकता। नक्सलियों को हिंसा के अलावा कुछ नहीं सूझता। वे मानवता के दुश्मन हैं।'

प्रिय पाठकगण! सही कहा है। हिंसा अपने आप में सबसे बड़ा गुनाह है। इसलिए हिंसा की राह पर चलने वाले संगठन और व्यक्तियों के प्रति सरकार को कोई नरमी नहीं बरतनी चाहिए- भले ही वे अपने देश के ही क्यों न हों।
रुखसाना को सलाम

29 सितंबर के अंक में प्रकाशित समाचार 'साहस नारी का' पर पाठकों के अनेक पत्र मिले हैं। जम्मू-कश्मीर के राजौरी जिले में लश्कर-ए-तैयबा के तीन दुर्दान्त आतंककारी एक घर में घुस आए थे। उनके हाथों में बंदूकें थी और वे परिवार के सदस्यों को ललकार रहे थे। इसी बीच 22 वर्षीय युवती रुखसाना ने अप्रतिम साहस का परिचय देते हुए आतंककारियों पर हमला बोल दिया। एक आतंककारी को रुखसाना ने कुल्हाड़ी के वार से मार गिराया। दो आतंककारी उल्टे पांव भाग छूटे। पूरे परिवार ने राहत की सांस ली।

अजमेर से जावेद खान, शमीम अख्तर, जयपुर से रक्षिता वर्मा, तन्वी जैन, रूपनारायण, अहमदाबाद से संतोष पारेख, श्रीगंगानगर से देवकीनंदन बंसल, उदयपुर से देवेन्द्र उपाध्याय के पत्रों का सार है कि अगर कश्मीर सहित देश के नागरिक रुखसाना जैसा हौसला अख्तियार कर ले तो देश में आतंकवाद का नामो-निशान नहीं बचेगा। कश्मीर की आम जनता अलगाववादियों और आतंकी संगठनों को पूरी तरह नकार चुकी है- यह बात तो विधानसभा चुनाव में कश्मीरी जनता की रिकॉर्ड भागीदारी से ही सिद्ध हो चुकी थी। लेकिन कश्मीर के लोग अब आतंककारियों को उनकी भाषा में ही जवाब देने लगे हैं- यह रुखसाना ने साबित कर दिया।
रुखसाना के साहस को पूरे देश का सलाम!

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2 comments:

पी.सी.गोदियाल said...

कायर है, कायर न होते तो नृशंसता से निहत्तो को मारते, इतना ही दम होता तो सहर में आकर इन सफ़ेद पोशो को न मारते, गली में तो कुत्ता भी अपने को शेर समझता है !

Pramod vaishnav said...

सर, आपने पत्रिका के लोकप्रिय स्तंभ अपनी बात में देश की सबसे बड़ी समस्या नक्सलवाद पर ध्यान खींचने का जो प्रयास किया है वह प्रशंसनीय हैं। यह सही है कि नक्सलवादियों ने जो तरीका अपनी मांगो को मनवाने के लिए अख्तियार किया हुआ है, वह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। उनको अपनी बात कहने के लिए शांतिपूर्ण साधनों को काम में लेना चाहिए। अपनी बात स्तंभ में भी अधिकांश प्रबुद्ध पाठकों के यहीं विचार हैं। लेकिन यह बात तय है कि जब तक सरकार इस पूरे नक्सली इलाके के विकास पर समुचित ध्यान नहीं देगी तब तक इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। गौरतलब है कि जिस इलाके में नक्सली अपने नापाक हरकतों को अंजाम दे रहे हैं उन इलाकों में शिक्षा का प्रतिशत न्यूनतम है, मूलभूत सुविधाएं ढूंढने से भी नहीं मिलती। कुपोषण चरम पर है, भूखमरी एक स्थायी समस्या है और बेरोजगारी अपने परवान पर है। ऐसे में उन भोले-भाले नागरिकों को बरगलाना किसी भी बाहरी ताकत के लिए आसान हो जाता है, जो दो जून की रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसलिए सरकार को भी अपना पुलिसिया रवैया छोड़कर इस क्षेत्र के विकास पर ज्यादा देना चाहिए, वहीं नक्सलियों को खून खराबे का रास्ता छोड़कर सरकार से अपनी समस्याओं के समाधान के लिए उचित माध्यम से बात करनी चाहिए। तभी इस समस्या का स्थायी समाधान संभव है।