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बख्शे न जाएं अफसर!

 टिप्पणी
राज्य सरकार जयपुर के अमानीशाह नाले के बहाव क्षेत्र में आ रही जमीन का मालिकाना हक निरस्त करेगी। इस क्षेत्र में आ रही निजी खातेदारों की जमीन चिक्षित करके पहली सूची जिला कलक्टर को भेज दी गई है। अब कलक्टर यह सूची राजस्व न्यायालय में पेश करेंगे। यानी शहर से गुजर रहे 40 किमी लम्बे नाले के बहाव-क्षेत्र में अवरोधों को दूर करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। देखने पर यह सारी कार्रवाई जयपुर विकास प्राधिकरण के काबिल अफसरों की लगती है। नौकरशाही को कितनी चिन्ता है प्राकृतिक नदी-नालों की! पर्यावरण की और नगर के संतुलित विकास की! लेकिन हकीकत शायद हर शहरवासी जानता है।
राजस्थान हाईकोर्ट के सख्त आदेश और बार-बार लगाई गई फटकार के बिना क्या इन अफसरों के कानों में जूं तक रेंगती? कोर्ट की सक्रियता और अवमानना से घबराए अफसरों के पास और कोई चारा भी नहीं बचा था। शुक्र है, प्राकृतिक जलाशयों और पर्यावरण पर माननीय न्यायालय की नजर है वरना जेडीए अफसर पूरे अमानीशाह नाले को ही बेच डालते। जिस तरह भू-राजस्व कानून की धज्जियां उड़ाते हुए नाले के बहाव क्षेत्र में जमीनों के आवंटन किए गए उससे सरकारी अफसरों ने भले ही अपनी जेबें गरम कर ली, लेकिन पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य के साथ भयानक खिलवाड़ हुआ। नाले के जहरीले पानी में लगाई गई सब्जियां शहरवासियों के पेट में लम्बे समय से जहर घोल रही हैं। संभवत: इसीलिए हाईकोर्ट द्वारा नियुक्त कमिश्नरों ने भी अपनी रिपोर्ट में बहाव क्षेत्र की खातेदारी खत्म करने की जरूरत बताई। हाईकोर्ट तो बहुत पहले ही नदी-नालों, बांध, तालाब आदि सभी जलाशयों के बहाव क्षेत्रों में अतिक्रमण, अवैध निर्माण तथा 1955 के भू-राजस्व कानून के विरुद्ध किए गए आवंटनों को निरस्त करने के आदेश दे चुका है। लेकिन  संबंधित अधिकारी कानों में तेल डालकर लोगों को लूटते रहे। सरकार आंखों पर पट्टी बांधकर बैठी रही। सरकार का यही रवैया राज्य में अधिकांश प्राकृतिक जलाशयों को सूखने के कगार तक पहुंचाने के लिए जिम्मेदार है।
रामगढ़ बांध का हाल सबके सामने है। रामगढ़ ही क्यों राज्य की कई झाीलों-तालाबों का यही हाल है जो लालची अफसरों और राजनेताओं की मिलीभगत का नतीजा है। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्य भी इस 'बीमारी' से मुक्त नहीं हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट तक के स्पष्ट निर्देश हैं कि जलाशयों के प्राकृतिक प्रवाह में किसी तरह का अवरोध नहीं होना चाहिए। राज्य हाईकोर्ट अपने आदेश में जलस्रोतों की जमीन का आवंटन रोकने की स्पष्ट हिदायत दे चुका है। कोर्ट यह तक कह चुका है कि अदालती आदेश के विपरीत आवंटन होने पर दोषी अधिकारी व लाभार्थी दोनों को बक्शा न जाए। ऐसे में जेडीए का जमीन आवंटन निरस्त करने का यह फैसला तब तक अधूरा है, जब तक कि अवैध आवंटन के जिम्मेदार अधिकारी को भी सजा नहीं मिले।
आवंटन निरस्त होने पर खातेदार को तो सजा मिल ही जाएगी, लेकिन अफसर खुले घूमते रहेंगे, यह नहीं चलेगा। भले ही अफसर रिटायर हो चुका हो, उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। इसलिए ऐसे सभी अफसरों की सूची सार्वजनिक की जानी चाहिए। अगर अफसर किसी नेता या मंत्री का नाम ले तो उसे भी सजा के दायरे में शामिल करना चाहिए। दो राय नहीं कि कई मामलों में नेताओं और मंत्रियों की अफसरों से मिलीभगत होगी। फिर भी आदेश करने वाला अफसर अगर सीधे जिम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा और उसे सजा नहीं मिलेगी तो यह घृणित गठजोड़ कभी टूट नहीं पाएगा।

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सड़कों पर बारात

  टिप्पणी
राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रशासन को हिदायत दी है कि जयपुर में सड़कों पर बारात निकलने के दौरान लोगों की आवाजाही पर असर नहीं पडऩा चाहिए। न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई के दौरान नगर निगम से कहा कि भीड़ भरी सड़कों पर क्यों नहीं लगाते बारात पर पाबंदी। न्यायालय ने जैसे ज्यादातर नागरिकों के मन की बात कह दी। भीड़ भरी सड़कों के कारण आखिर कौन है जो परेशान नहीं होता। बड़े शहरों में ही नहीं कस्बों में भी अब तो बारात के कारण घंटों-घंटों जाम में लोग फंस जाते हैं। बढ़ते वाहनों का अम्बार, साइकिल व ऑटो रिक्शा की रेलमपेल, अतिक्रमण के चलते सिकुड़ती सड़कें, बेतरतीब चौराहे और ऊपर से बारातियों का बीच सड़क पर घेरा डालकर कई-कई देर तक डांस करना राहगीरों की मुसीबत बन जाता है।
वाहनों की कतारों के बीच खतरनाक आतिशबाजी देखकर तो कई बार दिल दहल उठता है। कहीं कोई हादसा हो गया तो बच कर निकलने की कोई जगह नहीं। इन हालात से बेपरवाह बारातियों को निश्चिन्त होकर मनोरंजन में मशगूल देखकर बड़ी पीड़ा होती है। आखिर कहां गया हमारा नागरिक दायित्व-बोध? बारात के कारण जाम में फंसे लोगों में कोई गंभीर मरीज भी हो सकता है, जिसे तत्काल चिकित्सा की जरूरत है। गत दिनों ऐसे ही एक जाम में एम्बुलेंस के फंसने से मरीज की मौत हो चुकी है। हालांकि कुछ जगह बारातियों को भी व्यवस्था बनाते देखा जाता है, लेकिन ज्यादातर ऐसा देखने में नहीं आता और राह से गुजरने वाले परेशान होते रहते हैं। ऐसे लापरवाह लोगों के लिए तो यातायात पुलिस और स्थानीय प्रशासन की खास तौर पर जरूरत महसूस होती है।
किसी बड़े आदमी के यहां विवाह-समारोह हो तो पुलिस वालों की लाइन लग जाती है व्यवस्थाएं बनाने में। लेकिन आम विवाह-समारोह में बीच सड़क पर यातायात में खलल डालते समय पुलिस का कोई परिन्दा भी नजर नहीं आता। दूरस्थ कॉलोनियों का तो भगवान ही मालिक है। एक ही मुख्य सड़क पर कई 'मैरिज गार्डन्स' और आमने-सामने गुजरती बारातों की ऐसी चिल्ल-पों मचती है कि बेचारे राहगीरों का 'बाजा' बज जाता है। माना शहर की ट्रैफिक व्यवस्था केवल बारातों की वजह से नहीं बिगड़ती। यातायात पुलिस और स्थानीय निगमों की कुव्यवस्थाएं इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार हैं।
'पीक ऑवर्स' में तो रोजाना जाम के हालात बनते हैं। ऐसे में 'बारातियों' को कोसना ठीक नहीं। विवाह एक उत्कृष्ट सामाजिक संस्कार है जिसे समारोहपूर्वक मनाने का सबको हक है। इसके बावजूद हमारा दायित्व है कि हम सड़क पर बारात के दौरान कुछ चीजों का ध्यान रखकर राहगीरों की राह आसान बना सकते हैं और विवाह-समारोह का भी भरपूर आनन्द ले सकते हैं।

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स्वतंत्र मीडिया का दमन

सरकार के सुर में सुर मिलाकर बोलने वालों को उपकृत और विरोधी सुर को तिरस्कृत किया जाता है। राज्य सरकारों की यह आम प्रवृत्ति है। पर छत्तीसगढ़ की सरकार इससे भी आगे है।
दुनिया भर में पत्रकारिता के हालात और पत्रकारों की सुरक्षा पर नजर रखने वाली अन्तरराष्ट्रीय संस्था 'रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर्स' की रिपोर्ट के अनुसार प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में भारत दुनिया के देशों में 140 वें पायदान पर है। यह रैंकिंग वल्र्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स-2014 में दर्ज की गई है।
हाल ही में जारी इस रिपोर्ट के अनुसार गत वर्ष भारत में पत्रकार सरकारी और गैर सरकारी दोनों स्तरों पर हिंसक निशाने पर रहे और 13 पत्रकार मारे गए। प्रेस की स्वतंत्रता का हनन और अभिव्यक्ति के दमन के मामले में भी भारत की कोई अच्छी तस्वीर प्रस्तुत नहीं की गई है। रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ और जम्मू-कश्मीर राज्यों का खासतौर पर जिक्र किया गया है, जहां प्रेस की स्वतंत्रता भारत में सर्वाधिक कुचली जा रही है। आतंककारी और अलगाववादी ताकतों के बीच जम्मू-कश्मीर में प्रेस के हालात जब-तब राष्ट्रीय सुर्खियां बनते रहे हैं।
इसी तरह छत्तीसगढ़ में भी माओवादी हिंसा और पत्रकारों पर हमलों की घटनाएं राष्ट्रीय मीडिया में स्थान पा जाती हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ में प्रेस के दमन और अभिव्यक्ति को कुचलने की सरकारी कारगुजारियों की शायद ही कभी चर्चा होती है। जबकि राज्य की रमन सिंह सरकार पिछले लम्बे समय से प्रेस को दबाने और कुचलने का काम कर रही है। शासन और सत्ता की शक्ति का इस्तेमाल स्वतंत्र अभिव्यक्ति को रोकने में किस तरह किया जाता है, यह छत्तीसगढ़ में साफ देखा जा सकता है। सरकार के सुर में सुर मिलाकर बोलने वालों को उपकृत और विरोधी सुर को तिरस्कृत किया जाता है। राज्य सरकारों की यह आम प्रवृत्ति है। लेकिन छत्तीसगढ़ की सरकार इससे भी एक कदम आगे है। वह विरोध में उठने वाले एक सुर को भी बर्दाश्त नहीं कर सकती। सरकारी नीतियों का जनहित में विरोध करने वाले मीडिया को वह चुन-चुन कर निशाना बनाती हैं। हालांकि ज्यादातर स्थानीय मीडिया सरकार की कारगुजारियों पर चुप रहता है। अगर कोई बोलने की हिमाकत करता है तो उसे तरह-तरह से प्रताडि़त किया जाता है। धमकियां मिलती हैं।
'पत्रिका' को इसका कड़वा अनुभव है। 'पत्रिका' ने राज्य की सम्पदा को उद्योगपतियों के हाथों बेचने की सरकारी कारगुजारियों की एक-एक करके पोल खोली। छत्तीसगढ़ में बांध, नदी, तालाब, बगीचे यहां तक कि श्मशान की जमीनें भी उद्योगपतियों को बेच दी गई। अखबार की आवाज को दबाने और कुचलने की हर संभव कोशिश की गई। अखबार निर्भीकता और निष्पक्षता से मुद्दे उठाता रहा। भ्रष्टाचार की पोल खुलने पर सरकार किस तरह बौखला जाती है, यह छत्तीसगढ़ के लोग देख चुके हैं। क्या किसी मुख्यमंत्री द्वारा प्रेस कान्फ्रेंस बुलाकर अखबार को सरेआम धमकी देने का उदाहरण कहीं देखा है? मुख्यमंत्री की धमकी के बाद पत्रिका कार्यालय पर हमला किया गया। सरकार के दबाव के आगे झाुके बिना अखबार अपनी भूमिका निभाता रहा। सरकार की ज्यादतियां भी थमी नहीं। विधानसभाध्यक्ष के माध्यम से अखबार को सदन से बाहर कर दिया गया। पत्रिका संवाददाताओं के प्रवेश पत्र निरस्त कर दिए गए। अखबार ने सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी। कोर्ट ने अखबार के हक में आदेश सुनाए। लेकिन सवाल यह है कि क्या मीडिया की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति को कुचलने के ऐसे उदाहरण मिलेंगे? सबसे दुखद तो स्वतंत्र मीडिया के हितों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार संस्थाओं का खामोश रहना है। प्रेस परिषद, एडिटर गिल्ड जैसी संस्थाओं का क्या औचित्य, जब एक सर्वसत्तावादी सरकार अपनी शक्ति का इस तरह खुला दुरुपयोग करे। मीडिया संगठनों और संस्थाओं की यह उदासीनता ही सरकारों को मीडिया की स्वतंत्रता को कुचलने की ताकत देती है।
'रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर्स' ने अपनी रिपोर्ट को पत्रकारों से जुड़ी हत्याओं और माओवादी हिंसा पर केन्द्रित रखा है। निश्चय ही पत्रकारों की हत्या शर्मनाक कृत्य है। माओवादियों की जितनी भत्र्सना की जाए कम है। राज्य सरकार भी उतनी ही जिम्मेदार ठहराई जानी चाहिए जो पत्रकारों की हिफाजत करने में नाकाम रही। लेकिन पत्रकारों और पत्रकारिता की सुरक्षा, स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर नजर रखने वाले मीडिया संगठनों व संस्थाओं को उन हालात पर भी गौर करना चाहिए जिनमें सरकारें मीडिया की आवाज को दबाने का दुस्साहस करती हैं।
कैमरा झूठ नहीं बोलता...
केन्द्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिन्दे ने दो दिन पहले महाराष्ट्र में युवा कांग्रेस के एक कार्यक्रम में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को जमकर कोसा। लेकिन मीडिया में उठते विरोध के बाद उन्होंने जिस तरह पलटा खाया, वह चर्चा का विषय बन गया है। शिन्दे साफ मुकर गए और कहा कि मैं तो सोशल मीडिया की बात कर रहा था। जबकि उनके भाषण में साफ तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर हमला बोला गया था। अब टीवी चैनल भाषण का वो फुटेज दिखा रहे हैं जिसमें शिन्दे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर कांग्रेस पार्टी के खिलाफ नकारात्मक प्रचार करने का आरोप लगाते हुए मीडिया को हड़का रहे हैं। इसमें शिन्दे साहब जोश में मीडिया को 'कुचल' देने की धमकी तक देते हैं। अब ऑडियो-विजुअल मीडिया की क्या कहें—आदमी जो बोलता है और जो करता है उसे यह हूबहू रिकार्ड कर लेता है। क्योंकि कैमरा और माइक कभी झूठ नहीं बोलते!

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ये कैसी ठगी!


टिप्पणी
अगर आपका ए.टी.एम. कार्ड जेब में रखा हो और आपके मोबाइल पर जानकारी मिले कि आपके खाते से रुपए निकाले गए हैं। ये रुपए आपने नहीं किसी और ने निकाले हैं और वह भी किसी दूसरे शहर के ए.टी.एम. से। जाहिर है, आप बहुत ठगा हुआ महसूस करेंगे। किसी अनाम ठग से नहीं, बल्कि बैंक नामक उस जानी-पहचानी संस्था से, जिसमें करोड़ों लोगों ने भरोसा करके अपनी संचित राशि जमा कर रखी है।
जयपुर में हाल ही ऐसी कुछ घटनाएं हुई हैं। देश के अन्य कई शहरों में भी इस तरह की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इनकी तादाद भले ही अभी बहुत बड़ी न लगती हों, लेकिन ये ही हालात रहे तो हर दिन होने वाली चोरी और ठगी की वारदात की तरह आम हो जाएंगी। ऐसी सूरत में लोगों का बैंकों की ए.टी.एम. प्रणाली से तो भरोसा उठ ही जाएगा, बैंकिंग संस्था को भी बड़ा झाटका लग जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आखिर इन घटनाओं को साइबर अपराध मानकर बैंकें अपने ग्राहकों को केवल कानून और पुलिस के भरोसे कैसे छोड़ सकती है? बैंकों को इससे ऊपर उठकर सोचने की जरूरत है। बैंकों की चिन्ता में यह प्राथमिकता से शुमार होना चाहिए कि ए.टी.एम. क्लोनिंग की समस्या से कैसे निजात मिले। इस समस्या के तकनीकी उपाय तो होंगे ही। साइबर विशेषज्ञों का मानना है कि हर साइबर समस्या का निदान साइबर-जगत में ही मौजूद है। क्यों नहीं देश की सारी बैंकें चाहे वे सरकारी हों या निजी मिलकर इस समस्या का उपाय करें। उत्कृष्ट साइबर विशेषज्ञों के जरिए ऐसा सिस्टम बने जो ए.टी.एम. कार्ड की क्लोनिंग को लॉक कर सके। या तो क्लोनिंग ही संभव न हो और अगर हो तो वह किसी भी ए.टी.एम. मशीन पर कारगर न हो। तकनीक में सब कुछ संभव है। ए.टी.एम. कार्ड की पासवर्ड प्रणाली की समीक्षा करनी होगी। पासवर्ड की बजाय थम्ब इम्प्रेशन जैसे आधुनिक विकल्प मौजूद हैं, जो ज्यादा सुरक्षित हैं। बैंकों को नेट बैंकिंग की प्रणाली को भी दुरुस्त करना पड़ेगा। इसकी खामियों का फायदा उठाकर भी साइबर ठगी की जा रही है।
कुल मिलाकर बैंकों को अपने ग्राहकों को भरोसा दिलाना होगा कि उनके ए.टी.एम. कार्ड का कोई दुरुपयोग नहीं कर सकता। आजकल हर व्यक्ति ए.टी.एम. कार्ड रखता है। बैंक स्वयं भी ग्राहकों को यह कार्ड रखने का दबाव बनाती हैं। निश्चय ही यह कार्ड ग्राहकों को एक सहूलियत प्रदान करता है। लेकिन ऐसी घटनाएं उसे यह सहूलियत त्यागने को मजबूर कर देंगी। खाताधारी की नासमझाी या गलती से उसके साथ धोखा होता है तो बात समझ में आती है, लेकिन पूरी तरह सजग होते हुए अगर वह ऐसी साइबर ठगी का शिकार होता है तो बैंकें भी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। या तो बैंकें भरपाई करें या फिर मुकदमे का सामना करें।

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इंटरनेट और आपका बच्चा

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कहां खो गया जनता का प्रहरी?

आज तो मीडिया पर ही निगरानी की ज्यादा जरूरत है। जन को छोड़कर वह तंत्र के हितों को साधने में मशगूल है।
क्या गणतंत्र के प्रहरी के रूप में मीडिया का सामथ्र्य चुक गया? या फिर खुद मीडिया ने अपनी हालत इतनी दयनीय बना ली कि प्रहरी तो दूर वह एक कमजोर चौकीदार की भूमिका भी नहीं निभा पा रहा? उस पर जनता ने लोकतंत्र के तीनों पायों की निगरानी का दायित्व सौंपा था। लेकिन वह खुद चौथा पाया बनकर भ्रष्टतंत्र में शामिल हो गया। आज तो मीडिया पर ही निगरानी की ज्यादा जरूरत है। जन को छोड़कर वह तंत्र के हितों को साधने में मशगूल है। उसके अपने हित सर्वोपरि हैं। इसलिए उसकी आवाज में न ताकत है और न लोगों का उसमें भरोसा। वह जनता से दूर चला गया। सिर्फ कारोबार बन कर रह गया।
मीडिया आज मुख्यत: दो तरह के कारोबारियों के हाथ में है। एक वे जो रियल एस्टेट, चिटफंड, खनन, ऊर्जा जैसे गैर-मीडिया कारोबारी हैं। दूसरे वे जो मीडिया कारोबारी होते हुए भी धीरे-धीरे दूसरे व्यवसाय शुरू कर देते हैं। कुछ अरसे बाद दूसरा व्यवसाय प्रमुख बन जाता है। मीडिया तो सिर्फ उसे चमकाने के काम आता है। जैसे 'पॉवर' प्राप्त करने के लिए कुछ मीडिया कंपनियां पॉवर क्षेत्र में प्रवेश कर गईं तो कुछ पॉवर कंपनियां मीडिया में घुस आईं। दोनों ही सूरत में इस्तेमाल मीडिया का किया जा रहा है। भारत में क्रॉस मीडिया ऑनरशिप पर कोई पाबंदी नहीं है। इसलिए मीडिया में गैर-मीडिया और गैर-मीडिया क्षेत्र में मीडिया का प्रवेश निर्बाध जारी है।
मनोरंजन...
मीडिया की ओर से ऐसा सुनने पर बहुत निराशा होती है। हमारा सबसे पहला काम खबर देना है और वह भी संतुलित खबर। मीडिया स्वयं को लोकतंत्र का चौथा पाया मानता है, तो उसे पूरी तरह से इस भूमिका को निभाना चाहिए और ऐसा भारतीय मीडिया ने किया भी है। आज आम आदमी की जुबान पर जो बड़े-बड़े घोटालों के नाम हैं, वे मीडिया की वजह से ही उजागर हुए हैं। जिन घोटालों या भ्रष्टाचार की शिकायत आज आम आदमी करता है, उसके पीछे मीडिया का बड़ा रोल है। लेकिन यह सही है कि मौजूदा दौर में मीडिया की चौथे पाये की भूमिका में कमी आई है, उसमें सुधार होना चाहिए। भारत ही नहीं, दुनियाभर में मीडिया आज अहम किरदार है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस देश में भी तानाशाही होती है, वहां की सरकार सबसे पहले प्रेस को बंद करती है। किसी भी लोकतंत्र को बचाए रखने के स्वतंत्र और मजबूत प्रेस का होना बहुत जरूरी है।
कमजोर...
मालिक या कम्पनी प्रबंधन की सोच तो अखबार या चैनल में मुनाफा कमाना ही रहेगी। पाठक या दर्शक को अगर उपभोक्ता की तरह देखा जाए, तो फिर नागरिकों के सशक्तीकरण और उनमें जागरूकता की बात बेमानी है।
दिखने लगा सरकार का दबाव : पांच-छह साल से पूरे विश्व में आर्थिक संकट का दौर चल रहा है। हमारे देश की अर्थव्यवस्था भी खराब हुई है। जीडीपी वृद्धि की गति कम हो गई है, इससे बड़े-बड़े कॉरपोरेट घरानों ने विज्ञापनों पर खर्च करना कम कर दिया है। इसका मीडिया कम्पनियों पर भी असर पड़ा है। पिछले पांच-दस साल से इंटरनेट की पहुंच लोगों तक बहुत बढ़ गई है। वह मुफ्त में सूचनाएं, खबरें दे रहा है, हालांकि इसकी विश्वसनीयता पर सवाल जरूर है। आर्थिक संकट के चलते अखबारों और चैनलों में निजी संस्थाओं के विज्ञापन कम हो रहे हैं और मीडिया कम्पनियां विज्ञापन के लिए सरकार पर ज्यादा निर्भर हो गई हैं। ऐसे में सरकार विज्ञापन देगी, तो यह भी चाहेगी कि मीडिया उसके खिलाफ न जाए। यह दबाव भी मीडिया पर काम कर रहा है। इसी के चलते विश्वसनीयता खत्म हुई है।
पेड न्यूज के जरिए धोखा : इस दौर में पेड न्यूज ने पाठकों के साथ बड़ा छल किया है। विज्ञापन  को खबरों की तरह पेश किया जा रहा है। लेकिन हमारे देश का पाठक या दर्शक बेवकूफ नहीं है। वह समझाता  है कि कौन पाठकों या दर्शकों से धोखा कर रहा है। खबरों को लेकर विश्वसनीयता खत्म होगी, तो नुकसान मीडिया का ही होगा। बिजनेस मॉडल के चलते अगर सब कुछ विज्ञापन पर ही निर्भर रहेगा, तो आगे चलकर संकट पैदा हो जाएगा। मीडिया पर लगने वाले आरोपों में कुछ सच्चाई तो है। मीडिया को आत्म चिंतन करना चाहिए। जन-सरोकारों को निभाना चाहिए। जिस चौथे खम्भे का दर्जा मीडिया को मिला हुआ है, उसके हिसाब से कितना काम वह कर रहा है , आज यह सबके सामने हैं। हालांकि मीडिया का एक हिस्सा हमेशा  ऐसा रहा है, जो अपनी जिम्मेदारी निभाता रहा है, लेकिन ज्यादातर लोग ऐसा नहीं कर रहे । भारतवर्ष ही अकेला ऐसा देश है, जो खुद को लोकतंत्र कहता है, लेकिन रेडियो पर खबरें सरकार की ही आती हैं।
कहां...
क्रॉस मीडिया ऑनरशिप के दो रूप प्रचलित हैं। पहला, जब एक मीडिया- कंपनी मीडिया-क्षेत्र यानी टीवी, अखबार, रेडियो आदि में ही निवेश करे तो यह 'वर्टिकल क्रॉस मीडिया ऑनरशिप' है। दूसरा, जब एक मीडिया-कंपनी मीडिया से बाहर के क्षेत्र में निवेश करे तो यह 'हारिजेन्टल क्रॉस मीडिया ऑनरशिप' है। अमरीका तथा ज्यादातर यूरोपीय देशों में हॉरिजेन्टल क्रॉस मीडिया ऑनरशिप पर पाबन्दी है। भारत में ऐसी कोई रोक नहीं होने से मीडिया में घालमेल का कारोबार पनप गया। मीडिया को भ्रष्ट करने में इसकी बड़ी भूमिका है। इसके सूत्र देश के दो सबसे बड़े 2जी स्पैक्ट्रम और कोयला ब्लॉक आवंटन घोटालों में आसानी से देखे जा सकते हैं। 2जी स्पैक्ट्रम के लिए गैर मीडिया कंपनियों ने किस तरह लॉबिंग की और किस तरह लॉबिस्ट नीरा राडिया की मार्फत भ्रष्ट नेताओं, उद्योगपतियों और नामी-गिरामी पत्रकारों में सांठगांठ हुई, यह सबके सामने है। ये तो कुछ टेपों के ही खुलासे थे। अगर 5800 टेपों के राज खुल गए तो पता नहीं किस किसकी पोल खुलेगी। कोयला ब्लॉक्स घोटाले में कुछ मीडिया कंपनियों की भागीदारी सीधे तौर पर सामने आई। कुछ परोक्ष तौर पर जिम्मेदार रहीं। नवीन जिन्दल-जी न्यूज प्रकरण इसका उदाहरण है। देश में जब इतने बड़े घपले-घोटाले हों तो मीडिया की जिम्मेदारी थी कि वह इन्हें उजागर करता। लेकिन खुद मीडिया के हित जुड़े हों तो कौन यह काम करता। देश के बड़े घोटाले कैग, सीवीसी जैसी संस्थाएं सामने लेकर आईं।
मीडिया को एक और प्रवृत्ति ने ठेस पहुंचाई। यह है राजनेताओं का मीडिया कारोबार में प्रवेश। आज कई प्रान्तीय अखबार और न्यूज चैनलों पर राजनेताओं का मालिकाना हक है। मीडिया के जरिए गैर-मीडिया कारोबारों की तरह राजनीति को भी चमकाया जा रहा है। जैसे महाराष्ट्र में 'लोकमत', छत्तीसगढ़ में 'हरिभूमि', झारखंड में 'प्रभात खबर' जैसे अखबारों के खनन अथवा बिजली उत्पादन के गैर-मीडिया कारोबार हैं। कई राज्यों से प्रकाशित 'दैनिक भास्कर' के बिजली उत्पादन, खनन, रियल एस्टेट, खाद्य तेल रिफाइनिंग, कपड़ा उद्योग आदि कई गैर-मीडिया कारोबार हैं। इसी तरह राजनेताओं ने भी मीडिया को गैर-मीडिया कारोबार में तब्दील कर दिया। कहने को उनके न्यूज चैनल या अखबार जनता के लिए है, लेकिन असल हित राजनीति के साधे जाते हैं। दक्षिण भारत में यह प्रवृत्ति पहले से थी, अब पूरे देश में फैल गई है। हरियाणा में पूर्व केन्द्रीय मंत्री विनोद शर्मा का 'इंडिया न्यूज चैनल', सांसद के.डी. सिंह का 'तहलका एवन', राज्य के पूर्व गृहमंत्री और गीतिका कांड के आरोपी गोपाल कांडा का 'हरियाणा न्यूज' चैनल व 'आज समाज' अखबार, नवीन जिन्दल का 'फोकस टीवी' है। पंजाब में अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल का 'पीटीसी न्यूज'  चैनल, प.बंगाल में माकपा के अवीक दत्ता का 'आकाश बांग्ला' व '२४ घंटा' टीवी चैनल है। आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी का 'साक्षी टीवी', के.चन्द्रशेखर राव का टी.न्यूज, तमिलनाडु में जयललिता का 'जया टीवी', कलानिधि मारन का 'सन टीवी', कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी की पत्नी अनिता कुमार स्वामी का 'कस्तूरी टीवी', कांग्रेस के राजीव शुक्ला का 'न्यूज 24' है जो जनता के साथ-साथ राजनीति की सेवा भी कर रहे हैं।
पेड न्यूज का रोग भी मीडिया को खोखला कर रहा है। इसका सबसे पहले खुलासा 'वाल स्ट्रीट जनरल' के नई दिल्ली ब्यूरो चीफ पाल बैकेट के एक लेख में किया गया था। शीर्षक था-'प्रेस कवरेज चाहिए, मुझो पैसे दो।' इसमें चंडीगढ के एक निर्दलीय उम्मीदवार की व्यथा बयान की गई थी। 2009के आम चुनावों में पेड न्यूज एक महारोग के रूप में उभरा। प्रेस परिषद की समिति की रिपोर्ट में बड़े-बड़े अखबार और मीडिया घरानों (पत्रिका शामिल नहीं) के नाम सामने आए। कहने की जरूरत नहीं पेड न्यूज ने मीडिया की नैतिक शक्ति को कुंद कर डाला। देश के सारे मीडिया घराने और पत्रकार इन बुराइयों में डूबे हैं-यह सच नहीं है। अभी कुछ बचे हुए हैं। लेकिन इनकी तादाद इतनी कम है कि वे अकेले मीडिया की गिरती हुई साख को नहीं बचा सकते। अलबत्ता, इस कलुषित माहौल में वे अपने आपको साफ-सफ्फाक रखे हुए हैं यही कम बात नहीं है। वे बचे भी हैं और अपना काम भी बखूबी कर रहे हैं। इससे साबित है कि बिना भ्रष्ट हुए भी मीडिया जीवित रह सकता है।

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खोदा पहाड़ निकली चुहिया!

टिप्पणी
राजस्थान में नई सरकार बनने के बाद घोषणा हुई थी कि शीघ्र ही सरकारी विभागों से जुड़ी 60  दिवसीय कार्ययोजना पेश की जाएगी। सुनकर थोड़ी हैरत हुई थी। सिर्फ 60  दिवसीय ही क्यों? पूरे पांच साल की क्यों नहीं? फिर लगा सरकार जनता से जुड़े कुछ ऐसे महत्वपूर्ण कार्यों की प्राथमिकता तय करना चाहती होगी जो एक निश्चित समय-सीमा के भीतर पूरे हो जाने चाहिए। जनता के भारी ऐतिहासिक समर्थन से चुनी गई सरकार को भी लगा होगा कि उसे जनता का कर्ज लौटाने के लिए कुछ ऐसे काम करने चाहिए जो एक छोटी टाइम लाइन में बंधे हों। यह बात भी रही होगी कि दो माह बाद लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लग जाएगी। शुरू के दो माह आमतौर पर 'हनीमून पीरियड' के निकल जाते हैं। यानी सरकार बनने के चार-पांच माह बाद भी अगर वह कुछ काम न कर पाई तो जनता में बुरा संदेश जाएगा।
सरकार ने सही दिशा में सोचा। लेकिन माह भर इंतजार के बाद सामने आई साठ दिवसीय कार्ययोजना को जब देखा तो सब काफूर हो गया। खोदा पहाड़ और निकली चुहिया! यह कैसी कार्ययोजना। जिसमें न तो कोई प्राथमिकता है और न ही कोई जरूरी-गैर जरूरी कार्यों का विभाजन। 'गैर जरूरी' इस अर्थ में कि इन कार्यों की 60 दिन में क्रियान्विति की न तो कोई जरूरत है और न ही वह संभव है। विभागों ने सतही तौर पर जैसे एक सूची तैयार कर दी, जिसमें बिन्दुवार काम गिना दिए गए हैं। ऐसे-ऐसे काम हैं जिन्हें देखकर साफ है कि इनकी क्रियान्विति तो कोई लक्ष्य ही नहीं है। समय-सीमा के भीतर तो कतई नहीं।
क्या प्रदेश भर में 56 हजार किलोमीटर लंबी सड़कों की मरम्मत 60 दिवस में की जा सकेगी? राज्य में साढ़े चार हजार कम्प्यूटर लैब पांच साल में लगनी हैं तो दो हजार लैब फरवरी तक कैसे स्थापित होंगी! विभागों की कार्य सूची में ऐसे कई कार्य हैं जिन्हें पूरा करने के लिए कुछ साल चाहिए। तो कुछ कार्य ऐसे भी हैं जो 60 मिनट में किए जा सकते हैं। क्या तीन विश्वविद्यालयों के नाम परिवर्तन के लिए भी 60 दिन चाहिए? साफ-सफाई के रूटीन के काम भी शामिल करने की क्या तुक है! सबसे बड़ी बात यह है कि 60 दिन में काम पूरे नहीं हुए तो कौन जिम्मेदार होगा? इस पर खामोशी है।
कार्यों की सूची से साफ है कि नौकरशाही ने अपनी बला टाली है। सरकार का हुकुम था, इसलिए बजा दिया। लगता है इन कार्यों को तय करते समय 4 नामी-गिरामी मंत्रियों की समिति ने कुछ ध्यान ही  नहीं दिया। अफसरों ने जो परोसा वह पेश कर दिया। अफसरशाही की हठधर्मिता तो देखिए कि विभागों को योजना में संशोधन के लिए कहा भी गया तो अफसरों ने सुनी-अनसुनी कर दी।
परिणाम सामने है। जो कार्ययोजना आई है उससे जनता के न हित सधने वाले हैं और न ही उनकी आकांक्षाएं पूरी होंगी। उल्टे सरकार की छवि खराब होगी।

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