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ये कैसी ठगी!


टिप्पणी
अगर आपका ए.टी.एम. कार्ड जेब में रखा हो और आपके मोबाइल पर जानकारी मिले कि आपके खाते से रुपए निकाले गए हैं। ये रुपए आपने नहीं किसी और ने निकाले हैं और वह भी किसी दूसरे शहर के ए.टी.एम. से। जाहिर है, आप बहुत ठगा हुआ महसूस करेंगे। किसी अनाम ठग से नहीं, बल्कि बैंक नामक उस जानी-पहचानी संस्था से, जिसमें करोड़ों लोगों ने भरोसा करके अपनी संचित राशि जमा कर रखी है।
जयपुर में हाल ही ऐसी कुछ घटनाएं हुई हैं। देश के अन्य कई शहरों में भी इस तरह की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इनकी तादाद भले ही अभी बहुत बड़ी न लगती हों, लेकिन ये ही हालात रहे तो हर दिन होने वाली चोरी और ठगी की वारदात की तरह आम हो जाएंगी। ऐसी सूरत में लोगों का बैंकों की ए.टी.एम. प्रणाली से तो भरोसा उठ ही जाएगा, बैंकिंग संस्था को भी बड़ा झाटका लग जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आखिर इन घटनाओं को साइबर अपराध मानकर बैंकें अपने ग्राहकों को केवल कानून और पुलिस के भरोसे कैसे छोड़ सकती है? बैंकों को इससे ऊपर उठकर सोचने की जरूरत है। बैंकों की चिन्ता में यह प्राथमिकता से शुमार होना चाहिए कि ए.टी.एम. क्लोनिंग की समस्या से कैसे निजात मिले। इस समस्या के तकनीकी उपाय तो होंगे ही। साइबर विशेषज्ञों का मानना है कि हर साइबर समस्या का निदान साइबर-जगत में ही मौजूद है। क्यों नहीं देश की सारी बैंकें चाहे वे सरकारी हों या निजी मिलकर इस समस्या का उपाय करें। उत्कृष्ट साइबर विशेषज्ञों के जरिए ऐसा सिस्टम बने जो ए.टी.एम. कार्ड की क्लोनिंग को लॉक कर सके। या तो क्लोनिंग ही संभव न हो और अगर हो तो वह किसी भी ए.टी.एम. मशीन पर कारगर न हो। तकनीक में सब कुछ संभव है। ए.टी.एम. कार्ड की पासवर्ड प्रणाली की समीक्षा करनी होगी। पासवर्ड की बजाय थम्ब इम्प्रेशन जैसे आधुनिक विकल्प मौजूद हैं, जो ज्यादा सुरक्षित हैं। बैंकों को नेट बैंकिंग की प्रणाली को भी दुरुस्त करना पड़ेगा। इसकी खामियों का फायदा उठाकर भी साइबर ठगी की जा रही है।
कुल मिलाकर बैंकों को अपने ग्राहकों को भरोसा दिलाना होगा कि उनके ए.टी.एम. कार्ड का कोई दुरुपयोग नहीं कर सकता। आजकल हर व्यक्ति ए.टी.एम. कार्ड रखता है। बैंक स्वयं भी ग्राहकों को यह कार्ड रखने का दबाव बनाती हैं। निश्चय ही यह कार्ड ग्राहकों को एक सहूलियत प्रदान करता है। लेकिन ऐसी घटनाएं उसे यह सहूलियत त्यागने को मजबूर कर देंगी। खाताधारी की नासमझाी या गलती से उसके साथ धोखा होता है तो बात समझ में आती है, लेकिन पूरी तरह सजग होते हुए अगर वह ऐसी साइबर ठगी का शिकार होता है तो बैंकें भी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। या तो बैंकें भरपाई करें या फिर मुकदमे का सामना करें।

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इंटरनेट और आपका बच्चा

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कहां खो गया जनता का प्रहरी?

आज तो मीडिया पर ही निगरानी की ज्यादा जरूरत है। जन को छोड़कर वह तंत्र के हितों को साधने में मशगूल है।
क्या गणतंत्र के प्रहरी के रूप में मीडिया का सामथ्र्य चुक गया? या फिर खुद मीडिया ने अपनी हालत इतनी दयनीय बना ली कि प्रहरी तो दूर वह एक कमजोर चौकीदार की भूमिका भी नहीं निभा पा रहा? उस पर जनता ने लोकतंत्र के तीनों पायों की निगरानी का दायित्व सौंपा था। लेकिन वह खुद चौथा पाया बनकर भ्रष्टतंत्र में शामिल हो गया। आज तो मीडिया पर ही निगरानी की ज्यादा जरूरत है। जन को छोड़कर वह तंत्र के हितों को साधने में मशगूल है। उसके अपने हित सर्वोपरि हैं। इसलिए उसकी आवाज में न ताकत है और न लोगों का उसमें भरोसा। वह जनता से दूर चला गया। सिर्फ कारोबार बन कर रह गया।
मीडिया आज मुख्यत: दो तरह के कारोबारियों के हाथ में है। एक वे जो रियल एस्टेट, चिटफंड, खनन, ऊर्जा जैसे गैर-मीडिया कारोबारी हैं। दूसरे वे जो मीडिया कारोबारी होते हुए भी धीरे-धीरे दूसरे व्यवसाय शुरू कर देते हैं। कुछ अरसे बाद दूसरा व्यवसाय प्रमुख बन जाता है। मीडिया तो सिर्फ उसे चमकाने के काम आता है। जैसे 'पॉवर' प्राप्त करने के लिए कुछ मीडिया कंपनियां पॉवर क्षेत्र में प्रवेश कर गईं तो कुछ पॉवर कंपनियां मीडिया में घुस आईं। दोनों ही सूरत में इस्तेमाल मीडिया का किया जा रहा है। भारत में क्रॉस मीडिया ऑनरशिप पर कोई पाबंदी नहीं है। इसलिए मीडिया में गैर-मीडिया और गैर-मीडिया क्षेत्र में मीडिया का प्रवेश निर्बाध जारी है।
मनोरंजन...
मीडिया की ओर से ऐसा सुनने पर बहुत निराशा होती है। हमारा सबसे पहला काम खबर देना है और वह भी संतुलित खबर। मीडिया स्वयं को लोकतंत्र का चौथा पाया मानता है, तो उसे पूरी तरह से इस भूमिका को निभाना चाहिए और ऐसा भारतीय मीडिया ने किया भी है। आज आम आदमी की जुबान पर जो बड़े-बड़े घोटालों के नाम हैं, वे मीडिया की वजह से ही उजागर हुए हैं। जिन घोटालों या भ्रष्टाचार की शिकायत आज आम आदमी करता है, उसके पीछे मीडिया का बड़ा रोल है। लेकिन यह सही है कि मौजूदा दौर में मीडिया की चौथे पाये की भूमिका में कमी आई है, उसमें सुधार होना चाहिए। भारत ही नहीं, दुनियाभर में मीडिया आज अहम किरदार है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस देश में भी तानाशाही होती है, वहां की सरकार सबसे पहले प्रेस को बंद करती है। किसी भी लोकतंत्र को बचाए रखने के स्वतंत्र और मजबूत प्रेस का होना बहुत जरूरी है।
कमजोर...
मालिक या कम्पनी प्रबंधन की सोच तो अखबार या चैनल में मुनाफा कमाना ही रहेगी। पाठक या दर्शक को अगर उपभोक्ता की तरह देखा जाए, तो फिर नागरिकों के सशक्तीकरण और उनमें जागरूकता की बात बेमानी है।
दिखने लगा सरकार का दबाव : पांच-छह साल से पूरे विश्व में आर्थिक संकट का दौर चल रहा है। हमारे देश की अर्थव्यवस्था भी खराब हुई है। जीडीपी वृद्धि की गति कम हो गई है, इससे बड़े-बड़े कॉरपोरेट घरानों ने विज्ञापनों पर खर्च करना कम कर दिया है। इसका मीडिया कम्पनियों पर भी असर पड़ा है। पिछले पांच-दस साल से इंटरनेट की पहुंच लोगों तक बहुत बढ़ गई है। वह मुफ्त में सूचनाएं, खबरें दे रहा है, हालांकि इसकी विश्वसनीयता पर सवाल जरूर है। आर्थिक संकट के चलते अखबारों और चैनलों में निजी संस्थाओं के विज्ञापन कम हो रहे हैं और मीडिया कम्पनियां विज्ञापन के लिए सरकार पर ज्यादा निर्भर हो गई हैं। ऐसे में सरकार विज्ञापन देगी, तो यह भी चाहेगी कि मीडिया उसके खिलाफ न जाए। यह दबाव भी मीडिया पर काम कर रहा है। इसी के चलते विश्वसनीयता खत्म हुई है।
पेड न्यूज के जरिए धोखा : इस दौर में पेड न्यूज ने पाठकों के साथ बड़ा छल किया है। विज्ञापन  को खबरों की तरह पेश किया जा रहा है। लेकिन हमारे देश का पाठक या दर्शक बेवकूफ नहीं है। वह समझाता  है कि कौन पाठकों या दर्शकों से धोखा कर रहा है। खबरों को लेकर विश्वसनीयता खत्म होगी, तो नुकसान मीडिया का ही होगा। बिजनेस मॉडल के चलते अगर सब कुछ विज्ञापन पर ही निर्भर रहेगा, तो आगे चलकर संकट पैदा हो जाएगा। मीडिया पर लगने वाले आरोपों में कुछ सच्चाई तो है। मीडिया को आत्म चिंतन करना चाहिए। जन-सरोकारों को निभाना चाहिए। जिस चौथे खम्भे का दर्जा मीडिया को मिला हुआ है, उसके हिसाब से कितना काम वह कर रहा है , आज यह सबके सामने हैं। हालांकि मीडिया का एक हिस्सा हमेशा  ऐसा रहा है, जो अपनी जिम्मेदारी निभाता रहा है, लेकिन ज्यादातर लोग ऐसा नहीं कर रहे । भारतवर्ष ही अकेला ऐसा देश है, जो खुद को लोकतंत्र कहता है, लेकिन रेडियो पर खबरें सरकार की ही आती हैं।
कहां...
क्रॉस मीडिया ऑनरशिप के दो रूप प्रचलित हैं। पहला, जब एक मीडिया- कंपनी मीडिया-क्षेत्र यानी टीवी, अखबार, रेडियो आदि में ही निवेश करे तो यह 'वर्टिकल क्रॉस मीडिया ऑनरशिप' है। दूसरा, जब एक मीडिया-कंपनी मीडिया से बाहर के क्षेत्र में निवेश करे तो यह 'हारिजेन्टल क्रॉस मीडिया ऑनरशिप' है। अमरीका तथा ज्यादातर यूरोपीय देशों में हॉरिजेन्टल क्रॉस मीडिया ऑनरशिप पर पाबन्दी है। भारत में ऐसी कोई रोक नहीं होने से मीडिया में घालमेल का कारोबार पनप गया। मीडिया को भ्रष्ट करने में इसकी बड़ी भूमिका है। इसके सूत्र देश के दो सबसे बड़े 2जी स्पैक्ट्रम और कोयला ब्लॉक आवंटन घोटालों में आसानी से देखे जा सकते हैं। 2जी स्पैक्ट्रम के लिए गैर मीडिया कंपनियों ने किस तरह लॉबिंग की और किस तरह लॉबिस्ट नीरा राडिया की मार्फत भ्रष्ट नेताओं, उद्योगपतियों और नामी-गिरामी पत्रकारों में सांठगांठ हुई, यह सबके सामने है। ये तो कुछ टेपों के ही खुलासे थे। अगर 5800 टेपों के राज खुल गए तो पता नहीं किस किसकी पोल खुलेगी। कोयला ब्लॉक्स घोटाले में कुछ मीडिया कंपनियों की भागीदारी सीधे तौर पर सामने आई। कुछ परोक्ष तौर पर जिम्मेदार रहीं। नवीन जिन्दल-जी न्यूज प्रकरण इसका उदाहरण है। देश में जब इतने बड़े घपले-घोटाले हों तो मीडिया की जिम्मेदारी थी कि वह इन्हें उजागर करता। लेकिन खुद मीडिया के हित जुड़े हों तो कौन यह काम करता। देश के बड़े घोटाले कैग, सीवीसी जैसी संस्थाएं सामने लेकर आईं।
मीडिया को एक और प्रवृत्ति ने ठेस पहुंचाई। यह है राजनेताओं का मीडिया कारोबार में प्रवेश। आज कई प्रान्तीय अखबार और न्यूज चैनलों पर राजनेताओं का मालिकाना हक है। मीडिया के जरिए गैर-मीडिया कारोबारों की तरह राजनीति को भी चमकाया जा रहा है। जैसे महाराष्ट्र में 'लोकमत', छत्तीसगढ़ में 'हरिभूमि', झारखंड में 'प्रभात खबर' जैसे अखबारों के खनन अथवा बिजली उत्पादन के गैर-मीडिया कारोबार हैं। कई राज्यों से प्रकाशित 'दैनिक भास्कर' के बिजली उत्पादन, खनन, रियल एस्टेट, खाद्य तेल रिफाइनिंग, कपड़ा उद्योग आदि कई गैर-मीडिया कारोबार हैं। इसी तरह राजनेताओं ने भी मीडिया को गैर-मीडिया कारोबार में तब्दील कर दिया। कहने को उनके न्यूज चैनल या अखबार जनता के लिए है, लेकिन असल हित राजनीति के साधे जाते हैं। दक्षिण भारत में यह प्रवृत्ति पहले से थी, अब पूरे देश में फैल गई है। हरियाणा में पूर्व केन्द्रीय मंत्री विनोद शर्मा का 'इंडिया न्यूज चैनल', सांसद के.डी. सिंह का 'तहलका एवन', राज्य के पूर्व गृहमंत्री और गीतिका कांड के आरोपी गोपाल कांडा का 'हरियाणा न्यूज' चैनल व 'आज समाज' अखबार, नवीन जिन्दल का 'फोकस टीवी' है। पंजाब में अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल का 'पीटीसी न्यूज'  चैनल, प.बंगाल में माकपा के अवीक दत्ता का 'आकाश बांग्ला' व '२४ घंटा' टीवी चैनल है। आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी का 'साक्षी टीवी', के.चन्द्रशेखर राव का टी.न्यूज, तमिलनाडु में जयललिता का 'जया टीवी', कलानिधि मारन का 'सन टीवी', कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी की पत्नी अनिता कुमार स्वामी का 'कस्तूरी टीवी', कांग्रेस के राजीव शुक्ला का 'न्यूज 24' है जो जनता के साथ-साथ राजनीति की सेवा भी कर रहे हैं।
पेड न्यूज का रोग भी मीडिया को खोखला कर रहा है। इसका सबसे पहले खुलासा 'वाल स्ट्रीट जनरल' के नई दिल्ली ब्यूरो चीफ पाल बैकेट के एक लेख में किया गया था। शीर्षक था-'प्रेस कवरेज चाहिए, मुझो पैसे दो।' इसमें चंडीगढ के एक निर्दलीय उम्मीदवार की व्यथा बयान की गई थी। 2009के आम चुनावों में पेड न्यूज एक महारोग के रूप में उभरा। प्रेस परिषद की समिति की रिपोर्ट में बड़े-बड़े अखबार और मीडिया घरानों (पत्रिका शामिल नहीं) के नाम सामने आए। कहने की जरूरत नहीं पेड न्यूज ने मीडिया की नैतिक शक्ति को कुंद कर डाला। देश के सारे मीडिया घराने और पत्रकार इन बुराइयों में डूबे हैं-यह सच नहीं है। अभी कुछ बचे हुए हैं। लेकिन इनकी तादाद इतनी कम है कि वे अकेले मीडिया की गिरती हुई साख को नहीं बचा सकते। अलबत्ता, इस कलुषित माहौल में वे अपने आपको साफ-सफ्फाक रखे हुए हैं यही कम बात नहीं है। वे बचे भी हैं और अपना काम भी बखूबी कर रहे हैं। इससे साबित है कि बिना भ्रष्ट हुए भी मीडिया जीवित रह सकता है।

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खोदा पहाड़ निकली चुहिया!

टिप्पणी
राजस्थान में नई सरकार बनने के बाद घोषणा हुई थी कि शीघ्र ही सरकारी विभागों से जुड़ी 60  दिवसीय कार्ययोजना पेश की जाएगी। सुनकर थोड़ी हैरत हुई थी। सिर्फ 60  दिवसीय ही क्यों? पूरे पांच साल की क्यों नहीं? फिर लगा सरकार जनता से जुड़े कुछ ऐसे महत्वपूर्ण कार्यों की प्राथमिकता तय करना चाहती होगी जो एक निश्चित समय-सीमा के भीतर पूरे हो जाने चाहिए। जनता के भारी ऐतिहासिक समर्थन से चुनी गई सरकार को भी लगा होगा कि उसे जनता का कर्ज लौटाने के लिए कुछ ऐसे काम करने चाहिए जो एक छोटी टाइम लाइन में बंधे हों। यह बात भी रही होगी कि दो माह बाद लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लग जाएगी। शुरू के दो माह आमतौर पर 'हनीमून पीरियड' के निकल जाते हैं। यानी सरकार बनने के चार-पांच माह बाद भी अगर वह कुछ काम न कर पाई तो जनता में बुरा संदेश जाएगा।
सरकार ने सही दिशा में सोचा। लेकिन माह भर इंतजार के बाद सामने आई साठ दिवसीय कार्ययोजना को जब देखा तो सब काफूर हो गया। खोदा पहाड़ और निकली चुहिया! यह कैसी कार्ययोजना। जिसमें न तो कोई प्राथमिकता है और न ही कोई जरूरी-गैर जरूरी कार्यों का विभाजन। 'गैर जरूरी' इस अर्थ में कि इन कार्यों की 60 दिन में क्रियान्विति की न तो कोई जरूरत है और न ही वह संभव है। विभागों ने सतही तौर पर जैसे एक सूची तैयार कर दी, जिसमें बिन्दुवार काम गिना दिए गए हैं। ऐसे-ऐसे काम हैं जिन्हें देखकर साफ है कि इनकी क्रियान्विति तो कोई लक्ष्य ही नहीं है। समय-सीमा के भीतर तो कतई नहीं।
क्या प्रदेश भर में 56 हजार किलोमीटर लंबी सड़कों की मरम्मत 60 दिवस में की जा सकेगी? राज्य में साढ़े चार हजार कम्प्यूटर लैब पांच साल में लगनी हैं तो दो हजार लैब फरवरी तक कैसे स्थापित होंगी! विभागों की कार्य सूची में ऐसे कई कार्य हैं जिन्हें पूरा करने के लिए कुछ साल चाहिए। तो कुछ कार्य ऐसे भी हैं जो 60 मिनट में किए जा सकते हैं। क्या तीन विश्वविद्यालयों के नाम परिवर्तन के लिए भी 60 दिन चाहिए? साफ-सफाई के रूटीन के काम भी शामिल करने की क्या तुक है! सबसे बड़ी बात यह है कि 60 दिन में काम पूरे नहीं हुए तो कौन जिम्मेदार होगा? इस पर खामोशी है।
कार्यों की सूची से साफ है कि नौकरशाही ने अपनी बला टाली है। सरकार का हुकुम था, इसलिए बजा दिया। लगता है इन कार्यों को तय करते समय 4 नामी-गिरामी मंत्रियों की समिति ने कुछ ध्यान ही  नहीं दिया। अफसरों ने जो परोसा वह पेश कर दिया। अफसरशाही की हठधर्मिता तो देखिए कि विभागों को योजना में संशोधन के लिए कहा भी गया तो अफसरों ने सुनी-अनसुनी कर दी।
परिणाम सामने है। जो कार्ययोजना आई है उससे जनता के न हित सधने वाले हैं और न ही उनकी आकांक्षाएं पूरी होंगी। उल्टे सरकार की छवि खराब होगी।

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सोशल मीडिया : छवि बनाने का छल

कई विश्लेषक यह मानने लगे हैं कि आगामी आम चुनावों में प्रमुख राजनीतिक दलों और नेताओं की जीत-हार में सोशल मीडिया की मुख्य भूमिका होगी। युवाओं की एक बहुत बड़ी फौज है जो सोशल मीडिया से प्रभावित है। सोशल मीडिया एक दुधारी तलवार है। यह नकारात्मक व सकारात्मक दोनों लक्ष्य साधता है।
अपने पिछले स्तंभ (7 जनवरी) में मैंने भारत में सोशल मीडिया को लेकर किए गए एक अध्ययन का जिक्र किया था। इसमें लिखा था कि सोशल मीडिया को राजनीति के एक सशक्त औजार के रूप में देखा जाने लगा है। अध्ययन की रिपोर्ट इसी बात की पुष्टि करती है। इसके मुताबिक वर्ष 2014 के आम चुनावों में 543 में से 160 सीटों के नतीजों को सोशल मीडिया प्रभावित कर सकता है। हालांकि अध्ययन साल भर पहले किया गया था, लेकिन गत दिनों दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) को मिले जन समर्थन के बाद सबका ध्यान इस अध्ययन पर गया। कारण साफ था।
'आप' का उदय जिस आन्दोलन से हुआ वह सोशल मीडिया के जरिए ही उभरा था। 'आप' ने एक राजनीतिक दल के तौर पर सोशल मीडिया का भरपूर इस्तेमाल किया। 'आप' की सफलता ने दूसरे राजनीतिक दलों और नेताओं को भी सोशल मीडिया के प्रति अपने रवैये को बदलने के लिए मजबूर किया। आज तो हर कोई दल और राजनेता सोशल मीडिया की इस ताकत को स्वीकारता है और इसके राजनीतिक इस्तेमाल के लिए उत्सुक दिखाई पड़ता है। शायद इसीलिए कई विश्लेषक भी यह मानने लगे हैं कि आगामी आम चुनावों में प्रमुख राजनीतिक दलों और नेताओं की जीत-हार में सोशल मीडिया की मुख्य भूमिका होगी।
अगर सचमुच ऐसा है तो हमें सावधान रहने की जरूरत है। खासकर, इसलिए कि सोशल मीडिया का दुरुपयोग करना बहुत आसान हो गया है। पिछले कुछ अरसे में सोशल मीडिया के दुरुपयोग के कई प्रामाणिक मामले सामने आ चुके हैं। बेंगलुरु से उत्तर-पूर्व के लोगों के घर-बार छोड़कर भागने की घटना हमने देखी है, जो इसी सोशल मीडिया पर फैलाई अफवाहों के कारण घटी। पिछले साल मुजफ्फरनगर में एक सामान्य झागड़े को व्यापक दंगों में तब्दील करने में भी सोशल मीडिया की भूमिका सामने आई। हाल ही भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागड़े की अमरीका में निर्वस्त्र तलाशी का फर्जी वीडियो सोशल मीडिया के जरिए ही प्रचारित-प्रसारित किया गया था। ये उदाहरण सोशल मीडिया में सक्रिय किन्हीं शरारती तत्त्वों की कारस्तानी माने जा सकते हैं। लेकिन सोशल मीडिया के दुरुपयोग के कुछ ऐसे उदाहरण भी सामने आए हैं जो और भी गंभीर हैं। ये बाकायदा आई.टी. कंपनियों द्वारा सोशल मीडिया के दुरुपयोग से जुड़े हैं। राजनीति में इसका इस्तेमाल एक खतरनाक प्रवृत्ति का संकेत है।
कुछ समय पूर्व कोबरा पोस्ट ने 'ऑपरेशन ब्लू वायरस' नाम से अपने एक स्टिंग के जरिए देश में फैली ऐसी दर्जनों आई.टी. कंपनियों का पर्दाफाश किया था जो किसी भी नेता या राजनीतिक दल की छवि बनाने या बिगाडऩे में माहिर हैं। इसकी एवज में ये कंपनियां अपने 'ग्राहक' से भारी रकम वसूल करती हैं। ये कंपनियां सोशल मीडिया पर किसी एक दल के प्रचार-प्रसार और छवि निर्माण का कृत्रिम वातावरण तैयार करती हैं। किसी नेता की लोकप्रियता को भी गढ़ती हैं और उसकी महानता का इन्द्रजाल भी बुनती हैं।
इतना ही नहीं ग्राहक के लिए उसके प्रतिस्पर्धी या विरोधी का खेल बिगाडऩे का काम बड़े करीने से किया जाता है। प्रतिस्पर्धी नेता या दल को नकारात्मक प्रचार के जरिए ध्वस्त करने की तिकड़में आजमाई जाती हैं। इन कंपनियों द्वारा मोटा धन वसूल करके अपने ग्राहक के लिए दी जाने वाली सेवाओं के कुछ प्रस्ताव जो कोबरा पोस्ट के कैमरे में कैद किए गए उन्हें जानकर किसी को भी हैरत होगी। जैसे—फेस बुक पेज पर ग्राहक नेता या राजनीतिक दल के चहेतों का अम्बार लगा देना। यानी फेक खाते बनाकर उनके पेज 'लाइक्स' कराए जाते हैं। जरूरत पडऩे पर ये कंपनियां ग्राहक के लिए 'लाइक्स' खरीदती भी हैं। इसी तरह प्रतिस्पर्धी के खिलाफ भ्रामक और नकारात्मक प्रचार कराया जाता है ताकि विरोधी की छवि खराब की जा सके। ट्विटर पर फालो करने वालों की नकली सेना बनाने का काम भी प्रस्तावित सेवाओं में शामिल है। प्रचार के लिए वीडियो को वायरल बना कर यू-ट्यूब पर फैला देना भी इनकी सेवाओं में शामिल है। चोरी पकड़ में न आए इसके लिए कंपनियों ने तकनीकी रास्ते भी खोज निकाले हैं। ट्रेसिंग से बचने के लिए ऑफशोर आईपी और सर्वर का प्रयोग किया जाता है।
विरोधी की छवि खराब करने के लिए दूसरों के कम्प्यूटर हैक करने तथा अपनी लोकेशन हर घंटे बदलते रहने के लिए कम्प्यूटर पर प्रॉक्सी कोड का इस्तेमाल करने की जुगत की जाती है। कैमरे पर कुछ आई.टी. पेशेवरों के इंटरव्यू हैं जो पैसा लेकर ये सब काम करना न केवल कबूल करते हैं, बल्कि आगे के लिए भी अपनी सेवाएं देने को तत्पर हैं। हालांकि कोबरा पोस्ट के स्टिंग में जो कंपनियां पकड़ी गईं, वे आई.टी. क्षेत्र में कोई बड़ी या नामधारी कंपनियां नहीं मानी जाती, लेकिन इनके कारनामों का खुलासा तो होता ही है जो हमें सचेत करने के लिए काफी है। खासकर इस पृष्ठभूमि में कि सोशल मीडिया एक सशक्त राजनीतिक औजार है जिसका इस्तेमाल आगामी आम चुनावों के दौरान व्यापक स्तर पर किया जाएगा।
युवाओं की एक बहुत बड़ी फौज है जो सोशल मीडिया से प्रभावित है। सोशल मीडिया एक दुधारी तलवार है। यह नकारात्मक व सकारात्मक दोनों लक्ष्य साधता है। अगर लालची आई.टी. कंपनियां और सत्ता के लोभी नेता व दल आगामी आम चुनावों में सोशल मीडिया के जरिए अपना 'इन्द्रजाल' रचने में थोड़े कामयाब भी हो गए तो यह लोकतंत्र की बड़ी हार होगी। इन्हें कैसे रोका जा सकता है, कहना मुश्किल है। 'ट्राई' की नियमावली और सायबर कानून इनके समक्ष बौने नजर आते हैं। आई.टी. दिग्गज ही शायद कोई रास्ता निकाल सके। इसके लिए न केवल चुनाव आयोग बल्कि केन्द्र के स्तर पर भी खास उपायों की जरूरत पड़ेगी।
माफ करें...
ज्यादातर न्यूज चैनल उस रात राहुल गांधी पर चर्चा कर रहे थे। विशेषज्ञों का पैनल बहस में मशगूल था। दिन में हुई एआईसीसी की बैठक के दौरान राहुल के भाषण का सभी अपने-अपने ढंग से विश्लेषण कर रहे थे। राहुल के प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी की औपचारिक घोषणा न होने का चुनाव अभियान पर क्या असर पड़ेगा। इसी बीच सुनन्दा पुष्कर की मौत का 'फ्लेश' चमका। एंकरों ने चर्चा रोक कर घोषित किया— 'माफ करें, एक महत्त्वपूर्ण खबर आ रही है। हम फिर लौटेंगे, चर्चा जारी रहेगी।' लेकिन इसके बाद सभी चैनलों के कैमरे होटल लीला पर केन्द्रित हो गए। लाइव कवरेज की होड़ मच गई। चर्चा वाले एंकर फिर लौट कर नहीं आए।

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मनमानी के स्कूल

टिप्पणी
 नन्हे-मुन्नों को स्कूल में दाखिले की समस्या घर-घर की है। कम-से-कम मध्यमवर्गीय हर शहरी परिवार का तो यही दुखड़ा है। अपने बच्चे का निजी स्कूल में नर्सरी दाखिले की खातिर उनके पसीने छूट जाते हैं। एक स्कूल से दूसरे स्कूल, दूसरे से तीसरे स्कूल...। भटकते-भटकते सांस फूल जाती है। स्कूल संचालकों का रवैया हैरान कर देता है। एडमिशन फॉर्म नदारद। कहीं उपलब्ध तो फॉर्म का शुल्क भारी-भरकम! कहीं जबरदस्ती थोपे गए कायदे। शुल्क अदा करके फॉर्म भरो तब तक एडमिशन फुल! पिछला दरवाजा हरदम खुला है।
एडमिशन के क्या नियम-कायदे- कोई बताने वाला नहीं। कुल कितनी सीटें थीं, कितनी भरी गई—कोई पारदर्शिता नहीं। कोई नियम-कायदे स्पष्ट नहीं। सब-कुछ गोलमोल। और इसमें चक्करघिन्नी बने बेचारे अभिभावक। राज्य सरकार उन्हें पूरी तरह इन निजी स्कूल संचालकों के हवाले छोड़ कर चैन की नींद सो रही है। जयपुर सहित राज्यभर में ज्यादातर निजी स्कूलों के यही हालात हैं। भोपाल, इंदौर, रायपुर जैसे बड़े शहरों के हालात भी कमोवेश यही हैं। अभिभावकों की कोई सुनने वाला नहीं। भले ही इनकी तादाद लाखों में है। दिल्ली में सरकार ने सुध ली तो इस बार पासा ही पलट गया। अभिभावकों की बजाय निजी स्कूल संचालकों के पसीने छूट गए। सरकार के खिलाफ सारे निजी स्कूल लामबंद हो गए। खूब चीख-पुकार मचाई। हाईकोर्ट गए, लेकिन दाल नहीं गली। जब भी निजी स्कूलों पर शिकंजा कसने की बात आती है—स्कूलें स्वायत्तता का रोना रोने लगती है। सरकारी दखलंदाजी का शोर मचाती है। यही नहीं शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट की चेतावनी दे डालती है। कौन नहीं जानता दुकानों की तरह खुली हुई ज्यादातर निजी स्कूलों को न स्वायत्तता की चिन्ता है और न ही शिक्षा की गुणवत्ता की। हर कोई जानता है उनकी वास्तविक चिन्ता कहां अटकी और भटकी रहती है। हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार है। नर्सरी या प्री प्राइमरी दाखिला शिशु-शिक्षा की नींव है। नींव को मजबूती देने का दायित्व जितना अभिभावकों का है उतना ही स्कूल संचालकों का भी है। अगर ये संचालक अपना दायित्व नहीं समझते तो सरकार को अपनी भूमिका निभानी होगी। दिल्ली सरकार की तरह ही शिकंजा कसना होगा तथा नर्सरी दाखिले के लिए सख्त नियम-कानून तय करने होंगे। सख्ती करते ही स्कूल संचालक लामबंद होंगे। दिल्ली की तरह ही तर्क देंगे कि सरकार को उनकी स्वायत्तता में दखल का कोई अधिकार नहीं। क्यों नहीं है? सरकार से सस्ती जमीन लेते समय उन्हें यह याद क्यों नहीं आता? सरकार को अधिकार है—पूरा अधिकार है।
केवल अल्पसंख्यक स्कूलों को ही संवैधानिक कवच प्राप्त है। सभी स्कूलों को मनमानी करने की छूट नहीं दी जा सकती। आखिर क्यों अभिभावकों को अपने नन्हे-मुन्नों के लिए दर-दर भटकना पड़े। इन स्कूलों को प्रवेश के नियम, तारीख, समय-सीमा, सीटों की संख्या, फीस का ढांचा सब कुछ पारदर्शी रखना होगा। आखिर ये स्कूलें शिक्षा के ज्ञान-केन्द्र के तौर पर खुली हैं। इसी रूप में इनकी मान्यता है न कि उपभोक्ता सामग्री बेचने वाली दुकान के रूप में। अगर इन्हें दुकानदारी ही करनी है तो कोई दूसरा धंधा अपनाएं। स्कूलों को शिक्षा और शिक्षार्थी के प्रति ही समर्पित होना होगा—चाहे वह सरकारी सहायता  प्राप्त निजी स्कूल हो या गैर सहायता प्राप्त।

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पात्र जुड़ें, फर्जी रुकें

टिप्पणी
चुनावों में ज्यादा से ज्यादा लोग मतदान में हिस्सा लें —  लोकतंत्र की सफलता का यह मूलमंत्र है। हाल ही पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में लोगों ने उत्साहपूर्वक भागीदारी निभाई। मतदान के रिकॉर्ड टूटे। गड़बडिय़ां भी सामने आईं। ऐन वक्त पर कइयों के नाम मतदाता सूचियों से गायब हो गए। लेकिन कुल मिलाकर जो मतदान प्रतिशत रहा, वह उत्साहित करने वाला था। अब आम चुनाव की तैयारी है। जयपुर जिले में मतदाता सूचियों में नाम जुड़वाने वालों की भारी तादाद है। लंबी कतार देखकर थोड़ी हैरत भी होती है। अभी दो माह पहले तक मतदाता सूचियों में नाम जुड़वाने के राज्य भर में कार्यक्रम चल रहे थे। गत वर्ष यह सिलसिला लगातार चलता रहा था। ऐसे में अकेले जयपुर जिले में मतदाता सूची में नाम जुड़वाने वालों की संख्या व आंकड़े चौंकाते हैं। थोड़े से दिनों के चुनाव आयोग के कार्यक्रम में ही करीब 2 लाख लोगों ने मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए आवेदन कर दिए।
विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण नामक इस कार्यक्रम की समय सीमा 7 जनवरी तय थी, लेकिन आवेदनों को देखते हुए अगले दिन भी इन्हें जमा कराने का काम जारी रखना पड़ा। शायद कुछ दिन यह कार्यक्रम और बढ़ाना पड़े। जयपुर जिले की यह बानगी है तो पूरे राज्य की क्या तस्वीर होगी, अनुमान लगाया जा सकता है। दिसम्बर में राज्य विधानसभा चुनाव के ठीक पहले मतदाता सूचियों में नाम जुड़वाने का क्रम पूरा हुआ था। सवाल है क्या दो माह के भीतर इतनी बड़ी तादाद में नए मतदाता जुडऩे के लिए कतार में लगे हैं या फिर ये वे लोग हैं जो मतदाता सूची में नाम जुड़वाने से वंचित रह गए थे? या फिर ऐनवक्त पर सूचियों से जिनके नाम कट गए, वे लोग हैं ये? मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए 1 जनवरी तक 18 वर्ष की आयु जरूरी है।
संभव है पहली जनवरी के बाद पात्र हुए युवाओं की यह तादाद हो। लेकिन आंकड़े देखकर इसकी पुष्टि नहीं होती। जो आंकड़े सामने आए हैं, उनके अनुसार दो लाख में से 25 फीसदी आवेदक ही इस श्रेणी में है। यानी 75 फीसदी आवेदक विभिन्न आयु वर्ग के हैं। ये सभी लोग पहली बार तो आवेदन कर नहीं रहे होंगे। इनमें से कई अन्य जगहों से स्थानान्तरित होकर आए होंगे। कई वे होंगे, जिन्होंने पहले आवेदन किया था पर सूची में नाम दर्ज नहीं हुआ। ऐसे लोग भी कतार में होंगे, जिनका नाम ताजा सूची से गायब हो गया था। कई फर्जी नाम भी हो सकते हैं। तात्पर्य यह है कि अगर सारे लोग मतदाता सूचियों में नाम जुड़वाना चाहते हैं तो कहीं न कहीं यह चुनाव प्रबंधन की खामियों का नतीजा है। अभी राज्य भर से आंकड़े आना बाकी है।
जयपुर का उदाहरण यह दर्शाता है कि तमाम दावों के बावजूद मतदान सूची में नाम जुड़वाने की प्रक्रिया अभी कई खामियों की शिकार है। यह मानकर भी चलें कि मतदाता सूचियों में नाम जुड़वाने के लिए कोई फर्जीवाड़ा नहीं हो रहा है तो भी थोड़े से अंतराल के बाद ही अगर इतने आवेदक खड़े हो गए हों तो जरूर कहीं न कहीं गड़बड़ी है। नामों की जांच-परख अच्छी तरह से हो। बल्क में आवेदन स्वीकार न हो। 23 हजार आवेदन तो शुद्धीकरण के आए हैं। इससे साफ है सूचियों की जांच का काम लापरवाही से हुआ। इसमें दो राय नहीं कि कोई भी पात्र व्यक्ति सूची में दर्ज होने से वंचित नहीं होना चाहिए, लेकिन यह भी जरूरी है कि सूची पूरी तरह से निर्दोष और मुकम्मल हो। फर्जी नाम दर्ज न हो।

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