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प्रेस की स्वतंत्रता और हमले


प्रेस की स्वतंत्रता के कई बिन्दु हैं। स्वतंत्र अभिव्यक्ति का परिवेश, मीडिया के लिए मजबूत वैधानिक ढांचा, पारदर्शिता, पत्रकारों की सुरक्षा आदि कई पक्ष हैं जिनसे प्रेस की स्वतंत्रता का स्तर आंका जाता है। इनमें पत्रकारों की सुरक्षा काफी महत्वपूर्ण है।

हाल ही प्रेस स्वतंत्रता दिवस (3 मई) आया और चला गया।  चुनावी हलचल के बीच शायद इस पर किसी का ध्यान ही नहीं गया। प्रेस की स्वतंत्रता के लिए दुनिया में यह दिन खास तौर पर याद किया जाता है। यूनेस्को ने 3 मई 1991 में नामीबिया के विंडोक शहर में विश्व-सम्मेलन आयोजित किया था। सम्मेलन में शामिल सभी देशों ने मिलकर प्रेस की स्वतंत्रता के सिद्धान्त मंजूर किए थे। तब से ही विश्व भर की सरकारों को प्रेस की स्वतंत्रता के प्रति वचनबद्धता की याद दिलाने के लिए 3 मई विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है। मीडिया संगठनों और पत्रकारों के लिए ही नहीं, लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था रखने वाले हर व्यक्ति के लिए यह दिवस मायने रखता है।
प्रेस की स्वतंत्रता के कई बिन्दु हैं। स्वतंत्र अभिव्यक्ति का परिवेश, मीडिया के लिए मजबूत वैधानिक ढांचा, पारदर्शिता, पत्रकारों की सुरक्षा आदि कई पक्ष हैं जिनसे प्रेस की स्वतंत्रता का स्तर आंका जाता है। इनमें पत्रकारों की सुरक्षा काफी महत्वपूर्ण है। दुनियाभर में पत्रकारों पर बढ़ते हमलों की घटनाएं प्रेस की स्वतंत्रता की राह में सबसे बड़ी बाधा है। पिछले साल भर का रिकार्ड देखें तो पाएंगे कि विश्व में पत्रकारों पर जहां जानलेवा हमले किए गए, वहीं उन्हें जान से मारने की धमकियां भी कम नहीं मिलीं। 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' के 2014 के विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक के अनुसार 180 देशों में प्रेस की स्वतंत्रता के हनन के मामले साल-दर-साल बढ़ रहे हैं। मौजूदा प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 3395 से बढ़कर 3456 पर पहुंच गया है। इसका मतलब है दुनिया के विभिन्न देशों में प्रेस की स्वतंत्रता के हनन की घटनाएं1.8 फीसदी दर से बढ़ रही है। 'हफिंगटन पोस्ट' के अनुसार इस साल अब तक दुनिया के विभिन्न हिस्सों में 14 पत्रकार हमलों में मारे जा चुके हैं। जबकि पिछले वर्ष कम-से-कम 70 पत्रकारों की हत्या की गई थी। अफगानिस्तान, टर्की, और सीरिया आदि तो ऐसे देश हैं जहां पत्रकारिता करना सबसे खतरनाक पेशा बन गया है। अफगानिस्तान में गत माह ही एसोसिएट प्रेस की दो महिला पत्रकारों को गोली मार दी गई जिसमें प्रेस फोटोग्राफर एन्जा नेडरिगंस मारी गईं और केथी गेनन बुरी तरह से घायल हो गईं। सी.पी.जे. (कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स) के डिप्टी एडिटर रॉब मोने के अनुसार— 'विश्व में प्रत्येक आठ दिनों के दरम्यान कम से कम एक पत्रकार मार दिया जाता है। कई जगह  हालात इतने खतरनाक हैं कि अत्यन्त अनुभवी और दक्ष पत्रकार भी या तो मारा जाता है या फिर हमले में घायल हो जाता है, जैसा कि अफगानिस्तान में हाल ही इन दो महिला पत्रकारों के साथ हुआ।'
ताजा हमला पाकिस्तान के मशहूर पत्रकार हामिद मीर पर हुआ, जिन पर कट्टरपंथियों ने गोलियां बरसाईं। वे बुरी तरह घायल हो गए। उनका इलाज चल रहा है लेकिन तालिबानी धमकियां उन्हें अभी भी लगातार मिल रही हैं। ब्रिटेन की संस्था आई.एन.एस.आई. (इंटरनेशनल न्यूज सैफ्टी इंस्टीट्यूट) ने गत वर्ष पांच देशों की सूची में भारत को पत्रकारों के लिए दूसरा खतरनाक देश बताया था।
कुछ माह पहले देश में छत्तीसगढ़ में माओवादियों ने जाने-माने पत्रकार साईं रेड्डी की निर्मम हत्या कर दी। साईं रेड्डी रमन सिंह सरकार द्वारा प्रायोजित सलवा जुडूम तथा माओवादियों के हिंसक आन्दोलन दोनों के खिलाफ माने जाते थे। साईं रेड्डी की हत्या पर हाल ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने  बयान जारी कर कहा कि 'गलतफहमी वश' उनकी हत्या हो गई। मुम्बई के खोजी पत्रकार ज्योतिर्मय डे को अंडरवल्र्ड के माफियाओं ने मार डाला था। वहीं मध्यप्रदेश के पत्रकार चन्द्रिका राय की परिवार सहित निर्मम हत्या कर दी गई। इसी तरह उत्तर प्रदेश में राकेश शर्मा, शशांक शुक्ला, जकाउल्ला और लेखराम भारती नामक पत्रकार अलग-अलग वारदातों में मारे जा चुके। छत्तीसगढ़ में पत्रिका के रायगढ़ ब्यूरो प्रवीण त्रिपाठी पर जानलेवा हमला किया गया। ये सभी घटनाएं पिछले साल-दो-साल की हैं।
पत्रकारों पर हमलों की घटनाएं तो अनगिनत हैं जिनमें वे या तो बाल-बाल बच गए या फिर घायल हुए। इसी तरह पत्रकारों को धमकाने या परिवार को आतंकित करने की घटनाओं में भी बेशुमार वृद्धि हुई है। गत दिनों 'द ट्रिब्यून' के संवाददाता देवन्दर पॉल के घर पर पेट्रोल बम से हमला किया गया जिसमें वे बाल-बाल बच गए। इस वर्ष जनवरी माह में कोलकाता में सरकारी सचिवालय के बाहर पत्रकारों की पुलिस ने उस वक्त पिटाई कर डाली, जब वे पं. बंगाल सरकार के एक कार्यक्रम को कवर करने गए थे। पत्रकारों ने जब विरोध जताया तो उन्हें पुलिस के एक आला अधिकारी ने धमकाया— 'तुम लोग मेरा पावर नहीं जानते? हमें हर व्यक्ति को हड़काने का अधिकार है।' पुलिस अफसर ही क्यों, गृह मंत्री सुशील कुमार शिन्दे भी सोलापुर की एक सभा के दौरान सरेआम मीडिया को 'कुचलने' की धमकी दे चुके हैं। हालांकि बाद में बात बढ़ती देख वे पलट गए कि उनका मतलब सोशल मीडिया से था। लेकिन इलेक्ट्रानिक मीडिया ने उनकी पोल खोल दी। टीवी पर कई बार उनका धमकी भरा ऑडियो-विजुअल प्रसारित किया गया। द्वारिका के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती ने एक पत्रकार को उस वक्त थप्पड़ जड़ दिया जब उसने नरेन्द्र मोदी के बारे में राजनीतिक सवाल पूछा।
इसमें दो राय नहीं अपनी साख को लेकर इस वक्त मीडिया के समक्ष सर्वाधिक चुनौती भरा दौर है। इसके बावजूद मीडिया की स्वायत्तता और सुरक्षा को लेकर कोई संशय नहीं होना चाहिए। मीडिया पर हमले अतिवादी गुटों, आतंकियों, बाहुबलियों के अलावा सरकारों द्वारा प्रायोजित व समर्थित भी होते हैं। अक्सर इनके बहुत सूक्ष्म रूप और तरीके रहते हैं। प्रेस स्वतंत्रता जैसे दिवस न केवल सरकारों को उनकी वचनबद्धता की याद कराते हैं बल्कि दुनिया भर के मीडिया संगठनों को स्वतंत्र अभिव्यक्ति के प्रति संकल्पित भी करते हैं।

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मतदान और सोशल मीडिया

सोशल मीडिया पर खासकर युवा  परिचितों और विभिन्न समूहों को मतदान के लिए प्रेरित कर रहे हैं। देखने में आ रहा है कि 40 के आस-पास की पीढ़ी भी मतदान के लिए सोशल नेटवर्किंग का भरपूर इस्तेमाल कर रही है।

आम चुनाव का छठा चरण 24 अप्रेल को सम्पन्न होगा जिसमें 12 राज्यों के 117 सीटों पर मतदान होगा। इससे पहले (17 अप्रेल) पांचवें चरण में 121 सीटों पर मतदान के साथ ही देश की तकरीबन आधी संसदीय सीटों पर मतदान हो चुका है। मतदान के आंकड़ों को देखें, तो साफ है कि लगभग सभी राज्यों में मतदान प्रतिशत बढ़ा है। पांचवें चरण के मतदान में मणिपुर जरूर अपवाद है जहां गत बार (2009) की तुलना में तीन फीसदी वोटिंग घटी। शेष राज्यों में मतदान प्रतिशत का आंकड़ा लगातार बढ़ता हुआ दिखाई पड़ रहा है। इसमें दो राय नहीं कि लोगों में मतदान के प्रति रुझाान बढऩे के कई कारण हैं। इनमें चुनाव आयोग की सक्रियता, सामाजिक संगठनों, संस्थाओं, प्रिन्ट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का पूरा योगदान है। लेकिन विश्लेषकों के अनुसार इसमें सोशल मीडिया की सबसे बड़ी भूमिका है। अब तक के सभी चरणों के मतदान सोशल नेटवर्किंग पर छाये हुए हैं।
सोशल मीडिया पर लोग खासकर युवा फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्स एप, इंस्टाग्राम, लिंक्ड इन आदि पर मित्रों, शुभचिन्तकों, परिचितों और विभिन्न समूहों को मतदान के लिए प्रेरित कर रहे हैं। देखने में आ रहा है कि 40 के आस-पास की पीढ़ी भी मतदान के लिए सोशल नेटवर्किंग का भरपूर इस्तेमाल कर रही है। लोग मतदान के बाद स्याही लगी अंगुली दिखाते हुए तस्वीरें शेयर कर रहे हैं। मतदान वाले दिन तो 'ट्विटर' पर 'आई वोटेड' टॉपिक दिनभर ट्रेंड करता है। व्हाट्स एप पर मतदान के लिए लाखों की तादाद में मैसेज शेयर किए जा रहे हैं। जब आपका कोई परिचित या प्रिय व्यक्ति फेसबुक या व्हाट्स एप पर कहता है, 'मैंने वोट डाला, आप भी डालें', तो इसका आप पर असर जरूर पड़ता है। इस तरह के संदेशों की सोशल मीडिया में जैसे बाढ़ आई हुई है।
हालांकि वर्ष 2009 में भी और कुछ माह पहले हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी सोशल मीडिया का असर देखा गया था। लेकिन आम चुनाव-2014  इस मायने में अब तक के सभी चुनावों में विशेष है। मतदान प्रतिशत बढऩे का कारण कई राजनीतिक विश्लेषक यह मानते हैं कि खास राजनेता और दल के प्रति लोगों का इस बार जबरदस्त रुझान है। कुछ हद तक वे सही हो सकते हैं। लेकिन मतदान बढऩे के पीछे सोशल मीडिया की भूमिका को अनदेखा नहीं किया जा सकता। इस बार का चुनाव अनूठा है कि वर्चुअल संसार राजनीतिक प्रचार का सशक्त माध्यम बनकर उभरा है। इसका आभास आम चुनाव-२०१४ की घोषणा से काफी पहले हो चुका था। आपको याद होगा आई.आर.आई.एस. नालेज फाउंडेशन तथा इंटरनेट एवं मोबाइल एसोसिशन ऑफ इंडिया के संयुक्त तत्वावधान में एक अध्ययन किया गया था जिसकी मीडिया में खूब चर्चा हुई थी। 'पत्रिका' के पाठक इस स्तंभ में विस्तृत रूप से    (7 जनवरी 2014) इस बारे में पढ़ चुके हैं। इस अध्ययन में कहा गया था कि 543 लोकसभा सीटों में से 160 सीटों के नतीजों को सोशल मीडिया प्रभावित कर सकता है। इस अध्ययन के बाद देश के राजनीतिक मिजाज में खासा परिवर्तन आ चुका है। हम बात चुनाव परिणामों पर प्रभाव की नहीं कर रहे। हमारा फोकस देशव्यापी मतदान प्रतिशत बढऩे पर है।
अनेक बड़े शहरों में बढ़ता हुआ मतदान का आंकड़ा इस बात का सबूत है कि पढ़ा-लिखा शहरी वर्ग भी वोटिंग के लिए बड़ी तादाद में घर से निकलकर आया है। देश में करीब 20 करोड़ इंटरनेट यूजर्स हैं। फेसबुक के मामले में भारत दुनिया का नं. 2  देश है। यहां करीब 14 करोड़ उपभोक्ता शहरी हैं। वे एक-दूसरे से मनोरंजन के साथ ही ज्वलंत मुद्दों और राजनीतिक विषयों पर खुलकर विमर्श कर रहे हैं। ऐसे में यह विशाल समूह मतदान के प्रति उदासीन रहे, यह संभव नहीं। दूसरी ओर गांवों में भी यह समूह तेजी से विस्तार पा रहा है। इंटरनेट एवं मोबाइल एसोसिएशन की रिपोर्ट के अनुसार भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की विकास दर शहरों से भी ज्यादा है, जो इस समय 58 फीसदी सालाना तक पहुंच गई है। सोशल नेटवर्किंग पर सक्रिय भारत के गांवों-शहरों में एक विशाल और नए किस्म का राजनीतिक समूह बन चुका है। यह समूह अपनी सक्रिय भूमिका निभाते हुए नजर आता है।
क्या कहता है विदेशी मीडिया
चुनावों को लेकर देश के मीडिया और राजनीतिक पंडितों के अपने-अपने विश्लेषण और अनुमान है। लेकिन नौ चरणों में हो रहे हमारे इन चुनावों को विदेशी मीडिया किस नजर से देख रहा है, आइए जानें—
गार्जियन ने नरेन्द्र मोदी की चर्चा करते हुए 'मोदी नोमिक्स' यानी गुजरात पैटर्न की अर्थव्यवस्था को तेजी से विकसित जरूर बताया लेकिन अखबार के दृष्टिकोण में गुजरात मानव विकास सूचकांक के मामले में निराश करता है।
द साउथ  चाइना पोस्ट ने भारत के अगले प्रधानमंत्री को सलाह देते हुए लिखा कि उसे चीन और भारत के संदर्भ में व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। अखबार के अनुसार व्यापार और कूटनीतिक सम्बन्ध दोनों देशों के बीच सबसे उत्तम रास्ता है।
फोरेन अफेयर्स का मानना है कि भारत में कोई भी प्रधानमंत्री का पद संभाले, उसके लिए विदेश नीति में कोई नाटकीय और दूरगामी परिवर्तन करना संभव नहीं होगा।
द न्यूयार्क टाइम्स ने मौजूदा चुनावों के संदर्भ में लिखा—तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ऐसी शख्सियत हैं जो अगली किसी भी साझाा सरकार को बनाने या तोडऩे में मुख्य भूमिका अदा कर सकती हैं।

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बख्शे न जाएं अफसर!

 टिप्पणी
राज्य सरकार जयपुर के अमानीशाह नाले के बहाव क्षेत्र में आ रही जमीन का मालिकाना हक निरस्त करेगी। इस क्षेत्र में आ रही निजी खातेदारों की जमीन चिक्षित करके पहली सूची जिला कलक्टर को भेज दी गई है। अब कलक्टर यह सूची राजस्व न्यायालय में पेश करेंगे। यानी शहर से गुजर रहे 40 किमी लम्बे नाले के बहाव-क्षेत्र में अवरोधों को दूर करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। देखने पर यह सारी कार्रवाई जयपुर विकास प्राधिकरण के काबिल अफसरों की लगती है। नौकरशाही को कितनी चिन्ता है प्राकृतिक नदी-नालों की! पर्यावरण की और नगर के संतुलित विकास की! लेकिन हकीकत शायद हर शहरवासी जानता है।
राजस्थान हाईकोर्ट के सख्त आदेश और बार-बार लगाई गई फटकार के बिना क्या इन अफसरों के कानों में जूं तक रेंगती? कोर्ट की सक्रियता और अवमानना से घबराए अफसरों के पास और कोई चारा भी नहीं बचा था। शुक्र है, प्राकृतिक जलाशयों और पर्यावरण पर माननीय न्यायालय की नजर है वरना जेडीए अफसर पूरे अमानीशाह नाले को ही बेच डालते। जिस तरह भू-राजस्व कानून की धज्जियां उड़ाते हुए नाले के बहाव क्षेत्र में जमीनों के आवंटन किए गए उससे सरकारी अफसरों ने भले ही अपनी जेबें गरम कर ली, लेकिन पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य के साथ भयानक खिलवाड़ हुआ। नाले के जहरीले पानी में लगाई गई सब्जियां शहरवासियों के पेट में लम्बे समय से जहर घोल रही हैं। संभवत: इसीलिए हाईकोर्ट द्वारा नियुक्त कमिश्नरों ने भी अपनी रिपोर्ट में बहाव क्षेत्र की खातेदारी खत्म करने की जरूरत बताई। हाईकोर्ट तो बहुत पहले ही नदी-नालों, बांध, तालाब आदि सभी जलाशयों के बहाव क्षेत्रों में अतिक्रमण, अवैध निर्माण तथा 1955 के भू-राजस्व कानून के विरुद्ध किए गए आवंटनों को निरस्त करने के आदेश दे चुका है। लेकिन  संबंधित अधिकारी कानों में तेल डालकर लोगों को लूटते रहे। सरकार आंखों पर पट्टी बांधकर बैठी रही। सरकार का यही रवैया राज्य में अधिकांश प्राकृतिक जलाशयों को सूखने के कगार तक पहुंचाने के लिए जिम्मेदार है।
रामगढ़ बांध का हाल सबके सामने है। रामगढ़ ही क्यों राज्य की कई झाीलों-तालाबों का यही हाल है जो लालची अफसरों और राजनेताओं की मिलीभगत का नतीजा है। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्य भी इस 'बीमारी' से मुक्त नहीं हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट तक के स्पष्ट निर्देश हैं कि जलाशयों के प्राकृतिक प्रवाह में किसी तरह का अवरोध नहीं होना चाहिए। राज्य हाईकोर्ट अपने आदेश में जलस्रोतों की जमीन का आवंटन रोकने की स्पष्ट हिदायत दे चुका है। कोर्ट यह तक कह चुका है कि अदालती आदेश के विपरीत आवंटन होने पर दोषी अधिकारी व लाभार्थी दोनों को बक्शा न जाए। ऐसे में जेडीए का जमीन आवंटन निरस्त करने का यह फैसला तब तक अधूरा है, जब तक कि अवैध आवंटन के जिम्मेदार अधिकारी को भी सजा नहीं मिले।
आवंटन निरस्त होने पर खातेदार को तो सजा मिल ही जाएगी, लेकिन अफसर खुले घूमते रहेंगे, यह नहीं चलेगा। भले ही अफसर रिटायर हो चुका हो, उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। इसलिए ऐसे सभी अफसरों की सूची सार्वजनिक की जानी चाहिए। अगर अफसर किसी नेता या मंत्री का नाम ले तो उसे भी सजा के दायरे में शामिल करना चाहिए। दो राय नहीं कि कई मामलों में नेताओं और मंत्रियों की अफसरों से मिलीभगत होगी। फिर भी आदेश करने वाला अफसर अगर सीधे जिम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा और उसे सजा नहीं मिलेगी तो यह घृणित गठजोड़ कभी टूट नहीं पाएगा।

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सड़कों पर बारात

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राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रशासन को हिदायत दी है कि जयपुर में सड़कों पर बारात निकलने के दौरान लोगों की आवाजाही पर असर नहीं पडऩा चाहिए। न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई के दौरान नगर निगम से कहा कि भीड़ भरी सड़कों पर क्यों नहीं लगाते बारात पर पाबंदी। न्यायालय ने जैसे ज्यादातर नागरिकों के मन की बात कह दी। भीड़ भरी सड़कों के कारण आखिर कौन है जो परेशान नहीं होता। बड़े शहरों में ही नहीं कस्बों में भी अब तो बारात के कारण घंटों-घंटों जाम में लोग फंस जाते हैं। बढ़ते वाहनों का अम्बार, साइकिल व ऑटो रिक्शा की रेलमपेल, अतिक्रमण के चलते सिकुड़ती सड़कें, बेतरतीब चौराहे और ऊपर से बारातियों का बीच सड़क पर घेरा डालकर कई-कई देर तक डांस करना राहगीरों की मुसीबत बन जाता है।
वाहनों की कतारों के बीच खतरनाक आतिशबाजी देखकर तो कई बार दिल दहल उठता है। कहीं कोई हादसा हो गया तो बच कर निकलने की कोई जगह नहीं। इन हालात से बेपरवाह बारातियों को निश्चिन्त होकर मनोरंजन में मशगूल देखकर बड़ी पीड़ा होती है। आखिर कहां गया हमारा नागरिक दायित्व-बोध? बारात के कारण जाम में फंसे लोगों में कोई गंभीर मरीज भी हो सकता है, जिसे तत्काल चिकित्सा की जरूरत है। गत दिनों ऐसे ही एक जाम में एम्बुलेंस के फंसने से मरीज की मौत हो चुकी है। हालांकि कुछ जगह बारातियों को भी व्यवस्था बनाते देखा जाता है, लेकिन ज्यादातर ऐसा देखने में नहीं आता और राह से गुजरने वाले परेशान होते रहते हैं। ऐसे लापरवाह लोगों के लिए तो यातायात पुलिस और स्थानीय प्रशासन की खास तौर पर जरूरत महसूस होती है।
किसी बड़े आदमी के यहां विवाह-समारोह हो तो पुलिस वालों की लाइन लग जाती है व्यवस्थाएं बनाने में। लेकिन आम विवाह-समारोह में बीच सड़क पर यातायात में खलल डालते समय पुलिस का कोई परिन्दा भी नजर नहीं आता। दूरस्थ कॉलोनियों का तो भगवान ही मालिक है। एक ही मुख्य सड़क पर कई 'मैरिज गार्डन्स' और आमने-सामने गुजरती बारातों की ऐसी चिल्ल-पों मचती है कि बेचारे राहगीरों का 'बाजा' बज जाता है। माना शहर की ट्रैफिक व्यवस्था केवल बारातों की वजह से नहीं बिगड़ती। यातायात पुलिस और स्थानीय निगमों की कुव्यवस्थाएं इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार हैं।
'पीक ऑवर्स' में तो रोजाना जाम के हालात बनते हैं। ऐसे में 'बारातियों' को कोसना ठीक नहीं। विवाह एक उत्कृष्ट सामाजिक संस्कार है जिसे समारोहपूर्वक मनाने का सबको हक है। इसके बावजूद हमारा दायित्व है कि हम सड़क पर बारात के दौरान कुछ चीजों का ध्यान रखकर राहगीरों की राह आसान बना सकते हैं और विवाह-समारोह का भी भरपूर आनन्द ले सकते हैं।

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स्वतंत्र मीडिया का दमन

सरकार के सुर में सुर मिलाकर बोलने वालों को उपकृत और विरोधी सुर को तिरस्कृत किया जाता है। राज्य सरकारों की यह आम प्रवृत्ति है। पर छत्तीसगढ़ की सरकार इससे भी आगे है।
दुनिया भर में पत्रकारिता के हालात और पत्रकारों की सुरक्षा पर नजर रखने वाली अन्तरराष्ट्रीय संस्था 'रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर्स' की रिपोर्ट के अनुसार प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में भारत दुनिया के देशों में 140 वें पायदान पर है। यह रैंकिंग वल्र्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स-2014 में दर्ज की गई है।
हाल ही में जारी इस रिपोर्ट के अनुसार गत वर्ष भारत में पत्रकार सरकारी और गैर सरकारी दोनों स्तरों पर हिंसक निशाने पर रहे और 13 पत्रकार मारे गए। प्रेस की स्वतंत्रता का हनन और अभिव्यक्ति के दमन के मामले में भी भारत की कोई अच्छी तस्वीर प्रस्तुत नहीं की गई है। रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ और जम्मू-कश्मीर राज्यों का खासतौर पर जिक्र किया गया है, जहां प्रेस की स्वतंत्रता भारत में सर्वाधिक कुचली जा रही है। आतंककारी और अलगाववादी ताकतों के बीच जम्मू-कश्मीर में प्रेस के हालात जब-तब राष्ट्रीय सुर्खियां बनते रहे हैं।
इसी तरह छत्तीसगढ़ में भी माओवादी हिंसा और पत्रकारों पर हमलों की घटनाएं राष्ट्रीय मीडिया में स्थान पा जाती हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ में प्रेस के दमन और अभिव्यक्ति को कुचलने की सरकारी कारगुजारियों की शायद ही कभी चर्चा होती है। जबकि राज्य की रमन सिंह सरकार पिछले लम्बे समय से प्रेस को दबाने और कुचलने का काम कर रही है। शासन और सत्ता की शक्ति का इस्तेमाल स्वतंत्र अभिव्यक्ति को रोकने में किस तरह किया जाता है, यह छत्तीसगढ़ में साफ देखा जा सकता है। सरकार के सुर में सुर मिलाकर बोलने वालों को उपकृत और विरोधी सुर को तिरस्कृत किया जाता है। राज्य सरकारों की यह आम प्रवृत्ति है। लेकिन छत्तीसगढ़ की सरकार इससे भी एक कदम आगे है। वह विरोध में उठने वाले एक सुर को भी बर्दाश्त नहीं कर सकती। सरकारी नीतियों का जनहित में विरोध करने वाले मीडिया को वह चुन-चुन कर निशाना बनाती हैं। हालांकि ज्यादातर स्थानीय मीडिया सरकार की कारगुजारियों पर चुप रहता है। अगर कोई बोलने की हिमाकत करता है तो उसे तरह-तरह से प्रताडि़त किया जाता है। धमकियां मिलती हैं।
'पत्रिका' को इसका कड़वा अनुभव है। 'पत्रिका' ने राज्य की सम्पदा को उद्योगपतियों के हाथों बेचने की सरकारी कारगुजारियों की एक-एक करके पोल खोली। छत्तीसगढ़ में बांध, नदी, तालाब, बगीचे यहां तक कि श्मशान की जमीनें भी उद्योगपतियों को बेच दी गई। अखबार की आवाज को दबाने और कुचलने की हर संभव कोशिश की गई। अखबार निर्भीकता और निष्पक्षता से मुद्दे उठाता रहा। भ्रष्टाचार की पोल खुलने पर सरकार किस तरह बौखला जाती है, यह छत्तीसगढ़ के लोग देख चुके हैं। क्या किसी मुख्यमंत्री द्वारा प्रेस कान्फ्रेंस बुलाकर अखबार को सरेआम धमकी देने का उदाहरण कहीं देखा है? मुख्यमंत्री की धमकी के बाद पत्रिका कार्यालय पर हमला किया गया। सरकार के दबाव के आगे झाुके बिना अखबार अपनी भूमिका निभाता रहा। सरकार की ज्यादतियां भी थमी नहीं। विधानसभाध्यक्ष के माध्यम से अखबार को सदन से बाहर कर दिया गया। पत्रिका संवाददाताओं के प्रवेश पत्र निरस्त कर दिए गए। अखबार ने सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी। कोर्ट ने अखबार के हक में आदेश सुनाए। लेकिन सवाल यह है कि क्या मीडिया की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति को कुचलने के ऐसे उदाहरण मिलेंगे? सबसे दुखद तो स्वतंत्र मीडिया के हितों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार संस्थाओं का खामोश रहना है। प्रेस परिषद, एडिटर गिल्ड जैसी संस्थाओं का क्या औचित्य, जब एक सर्वसत्तावादी सरकार अपनी शक्ति का इस तरह खुला दुरुपयोग करे। मीडिया संगठनों और संस्थाओं की यह उदासीनता ही सरकारों को मीडिया की स्वतंत्रता को कुचलने की ताकत देती है।
'रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर्स' ने अपनी रिपोर्ट को पत्रकारों से जुड़ी हत्याओं और माओवादी हिंसा पर केन्द्रित रखा है। निश्चय ही पत्रकारों की हत्या शर्मनाक कृत्य है। माओवादियों की जितनी भत्र्सना की जाए कम है। राज्य सरकार भी उतनी ही जिम्मेदार ठहराई जानी चाहिए जो पत्रकारों की हिफाजत करने में नाकाम रही। लेकिन पत्रकारों और पत्रकारिता की सुरक्षा, स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर नजर रखने वाले मीडिया संगठनों व संस्थाओं को उन हालात पर भी गौर करना चाहिए जिनमें सरकारें मीडिया की आवाज को दबाने का दुस्साहस करती हैं।
कैमरा झूठ नहीं बोलता...
केन्द्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिन्दे ने दो दिन पहले महाराष्ट्र में युवा कांग्रेस के एक कार्यक्रम में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को जमकर कोसा। लेकिन मीडिया में उठते विरोध के बाद उन्होंने जिस तरह पलटा खाया, वह चर्चा का विषय बन गया है। शिन्दे साफ मुकर गए और कहा कि मैं तो सोशल मीडिया की बात कर रहा था। जबकि उनके भाषण में साफ तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर हमला बोला गया था। अब टीवी चैनल भाषण का वो फुटेज दिखा रहे हैं जिसमें शिन्दे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर कांग्रेस पार्टी के खिलाफ नकारात्मक प्रचार करने का आरोप लगाते हुए मीडिया को हड़का रहे हैं। इसमें शिन्दे साहब जोश में मीडिया को 'कुचल' देने की धमकी तक देते हैं। अब ऑडियो-विजुअल मीडिया की क्या कहें—आदमी जो बोलता है और जो करता है उसे यह हूबहू रिकार्ड कर लेता है। क्योंकि कैमरा और माइक कभी झूठ नहीं बोलते!

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ये कैसी ठगी!


टिप्पणी
अगर आपका ए.टी.एम. कार्ड जेब में रखा हो और आपके मोबाइल पर जानकारी मिले कि आपके खाते से रुपए निकाले गए हैं। ये रुपए आपने नहीं किसी और ने निकाले हैं और वह भी किसी दूसरे शहर के ए.टी.एम. से। जाहिर है, आप बहुत ठगा हुआ महसूस करेंगे। किसी अनाम ठग से नहीं, बल्कि बैंक नामक उस जानी-पहचानी संस्था से, जिसमें करोड़ों लोगों ने भरोसा करके अपनी संचित राशि जमा कर रखी है।
जयपुर में हाल ही ऐसी कुछ घटनाएं हुई हैं। देश के अन्य कई शहरों में भी इस तरह की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इनकी तादाद भले ही अभी बहुत बड़ी न लगती हों, लेकिन ये ही हालात रहे तो हर दिन होने वाली चोरी और ठगी की वारदात की तरह आम हो जाएंगी। ऐसी सूरत में लोगों का बैंकों की ए.टी.एम. प्रणाली से तो भरोसा उठ ही जाएगा, बैंकिंग संस्था को भी बड़ा झाटका लग जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आखिर इन घटनाओं को साइबर अपराध मानकर बैंकें अपने ग्राहकों को केवल कानून और पुलिस के भरोसे कैसे छोड़ सकती है? बैंकों को इससे ऊपर उठकर सोचने की जरूरत है। बैंकों की चिन्ता में यह प्राथमिकता से शुमार होना चाहिए कि ए.टी.एम. क्लोनिंग की समस्या से कैसे निजात मिले। इस समस्या के तकनीकी उपाय तो होंगे ही। साइबर विशेषज्ञों का मानना है कि हर साइबर समस्या का निदान साइबर-जगत में ही मौजूद है। क्यों नहीं देश की सारी बैंकें चाहे वे सरकारी हों या निजी मिलकर इस समस्या का उपाय करें। उत्कृष्ट साइबर विशेषज्ञों के जरिए ऐसा सिस्टम बने जो ए.टी.एम. कार्ड की क्लोनिंग को लॉक कर सके। या तो क्लोनिंग ही संभव न हो और अगर हो तो वह किसी भी ए.टी.एम. मशीन पर कारगर न हो। तकनीक में सब कुछ संभव है। ए.टी.एम. कार्ड की पासवर्ड प्रणाली की समीक्षा करनी होगी। पासवर्ड की बजाय थम्ब इम्प्रेशन जैसे आधुनिक विकल्प मौजूद हैं, जो ज्यादा सुरक्षित हैं। बैंकों को नेट बैंकिंग की प्रणाली को भी दुरुस्त करना पड़ेगा। इसकी खामियों का फायदा उठाकर भी साइबर ठगी की जा रही है।
कुल मिलाकर बैंकों को अपने ग्राहकों को भरोसा दिलाना होगा कि उनके ए.टी.एम. कार्ड का कोई दुरुपयोग नहीं कर सकता। आजकल हर व्यक्ति ए.टी.एम. कार्ड रखता है। बैंक स्वयं भी ग्राहकों को यह कार्ड रखने का दबाव बनाती हैं। निश्चय ही यह कार्ड ग्राहकों को एक सहूलियत प्रदान करता है। लेकिन ऐसी घटनाएं उसे यह सहूलियत त्यागने को मजबूर कर देंगी। खाताधारी की नासमझाी या गलती से उसके साथ धोखा होता है तो बात समझ में आती है, लेकिन पूरी तरह सजग होते हुए अगर वह ऐसी साइबर ठगी का शिकार होता है तो बैंकें भी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। या तो बैंकें भरपाई करें या फिर मुकदमे का सामना करें।

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इंटरनेट और आपका बच्चा

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