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वादी का सच

उन्तीस जून के अंक में प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित फोटो 'वादी का सच' देखकर जयपुर के पाठक जितेन्द्र एस. चौहान ने लिखा- 'उस दिन पत्रिका में फोटो देखा, तभी माजरा समझा में आ गया कि कश्मीर में क्या चल रहा है। सुरक्षा पैड से सुसज्जित एक हथियारबंद सिपाही सड़क पर लाचार पड़ा जान की भीख मांग रहा था। तीन-चार उग्र युवक चेहरों पर नकाब ओढ़े लाठियों, पत्थरों और लात-घूंसों से उसे घेरकर नृशंसतापूर्वक पीट रहे थे। जनता की सुरक्षा में तैनात सुरक्षाकर्मी के जान के लाले पड़े थे। बेचारे को प्रदर्शनकारियों पर किसी तरह की सख्ती न किए जाने के आदेश का पालन जो करना था। आखिर क्या हुआ? पहले हिंसक प्रदर्शन करो, पथराव करो, कानून तोड़ो, कफ्र्यू का उल्लंघन करो। गोली से मौत हो जाए फिर बड़ा प्रदर्शन करो। फिर मौत और फिर उससे भी बड़ा प्रदर्शन... तांडव... अराजकता...! यही तो चाहते थे सीमा पार बैठे हमारे दुश्मन। घाटी में शांति लौट रही थी। कोई बड़ा वाकिया नहीं हुआ था एक साल से। सैलानियों की चहल-पहल बढ़ गई थी। वर्ष 2008 से ही सुखद वातावरण बनने लगा था। रिकार्ड मतदान हुआ। पहले विधानसभा उसके बाद लोकसभा में जन प्रतिनिधि चुने गए तो शांति के दुश्मनों के सीने पर सांप लोटने लगे। वे अपने मकसद में कामयाब हो गए। कश्मीर घाटी फिर सेना के सुपुर्द हो गई। यही तो चाहते थे वे।'

प्रिय पाठकगण! कश्मीर के वर्तमान माहौल पर पाठकों ने व्यापक प्रतिक्रियाएं की हैं। पाठकों के विचार कश्मीर समस्या पर जनमानस की एक झालक है। महत्वपूर्ण बात यह है कि पाठकों ने कश्मीर के मौजूदा अशांतिपूर्ण हालात से कैसे निपटा जाए, उस पर खुलकर अपनी बात कही है।

बांसवाड़ा से चन्द्रमोहन शर्मा ने लिखा- 'जुलाई में अमरनाथ यात्रा शुरू होती है। कश्मीर के अलगाववादी नेताओं ने जून की शुरुआत में ही अशांति के बीज बोने शुरू कर दिए ताकि इस धार्मिक यात्रा में विघ्न पड़े और देशव्यापी प्रतिक्रिया हो। पिछले वर्ष 15दिन में देश भर से कोई 35 लाख श्रद्घालुओं ने पवित्र गुफा के दर्शन किए थे। यह बात लश्कर-ए-तैयबा को नागवार गुजर रही थी। इसलिए उसने कश्मीर में बैठे अहमद शाह गिलानी जैसे हुर्रियत के गुर्गों के जरिए अमरनाथ यात्रा को 15 दिनों तक सीमित करने की दुर्भावनापूर्ण मांग रखी।'

इंदौर से कार्तिक गर्ग ने लिखा- 'एक प्रसिद्घ साप्ताहिक पत्रिका में सुरक्षा विशेषज्ञ के हवाले से छपा कि पाक समर्थित आतंकी गुट अब इंतिफादा मॉडल पर काम कर रहे हैं। यह मॉडल फिलिस्तिनियों ने इजरायल के खिलाफ सड़कों पर प्रदर्शन करके तैयार किया था। इसके तहत कम उम्र के किशोर और बेरोजगार युवकों को चंद रुपयों के लालच देकर सड़कों पर उतरने के लिए तैयार किया जाता है। हाल के कश्मीर में प्रदर्शनों से इसकी तुलना की जा सकती है।' अहमदाबाद से हिमांशु मेहता ने लिखा, 'हाल ही कश्मीर घाटी में जितने प्रदर्शन हुए उनमें हिंसा फैलाने वालों को साफ तौर पर पहचाना जा सकता था। ये लोग मुंह ढांपकर अपनी पहचान छुपाते हुए खुले तौर पर पत्थरबाजी करते कैमरों के सामने आ रहे थे। क्या ये लोग कश्मीर की आम जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं?' बेंगलुरु से दमयन्ती नैयर ने लिखा- 'अलगाववादी संगठन कश्मीर में अक्सर अफवाहें फैलाकर माहौल खराब करने की कोशिश करते रहे हैं। शोपियां कांड इसका जीता जागता नमूना था।'

उज्जैन से दीपेन्द्र गोस्वामी के अनुसार, 'कश्मीर के वर्तमान हालात के लिए जम्मू-कश्मीर की सरकार भी कम दोषी नहीं है। एक तरफ तो कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अ?दुल्ला कश्मीर में 'आम्र्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट' को खत्म करने की मांग करते हैं दूसरी तरफ खतरा बढ़ते ही सेना को बुलाना चाहते हैं।'
इसके विपरीत भोपाल से रविन्द्र ठाकुर की प्रतिक्रिया मिली- 'कश्मीर में बिगड़े हालात के लिए केन्द्र सरकार का रवैया जिम्मेदार है। सेना को मिले विशेषाधिकार को केन्द्र सरकार खुद खत्म करने पर तुली हुई है। प्रधानमंत्री ने अभी जून माह में ही कश्मीर दौरे में राज्य को एक हजार करोड़ रुपए की विशेष सहायता की घोषणा की थी। क्या नतीजा निकला? सेना के अधिकार खत्म करने को तैयार बैठी सरकार को कश्मीर में सेना नहीं भेजने का अपना संकल्प महज एक सप्ताह के भीतर तोड़ देना पड़ा।'

जोधपुर से दिनेश परिहार नेलिखा- 'कश्मीर में उपद्रवियों से निपटने के लिए सेना को पूरे अधिकार दिए जाएं। अलगाववादियों के साथ देशद्रोहियों जैसा सलूक हो।'

बीकानेर से रवि भारती ने लिखा- 'आम्र्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट का इस्तेमाल दंगाइयों के लिए है न कि आम जनता के लिए।'

उदयपुर से जवाहर सिंह ने लिखा- 'कश्मीर का सच क्या है, इसे पत्रिका समूह के प्रधान संपादक ने अपनी संपादकीय टिप्पणी (नीतियों का भ्रष्टाचार, 2जुलाई) में स्पष्ट तौर से व्यक्त किया है।'

भरतपुर से गजेन्द्र सिंह ने लिखा- 'कश्मीर में हुई मौतें दुखद है। लेकिन वहां के हालात को सख्ती से ही कुचला जा सकता है।'

जयपुर से ज्योत्सना अग्रवाल के अनुसार- 'भारत सरकार अलगाववादियों को बातचीत का बार-बार न्यौता देकर देशवासियों को क्यों अपमानित कर रही है।'

अजमेर से विजय सेन ने लिखा- 'कश्मीर में अशांति व आतंक का जवाब वहां की जनता ही दे सकती है जिसकी शुरुआत पिछले वर्ष बहादुर युवती रुखसाना कौसर ने की थी।'

जबलपुर से दीपक रॉय ने लिखा- 'कश्मीरी जनता की सुरक्षा राज्य और केन्द्र दोनों की जिम्मेदारी है जिसकी राजनीतिक कारणों से अनदेखी नहीं की जा सकती है।'

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अफजल की सजा

क्या अफजल गुरु की दया याचिका को साढ़े चार साल तक इसलिए लटकाया गया ताकि उसकी मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदला जा सके?

जबलपुर के पाठक आर.सी. अग्निहोत्री ने लिखा, 'सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदण्ड देने के लिए चार साल की समय सीमा तय कर रखी है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी दया याचिका में देरी होने पर कुछ अपराधियों की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल चुका है। सुप्रीम कोर्ट इस बात पर जोर देता रहा है कि फांसी की सजा वाले अपराधी को फांसी देने में अत्यधिक विलम्ब से उस पर अमानवीय प्रभाव पड़ता है। ऐसे में वह आजीवन कारावास के रूप में कम कठोर सजा पाने का हकदार बन जाता है। इसी आधार पर विवियन रॉड्रिक्स बनाम प. बंगाल (1971), टी.वी. वथीश्वरन बनाम तमिलनाडु (1983), शेरसिंह बनाम पंजाब (1983), त्रिवेणी बेन बनाम गुजरात (1989) आदि मामलों में शीर्ष अदालत ने मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया था। शायद इसीलिए पिछले दिनों अफजल गुरु ने फांसी से बचने का एक नया पैंतरा चला। उसने सुप्रीम कोर्ट से प्रार्थना की और कहा, उसकी दया याचिका पर शीघ्र निर्णय हो, उसे इससे मुक्ति चाहिए। अब और इंतजार सहा नहीं जाता। अफजल को मालूम है, उसके मामले में साढ़े चार साल बीत गए जो सुप्रीम कोर्ट की तयशुदा सीमा को लांघ चुके हैं। लिहाजा वह कम कठोर सजा (आजीवन कारावास) पाने का हकदार है।'

पाठक का प्रश्न है, 'आखिर जो काम साढ़े चार साल पहले किया जा सकता था, वह क्यों नहीं किया गया? इसलिए कि अफजल गुरु को कम कठोर सजा (आजीवन कारावास) का हकदार बना दिया जाए? ताकि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे? लाठी टूटेगी या बचेगी, यह तो मैं नहीं जानता लेकिन सांप अवश्य जिन्दा रहेगा। सांप के मरने की खुशफहमी में यूपीए सरकार की अगर यह रणनीति है तो वह भारी मुगालते में है। आतंकी कभी भी सरकार को ब्लैकमेल करके कंधार विमान अपहरण कांड जैसा षडयंत्र रच कर अफजल को छुड़ा ले जा सकते हैं।'

प्रिय पाठकगण! 13दिसम्बर 2001 को आतंककारियों ने देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक पंचायत संसद पर हमला बोल दिया था। इससे भारत-पाक में तनाव बढ़ गया था। सेनाएं मोर्चे पर जा डंटी थी। इस हमले का एक मुख्य अपराधी अफजल गुरु को निचली अदालत ने 2002में फांसी की सजा सुनाई। उच्च न्यायालय ने भी 2003में इस सजा को बरकरार रखा। इसके बाद उच्चतम न्यायालय ने भी 2005में फांसी की सजा पर मुहर लगा दी। तभी राष्ट्रपति को दया याचिका पेश की गई। तभी से मामला सरकारी प्रक्रिया में अटका पड़ा था। हाल ही अफजल गुरु की फाइल आगे खिसकी तो माना गया कि अब अपराधी को वह सजा मिल सकेगी जो शीर्ष अदालत ने तय की है।

इस परिप्रेक्ष्य में पाठकों की कुछ और प्रतिक्रियाएं जानना सार्थक होगा।

जयपुर से देवेन्द्र कुमार भटनागर ने लिखा- 'अब अफजल को फांसी की सजा से कोई नहीं बचा सकता। गेंद गृह मंत्रालय के पाले में आ चुकी है। गृह मंत्रालय को अपनी सिफारिशों के साथ मामला राष्ट्रपति के सचिवालय को भिजवाना है। दया याचिका खारिज होने के बाद फांसी की तारीख मुकर्रर कर दी जाएगी। अगर गृहमंत्रालय या केन्द्र सरकार कोई अड़चन लगाती है तो उसकी भारी बदनामी होगी।'

कोटा से दीनबन्धु शर्मा ने लिखा- 'भारतीय दण्ड विधान में मृत्युदण्ड दुर्लभतम अपराध में ही दिया जाता है। अफजल संसद पर हमले का कसूरवार है। अगर भारत-पाक में युद्घ छिड़ जाता तो न जाने कितनी बेकसूर जानें चली जाती।'

इंदौर से के।एल. पुरोहित ने लिखा- 'संसद पर हमले में मारे गए सुरक्षाकर्मियों को सरकार ने जो वीरता पदक दिए थे, उनके परिजनों ने वे पदक इसलिए लौटा दिए थे क्योंकि सरकार अफजल को फांसी में देर कर रही थी। हैरत की बात है कि जिस अफजल गुरु को 20अक्टूबर 2006 को फांसी लगनी थी वह अभी तक सरकारी रोटियां तोड़ रहा है।'

बीकानेर से अनवर अली भाटी ने लिखा, 'अफजल पर दया करने की जरूरत ही कहां है। उसने माफी के लिए कभी नहीं कहा। वह तो अलगाववादियों और आतंककारियों के लिए मिसाल बनना चाहता है। दया याचिका तो उसकी पत्नी की तरफ से पेश की गई। अफजल के तेवर आज भी वही है।'

चेन्नई से नरेश मेहता के अनुसार, 'अफजल घाघ आतंककारी है। उसकी दलील है कि मृत्यु की प्रतीक्षा करना मृत्यु से भी बदतर है जो संविधान के अनुच्छेद 21 में दिए गए उनके जीवन के बुनियादी अधिकार का उल्लंघन है। आश्चर्य है संविधान की धज्जियां उड़ाने वाला ही संविधान की दुहाई दे रहा है।'
भोपाल से आशीष कुमार सिंह ने लिखा- 'मृत्युदण्ड की प्रतीक्षा में तिल-तिल कर मरने की व्यथा सिर्फ आतंककारी ही नहीं झोलते। जो लोग इनकी हिंसा के शिकार होते हैं, उनके रिश्तेदार भी जीवन भर तिल-तिल कर मरते हैं।

सम्भवत: इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए। इसमें साफ कहा गया कि फांसी देने में होने वाली देरी होने मात्र के आधार पर किसी अपराधी की सजा को कम नहीं किया जा सकता। ऐसा करते समय अन्य तथ्यों पर भी गौर करना चाहिए।'

प्रिय पाठकगण! सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों से स्पष्ट है, दुर्लभतम अपराध का दोषी माफी का हकदार नहीं बन सकता। जनमानस भी यही कहता है। अब फैसला सरकार को करना है।

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अब आगे क्या ?

एक पाठक का प्रश्न है- 'भोपाल गैस काण्ड के दोषियों को मामूली सजा सुनाने के बाद देश भर में हंगामा मचा है। क्या ऐसी प्रतिक्रिया उस वक्त हुई थी, जब 25 साल पहले यह भयानक त्रासदी घटी थी?'
जवाब पाठक ने खुद ही दिया है। 'उस वक्त शोक में डूबा राष्ट्र किंकर्तव्यविमूढ़ था। वह लाशें गिनने और लाखों गैस पीडि़तों के क्रन्दन से हतप्रभ था। जब सामान्य हुआ तो उसने देश के कर्णधारों और न्याय-व्यवस्था पर भरोसा किया। न्याय की आस में २५ साल काट दिए। लेकिन उसे मिला क्या? विश्वासघात! सचमुच उसके विश्वास को बड़ी बेरहमी से कुचल दिया गया। उसके असीम धैर्य का जो सिला राष्ट्र के कर्णधारों ने दिया उससे वह भीतर तक बिंध गया। आज वह क्षोभ, ग्लानि और पश्चाताप की आग में झाुलस रहा है।'

प्रिय पाठकगण! भोपाल गैस काण्ड यानी दुनिया की सबसे भीषण औद्योगिक त्रासदी एक बार फिर सुर्खियों में है। 2-3 दिसम्बर 1984 की दरम्यानी रात को जो कुछ हुआ वह अनचाहा हादसा कहा जा सकता है। लेकिन बाद में जो कुछ प्रत्यक्ष और परोक्ष में घटता रहा उसे क्या कहेंगे? लापरवाही? भूल ... अमरीकी दबाव ... देशद्रोह ...? देखें पाठक क्या कहते हैं। खास बात यह कि अब आगे क्या? भोपाल की जिला अदालत के फैसले और कई नए तथ्यों की रोशनी में ऐसा क्या किया जाए कि गैस पीडि़तों को शीघ्र न्याय मिले। सभी दोषियों को सजा मिले। पाठकों ने इस पर तार्किक चर्चा की है।

भोपाल सेविशाल दुबे ने लिखा- 'गैस त्रासदी के दो मुख्य बिन्दु हैं- 1। आपराधिक 2. नागरिक। दोनों बिन्दुओं पर तत्कालीन केन्द्र और राज्य सरकार ने अपना कर्तव्य क्यों नहीं निभाया, इसकी जांच होनी चाहिए। आपराधिक कर्तव्य के तहत गैस काण्ड के अपराधियों को सलाखों के पीछे पहुंचाना था। नागरिक कर्तव्य के तहत मृतकों के परिजनों और गैस पीडि़तों को पर्याप्त मुआवजा दिलाना था। इन दोनों बिन्दुओं पर सरकार सक्षम थी। सबूत और गवाह भी थे। लेकिन उसने बिलकुल उलट कार्य किया। कौडि़यों का मुआवजा लेकर यूनियन कार्बाइड को बख्श दिया। अमरीका में बैठी एंडरसन की पत्नी के बयान पर गौर करना चाहिए। उसने सब कुछ 'सैटल' होने की बात कही है। केन्द्र सरकार ने 15 फरवरी 1989 को यूनियन कार्बाइड से समझाौते में क्या 'सैटल' किया, देश को इसका पता चलना चाहिए।'

भोपाल से ही मुमताज अली ने लिखा- 'अमरीकन कम्पनी यूनियन कार्बाइड को 25 हजार लोगों की मौत और 6 लाख लोगों के बीमार पड़ने के बदले सिर्फ 710 करोड़ रुपए का मुआवजा लेकर बरी कर दिया गया। यह राशि कितनी नाकाफी है, इसका अंदाजा अमरीका में 9/11 हमले में मारे गए 2 हजार 8 सौ लोगों के परिजनों को मिले मुआवजे से लगाया जा सकता है। भारतीयों की जान की कीमत क्या है- जरा गौर करें। अमरीका में सभी 2800 मृतकों के परिजनों को एक साल के भीतर प्रति व्यक्ति 8 करोड़ रुपए का मुआवजा मुहैया कराया गया। जबकि भोपाल गैस काण्ड के 25 साल बाद भी मृतकों को औसत 2 लाख रुपए तथा घायलों को 50 हजार रुपए मुआवजा ही दिया जा सका है। कई घायल इलाज पर ही लाखों रुपए खर्च कर चुके हैं।'

जबलपुर से शशि शेखर ने लिखा- 'भारत सरकार चाहे तो वह अब भी यूनियन कार्बाइड से अतिरिक्त मुआवजा राशि की मांग कर सकती है। इसके लिए वह यूनियन कार्बाइड के खिलाफ अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय में दावा कर सकती है। यह कार्रवाई न्यायसंगत ही नहीं, तर्कपूर्ण भी कही जाएगी। क्योंकि कम्पनी से जिस वक्त मुआवजा राशि तय की गई थी उस दौरान तीन हजार मौतें और करीब एक लाख लोगों के बीमार होने के मामले सामने आए थे। बाद में यह संख्या बढ़कर क्रमश: 25 हजार तथा 6 लाख हो गई। ये आंकड़े उन गैस दावा अदालतों द्वारा प्रमाणित हैं जिन्होंने गैस त्रासदी में मौतों और घायलों के लिए मुआवजे मंजूर किए हैं।'

जयपुर से विजय सिंह तंवर के अनुसार- 'यूनियन कार्बाइड के जिन सात अधिकारियों को दो साल सश्रम कारावास की सजा सुनाकर जमानत पर छोड़ दिया गया, उसमें राज्य सरकार सी।आर.पी.सी. की धारा 172-ए के तहत सजा बढ़ाने की अपील करे। साथ ही सी.बी.आई धारा 304 (गैर इरादतन हत्या) के तहत मुकदमा चलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू अर्जी दाखिल करे। और केन्द्र सरकार वारेन एंडरसन को तत्काल भारत लाने की कार्रवाई करे।'

उदयपुर से गौरव मेहता ने लिखा- 'यूनियन कार्बाइड के अधिकारियों के खिलाफ गैर इरादतन हत्या का मामला ही दर्ज होना चाहिए। एंडरसन समेत सभी अधिकारियों ने गैस संयंत्र की सुरक्षा को लेकर आपराधिक लापरवाही बरती थी, जिसका विस्तृत विवरण सतीनाथ षडंगी के लेख 'सूना ही रह गया कठघरा' (पत्रिका 9 जून) में किया गया है।'

अहमदाबाद से प्रो. कीर्ति व्यास ने लिखा- 'केन्द्र और राज्य सरकार से सम्बंधित उन राजनेताओं और अफसरों का खुलासा होना जरूरी है, जो गैस त्रासदी काण्ड में निर्णायक भूमिका निभा रहे थे। केन्द्रीय जांच ?यूरो के पूर्व संयुक्त निदेशक बी।आर. लाल, भोपाल के तत्कालीन कलक्टर मोतीसिंह, प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव रहे पी.सी. अलेक्जेंडर, पायलट हसन अली, कैप्टन आर.सी. सोढ़ी आदि ने जो नए खुलासे किए हैं, उन पर इसलिए गौर करना जरूरी है कि राष्ट्र के समक्ष दूध का दूध और पानी का पानी होना चाहिए।'

कोटा से नीलिमा बंसल ने लिखा- 'जब भी रघु राय की खींची मिट्टी में दबे उस मृत बच्चे की तस्वीर देखती हूं- जो भोपाल गैस त्रासदी में मारे गए लोगों की भयावहता का प्रतीक बन चुकी है- तो कांप उठती हूं। आखिर ऐसे कारखानों की हमें जरूरत ही क्यों है जो मानवता और प्रकृति के निर्मम हत्यारे साबित हो रहे हैं।'

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नक्सली नासूर !

17 मई, दंतेवाड़ा: नक्सलियों ने यात्री बस को बारूदी सुरंग से उड़ाया, 40 मरे

28 मई, प. मिदनापुर:नक्सलियों ने रेलवे ट्रेक उड़ाया, 140
ये वे तारीखें हैं, जिन्हें सरकार और राजनेताओं ने नजरअंदाज किया तो उन्हें जिन्दगी भर पछताना पड़ेगा। देश की नजर में वे गुनहगार माने जाएंगे।चेतावनी के ये शब्द पाठकों की प्रतिक्रियाओं का सार है, जिन्होंने हाल ही की नक्सली करतूतों पर व्यक्त की हैं। नक्सली हिंसा के लम्बे इतिहास के बावजूद प्रबुद्ध पाठकों ने उपरोक्त दो तिथियों पर खास जोर दिया है। कारण उन्हीं से जानते हैं-

कोटा से डॉ. सुनील एस. चौहान ने लिखा- 'पिछले 60 वर्ष के इतिहास में नक्सलियों ने निर्दोष नागरिकों को कभी निशाना नहीं बनाया। उनका शिकार पुलिस, सरकारी अफसर, जमींदार, मुखबिर या फिर दुश्मनों के लिए बिछाई बारूदी सुरंगों के फटने से अनायास मारे गए नागरिक शामिल थे। नक्सली अपने मापदंडों पर गुनाह-बेगुनाह का फैसला करते हैं। इसलिए कर्तव्य पालन करने वाले पुलिस के जवान को भी वे अपना दुश्मन मानते हैं। सहमत न होते हुए भी यहां तक तो उनकी विचारधारा समझा में आती है लेकिन 17 और 28 मई की घटनाओं को वे क्या कहेंगे जिनमें लक्ष्य करके बेकसूर नागरिकों को मारा गया? कोई नक्सली या माओवादी इसका जवाब देगा? माओवादियों से सहानुभूति रखने वाले बुद्घिजीवी और राजनेता कहां हैं? शायद उन्हें सांप सूंघ गया। ज्यादा कुरेदेंगे तो कह देंगे हिंसा से वे सहमत नहीं। उनका यही दोगला चरित्र राष्ट्र को खा रहा है। साफ है कि नक्सली अपनी घोषित विचारधारा को तिलांजलि दे चुके हैं और अराजकता के रास्ते सत्ता पर कब्जा करने की तैयारी कर रहे हैं। इसलिए आतंककारियों की तरह निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। यात्री बस और रेलगाड़ी को उड़ाने की ये दो घटनाएं इसका नया सबूत है। 'जयपुर से राजस्थान विश्वविद्यालय के शोधार्थी दीपेन्द्र जैन ने लिखा- 'दंतेवाड़ा में 17 मई को बारूदी सुरंग विस्फोट करके जिन 40 बस यात्रियों को उड़ाया, उनमें कुछ पुलिस के जवान भी थे। नक्सलियों ने इस घटना की जिम्मेदारी ली थी। लेकिन उनका कुतर्क देखिए। कथित नक्सली नेता रामन्ना ने कहा, बस को इसलिए उड़ाया क्योंकि उसमें पुलिस के अधिकारी सवार थे। सरकार ने जनता को ढाल की तरह इस्तेमाल किया। इसलिए सरकार ही इन मौतों की जिम्मेदार है। (पत्रिका 28 मई, आत्मघाती साबित होगी नरमी) क्या कोई रामन्ना से पूछने वाला है कि झाारग्राम में मारे गए 140 रेलयात्रियों में कितने पुलिस के जवान थे? रामन्ना अब कहां छिपा बैठा है?'

भोपाल से रफीक कुरैशी ने लिखा- 'मुझो उन लोगों पर तरस आता है जो माओवादियों की वकालत करते हैं। नक्सलियों से सहानुभूति रखने वाली अरुंधती राय जैसी बुद्घिजीवी अब चुप क्यों हैं? झाारग्राम रेल हादसे का जिसने भी अखबारों में विवरण पढ़ा, उसकी रूह कांप गई होगी। मासूम चीत्कारों और कटी-पिटी वीभत्स निर्दोष लाशों को देखकर किसका दिल नहीं पसीजा होगा? शायद हमारे बुद्धिजीवी इस घटना में भी कोई तर्क तलाश रहे होंगे।'

नीलम शर्मा (जयपुर) के अनुसार- 'सम्पादकीय पृष्ठ पर 'नक्सलियों की निर्ममता' (29 मई) शीर्षक से प्रकाशित फोटो देखकर कलेजा मुंह को आ गया। ट्रेन का डिब्बा प्लास्टिक के खिलौने की तरह बिखरा पड़ा था और रेलयात्री का शव पुर्जा-पुर्जा रक्त से रंजित! यह किसी हैवान की ही कारगुजारी हो सकती है।'

कोलकाता से ज्ञानचंद्र व्यास ने लिखा- 'घोर अफसोस की बात है, नक्सली समस्या को अब भी राजनीतिक चश्मे से देखा जा रहा है। ममता बनर्जी माओवादियों का नाम लेने से परहेज कर रही हैं। चिदम्बरम ममता को नाराज करना नहीं चाहते। माकपा ममता से भयभीत है। सबको चुनाव लड़ने हैं। निकाय चुनाव के बाद तैयारी विधानसभा चुनाव की है। इसलिए सब अपनी-अपनी रणनीति के अनुसार नक्सलियों को देख रहे हैं। देश को कोई नहीं देख रहा है।'

बेंगलूरु से नवीन दोषी ने लिखा- 'नक्सली नासूर बन चुके हैं। नासूर को शरीर से काट फेंकना ही बेहतर है।'

जोधपुर से डॉ. रवीन्द्र माथुर ने लिखा- 'एक तो निरपराध नागरिकों की हत्याएं और ऊपर से नक्सलियों के लश्कर-ए-तैयबा से सम्पर्क की खबर (26 मई, शांति प्रक्रिया पर काली छाया) हमारी आंतरिक सुरक्षा को गंभीर चुनौती है।'

ग्वालियर से सतीश पटेरिया के अनुसार- 'पानी सिर के ऊपर से गुजर चुका है। यूपीए- दो को अपने एक वर्ष शासन के जश्न को खत्म करके नक्सलियों के खात्मे पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।'

नवलगढ़ (झुंझुनूं) से प्रीति कुमावत ने लिखा- 'नक्सलवाद आतंकवाद से भी ज्यादा खतरनाक है।' अजमेर से नीरज शर्मा ने लिखा- 'नक्सली जब देश के आम आदमी को ही निशाना बनाने लग गए तो उन्हें देश का नागरिक मानना भूल होगी।' अलवर से गोपाल यादव ने लिखा- 'अफसोस की बात है कि बस यात्रियों के मारे जाने के बाद केन्द्रीय गृहमंत्री ने नक्सलियों से वार्ता की पेशकश की जिसे नक्सलियों ने ठुकरा दी। (19 मई, हिंसा छोड़ो, बात करो) नक्सलियों से नरमी की क्या जरूरत है।'

प्रिय पाठकगण। 17 और 28 मई की घटनाओं पर अनेक पाठकों की प्रतिक्रियाएं शेष हैं। सभी का सार है कि निर्दोष नागरिकों की हत्याएं नक्सलियों की हताशा लेकिन खतरनाक इरादों का संकेत है। वे आदिवासियों के शोषण के नाम पर सिर्फ अराजकता फैला रहे हैं। उनमें और आतंककारियों में कोई फर्क नहीं।
बधाई संदेश
मध्य प्रदेश में पत्रिका के दो वर्ष पूर्ण होने पर देश भर से पाठकों के बधाई संदेश व शुभकामनाएं प्राप्त हुई हैं। पाठकों ने लिखा- 'सार्थक पत्रकारिता के माध्यम से पत्रिका ने मिसाल कायम की, जिससे पत्रिका अल्प समय में मध्य प्रदेश की आवाज बन गया और पाठकों का विश्वास अर्जित करने में सफल रहा। 'पत्रिका' की ओर से पाठकों का आभार व्यक्त किया गया है।

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प्रेस की स्वतंत्रता पर आक्रमण

इंदौर में पत्रिका पर हमले की घटना ने देश भर के पाठकों में मानो उबाल-सा ला दिया। पाठक उद्वेलित हैं और हमलावरों की कड़ी भत्र्सना कर रहे हैं। मुझो रोजाना ढेरों प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं। कई आप पढ़ चुके हैं। आगे भी पढ़ेंगे। यहां कुछ चुनिंदा प्रतिक्रियाएं। जो समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

प्रिय पाठकगण! पहले एक जरूरी बात। किसी भी विवाद में दो पक्ष होते हैं। यहां भी हैं। एक हमलावर है तो दूसरा हमले का शिकार है। हमले का शिकार कौन? अखबार का पाठक। यानी आम आदमी। आखिर वितरकों-हॉकरों से अखबार के बंडल छीनकर पाठकों को खबरों से वंचित करना उनके हकों पर हमला ही तो है। पाठक जानना चाहते हैं कि ऐसी कौन-सी खबर थी जिसे वे पाठकों की पहुंच से दूर रखना चाहते थे। और क्यों? जयपुर से डॉ। अरविन्द गुप्ता ने लिखा- 'कांपती मथुरा और इंदौर में प्रेस की आजादी पर आक्रमण (७ मई) पढ़कर मुझो घोर आश्चर्य हुआ।

आश्चर्य इस बात का कि सूचना का अधिकार के युग में ऐसे सिरफिरे भी हैं जिन्होंने एक प्रतिष्ठित अखबार को उसके पाठकों से वंचित करने का विफल कृत्य किया। जी हां, विफल। क्योंकि आज के युग में अखबार को रोकना आसान नहीं। आधुनिक सूचना तकनीक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की संवैधानिक व्यवस्था तो है ही। महत्वपूर्ण बात यह है कि जब भी किसी अखबार की स्वतंत्र और निष्पक्ष आवाज को दबाने की कोशिश की गई, वह अखबार पाठकों का और भी चहेता बन गया। मुझो पूरा यकीन है, इंदौर की घटनाओं ने 'पत्रिका' को पाठकों का सबसे चहेता अखबार बना दिया होगा। इंटरनेट पर भी पत्रिका को पढ़ने वालों की संख्या बढ़ गई होगी।'

इंदौर के सामाजिक कार्यकर्ता श्रीधर बापट के अनुसार- 'पत्रिका का ७ मई का अंक देखकर दंग रह गया। अखबार के सैकड़ों बंडल नाले में पड़े थे जिन्हें गुण्डों ने हॉकरों से छीनकर फेका था। पुलिस संगीनें लिए खड़ी है, लेकिन मूकदर्शक।

एक फोटो में मोटरसाइकिलों पर गुण्डों की फौज सवार है। जमीन पर अखबार की फटी हुई प्रतियां उनकी काली करतूत की दास्ता बयां कर रही थी। सचमुच उस दिन इंदौर में गुण्डाराज था जिसने लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को अपमानित करके मुझा जैसे लाखों इंदौरवासियों को शर्मशार कर दिया।'

इंदौर के ही अनिल नागपाल ने लिखा- 'पत्रिका इंदौर के आम आदमी का प्रिय अखबार है। इसका प्रमाण है, गुण्डों द्वारा छीनकर फेंकी गई अखबार की प्रतियों को लोगों ने ढूंढ़-ढूंढ़ कर पढ़ा।' विकास माथुर ने लिखा, 'आखिर पत्रिका ने क्या गलत लिखा? मंत्री और विधायक के भ्रष्टाचार को उजागर करना अखबार का उत्तरदायित्व है। इस उत्तरदायित्व से इंदौर के अन्य अखबारों ने क्यों मुंह फेरा, यह समझा से परे है।'

इंदौर से विजय वर्मा ने लिखा- 'इंदौर शहर में एक बार फिर गुण्डों ने आतंक मचाया और शिवराज में जंगलराज का एक और नमूना दिखाया। माफ कीजिएगा... ये लोग आज अचानक कहीं से पैदा नहीं हो गए। ये पहले से यहीं मौजूद थे। मगर अफसोस किसी ने आंखें खोलना जरूरी ही नहीं समझा।'

भोपाल से एडवोकेट रमेश शर्मा के अनुसार- 'मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और विधायक रमेश मेंदोला के भ्रष्ट कारनामों की तथ्यों सहित पोल खोली गई तो वे बौखला गए। मध्य प्रदेश में राजनेताओं और अफसरों का भ्रष्टाचार चरम पर है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह भ्रष्टाचार के खात्मे की बात करते हैं। लेकिन हकीकत में भ्रष्ट मंत्रियों पर कार्रवाई नहीं करना चाहते। सुगनीदेवी कॉलेज परिसर का भूमि घोटाला बच्चे-बच्चे की जुबान पर है, परंतु मुख्यमंत्री सहित भाजपा के सभी शीर्ष नेता मौन हैं।'

ग्वालियर से संगीता शर्मा (गृहणी) ने लिखा- 'पत्रिका की पहले दिन से ही पाठक हंू। जैसा सुना था वैसा ही पाया। इसलिए पढ़े बगैर चैन नहीं पड़ता। मध्य प्रदेश सहित पूरे देश में भ्रष्टाचार फैला हुआ है। बड़े-बड़े नेता भ्रष्टाचार मिटाने की बात करते हैं। पत्रिका यही तो कर रहा था।'

कोटा से संगीता सक्सेना (शास्त्रीय गायिका) ने लिखा- 'हम पत्रिका के पीढि़यों से पाठक हैं। रोज सुबह ५ बजे टीवी पर स्वामी रामदेवजी का योग कार्यक्रम तथा सवा पांच बजे राजस्थान पत्रिका से अपने दिन की शुरुआत करते हैं। बेबाक, बेखौफ व बुलंद पत्रिका की आवाज को कोई दबाने की कोशिश करता है तो यह सीधा-सीधा जनमानस पर आघात होगा।'

'भ्रष्टाचार के खिलाफ मीडिया की आवाज को कोई दबा नहीं सकता, बशर्त मीडिया यह कार्य पूर्ण निष्पक्षता से करे।' यह प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अजमेर से पूर्व प्राचार्य डा. पुरुषो?ाम उपाध्याय ने लिखा- 'पत्रिका की छवि एक निर्भय और निष्पक्ष अखबार की रही है।

पत्रिका के संस्थापक स्व. कुलिशजी जुझारू पत्रकार थे। वे कभी झाुके नहीं। इसीलिए पत्रिका को विशाल पाठक समुदाय मिला। इंदौर में पत्रिका पर हमले के बाद विभिन्न वर्गों से समर्थन की जो प्रतिक्रियाएं मिल रही है, वही उसकी वास्तविक शक्ति है। इस शक्ति से बौखलाकर कोई भ्रष्ट राजनेता अखबार की आवाज दबाने की हिमाकत करता है तो उस पर तरस ही आता है।'

अहमदाबाद से हरीश पारीक ने लिखा- 'पत्रिका के समाचारों से अगर मंत्री या विधायक को कोई आपत्ति थी तो वे प्रेस कौंसिल में जा सकते थे। कोर्ट के दरवाजे भी खुले हैं। लेकिन यह क्या! अखबार की प्रतियां लूटना, बंडल छीनना, वितरकों/हॉकरों से मारपीट करना लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह सब नहीं चलता।'

प्रिय पाठकगण! पाठकों के सभी पत्रों में लोकतंत्र के चौथे पाए पर हमले की निन्दा की गई है। और यह सवाल उठाया गया है कि प्रेस की स्वतंत्रता को रोकने का किसी को क्या अधिकार है। स?ााधीश मंत्री और विधायक के भ्रष्टाचार को लेकर तथ्यपरक समाचारों को मध्य प्रदेश सहित सभी जगह के पाठकों ने सराहा। कर्नाटक, तमिलनाडू, पं. बंगाल, गुजरात, राजस्थान आदि प्रदेशों के पाठकों की प्रतिक्रियाएं इसका प्रमाण हैं।

कई प्रतिक्रियाओं का सार है कि मध्य प्रदेश के इस राजनीतिक भ्रष्टाचार की लोकायुक्त जांच चल रही है। लेकिन अखबार में जो तथ्य प्रकाशित हुए हैं, वे इतने पर्याप्त हैं कि आरोपित नेताओं को स्वत: ही नैतिकता के आधार पर पद त्याग देने चाहिए अन्यथा शीर्ष नेतृत्व को उन्हें हटा देना चाहिए। जनभावना का यही तकाजा है।

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रिश्वत का रोग

जयपुर के एक युवा चिकित्सक डॉ. शशांक सेन की प्रतिक्रिया है- 'हाल ही पत्रिका में प्रकाशित चिकित्सकों के भ्रष्टाचार सम्बन्धी समाचारों ने साख खोते जा रहे चिकित्सकीय पेशे को शर्मशार ही किया है। 'डॉक्टर से रिश्वत लेते डॉक्टर गिरफ्तार' (24 अप्रेल) और 'डॉक्टर के घर करोड़ों की सम्पत्ति' (संदर्भ डॉ। केतन देसाई प्रकरण, 25 अप्रेल) समाचारों को पढ़कर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति आहत हुए बिना नहीं रहेगा। यूं तो भ्रष्टाचार सब जगह है, लेकिन डॉक्टर होने के नाते मैं अपने इस पेशे के प्रति ज्यादा चिंतित हूं। हमारा पेशा औरों से भिन्न है। जिन्दगी और मौत देने वाला तो भगवान है, फिर भी करोड़ों लोग चिकित्सकों को भगवान से कम नहीं मानते। उन पर क्या बीतती होगी, जब वे ऐसे समाचार पढ़ते हैं। रिश्वतखोरी की दोनों घटनाएं शर्मनाक हैं। दोनों आरोपी चिकित्सक खास जिम्मेदारी के ओहदे पर बैठे हुए वरिष्ठजन हैं।' जोधपुर से दिवाकर सोनी ने लिखा- 'मैं यकीन से कहता हूं कि भारत समेत दुनिया में ऐसा कोई देश नहीं है, जहां चिकित्सक बी.पी.एल. श्रेणी में आता हो। भारत में भी एक सामान्य चिकित्सक को इतना अवश्य मिल जाता है कि वह आत्मसम्मान पूर्वक जीवन-यापन कर सके। इसलिए यह तो स्पष्ट है कि चिकित्सक भी अन्य भ्रष्टाचारियों की तरह लालच का शिकार हो रहे हैं। लेकिन इसके परिणाम जितने गम्भीर हैं, उतने किसी और पेशे में नहीं हैं। रिश्वतखोरी या भ्रष्टाचार भले ही चिकित्सा-कौशल से सीधे न जुड़े हों, परन्तु ये बुराइयां कहीं न कहीं रोग-निदान पर असर डालती है जो इंसानी जिन्दगी और मौत से जुड़ी हैं।'

प्रिय पाठकगण! भ्रष्टाचार सम्बन्धी समाचारों पर पाठक सदैव त्वरित प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। सम्भवत: इस 'महामारी' से हर व्यक्ति प्रभावित है। पत्रिका के सर्वे (2 मई) से भी यह जाहिर है। पाठकों ने चिकित्सा क्षेत्र के संदर्भ में फैले भ्रष्टाचार को इंगित किया है। इंदौर से देवेन्द्र राज शुक्ला ने लिखा- 'मेडिकल कौंसिल ऑफ इण्डिया एक सम्मानित संस्था है। चिकित्सा-पेशे से जुड़े मानदंड उसकी निगरानी में तय होते हैं। लेकिन जब संस्था का अध्यक्ष ही दो करोड़ की रिश्वत के आरोप में गिरफ्तार होता है तो संस्था के सम्मान को तार-तार कर देता है। दिल्ली, अहमदाबाद और अन्य ठिकानों पर सी।बी।आई. छापों में डॉ. केतन देसाई के पास करोड़ों रुपए की सम्पत्ति इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि इतनी सम्पत्ति कोई अपने वेतन से तो सात जन्मों में भी अर्जित नहीं कर सकता।'

अजमेर से धीरज गुप्ता ने लिखा- 'सर्वाधिक गम्भीर बात यह है कि डॉ। केतन देसाई को एक निजी मेडिकल कॉलेज को मान्यता देने के बदले रिश्वत लेने के आरोप में पकड़ा गया। अब तो यह भी सामने आ रहा है कि डॉ. देसाई ने देश के कई निजी मेडिकल कॉलेजों से करोड़ों की रिश्वत लेकर मेडिकल कौंसिल की अनुमति दिलवाई। रिश्वत देकर मान्यता प्राप्त करने वाली संस्थाएं मेडिकल क्षेत्र में कैसा योगदान कर रही होंगी, यह हर कोई समझा सकता है।'

भोपाल से अनुपम श्रीवास्तव के अनुसार- 'मैं ऐसे व्यक्ति को जानता हूं जिसने अपने सुपुत्र को एक निजी मेडिकल कॉलेज में लाखों रुपए रिश्वत देकर दाखिला कराया, जो फिसड्डी था। आज वह डॉक्टर बनकर धड़ल्ले से प्रैक्टिस कर रहा है और ऊंची फीस वसूल कर रहा है। उसके पिता का तर्क है, बच्चे को डॉक्टर बनाने के लिए हमने लाखों का इन्वेस्टमेंट किया था।'

हरेन्द्र बेनीवाल (बाड़मेर) ने लिखा- 'रिश्वत देकर मान्यता प्राप्त करने वाली मेडिकल कॉलेज छात्रों से वसूली प्रक्रिया अपनाती है। सीटों में हेराफेरी करके ऊंचा चंदा वसूल करती है। कम अंकों के बावजूद छात्रों को दाखिला दे देती है, जबकि ज्यादा अंकों वाले छात्रों को लटका देती है। जयपुर की एक निजी मेडिकल कॉलेज का ऐसा ही एक मामला पिछले दिनों सामने आया था।'

जयपुर से धनञ्जय शर्मा ने लिखा- 'राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल के मेडिकल ज्यूरिस्ट विभागाध्यक्ष अगर किसी डॉक्टर से ही रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़े जाएं तो फिर कहने के लिए क्या रह जाता है। यह विभाग कई जटिल मामलों का संधारण करता है। विभाग की सिफारिश और अन्वेषण पर कानून और न्याय की बुनियाद टिकी होती है। वह विभाग भी भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं है- यह सवाई मानसिंह अस्पताल के मेडिकल ज्यूरिस्ट विभागाध्यक्ष डॉ। बी.एम. गुप्ता की गिरफ्तारी से साफ हो जाता है।'

उदयपुर से शिवानी माथुर ने लिखा- 'रिश्वतखोरी देश की एक गंभीर महामारी का रू प धारण कर चुकी है। हालांकि भ्रष्टाचार के और भी कई रू प हैं, लेकिन सबसे बड़ा दैत्य तो रिश्वतखोरी ही है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में वर्ष 2008 में गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले लोगों ने मूलभूत सुविधाओं को हासिल करने के लिए 90 अरब रुपए की रिश्वत दी। अब यह राशि 100 अरब के पार जा चुकी होगी। अंदाज लगा सकते हैं कि भारत में रिश्वतखोरी की समस्या कितनी विकराल है।'

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बर्बर माओवादी

'बर्बर नक्सली हमला' (पत्रिका 7 अप्रेल) समाचार पर पाठकों की विचारोत्तेजक प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुई हैं। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में माओवादियों ने अब तक का सबसे बड़ा हमला बोलकर एक साथ 76 जवानों को मार डाला। इस हत्याकाण्ड ने पूरे तंत्र को झाकझाोर दिया। कुछ लोगों का मानना है कि नक्सली आंदोलन शोषण की उपज है। इस आंदोलन से सहानुभूति रखने वाले कुछ राजनीतिक दलों, बुद्धिजीवियों और मानवाधिकार संगठनों के विचार व तर्कों से परे आम नागरिक भारत में माओवादियों की विचारधारा और आंदोलन को किस नजरिए से देखता है, यह जानना महत्वपूर्ण होगा।

जयपुर से हरिश्चन्द्र शुक्ला की प्रतिक्रिया है- 'दंतेवाड़ा और इससे पहले गढ़चिरौली, लालगढ़ आदि घटनाओं को सामान्य नक्सली आंदोलन समझाना भूल होगी। जैसा कि एक पूर्व सैन्य अधिकारी आर। विक्रम सिंह ने उत्तर प्रदेश के एक हिंदी दैनिक में लिखा- ये घटनाएं नक्सली आंदोलनकारियों की करतूत भर नहीं है। यह भारत पर मंडराता आंतकवाद और माओवाद की संयुक्त चुनौती का खतरा है। देश में दोनों ताकतें एक-दूसरे से कदम मिलाकर चल रही हैं। मजहबी आतंककारियों के आका पाकिस्तान में और माओवादियों के आका चीन में हैं। इन दोनों देशों की रणनीतिक घनिष्ठता का उद्देश्य भारत को खंडित कर इलाके बांटना है। सिंह का यह आकलन मुझो तो सही लगता है। देश में मुट्ठी भर समझो जाने वाले हार्डकोर माओवादियों से निपटने के लिए 37 हजार अद्र्ध सैनिक बल भी नाकाफी सिद्ध हो रहे हैं तो जरू र इसके पीछे कुछ बड़ी ताकतें काम कर रही हैं।'

सूरत से राहुल एस. मेहता ने लिखा- 'नक्सलियों को विदेशी मदद मिल रही है। दंतेवाड़ा हत्याकाण्ड के बाद गृह मंत्री पी. चिदम्बरम ने भी स्वीकार किया कि नक्सलियों को सीमा पार से हथियार मिलते हैं। (पत्रिका 9 अप्रेल) नेपाल, म्यांमार, बांग्लादेश की खुली सीमाओं से नक्सली जो हथियार प्राप्त कर रहे हैं वे उन्हें कहां से मिल रहे हैं- यह जानने की जरू रत है।'

इंदौर से अरविन्द खरे ने लिखा- 'नक्सलियों ने साठ के दशक में अपना एक राजनीतिक दल भी गठित किया था। उसी समय चीन के साथ समस्याओं की शुरुआत हुई थी। चीन आज भी जिस तरह इंच-इंच करके भारत की भूमि हड़प रहा है, उसे देखते हुए साफ है कि वह भारत का हितैषी नहीं है।'

कोलकाता से डा. प्रदीप शर्मा ने लिखा- 'यह सही है कि नक्सलवादी आंदोलन की शुरुआत गरीबों पर अत्याचार और शोषण की प्रतिक्रिया स्वरू प हुई। लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक देश में सशस्त्र विद्रोह का कोई अर्थ नहीं। माओवादियों को पंजाब के उग्रवादियों की हार से सबक सीखना चाहिए।'जबलपुर से जयकान्त दीक्षित ने लिखा- 'माओवादी अपने उद्देश्य से पूरी तरह भटक गए। चारू मजूमदार और कानू सान्याल की विचारधारा चकाचौंध में खो गई। नक्सली अब सत्ता के ख्वाब देख रहे हैं। वे दिल्ली की कुर्सी पर काबिज होना चाहते हैं। भोले-भाले आदिवासियों को वे लाल क्रांति का सपना दिखाकर लुभा रहे हैं। बेरोजगार युवकों को बाकायदा वेतन देकर भर्ती कर रहे हैं। लोकतंत्र में सत्ता प्राप्त करने का हक सभी को है- लेकिन बुलैट से नहीं बैलेट से।'

कोटा से दयानन्द वैष्णव ने लिखा- माओवादी-नक्सली बहुत खूंखार तरीके अपना रहे हैं। सी।आर.पी.एफ. के 120 हथियारबंद जवान तीन एंटीलैंड माइन वाहनों में बैठकर दंतेवाड़ा के जंगलों में गए थे। लेकिन नक्सलियों ने उन्हें जिस तरह घेरकर गोलियों से भूना और धमाके किए, उससे स्पष्ट है कि उनके पास अत्याधुनिक हथियारों की कोई कमी नहीं है। पहले नक्सलियों के पास पुलिस से लूटी हुई रायफलें ही हुआ करती थीं। वे गुरिल्ला पद्धति से छिपकर वार करते थे। लेकिन दंतेवाड़ा की घटना कुछ और ही संकेत कर रही है। माओवादियों को इतनी ताकत कहां से मिल रही है।'श्रीगंगानगर से संतोष सिंह ने लिखा- 'वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल पी.वी. नाइक ने कहा कि सशस्त्र सेनाएं घातक अभियानों के लिए प्रशिक्षित हैं, कम घातक अभियानों के लिए नहीं। (पत्रिका 8 अप्रेल) नाइक के इस वक्तव्य के बारे में मुझो यही कहना है कि नक्सली हैवानियत की हदें पार कर चुके हैं। इनके खिलाफ घातक अभियान ही चलाया जाना चाहिए। नासूर अब खत्म होना जरू री है।'

कुछ पाठकों ने उन परिस्थितियों की चर्चा भी की जिसके चलते नक्सलवाद पनपा। अजमेर से डी.डी. गर्ग के अनुसार- 'बंदूक का जवाब बंदूक से देकर कोई समस्या हल नहीं हो सकती। इस समस्या का राजनीतिक समाधान होना चाहिए। इस बारे में भाकपा (माले) के दीपंकर भट्टाचार्य ने सही कहा। (पत्रिका 10 अप्रेल) जोधपुर से दीपेन्द्र डागा ने लिखा- 'सुरक्षाबल आदिवासियों पर अत्याचार करते हैं। अतिउत्साहित अधिकारियों ने दंतेवाड़ा की घटना से कुछ दिन पहले ही जनजातियों को उनके जंगल में स्थित घरों से खदेड़ दिया था। इसका सबूत स्वयं केन्द्रीय गृह सचिव जी.के. पिल्लई का बयान है। (पत्रिका 14 अप्रेल)

उदयपुर से नीलिमा खत्री ने लिखा- 'आदिवासियों पर जुल्म पुरानी बातें हैं। छत्तीसगढ़ देश का पहला राज्य है, जहां गरीबों के लिए दो रुपए किलो चावल सरकार ने उपलब्ध कराया और आदिवासियों के लिए 'सलवा जुड़ूम' जैसा पुनर्विकास का अभियान चलाया। उसी छत्तीसगढ़ में देश का सबसे बर्बर माओवादी हमला हुआ।'

प्रिय पाठकगण! हिंसक विचारधारा चाहे वह मजहबी आतंकवाद से जुड़ी हो अथवा राजनीतिक माओवाद से- लोकतंत्र में उसका कोई स्थान नहीं है। हिंसक विचारधाराएं बार-बार नकारी जा चुकी हैं, क्योंकि ये लोकतंत्र ही नहीं मानवता की भी दुश्मन हैं।

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