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तहलका पर कालिख के छींटे

तहलका के रिपोर्टरों और पत्रकारों ने ये उपलब्धियां जिसके नेतृत्व में अर्जित की, उसी की मूर्ति खंडित हो गई। गोवा की घटना केवल एक सम्पादक-पत्रकार के पतन की घटना मात्र नहीं है, यह तहलका के पतन की भी घोषणा है। निश्चय ही मीडिया-जगत के लिए यह अफसोसजनक है।

अपनी शुरुआत से ही तहलका साहसी और तीखी पत्रकारिता के अपने संकल्प पर कायम रहा है। यह उन कुछ संस्थानों में से एक है, जो अपने मूल्यों से कभी समझाौता नहीं करते।'
ये शब्द फिल्मकार अभिनेता आमिर खान के हैं, जिनका इस्तेमाल तहलका संस्थान अपनी प्रचार सामग्री में अक्सर करता है, लेकिन अब ये शब्द बहुत अटपटे लगेंगे। गोवा की घटना ने तरुण तेजपाल के साथ ही तहलका की साख भी चौपट कर दी। इस घटना का एक दुखद और चिन्तनीय पहलू यह भी है कि जिस संस्थान ने देश की खोजी पत्रकारिता में एक नई जान फूंकी, वह आज शर्मनाक मोड़ पर आ खड़ा है। तरुण तेजपाल की हरकत ने अपने साथ ही संस्थान को भी गर्त में ला दिया। आप कह सकते हैं, तरुण तेजपाल अपने में कोई सम्पूर्ण संस्थान नहीं हैं और तहलका को बनाने में समर्पित पत्रकारों की एक पूरी टीम रही है। इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन संस्थान के सर्वोच्च शीर्ष पर बैठे व्यक्ति पर लगी कालिख के छींटों से कोई संस्थान कैसे बचा रह सकता है? तेजपाल तो तहलका के संस्थापक भी हैं और सम्पादक भी। उनकी हरकत से सम्पादक की गरिमा और पत्रकारिता का पेशा भी शर्मसार हुआ है।
महिलाओं के यौन-उत्पीडऩ की बढ़ती घटनाओं से लोग उद्वेलित हैं। निर्भया कांड ने सबको हिलाकर रख दिया था। अनुमान था कि इस घटना के बाद लोगों के आन्दोलन व आक्रोश से एक सामाजिक दबाव बनेगा और ऐसी घटनाओं में कमी आएगी। छेड़छाड़ और यौन-उत्पीडऩ के वाकिये कम होंगे। कम-से-कम कार्यस्थलों पर तो महिलाएं सुरक्षित रह सकेंगी, लेकिन जब जिम्मेदार और प्रबुद्ध कहे जाने वाले लोग ही अपने मातहतों के साथ ऐसा बर्ताव करेंगे, तो उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आती। शायद इसीलिए सोशल मीडिया में तरुण तेजपाल पर लोगों का गुस्सा विस्फोटक बनकर सामने आया। गोवा की घटना भले ही तहलका के दफ्तर में नहीं घटी, लेकिन यह कार्यस्थल पर घटी घटना मानी जाएगी। गोवा में 8 से 10 नवम्बर को तहलका का सालाना कार्यक्रम 'थिंक' आयोजित था। पीडि़त पत्रकार अपनी ड्यूटी निभा रही थी। आयोजन में देश-विदेश की कई जानी-मानी हस्तियां आमंत्रित की गई थीं। इन मेहमानों की देखभाल की जिम्मेदारी तहलका स्टाफ पर थी। इसी दौरान तहलका के सम्पादक तरुण तेजपाल ने अपनी स्टाफ सदस्य के साथ दुराचार किया। लगातार दो बार। दो अलग-अलग दिनों में होटल की लिफ्ट के भीतर। पीडि़त पत्रकार ने इस घटनाक्रम का जो विवरण तहलका की प्रबंध सम्पादक शोमा चौधरी को लिखा उससे साफ है कि तरुण तेजपाल ने संस्थान में अपनी हैसियत का बेजा फायदा उठाते हुए अपनी बेटी की उम्र की मातहत कर्मचारी के साथ यौन-दुराचार किया।
यह स्पष्टत: सुप्रीम कोर्ट की विशाखा गाइड लाइन की धज्जियां उड़ाने वाली घटना थी। इस घटना ने मीडिया संस्थानों में कार्यरत व अन्य महिला कर्मियों में भी वरिष्ठ पुरुष कर्मियों के प्रति विश्वास को ठेस पहुंचाई है। कार्यालय में जिसकी संरक्षक की भूमिका थी, उसी ने भक्षक का रूप धारण कर लिया।
घटना से निपटने की जिस तरह 'आन्तरिक' कोशिश हुई, वह भी कम निराशाजनक नहीं। अभियुक्त ने माफी मांग ली और पश्चाताप स्वरूप छह माह के लिए स्वयं को पद से अलग भी कर लिया। वाह क्या न्याय है! कोई भी पीडि़ता इससे कैसे संतुष्ट हो सकती थी? यही वजह रही कि घटना सार्वजनिक हो गई और मामले पर तहलका प्रबंधन के परदा डालने के प्रयास बेनकाब हो गए। इस घटना से चुपचाप निपटने की कोशिश से जाहिर होता है कि महिला यौन-उत्पीडऩ के मामले किस तरह दबाये जाते हैं। पीडि़त पत्रकार अगर साहसी और सजग ना होती, तो लोगों को घटना की भनक तक नहीं पड़ती। यौन-उत्पीडऩ की ज्यादातर घटनाएं शायद इसी तरह दबा दी जाती हैं। दुर्भाग्य से अधिकतर महिलाएं भी साहस नहीं जुटा पातीं। सबसे स्याह पहलू यह है कि यह सब एक ऐसे मीडिया-संस्थान में घटित हुआ, जो न केवल महिला-अधिकारों की पैरवी करता रहा है, बल्कि उनके हर तरह के उत्पीडऩ के खिलाफ मजबूती से खड़ा नजर आता है। छत्तीसगढ़ में पुलिस हिरासत के दौरान सोनी सोरी के साथ रौंगटे खड़े कर देने वाली यौनिक यातनाओं का खुलासा पढ़कर हर कोई दंग रह गया था। आज वही तहलका स्त्री, वह भी एक सहकर्मी स्त्री के यौन-उत्पीडऩ के प्रति ऐसा ठंडा रवैया अख्तियार करता है, तो मायूसी होती है। निराश होने का कारण यह भी है कि तहलका के जिस प्रबंधन ने इसे आन्तरिक मामला बताया, उसकी कमान एक महिला के हाथ में है।
गोवा की घटना को कुछ देर के लिए तहलका का आन्तरिक मामला भी मान लें, तो क्या फर्क पड़ेगा? तहलका को नुकसान तो होना ही था। हालांकि तहलका के भीतर से कुछ प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं, जिनके अनुसार, तहलका पर कोई संकट नहीं है। तहलका के पत्रकार अपना काम कर रहे हैं। जिसने बुरा किया वही भुगतेगा भी। तहलका पर कोई आंच नहीं है। कई दूसरे लोगों का भी मानना है कि तरुण तेजपाल का मतलब 'तहलका' संस्थान नहीं है। तरुण तेजपाल के पश्चाताप का सन्देश स्टाफ कर्मियों में बंट चुका था। सभी स्टाफकर्मी इस पश्चाताप से संतुष्ट नहीं थे, यह बाद की घटनाओं से भी स्पष्ट हो गया।
तहलका के रिपोर्टरों ने कई उत्कृष्ट रिपोर्टें लिखीं। इन पर तहलका को कई पुरस्कार भी मिले। तहलका ने मीडिया की दुनिया में 'स्टिंग्स' को एक नया आयाम दिया। राजनीति से लेकर नौकरशाही, पुलिस-तंत्र और खेल-जगत में व्याप्त भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ किया। देश के रक्षा सौदे किस तरह रिश्वतखोरी पर टिके हैं, और भद्रजनों का खेल क्रिकेट मैच फिक्सिंग के जाल में किस हद तक फंस चुका है, यह सब तहलका ने बताया। तहलका के रिपोर्टरों और पत्रकारों ने ये उपलब्धियां जिसके नेतृत्व में अर्जित की, उसी की मूर्ति जब खंडित हो जाए, तो उनके पास ऐसी कौन-सी नैतिक शक्ति बचेगी कि वे संस्थान को ऊंचे पायदानों पर पहुंचाते जाएं। सचमुच गोवा की घटना केवल एक सम्पादक-पत्रकार के पतन की घटना मात्र नहीं है, यह तहलका के पतन की भी घोषणा है। निश्चय ही मीडिया-जगत के लिए यह अफसोसजनक और दुखद है। खासकर इसलिए भी कि 'पेड न्यूज', 'राडिया टेप' और 'जिन्दल जी न्यूज' जैसे प्रकरणों में मीडिया की विश्वसनीयता पहले से ही सवालों से घिरी हुई है।

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क्यों हो जनमत सर्वे पर रोक?

किसी राजनीतिक दल को लेकर जनता का एक समूह क्या विचार रखता है, उसको व्यक्त करने से रोकना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करना ही माना जाएगा। जनमत सर्वेक्षण एक रैण्डम पद्धति है। यह सारी दुनिया में 'सेफोलॉजी' के रूप में मान्य है।

  वर्ष 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ओपिनियन पोल्स (जनमत सर्वेक्षणों) पर रोक लगाना चाहती थी। बाकायदा अध्यादेश लाने की तैयारी हो चुकी थी। लेकिन अटार्नी जनरल सोली सोराबजी की राय के बाद सरकार ने अपना इरादा त्याग दिया। सोली सोराबजी ने जनमत सर्वेक्षणों पर प्रतिबंध के खिलाफ राय व्यक्त की थी।
वर्ष 2009 में मनमोहन सिंह सरकार एग्जिट पोल के साथ ही ओपिनियन पोल पर भी प्रतिबंध लगाने की इच्छुक थी। लेकिन अटार्नी जनरल मिलन बनर्जी ने सरकार को सलाह दी कि अगर ओपिनियन पोल्स प्रतिबंधित किए गए तो सुप्रीम कोर्ट उसे रद्द कर देगा। क्योंकि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा। सीधे तौर पर यह संविधान की धारा 19 (1) ए का उल्लंघन माना जाएगा। इसके विपरीत वर्ष 2013 में अटार्नी जनरल जी.ई. वाहनवती ने केन्द्र सरकार को जनमत सर्वेक्षणों पर रोक लगाने की सलाह दी। चुनाव आयोग पहले से ही यह मांग करता रहा है। यूपीए सरकार को भी इस बार जनमत सर्वेक्षणों पर प्रतिबंध अपने अनुकूल लग रहा है। लिहाजा चुनाव-पूर्व जनमत सर्वेक्षणों पर रोक को लेकर जी-तोड़ कवायद की जा रही है। इसी के चलते चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों से इस बारे में राय मांगी। मुख्यत: कांग्रेस प्रतिबंध के पक्ष में और भाजपा प्रतिबंध के खिलाफ है। कई अन्य छोटे दल तथा प्रादेशिक पार्टियां जनमत सर्वेक्षणों के पक्ष और खिलाफत में अपनी-अपनी राय व्यक्त कर चुकी हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि जो दल प्रतिबंध का समर्थन कर रहे हैं, वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ हैं। जो विरोध कर रहे हैं वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकार हैं। दलों का समर्थन या विरोध राजनीतिक कारणों से है तथा अवसरवादिता के अलावा कुछ नहीं है। लेकिन यह मुद्दा केवल मीडिया के लिए ही नहीं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से सरोकार रखने वाली सभी संस्थाओं और व्यक्तियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इस पर गंभीरता से चर्चा की जरूरत है। जो सवाल सीधे तौर पर उठते हैं, वे हैं—
क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में ओपिनियन पोल्स पर प्रतिबंध लगना चाहिए?
क्या जनमत सर्वेक्षण मतदाताओं की स्वतंत्र राय को प्रभावित करते हैं?
क्या जनमत सर्वेक्षणों पर प्रतिबंध का मतलब सीधे तौर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक है?
पहली बात, जनमत सर्वेक्षणों पर प्रतिबंध क्यों लगे? क्या दुनिया में किसी भी देश में जनमत सर्वेक्षणों पर प्रतिबंध है? सिर्फ फ्रांस में चुनाव से24 घंटे पहले जनमत सर्वे पर रोक है। यदि वहां कोई मीडिया संस्थान सर्वे के निष्कर्ष प्रकाशित ही करना चाहता है तो उसे सर्वे के नमूने और आंकड़ों की विश्लेषण पद्धति का खुलासा करके इजाजत लेनी होती है। अलबत्ता, यह जरूर कह सकते हैं कि भारत जैसे विशाल और विविध दलीय देश में जनमत सर्वेक्षण अभी उतने सटीक नहीं है। लेकिन क्या इन्हें अपनी त्रुटियों से सीखकर निखरने, अधिक वैज्ञानिक और तार्किक होने का अवसर नहीं मिलना चाहिए?
दूसरी बात, क्या जनमत सर्वेक्षण सचमुच मतदाताओं की स्वतंत्र राय को प्रभावित करते हैं। व्यवहार में तो ऐसा नहीं देखा गया। बल्कि कई बार तो उल्टा ही देखा गया है। सबको मालूम है ,2004 में जब सारे जनमत सर्वेक्षण एन.डी.ए. सरकार की वापसी का संकेत कर रहे थे तब यू.पी.ए. की सरकार सत्ता में आई। शायद ही कोई सर्वे एजेन्सी ऐसी होगी, जिसका कोई भी निष्कर्ष हमेशा शत-प्रतिशत सही साबित हुआ है। साफ है, जिसको जिसे वोट देना है वह उसी को देगा। मतदाता कई कारणों को आधार बना कर मतदान करता है। उस पर अकेले सर्वे का असर नहीं पड़ता। थोड़ा बहुत पड़ता भी है तो इतना कम कि उससे मतदान परिणाम प्रभावित नहीं होता।
तीसरी बात, जनमत सर्वेक्षणों पर रोक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखा जाना चाहिए या नहीं। क्यों नहीं। सोली सोराबजी और मिलन बनर्जी जैसे दिग्गज कानून विशेषज्ञों ने यूं ही सरकार को राय नहीं दी थी। 1999 में चुनाव आयोग ने कुछ दिशा-निर्देश तय करके जनमत सर्वे को प्रतिबंधित कर दिया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में मामला चला गया। कोर्ट ने कहा, आयोग को प्रतिबंध लगाने का हक नहीं। वह सिर्फ संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनावों पर नियंत्रण या देखरेख की शक्ति रखता है। किसी राजनीतिक दल को लेकर जनता का एक समूह क्या विचार रखता है, उसको व्यक्त करने से रोकना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करना ही माना जाएगा। तर्क दिया जाता है कि किसी क्षेत्र के लाखों लोग क्या सोचते हैं, यह सर्वेक्षणों में चंद लोगों की राय से कैसे जान सकते हैं। जनमत सर्वेक्षण एक रैण्डम पद्धति है। यह सारी दुनिया में 'सेफोलॉजी' के रूप में मान्य है। सभी देशों में इसी विधि से सर्वेक्षण किए जाते हैं। ऐसे में सर्वेक्षणों को प्रतिबंधित करना जनता की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करना है।
महत्त्वपूर्ण बात यह कि क्या यह प्रतिबंध जनमत सर्वे तक ही सीमित रहेगा? इस बात की क्या गारण्टी कि अखबारों में छपने वाले चुनाव-विश्लेषण, रिपोर्टें, समीक्षाएं और सम्पादकीयों पर भी प्रतिबंध की गाज नहीं गिरेगी? जब बात मतदाताओं को प्रभावित करने की ही हो तो मीडिया पर प्रतिबंध की सूची में सबसे पहले आने का खतरा होगा। जिस दल या नेता के खिलाफ रिपोर्टिंग होगी, वही मीडिया के खिलाफ हो जाएगा और प्रतिबंध की मांग करेगा।
जनमत सर्वेक्षणों पर रोक का  मजबूत तर्क यह है 'पेड न्यूज' की तरह 'पेड ओपिनियन पोल' पर भी रोक लगनी चाहिए। जिस तरह 'पेड न्यूज' पर रोक का आशय 'न्यूज' पर रोक नहीं है, उसी तरह 'पेड ओपिनियन पोल' पर प्रतिबंध का आशय भी 'ओपिनियन पोल' पर प्रतिबंध नहीं होना चाहिए। दोनों में फर्क जरूरी है। 'पेड ओपिनियन पोल' या स्पॉन्सर्ड ओपिनियन पोल पर प्रतिबंध का शायद ही कोई विरोध करेगा। जनमत सर्वेक्षणों के सर्वमान्य मापदंड बनाए जा सकते हैं, जिनका पालन जरूरी हो, तो भी स्वीकार्य होगा। लेकिन स्वतंत्र 'ओपिनियन पोल' पर प्रतिबंध लगाना स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर रोक लगाने के समान ही खतरनाक साबित होगा।

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गांधी मैदान की 'लाइव' कवरेज

आयोजकों के कुशल प्रबंधन और देरी से ही सही सतर्क हुई पुलिस व्यवस्था के चलते धमाकों के बीच पटना रैली नियोजित ढंग से सम्पन्न हो गई। न्यूज चैनल वालों ने भी अपने को संयत कर लिया था। शुरुआती विचलन के बाद वे संभल गए थे। रिपोर्टरों और कैमरामैन ने बहुत शानदार तरीके से मोर्चा संभाला। वे दो टीमों में बंटकर दायित्व निभा रहे थे।

रविवार को जो भी टीवी न्यूज चैनल देख रहा था, हतप्रभ था। पटना के गांधी मैदान में लाखों लोग जमा थे। मंच से उद्घोषणाएं हो रही थीं। नरेन्द्र मोदी सहित भाजपा के बड़े नेताओं के पहुंचने का इंतजार था। वे साढ़े बारह बजे सभा-स्थल पर पहुंचेंगे। अभी आधा घंटा बाकी था। मैदान में भीड़ लगातार बढ़ रही थी। सुबह साढ़े नौ बजे पटना रेलवे स्टेशन पर दो धमाके हुए थे। उस वक्त रैली में आने वालों की विशेष रेलगाडिय़ां पटना स्टेशन पर पहुंच रही थीं। जबरदस्त भीड़-भड़क्का था। धमाके मामूली बताए गए। कोई जान-माल के नुकसान की खबर नहीं थी। स्टेशन पर किसी तरह की अफरा-तफरी की खबर भी नहीं थी। लेकिन चैनलों पर कयासबाजी शुरू हो चुकी थी। रैली की सुरक्षा को लेकर अटकलें लगाने और टिप्पणियां करने से टीवी एंकर बाज नहीं आ रहे थे। लग रहा था इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कहीं पटरी से उतर कर कुछ अनहोनी का बायस नहीं बन जाए। प्रशासन और सुरक्षा एजेन्सियों के लोग साफ कर रहे थे कि धमाके बहुत मामूली थे। एक अधिकारी ने डींग हांकी—रैली से इन धमाकों का कोई 'कनेक्शन' (सम्बन्ध) नहीं है। लाइव रिपोर्टिंग से ही मालूम चला कि धमाकों से बेखबर लोग गांधी मैदान में जुट रहे थे। लोगों के आने का सिलसिला थमा नहीं था। स्थानीय नेताओं की भाषणबाजी चल रही थी।
अचानक पौने बारह बजे मैदान के पूर्वी छोर पर एक धमाका हुआ। रेलवे स्टेशन के बाद मैदान के पास यह पहला धमाका था। फिर क्या था। टीवी चैनलों के कैमरों का रुख पलट गया। रैली की बजाय इस धमाके पर फोकस होने लगा। एकबारगी तो लगा, लाइव कवरेज कर रहा सारा मीडिया इधर ही न उमड़ पड़े और सभा कहीं उखड़ न पड़े। इसी बीच मैदान के दूसरे छोर पर एक और धमाका हुआ। मंच से फिर घोषणा हुई—कृपया पटाखे न फोड़ें। कवरेज बता रही थी कि स्थानीय नेताओं के भाषण सुन रहे लोग अविचलित डटे रहे। मानों सचमुच पटाखे ही फूट रहे हैं। सिलसिला शुरू हो गया था। एक के बाद एक धमाके। बीस मिनटों में कुल छह धमाके। किसी को पता नहीं, क्या हो रहा है। स्टूडियो में बैठी एक न्यूज चैनल की एंकर चीख रही थी। उसे कुछ समझ नहीं पड़ रहा था। कभी वह रिपोर्टर से पूछती, कभी खुद ही बड़बड़ाती। सचमुच हतप्रभ करने वाले क्षण थे वे।
लाइव रिपोर्टिंग में प्राय: ऐसा ही होता है। घटनाएं हमारे आंखों के सामने घटती हैं। जो दिखाई देता है, वही सच लगता है। लाखों लोगों की भीड़ एकत्रित थी। महज एक अफवाह या गलतफहमी पूरे परिदृश्य को बदल कर रख सकती थी। उस वक्त देश भर में अनेक लोग न्यूज चैनलों को देख रहे होंगे। धुएं का उठता गुबार। भागते-बचते लोग। कुछ लोग घायलों की मदद करते हुए भी। सुरक्षाकर्मियों की घेराबंदी। चीख-पुकार। अफरा-तफरी। मैदान के जिस हिस्से में घटना घटी, बस वहीं तक यह सब सीमित। शायद तब तक दूसरी तरफ  कैमरे गए न हों। मुख्य मैदान में जमी भीड़ को जैसे मालूम ही न हो, मैदान में सीरियल ब्लास्ट हो रहे हैं। ऐसा पहली बार था। टीवी देखने वाले कयास लगा रहे थे, रैली रद्द होगी या नहीं। मुख्य वक्ता भाषण देने आएं या न आएं। मगर मुख्य वक्ता आए। भाषण भी हुए। लोग सुनते रहे और बाद में शान्ति से लौट भी गए।
कह सकते हैं कि रैली के आयोजकों के कुशल प्रबंधन और देरी से ही सही सतर्क हुई पुलिस व्यवस्था के चलते धमाकों के बीच एक बड़ी रैली नियोजित ढंग से सम्पन्न हो गई। लेकिन इतना ही नहीं था। न्यूज चैनल वालों ने भी अपने को संयत कर लिया था। शुरुआती विचलन के बाद वे संभल गए थे। रिपोर्टरों और कैमरामैन ने बहुत शानदार तरीके से मोर्चा संभाला। वे दो टीमों में बंटकर दायित्व निभा रहे थे। एक टीम मुख्य मैदान में स्थित घटना से अनभिज्ञ भीड़ और मंच पर केन्द्रित रही। दूसरी टीम मैदान के सिरों पर डंटी रही। जहां घटना घटती, दौड़कर वहीं पहुंच जाते। वे जानकारियों को संतुलित ढंग से दर्शकों तक पहुंचा रहे थे। स्टूडियो में बैठे एंकरों के हवाई सवालों को दरकिनार भी कर रहे थे। बीच-बीच में धमाकों की असरहीनता भी बता रहे थे, इससे 'पेनिक' नहीं फैला। हालांकि धमाकों में छह लोग मारे गए। कई घायल हुए। मगर सूचनाओं के संतुलन ने लोगों के मिजाज को सामान्य बनाए रखने में खासी भूमिका निभाई। आधी-अधूरी जानकारियां ऐसे वक्त पर लोगों के मिजाज को कैसे गर्मा देती है, यह हम मुजफ्फरनगर के दंगों में देख चुके हैं। अभी कुछ दिन पहले मीडिया, खासकर हिन्दी चैनलों ने किले के नीचे गड़े खजाने को लेकर जैसा 'महाअभियान' चलाया था, उससे उनकी काफी फजीहत हुई थी। देश में ही नहीं विदेशी समाचार जगत में भी उनकी हंसी उड़ी थी। इस पृष्ठभूमि में पटना के गांधी मैदान की रिपोर्टिंग कुछ आश्वस्त करती नजर आई।
ऑनलाइन पत्रकारिता
गत 19 अक्टूबर को ऑनलाइन न्यूज एसोसिएशन (ओ.एन.एस.) की ओर से प्रतिवर्ष दिए जाने वाले ऑनलाइन पत्रकारिता पुरस्कारों की घोषणा की गई। इस अवसर पर ब्रिटेन के 'द गार्जियन' को ऑनलाइन पत्रकारिता के दो पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 'द गार्जियन' को रचनात्मक खोजी पत्रकारिता के लिए अमरीकी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी की पूर्व खुफिया अधिकारी एडवर्ड स्नोडेन द्वारा लीक की गई जानकारियों को उजागर करने के लिए पुरस्कृत किया गया।  'द न्यूयार्क टाइम्स डाट कॉम' और 'द बोस्टन ग्लोब डाट काम' को भी पुरस्कारों के लिए चुना गया। न्यूयार्क टाइम्स अखबार को भी 'स्नोफाल' नामक फीचर रिपोर्टिंग के लिए चयनित किया गया। 'द बोस्टन ग्लोब' की वेबसाइट को ब्रेकिंग न्यूज श्रेणी में तथा अखबार को '68 ब्लाक्स' कार्यक्रम के लिए पुरस्कृत किया गया। 'वाशिंगटन पोस्ट' की 'एजरा क्लेन' तथा न्यूजीलैण्ड के 'स्टफ नेशन' को भी ऑनलाइन कमेन्टरी के लिए पुरस्कृत किया गया। रेडियो कनाडा को श्रोताओं से संवाद के एक कार्यक्रम के लिए पुरस्कृत किया गया।

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कैसे हो साफ-सुथरी राजनीति

राजा भैया केवल सपा की सरकार में ही मंत्री बने हों, ऐसी बात नहीं। भाजपा के कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह के समय में भी वे मंत्रिमंडल में शामिल रहे हैं। बाहुबलियों का आसरा सभी दल प्राप्त करते रहे हैं। कोई प्रत्यक्ष तो कोई परोक्ष। इस मामले में सारे दलों में समानता है। यही पाखंड से भरी राजनीति कही जाएगी, जिसके चलते देश में शायद ही कभी साफ-सुथरी राजनीति की बात सोची जा सकती है।
 राजनीतिक सुधारों पर राजनीति ही किस तरह निर्लज्जता से प्रहार करती है, यह ज्वलन्त उदाहरण है। देश में आपराधिक रिकार्ड वाले नेताओं के खिलाफ एक वातावरण बन रहा था। केन्द्र सरकार विवादास्पद अध्यादेश वापस लेने को मजबूर हो गई थी। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले को पलटने की राजनीतिक दलों की मंशा नाकाम रही थी। चुनाव आयोग ने मतदाताओं को 'नोटा' का विकल्प देकर एक शुरुआत कर दी थी। निष्कर्ष यह कि विभिन्न दलों और सरकारों पर दागियों-अपराधियों को लेकर थोड़ा नैतिक दबाव बन रहा था।
अचानक अखिलेश यादव की सरकार ने इसकी धज्जियां उड़ा दी— बाहुबली नेता राजा भैया को फिर मंत्री बना कर। गत शुक्रवार को लखनऊ के राज भवन में मंत्रिमंडल विस्तार का समारोह आयोजित हुआ। कई आपराधिक मामलों में लिप्त राजा भैया को राजभवन के गांधी सभागार में मंत्री-पद की शपथ दिलाई गई। वह भी अकेले। सिर्फ पांच मिनट में शपथ ग्रहण समारोह सम्पन्न हो गया। राजा भैया फिर से कैबिनेट मंत्री बन गए। समर्थकों ने जयघोष किया— 'राजा भैया जिन्दाबाद! जिन्दाबाद! जिन्दाबाद!!'
यू.पी. के निर्वाचन क्षेत्र कुंडा के निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह को आप जानते हों या नहीं, लेकिन राजा भैया का नाम बखूबी जानते होंगे। आप ही क्यों, उन्हें पूरा देश जानता है। अपने आपराधिक कारनामों से वे मीडिया में अक्सर सुर्खियों में रहते हैं। इस वर्ष मार्च में वे फिर सुर्खियों में आए। जब उत्तर प्रदेश के एक पुलिस अधिकारी जिया-उल-हक की पत्नी ने पति की हत्या का उन पर आरोप लगाया। उन्हें मंत्रिमंडल से हटा दिया गया। उनके खिलाफ सी.बी.आई. ने जांच की। जांच के बाद सी.बी.आई. ने उन्हें क्लीन चिट दे दी। हालांकि अदालत में अभी मामला लंबित है। पर रघुराज प्रतापसिंह उर्फ राजा भैया फिर कैबिनेट मंत्री की कुर्सी पर काबिज हो गए।
ध्यान देने की बात यह है कि राजा भैया न तो सत्तारूढ़ दल के विधायक हैं और न ही अखिलेश सरकार को सत्ता में रहने के लिए किसी निर्दलीय विधायक के समर्थन की वैधानिक आवश्यकता है। विधानसभा चुनाव में जनता ने युवा नेता अखिलेश को भरपूर समर्थन दिया था। इसलिए एक बाहुबली नेता को सरकार में शामिल करने की क्या मजबूरी थी, यह सवाल हर किसी के जेहन में था। हत्या के आरोप में इस्तीफा देने के बाद तो सरकार से हर कोई यही उम्मीद कर रहा था कि राजा भैया की मंत्रिमंडल में वापसी संभव नहीं होगी। आखिर कोई सरकार राह चलते बदनामी क्यों मोल ले? खासकर तब, जब देश भर में अपराधियों-दागियों के खिलाफ वातावरण बन रहा हो। लेकिन जिस तरह आनन-फानन में राजा भैया को मंत्रिमंडल में पुन: शामिल किया गया उससे साफ हो गया, उत्तर प्रदेश सरकार को न जनमत की परवाह है और न ही अदालत, चुनाव आयोग जैसी वैधानिक संस्थाओं की। आड़ ली गई सी.बी.आई. की। इस सरकारी संस्था ने राजा भैया को पुलिस अधिकारी की हत्या के आरोप से मुक्त कर दिया। इसलिए राजा भैया निष्कलंक और साफ-सुथरे हैं।
यह बिलकुल संभव है कि राजा भैया इस मामले में निर्दोष हों, लेकिन उनकी जो छवि है, उससे राज्य सरकार क्यों बावस्ता रहना चाहती है? खासकर तब, जबकि राजा भैया आठ अन्य आपराधिक मामलों में भी फंसे हुए हैं। और वे इनमें से किसी में भी दोषमुक्त नहीं हुए हैं। एक मामला तो खुद सी.बी.आई. ही देख रही है। मुद्दा यह नहीं है कि एक दागी और विवादास्पद व्यक्ति को मंत्री बनाया गया, महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे समय में बनाया गया, जब राजनीति में सफाई अभियान की कोशिशें शुरू हुई हैं। संवैधानिक संस्थाएं ही क्यों, राजनीतिक संस्थाएं भी इसके लिए प्रतिबद्ध होनी चाहिए। जिस व्यापक बहुमत के साथ उत्तर प्रदेश की जनता ने समाजवादी पार्टी को सत्ता सौंपी उससे तो राजनीतिक शुचिता के लिए उसकी जिम्मेदारी अधिक बढ़ जानी चाहिए थी। लेकिन अफसोस की बात है कि जब राहुल गांधी के बयान के बाद विवादास्पद विधेयक वापस लेने के कयास लगाये जा रहे थे तो सबसे पहले समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने ही विरोध किया। एक ऐसा राज्य जिसकी देश के प्रधानमंत्री के चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक भूमिका मानी जाती है, उस राज्य के राजनीतिक कर्ता-धर्ताओं का यह रवैया दुर्भाग्यपूर्ण है। राजा भैया केवल समाजवादी पार्टी की सरकार में ही मंत्री बने हों, ऐसी बात नहीं। भाजपा के कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह के समय में भी वे मंत्रिमंडल में शामिल रहे हैं। बाहुबलियों का आसरा सभी दल प्राप्त करते रहे हैं। कोई प्रत्यक्ष तो कोई परोक्ष। इस मामले में सारे दलों में समानता है। यही पाखंड से भरी राजनीति कही जाएगी, जिसके चलते देश में शायद ही कभी साफ-सुथरी राजनीति की बात सोची जा सकती है। तो क्या दागी, अपराधी, बाहुबली नेता जनता पर इसी तरह राज करते रहेंगे? मीडिया में सुर्खियां बनती रहेंगी?
मीडिया और विदेशी पूंजी
एक समय था जब मीडिया में विदेशी पूंजी निवेश को लेकर सख्त विरोध था। तर्क था कि समाचार-पत्र जनमत निर्मित करते हैं। विदेशी पूंजी निवेश से जनमत पर असर पड़ सकता है। इसलिए मीडिया को विदेशी पूंजी निवेश से दूर ही रखा जाए। लेकिन धीरे-धीरे यह विचार ढीला पड़ गया। पहले 26 फीसदी विदेशी पूंजी निवेश आया और अब 49 प्रतिशत की तैयारी शुरू कर दी गई है। भारत में अखबारों की प्रतिनिधि संस्था इंडियन न्यूज पेपर सोसाइटी ने गत दिनों सूचना प्रसारण मंत्रालय को एफ.डी.आई. संबंधी अपनी सहमति भेज दी है। इसमें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाकर 49 प्रतिशत पर सहमति जताई गई है। यह सहमति केन्द्र सरकार की ओर से विदेशी निवेश की समीक्षा के लिए बनाई गई मायाराम समिति द्वारा मांगे गए सुझाावों पर दी गई। प्रस्ताव को अंतिम रूप देने की कार्रवाई चल रही है।
पत्रकार बने अभिनेता
मीडिया और फिल्म उद्योग के अन्तर्संबंधों की पोल खोलती एक लघु फिल्म में मीडिया कर्मियों ने ही विभिन्न किरदार निभाए हैं। आई.आई.एम.सी. के छात्र रह चुके मयंक सिंह फिल्म के निर्देशक हैं तथा पी.टी.आई., यू.एन.आई., दैनिक हिन्दुस्तान, नवभारत टाइम्स, पांचजन्य आदि से जुड़े युवा पत्रकारों ने भूमिकाएं अभिनीत की हैं। खास बात यह है कि 'जम के रखना कदम' नामक इस लघु फिल्म को हाल ही अन्तरराष्ट्रीय लघु फिल्म समारोह के लिए नामित किया गया है, जिसमें अन्य 12 देशों की 25 सर्वोत्तम लघु फिल्में चुनी गई हैं।

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दागी 'माननीयों' का बचाव

 







बड़ा सवाल यह है कि आखिर दागी नेताओं को बचाने की जरूरत क्या है? क्या इसलिए कि ऊपरी अदालत से निर्दोष साबित होने पर सांसदों-विधायकों को उनकी वंचित सदस्यता फिर से नहीं लौटाई जा सकती? सही है। जब तक ऊपरी अदालत का फैसला आएगा, उसकी पांच साल की सदस्यता अवधि खत्म हो चुकी होगी। पर यही अंत नहीं है। चुनाव में दुबारा जाने का अवसर थोड़े ही खत्म होगा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटकर दागी नेताओं को बचाने की जिद पर क्या सरकार अड़ी रहेगी या राहुल गांधी के बयान के बाद अध्यादेश को वापस लेगी? या फिर विपक्ष के आगे झाुकते हुए विधेयक का रास्ता अपनाएगी अथवा थक-हार कर सर्वोच्च अदालत का फैसला मान लेगी?
इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में मिल जाएंगे, लेकिन दागी सांसदों-विधायकों को बचाने की सरकार की जुगत देश को इतनी भारी पड़ेगी कि नतीजे लम्बे समय तक भुगतने पड़ेंगे।
आम जन दागी नेताओं से छुटकारा पाना चाहता है। वह सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले को एक बेहतरीन अवसर मानता है। राजनीति को साफ-सुथरी करने का सरकार को दुर्लभ मौका मिला था। अदालत के फैसले को पूरा देश सराह रहा था। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया पर लोगों की उम्मीदें परवान चढ़ी थी। लेकिन सरकार ने आंखों पर पट्टी बांध ली। सरकार ही क्यों, सारे राजनीतिक दल जनता की उम्मीदों पर पानी फेरने को तैयार थे। आखिरकार अदालत का फैसला पलट दिया गया। फैसला चाहे अध्यादेश से पलटे या विधेयक से- क्या फर्क पड़ता है। जनता की उम्मीदें तो दोनों से टूटेंगी।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला जस का तस मान लिया जाएगा, इसकी उम्मीद बिलकुल नहीं है। फैसला आने के बाद सरकार ने जो कवायदें की, वे गवाह हैं। सबसे पहले कानून की उन धाराओं को ही बदलने का निश्चय किया, जिनके तहत अदालत का फैसला आया। गौरतलब है, 10 जुलाई को अदालत ने दो फैसले किए थे। एक में कहा था कि जो जेल में बंद हैं, वे चुनाव नहीं लड़ सकते और न ही मतदान कर सकते हैं। दूसरे फैसले में कहा कि सांसद या विधायक को किसी आपराधिक मामले में दो साल से ज्यादा की सजा हो तो उसकी सदन से सदस्यता खत्म हो जाएग। जेल से चुनाव नहीं लडऩे की पाबंदी जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 की धारा 62(2) तथा सजायाफ्ता होने पर सदस्यता से वंचित करना धारा 8(4) से सम्बंधित हैं। राजनीतिक दलों को अदालत के ये दोनों फैसले मान्य नहीं थे। लिहाजा सरकार ने दोनों धाराओं को बदलकर लोकसभा में संशोधन विधेयक पेश कर दिया। इसमें सभी दलों की सहमति थी। विधेयक लोकसभा से पारित हो गया। लेकिन राज्यसभा में भाजपा और बीजद की कुछ आपत्तियों के चलते अटक गया। 'माननीयों' का बचाव करने में सरकार इतनी जल्दी में थी कि तुरत-फुरत अध्यादेश लेकर आ गई। इस बीच उसने एक कोशिश और की और अदालत में पुनर्विचार याचिका का दांव आजमाया। सर्वोच्च अदालत ने यह याचिका भी खारिज कर दी। विधेयक अब भी राज्यसभा के पटल पर है। एक बार पटल पर रखे जाने के बाद वह सदन की सम्पत्ति बन जाता है। इसके बावजूद सरकार ने न्यायपालिका के बाद विधायिका की भी सर्वोपरिता की अनदेखी करते हुए कार्यपालिका का आसरा लिया और अध्यादेश पेश कर दिया। यह अध्यादेश राष्ट्रपति की मुहर के बाद कानून बन जाएगा। फिलहाल तो राष्ट्रपति ने इस पर सवाल-जवाब करके सरकार को मुश्किल में डाल दिया। रही-सही कसर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पूरी कर दी। सरकार की हालत सांप-छछूंदर जैसी है। न उगलते बन रहा है, न निगलते। हो सकता है वह कोई बेहतर फैसला ले, लेकिन इस पूरी कवायद में उसकी भारी किरकिरी हो चुकी है।
बड़ा सवाल यह है कि आखिर दागी नेताओं को बचाने की जरूरत क्या है? क्या इसलिए कि ऊपरी अदालत से निर्दोष साबित होने पर सांसदों-विधायकों को उनकी वंचित सदस्यता फिर से नहीं लौटाई जा सकती? सही है। जब तक ऊपरी अदालत का फैसला आएगा, उसकी पांच साल की सदस्यता अवधि खत्म हो चुकी होगी। पर यही अंत नहीं है। चुनाव में दुबारा जाने का अवसर थोड़े ही खत्म होगा। बल्कि बेदाग होकर दुबारा चुने जाने के अवसर ज्यादा मजबूत होंगे—ज्यादा जन-समर्थन के साथ। अदालतों के दो फैसलों के परिणाम भिन्न हो सकते हैं। वे अभियुक्त के अनुकूल भी जा सकते हैं और प्रतिकूल भी। न्यायिक प्रक्रिया की यह स्वाभाविक प्रकृति है, जो देश के प्रत्येक नागरिक पर लागू होती है। तो फिर माननीय सांसदों-विधायकों पर क्यों नहीं? यही वो सवाल है जिसका जवाब आम जन राजनीतिक दलों से जानना चाहता है। जो चुनकर भेजता है वही जब कानून के समक्ष समान है तो जो चुनकर जाता है उसे खास दर्जा क्यों? वह भी आपराधिक मामलों में? दागी नेताओं को बचाने की एक आड़ और ली जाती है। वह यह कि नेताओं को राजनीतिक कारणों से झाूठे मामलों में फंसा लिया जाता है। इसलिए उनके लिए कानूनी सुरक्षा-कवच जरूरी है। कौन फंसाता है नेताओं को? पुलिस? अफसर? आम आदमी? अक्सर नेताओं पर मामले उनके प्रतिद्वंद्वी ही प्रत्यक्ष या परोक्षत: दर्ज कराते देखे गए हैं। यह राजनीति की भीतरी बुराई है। इसका दोष दूसरों पर क्यों मढ़ा जाए? अगर दागियों को बचाने की कोशिशें यूं ही चलती रही, तो राजनीति कभी साफ-सुथरी नहीं हो सकती। बगैर साफ-सुथरी राजनीति के लोकतंत्र मजबूत नहीं रह सकता। जिसकी आतंकवाद, नक्सलवाद, भ्रष्टाचार, गरीबी जैसी बुराइयों से उबरने के लिए सख्त जरूरत है।
'इमोशनल' बनाम 'आइडियोलॉजिकल'
लालू यादव को चारा घोटाले में जेल भेजा गया है, लेकिन लगता है राजनेता कोई सबक नहीं सीख रहे हैं। राजद के एक नेता लालू की गिरफ्तारी के तुरन्त बाद टीवी पर बयान दे रहे थे, 'लालू और मजबूत होंगे, फिर चुनाव जीतेंगे। बिहार में उनके लाखों 'इमोशनल सपोर्टर्स' हैं। वे कोई 'आइडियोलॉजिकल सपोर्टर्स' नहीं हैं कि जेल जाने पर लालू का समर्थन बंद कर देंगे, बल्कि जेल जाने पर लालू के साथ उनकी सहानुभूति पैदा होगी और वे लालू का साथ ज्यादा मजबूती से देंगे। देख लेना।'
राजनेता गण जन भावनाओं को समझाने में गलती कर रहे हैं या जमीनी हकीकत बयान कर रहे हैं, इसका फैसला पाठक ही बेहतर कर सकते हैं।
मीडिया को ऐतराज
दिल्ली की रैली में नरेन्द्र मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री को 'देहाती औरत' बताने पर नवाज शरीफ के साथ ही उस भारतीय पत्रकार को भी घसीट लिया, जो वार्ता में शामिल थी। हालांकि उस पत्रकार ने प्रधानमंत्री को अपमानित करने के वाकिये का खंडन किया, लेकिन मोदी की टिप्पणी को 'ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन' ने आपत्तिजनक माना है। पत्रकार पर मोदी के बयान को मीडिया के खिलाफ बताया और कहा कि ऐसे बयानों का उद्देश्य भारतीय मीडिया को बदनाम करना है, जो लोकतंत्र की एक मुख्य संस्था है। बी.इ.ए. ने कहा, भारतीय मीडिया अपनी जिम्मेदारी और आचरण को बखूबी समझता है। मोदी ने पूरे तथ्य जाने बगैर ही पत्रकार पर टिप्पणी कर दी।

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असली और नकली वीडियो

किसी पुराने वीडियो या फोटो को नई घटना से जोड़कर अपलोड कर देना और फोटो तकनीक के जरिए फर्जी दृश्य गढ़ देना, ये तरीके भ्रम पैदा करते हैं। यह बहुत खतरनाक है। इससे बचने के उपाय जरूरी है। कानूनी उपाय पर्याप्त नहीं हैं। तकनीकी और वैज्ञानिक तरीकों की ज्यादा जरूरत है। हमें ऐसे तरीके खोजने होंगे जो आम जन को आगाह कर सके।

जैसे-जैसे सोशल मीडिया ताकतवर बनता जा रहा है, इसके दुरुपयोग की घटनाएं भी बढ़ती जा रही हैं। इसमें शब्द और चित्र दोनों रूप शामिल हैं। चूंकि चित्र ज्यादा असरकारी हैं, इसलिए ज्यादा दुरुपयोग भी चित्रों का ही किया जा रहा है। यह दो तरह से देखने में आता है। पहला, किसी पुराने वीडियो या फोटो को नई घटना से जोड़कर अपलोड कर देना और दूसरा, फोटो तकनीक के जरिए फर्जी दृश्य गढ़ देना। ये दोनों तरीके भ्रम पैदा करते हैं। शरारती व असामाजिक तत्त्व मौका देखकर इनका दुरुपयोग कर डालते हैं।
गत दिनों मुजफ्फरनगर के दंगों को भड़काने में एक ऐसे ही फर्जी वीडियो की अहम भूमिका मानी जा रही है। वीडियो में दो लड़कों की कुछ लोग हत्या करते हुए दिखाए गए थे। कट्टरपंथी तत्त्वों ने इस वीडियो को मुजफ्फरनगर के कंवल गांव की उस घटना से जोड़कर यू-ट्यूब पर अपलोड कर दिया, जहां झागड़े की शुरुआत हुई थी। जाहिर है, यह वीडियो एक समुदाय के लोगों को भड़काने के उद्देश्य से अपलोड किया गया था। बाद में पूरे जिले में हिंसा फैल गई, लोग मारे गए। वहां हिंसा के और भी कारण रहे होंगे, लेकिन जातीय तनाव और परस्पर नफरत पैदा करने में इस वीडियो की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता। हकीकत यह थी कि यह वीडियो कंवल गांव का था ही नहीं। यह वीडियो तो दो वर्ष पहले पाकिस्तान में बनाया गया था, जिसमें आतंकियों द्वारा दो लड़कों को नृशंसतापूर्वक मारा जा रहा था। कंवल गांव की घटना शरारती तत्त्वों के लिए एक अवसर बन गई, जिन्होंने इस वीडियो का जमकर दुरुपयोग किया। तकनीकी तौर पर वीडियो असली था, लेकिन संदर्भ बदलकर प्रचारित करने से यह फर्जी ही कहा जाएगा।
इसी दौरान फेसबुक पर उप्र के एक लोकप्रिय हिन्दी अखबार की चार कॉलम में प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित खबर अपलोड की गई। खबर का शीर्षक था— 'दंगाइयों को गोली मारने के आदेश'। लेकिन शरारती तत्त्वों ने फोटोशॉप की मदद से शीर्षक बदलकर उसे अत्यन्त भड़काऊ बना दिया। कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने नफरत फैलाने वाली इस फर्जी खबर की पोल खोली और अखबार की असली कटिंग चस्पां की।
इसी तरह एक फर्जी फोटो का इस्तेमाल असम में भड़की हिंसा तथा उत्तर-पूर्वी राज्यों के लोगों का देश के विभिन्न हिस्सों से पलायन के दौरान किया गया था। शुरुआत पड़ोसी देश म्यांमार में भड़की जातीय हिंसा से हुई, जिसमें अनेक लोग मारे गए थे। इसे फेसबुक पर बयान करते हुए एक फोटो अपलोड की गई। फोटो में एक स्थान पर कई शव दिखाए गए थे। इन्हें म्यांमार में हिंसा में मारे गए एक समुदाय के लोगों के शव बताया गया था। जबकि यह फोटो म्यांमार की न होकर इंडोनेशिया की थी। फोटो में जो शव जातीय हिंसा में मारे गए लोगों के बताए गए थे, दरअसल वे समुद्री तूफान 'सुनामी' में मारे गए लोगों के थे। यह फोटो अंतरराष्ट्रीय फोटो एजेन्सी एपी द्वारा सन् २००४ में जारी की गई थी, जो कई अखबारों में छपी थी। फोटो में मारे गए लोगों के शव समुद्र किनारे बहकर आए एक ढेर के रूप में पड़े थे, जो इस प्राकृतिक आपदा की विभीषिका को बयान कर रहे थे। कट्टरपंथियों ने इसे म्यांमार की हिंसा से जोड़ कर प्रचारित किया। फोटो असली थी, लेकिन इस्तेमाल 'नकली' था।
अभी उत्तर प्रदेश के एक हिन्दी अखबार की खबर की चर्चा की गई। शीर्षक बदलकर उसका दुरुपयोग किया गया। ठीक ऐसे ही गत दिनों कुछ फोटो और वीडियो फुटेज का इस्तेमाल करके फिल्म स्टार अमिताभ बच्चन का फेक वीडियो 'यू-ट्यूब' पर डाल दिया गया। अमिताभ वीडियो में नरेन्द्र मोदी की प्रधानमंत्री के तौर पर पैरवी करते हुए बताए गए थे। खुद अमिताभ के तीखे विरोध के बाद राजकोट का एक व्यक्ति सामने आया और उसने अभिनेता से माफी मांगी। इस व्यक्ति का कहना था कि उसने यह वीडियो सिर्फ अपलोड किया था, बनाया नहीं। जाहिर है, तकनीक का इस्तेमाल करते हुए किसी ने तो यह वीडियो बनाया ही था। 'फेक वीडियो' के शिकार तो रूस के प्रधानमंत्री ब्लादीमिर पुतिन भी हो चुके। वर्ष 2010 में उन्हें 'यू ट्यूब' पर अपलोड की गई एक वीडियो फिल्म में सलाखों के पीछे बंदी के रूप में दिखाया गया था। जबकि हकीकत में यह वीडियो रूस के एक बड़े तेल व्यापारी मिखाइल खोदोर्कोवस्की के मुकदमे की सुनवाई का था। वीडियो में सलाखों के पीछे खड़े खोदोर्कोवस्की को हटाकर पुतिन के वीडियो फुटेज इस तरह से चस्पां कर दिए थे कि असली जैसे दिखें। इस वीडियो को रूस में सिर्फ ३ दिन में ही तीस लाख लोगों ने देखा।
जाहिर है, भ्रमित करने, अफवाहें फैलाने, परस्पर नफरत पैदा करने, हिंसा भड़काने के लिए कट्टरपंथी ताकतें और असामाजिक तत्त्व सोशल मीडिया का दुरुपयोग कर रहे हैं। यह बहुत खतरनाक है। इससे बचने के उपाय जरूरी है। कानूनी उपाय पर्याप्त नहीं हैं। तकनीकी और वैज्ञानिक तरीकों की ज्यादा जरूरत है। हमें ऐसे तरीके खोजने होंगे जो आम जन को आगाह कर सके ताकि वे असली और नकली का भेद समझा सकें।
दामिनी दुष्कर्म के दंश
आज के हिंसा और तनाव के दौर में मीडिया से हर कोई यही अपेक्षा करेगा कि उसकी रिपोर्टिंग राहत प्रदान करे। इसके विपरीत दामिनी दुष्कर्म कांड पर न्यायालय के फैसले के बाद मीडिया रिपोर्टिंग ने निराश ही किया। खासकर, अंग्रेजी अखबारों ने मुकदमे की जो विस्तृत रिपोर्टिंग की उसने एक बार फिर 16 दिसम्बर की उस क्रूर घटना के घाव हरे कर दिए। पीडि़ता के मृत्यु पूर्व बयान, चिकित्सकों की रिपोर्ट, वकीलों के तर्क-वितर्क और फैसले में माननीय न्यायाधीश की टिप्पणियों को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया। इन खबरों में बताया गया कि बस के भीतर किस तरह युवती से नृशंसतापूर्वक दुष्कर्म किया गया। कैसे वहशी होकर अभियुक्त युवती पर टूट पड़े थे। कैसे लोहे की छड़ उसके अंगों में घुसेड़ी गई। कैसे उसे जगह-जगह से दांतों से काटा गया और कैसे संवेदनशील अंगों को निकाल बाहर किया गया। यह सारा विवरण न केवल जुगुप्सा (घृणा) पैदा करता है, बल्कि पाठक को तनावग्रस्त भी कर देता है। अंग्रेजी के लगभग सभी प्रमुख अखबारों ने यह किया। क्या ऐसा 'विस्तृत वर्णन' जरूरी था?
भूल सुधार
प्रिंट हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया गलती सभी से होती है। गलती सुधार ली जाए, यही उचित है। खासकर जब गलती तथ्यात्मक हो, लेकिन पिछले दिनों बी.बी.सी. ने भूल करके भी नहीं सुधारी। 10 सितंबर को उसने एक बिजनेस रिपोर्ट दिखाई। इसमें एक महिला उद्यमी की सफलता की कहानी थी कि कैसे उसने अपने देश में ऑटो रिपेयरिंग क्षेत्र में पुरुषों के एकाधिकार को तोड़ा। एंकर ने उस उद्यमी को बांग्लादेशी बताते हुए पूरा बखान कर डाला, जबकि वह अफ्रीकी देश सेनेगल की थी।

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पत्रकारों पर बढ़ते हमले


मौजूदा दौर में पत्रकारिता-कर्म दिनोंदिन मुश्किल बनता जा रहा है।  पत्रकारों पर हमले की घटनाएं बढ़ रही हैं। दरअसल, मीडिया और पत्रकारों पर हमला वही करते हैं या फिर करवाते हैं जो बुराइयों में डूबे हुए हैं। ऐसे लोग दोहरा चरित्र जीते हैं। ऊपर से सफेदपोश और भीतर से काले-कलुषित। किसी भी घटना से कोई सबक सीखा गया हो, देखने में नहीं आया।
राष्ट्रीय न्यूज चैनल का संवाददाता घायल अवस्था में आप बीती बता रहा था। उस पर आसाराम के समर्थकों ने हमला बोल दिया था। शरीर पर जगह-जगह चोटों के निशान थे। हमलावरों ने कैमरामैन व उसके साथी को भी घायल कर दिया था। कैमरामैन खून से लथपथ था। सिर पर गहरा घाव हुआ था। न्यूज चैनल टीम सदस्यों पर हमला तब हुआ, जब वे जोधपुर के पाल गांव में आसाराम के आश्रम के बाहर रिपोर्टिंग कर रहे थे। आई.बी.एन.-7 के संवाददाता भवानी सिंह एबीपी न्यूज को बता रहे थे—अचानक आश्रम के भीतर से कुछ लोग आए और उन्होंने हम पर हमला बोल दिया। हमें लातों, घूंसों, डंडों से पीटा गया। वे बहुत उग्र थे। यह तो शुक्र था कि आसपास रहने वाले ग्रामीणों ने हमें बचा लिया, वरना हमारी जान भी जा सकती थी। भवानी सिंह ने ग्रामीणों का शुक्रिया करते हुए उनमें से कुछ को कैमरे के सामने भी पेश किया। कैमरे के सामने ही घायल मीडिया कर्मियों को जिसने भी देखा, उसने इस पेशे के मुश्किल हालात पर जरूर सोचा होगा। एक दिन पहले ही भोपाल में भी आसाराम के समर्थकों ने हमला किया था। उन्हें पत्रकारों पर हमला करके मोटर साइकिल से भागते हुए देखा गया था।
मौजूदा दौर में पत्रकारिता-कर्म दिनोंदिन मुश्किल बनता जा रहा है। जैसे-जैसे समाज में पाखंड, अत्याचार, भ्रष्टाचार, दुराचार और अपराध बढ़ रहा है, पत्रकारों पर हमले की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। दरअसल, मीडिया और पत्रकारों पर हमला वही करते हैं या फिर करवाते हैं जो इन बुराइयों में डूबे हुए हैं। ऐसे लोग दोहरा चरित्र जीते हैं। ऊपर से सफेदपोश और भीतर से काले-कलुषित। इनके धन-बल, सत्ता-बल और कथित सफल-जीवन से आम जनता चकित रहती है। वह इन्हें सिर-माथे पर बिठा लेती है। लेकिन मीडिया जब इनकी पोल खोलने लगता है तो ये बौखला जाते हैं और उन पर हमले करवाते हैं। पुलिस और शासन-तंत्र इन्हीं का साथ देते हैं। बल्कि कई बार तो मिले हुए भी नजर आते हैं। दिखावे के तौर पर जरूर मामले दर्ज कर लिये जाते हैं, लेकिन होता-हवाता कुछ नहीं। पिछले कई दिनों से आसाराम को लेकर खबरें चल रही थीं। उन पर नाबालिग लड़की के यौन शोषण के गंभीर आरोप लगे थे। इसलिए मीडिया वाले उनके इर्द-गिर्द मंडरा रहे थे। इधर उनके समर्थक लगातार उग्र होते जा रहे थे। भोपाल और इंदौर में वे मीडिया कर्मियों पर हमला कर चुके थे। आसाराम गिरफ्तार कर जोधपुर लाये जाने वाले थे। उनके आश्रम में सैकड़ों समर्थक इक_े होते जा रहे थे। ऐसे में जोधपुर पुलिस ने सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त क्यों नहीं किए? जिस वक्त मीडिया कर्मियों पर हमला हुआ, पुलिस का कोई अधिकारी वहां क्यों नहीं था? क्यों घटना के तीन घंटे बाद पुलिस हरकत में आई? ऐसे कई सवाल मीडिया कर्मियों पर हर हमलों के बाद उठते रहे हैं। लेकिन किसी भी घटना से कोई सबक सीखा गया हो, देखने में नहीं आया। साफ है पत्रकारों पर हमलों के लिए सिर्फ हमलावर ही नहीं, शासन-तंत्र भी कम जिम्मेदार नहीं है।
ये हालात चिन्ताजनक हैं। खासकर, इसलिए कि पत्रकारों की सुरक्षा के मामले में भारत विश्व के देशों में निरंतर पिछड़ता जा रहा है। दुनिया में मीडिया और पत्रकारों की सुरक्षा पर नजर रखने वाली ब्रिटेन की संस्था आई.एन.एस.आई. (इंटरनेशनल न्यूज सैफ्टी इंस्टीट्यूट) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार सूची में सबसे खराब पांच देशों में भारत पत्रकारों के लिए 'दूसरा सबसे खतरनाक' देश है। पहले नंबर पर सीरिया है। इस संस्था ने  इस वर्ष की प्रथम छमाही आंकड़े जारी किए थे। इसके अनुसार भारत में जनवरी से जून माह तक 6 पत्रकार मारे गए। सीरिया में इस दौरान 8, पाकिस्तान में 5, सोमालिया में 4 और ब्राजील में 3 पत्रकारों की हमलों में मौत हो चुकी है। गौरतलब है कि ये दो माह पुराने आंकड़े हैं। अगर इसमें उत्तर प्रदेश में पिछले दो माह में हुई ४ पत्रकारों की हत्याओं को भी जोड़ दें तो संभवत: भारत सीरिया से भी आगे निकल जाएगा। इटावा जिले में राकेश शर्मा और बुलंदशहर जिले में जकाउल्ला तथा पिछले माह बांदा जिले में शशांक शुक्ला और लखनऊ जिले में लेखराम भारती— ये चार पत्रकार मारे जा चुके हैं। पुलिस अभी तक किसी भी हमलावर को गिरफ्तार नहीं कर पाई है।
स्पष्ट है, पिछले आठ माह में ही देश में 10 पत्रकार विभिन्न हमलों में मारे जा चुके हैं। पिछले वर्ष मध्यप्रदेश के पत्रकार चन्द्रिका रॉय की परिवार सहित हत्या कर दी गई थी। पत्नी सहित उनके दो मासूम बच्चों को मौत की नींद में सुला दिया गया था। मुम्बई के खोजी पत्रकार ज्योतिर्मय डे (जेडी) की हत्या को भी भूला नहीं जा सकता, जो महाराष्ट्र के अंडरवल्र्ड सरगनाओं की सच्चाइयों को उजागर कर रहे थे। मारपीट और कैमरा तोडऩे की तो सैकड़ों घटनाएं हैं। गत वर्ष जोधपुर में ही भंवरी देवी अपहरण कांड के दौरान महिपाल मदेरणा के समर्थकों ने पत्रकारों पर हमला बोल दिया था। छत्तीसगढ़ में पत्रिका के रायगढ़ ब्यूरो प्रमुख प्रवीण त्रिपाठी पर भी पार्षद के लोगों ने जानलेवा हमला किया था। पत्रकारों से मारपीट, अपहरण और हत्याओं की पृष्ठभूमि का एक मात्र सबब यही है कि मीडिया की आवाज को दबाया जाए। निश्चय ही पत्रकार मुश्किल हालात में काम कर रहे हैं। शासन-तंत्र पत्रकारों की सुरक्षा करने में नाकाम रहा है।
फिर संवेदनहीनता!
पत्रकारों में हेकड़ी और संवेदनहीनता की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। टीवी पत्रकारों में यह खासतौर पर देखी जा रही हैं। उत्तराखंड में बाढ़ के दौरान कई घटनाएं सामने आई थीं। एक टीवी संवाददाता तो भरे पानी में बाढ़ पीडि़त एक कमजोर ग्रामीण के कंधे पर बैठकर रिपोर्टिंग करते देखा गया था। ताजा घटना दीपिका कुमारी से जुड़ी है। दीपिका ने तीरन्दाजी में भारत का नाम रोशन किया है। वे गत दिनों पोलैण्ड में सम्पन्न हुए विश्व-कप में स्वर्ण पदक जीतकर स्वदेश लौटी थीं। दीपिका से इंटरव्यू करने के लिए सारे चैनल वाले उन पर मानो टूट पड़े थे। दीपिका ने उनसे गुजारिश की कि सब एक साथ उनसे इंटरव्यू कर लें। क्योंकि वे लगातार अभ्यास, यात्रा की थकान और सो न सकने के कारण सबको अलग-अलग इंटरव्यू देने में असमर्थ हैं। लेकिन संवाददाता अड़ गए। कुछेक तो बाकायदा दीपिका पर तंज कसने लगे, जिसका सार यह था कि स्वर्ण पदक जीतते ही दीपिका आसमान में उडऩे लगी है। संवाददाताओं के कठोर बोल और तानों से आहत दीपिका कुमारी सबके सामने ही रो पड़ीं। लेकिन खबर के भूखे संवाददाताओं पर कोई असर नहीं था। क्या देश का गौरव बढ़ाने वाली एक खिलाड़ी का हम मीडिया वाले इस तरह से स्वागत करते हैं! 30 अगस्त के अंक में 'हिन्दू' ने इस पूरी घटना का विवरण प्रकाशित किया और बिलखती हुई दीपिका कुमारी का फोटो भी, जो पीटीआई ने जारी किया था। इस विवरण को पढ़कर हर कोई यही कहेगा—संवेदनहीन मीडिया!!

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