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सरकार का ट्विटर पर चहकना


आजकल ट्विटर पर अभिनेता से लेकर राजनेता तक सभी चहकते (ट्विट करते) हैं। शायद इसीलिए पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने पेट्रोल में कीमतों की कमी की घोषणा अपने ट्विटर अकाउंट पर की। यह पहला अवसर है, जब किसी महत्वपूर्ण निर्णय की जानकारी सरकार ने औपचारिक प्रेस-विज्ञप्ति या प्रेस कान्फे्रन्स की बजाय सोशल नेटवर्किंग के जरिए दी। वह भी पेट्रोल में कीमतों की कमी की तिथि से पूरे चौबीस घंटे पहले। मीडिया को यह खबर ट्विटर से मिली और आम जनता के लिए सार्वजनिक हुई। वैसे कह सकते हैं कि मंत्री ने जब पेट्रोल की कीमत घटाने की जानकारी अपने ट्विटर अकाउंट पर दी तभी यह सूचना सार्वजनिक हो गई थी, लेकिन भारत जैसे देश में ट्विटर पर या मंत्री को फोलो करने वाले लोगों की सीमित तादाद है। सही मायने में आम लोगों के हित की यह सूचना मीडिया के जरिए ही लोगों तक पहुंच पाई।
ऐसे में यह स्वाभाविक सवाल है कि सरकार को अपने महत्वपूर्ण निर्णयों की जानकारी 'ट्विटर', 'फेसबुक' आदि सोशल नेटवर्किंग माध्यमों से देनी चाहिए या मीडिया के मार्फत आम जन तक पहुंचानी चाहिए? प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने अपने मंत्रियों और अफसरों को सोशल मीडिया से जुड़ने के निर्देश दिए थे। स्वयं प्रधानमंत्री भी ट्विटर के जरिए लोगों तक संदेश पहुंचाते हैं। जनता के वोटों से चुनी हुई सरकार जनता से सतत संवाद के लिए इन माध्यमों का उपयोग करे तो शायद किसी को भी एतराज नहीं होगा। अनेक राजनेता 'ट्विटर', 'फेसबुक' आदि माध्यमों पर मौजूद हैं और समय-समय पर अपने प्रशंसकों-मित्रों-शुभचिन्तकों आदि से संवाद करते हैं। विभिन्न मुद्दों पर उनकी राय, सम्मति, प्रतिक्रियाएं मीडिया में सुर्खियां भी बनती हैं। लेकिन सरकार का कोई महत्वपूर्ण निर्णय, वह भी ऐसा जो सीधे जनता से जुड़ा हो- अगर उसे मंत्रीजी अपने 'ट्विटर' अकाउंट पर डालकर इतिश्री कर ले तो इसे क्या कहना चाहिए। सरकार के महत्वपूर्ण व नीतिगत निर्णयों की सूचनाओं-घोषणाओं के लिए सोशल नेटवर्किंग पर निर्भरता सही नहीं मानी जा सकती। बल्कि कई विश्लेषकों की राय में तो यह एक खतरनाक प्रवृत्ति है। भाजपा के पूर्व नेता गोविन्दाचार्य तो इसे पब्लिक रिकार्ड एक्ट का उल्लंघन मानते हैं और अदालत में जनहित याचिका दायर कर चुके हैं। अगर समय रहते सोशल मीडिया-प्रेमी सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया तो उसके नतीजे भी भुगतने पड़ सकते हैं।
सोशल मीडिया के दुरुपयोग और उसके दुष्परिणाम के विश्व में सैकड़ों उदाहरण हैं। इसमें जितना खुलापन है, उतनी अराजकता भी। किसी भी तरह के नियन्त्रण और नियमन से मुक्त यह माध्यम कई बार सरकारों की फांस बन चुका है। इसका मतलब यह भी नहीं कि सोशल मीडिया की सकारात्मक भूमिका नगण्य है। लेकिन यह एक दुधारी तलवार है। मौजूदा केन्द्र सरकार सोशल मीडिया की शक्ति और कमजोरियों से नावाकिफ होगी, यह सोचना नादानी होगी। सरकार में आने से पहले भाजपा के कई नेता सोशल नेटवर्किंग पर सक्रिय रहे हैं। नरेन्द्र मोदी तो काफी पहले ही सोशल नेटवर्क पर लोकप्रिय राजनेता का खिताब हासिल कर चुके थे। ऐसे में मौजूदा केन्द्र सरकार की सोशल मीडिया पर निर्भरता को सहज ही समझाा जा सकता है। दरअसल, सोशल मीडिया और मुख्य मीडिया के मूलभूत स्वरूप और उनमें परस्पर भिन्नता है।
सोशल मीडिया एक निरपेक्ष माध्यम है। इसमें आप इकतरफा संवाद लम्बे समय तक कायम रख सकते हैं। आप जानते हैं लोग आपके 'फॉलोवर' या दूसरे शब्दों में आपके 'समर्थक' होते हैं। वे आपके शब्दों की प्रतीक्षा करते हैं और जब आप उन्हें व्यक्त कर देते हैं तो वे आपकी तारीफ करते हैं। कई तो प्रशंसा के पुल बांध देते हैं। कुछ आलोचक भी होते हैं, लेकिन दिखावे के। वास्तविक आलोचक या विश्लेषकों को कोई पसंद नहीं करता और उन्हें आमतौर पर प्रतिबंधित (ब्लॉक) कर दिया जाता है। अव्वल तो कोई असुविधाजनक सवाल आपसे करता ही नहीं। किसी ने कर भी दिया तो आप उसकी आसानी से अनदेखी कर सकते हैं। 'ट्विटर' में तो वैसे भी १४० अक्षरों की सीमा बंधी है। यानी एक सुविधाजनक परिस्थिति आपको सोशल मीडिया पर उपलब्ध है। इसका सबसे ज्यादा फायदा राजनेता उठा रहे हैं। प्रचार का प्रचार और जवाबदेही नगण्य। सरकार में बैठे नेता के लिए तो यह और भी मुफीद है। मंत्री का सोशल मीडिया के जरिए लोगों से संवाद बुरी चीज नहीं है, लेकिन इसे राजनीतिक सुविधा का माध्यम बना देना अनुचित है।
यह सुविधा मुख्य मीडिया में सहज उपलब्ध नहीं है। हालांकि मीडिया के जो मौजूदा हालात हैं उनमें राजनेता, राजनीतिक दल और सरकार ही नहीं, पहुंचवाला कोई भी व्यक्ति मीडिया से अनुकूल सुविधाएं हासिल कर लेता है। लेकिन मुख्यधारा का मीडिया अपने स्वरूप में ही सोशल मीडिया से इतना भिन्न है कि वह कहीं न कहीं या किसी न किसी स्तर पर आपको जवाबदेही के लिए मजबूर कर सकता है।
मीडिया की इसी शक्ति ने उसे अनेक विपरीत परिस्थितियों के बावजूद कायम रखा है। मीडिया 'ट्विटर' की तरह निरपेक्ष नहीं है। न ही वह 'फेसबुक' की तरह किसी एक कंपनी या व्यक्ति द्वारा संचालित है। सोशल मीडिया में कुछ नियम और विधियां तय हैं जो निरपेक्ष भाव से स्वत: काम करती रहती है। उसका यह तंत्र अच्छे और बुरे की पहचान नहीं कर सकता। इसके विपरीत मीडिया एक जीवन्त माध्यम है। उसके संचालक ही नहीं, उसमें कार्यरत मीडियाकर्मी भी हर क्षण चौकन्ने रहते हैं। उनमें परस्पर कड़ी प्रतिस्पद्र्र्धा है। वह अलग-अलग रूपों और नामों में मौजूद है। कहीं वह प्रिंट मीडिया है तो कहीं वह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। प्रिंट में भी दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक कई स्तर हैं तो इलेक्ट्रॉनिक में भी दृश्य और श्रव्य दोनों माध्यम हैं। न्यूज चैनलों की पूरी शृंखला है। ऐसे में लोगों के प्रति जवाबदेही से बचना मुश्किल है, खासकर किसी सरकारी प्रतिनिधि का। यही बंदिश शायद सरकार को रास नहीं आ रही है और उसने एक सुविधाजनक रास्ता अख्तियार कर लिया है। लेकिन अगर सरकार ने यही राह अपनाने का फैसला कर लिया है तो माना जाएगा कि वह मुख्यधारा के मीडिया की तो अनदेखी कर ही रही है, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेही का भी अनादर कर रही है।

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मीडिया का मित्र सोशल वीडियो

कैमरे ने सब कुछ बयान कर दिया और दोषियों को सींखचों के पीछे पहुंचा दिया।  कल्पना कीजिए पीडि़त बच्चों के माता-पिता कैमरे के फुटेज लेकर सीधे कानून का दरवाजा खटखटाते तो क्या होता। बहुत संभव है, पुलिस उन्हें टरका देती। मामला ही दर्ज नहीं करती। जैसा कि अक्सर होता है।

कुछ दिनों पहले यह खबर आपने पढ़ी होगी जिसमें कुछ वीडियो-चित्र भी छपे थे। इन चित्रों में आन्ध्र प्रदेश के एक स्कूल का प्रधानाचार्य तीन नेत्रहीन बच्चों को बेरहमी से पीट रहा था। बच्चे दर्द से चिल्ला रहे थे और रहम की गुजारिश कर रहे थे। मगर प्रधानाचार्य इन बच्चों को बेदर्दी से छड़ी लेकर पीटे जा रहा था। सभी बच्चे दस साल से भी कम उम्र के थे। खास बात यह कि प्रधानाचार्य स्वयं नेत्रहीन था। स्कूल के किसी कर्मचारी ने इस घटना की वीडियो रिकार्डिंग कर ली। वीडियो यू-ट्यूब पर साझाा हुआ तो लोगों को इस घटना का पता चला। प्रधानाचार्य और उसका साथ देने वाले स्कूल के सचिव को गिरफ्तार कर लिया गया।
इसी तरह कोलकाता के एक घर में महिला ट्यूटर ने तीन साल के मासूम बच्चे को बुरी तरह पीटकर जख्मी कर दिया। फिर बच्चे की मां को धमकाया कि पुलिस में शिकायत करने की गलती मत करना लेकिन जब कैमरे के चित्र मीडिया में प्रकाशित हुए तो ट्यूटर के होश ठिकाने आ गए। गिड़गिड़ाई, खूब माफी मांगी। मामला पुलिस में दर्ज हो गया। दरअसल, ट्यूटर की सारी करतूत घर में लगे सीसी टीवी कैमरे में कैद हो गई थी। एक तरफ केन्द्र सरकार बच्चों को पीटने वालों के खिलाफ कानून को कड़ा बनाने की तैयारी कर रही है वहीं दूसरी तरफ ऐसी घटनाओं में बढ़ोतरी बेहद दुखद है।
  कहने की जरूरत नहीं, अगर उपरोक्त घटनाओं के वीडियो या सीसी टीवी चित्र नहीं होते तो इन घटनाओं की किसी को भनक तक नहीं लगती। मीडिया को भी नहीं। न जाने कब से नेत्रहीन बच्चे प्रधानाचार्य के जुल्म सह रहे थे। तीन साल का मासूम भी ट्यूटर का जुल्म बयान करने में सक्षम नहीं था। कैमरे ने सब कुछ बयान कर दिया और दोषियों को सींखचों के पीछे पहुंचा दिया। सवाल है क्या अकेले कैमरे ने? क्या कैमरे में कैद केवल तस्वीरें ही पीडि़तों को न्याय दिलाने में पर्याप्त थी? या इन तस्वीरों के सार्वजनीकरण ने भी यह काम किया? कल्पना कीजिए पीडि़त बच्चों के माता-पिता कैमरे के फुटेज लेकर सीधे कानून का दरवाजा खटखटाते तो क्या होता। बहुत संभव है, पुलिस उन्हें टरका देती। मामला ही दर्ज नहीं करती। जैसा कि अक्सर होता है। पीडि़त ही बार-बार चक्कर काटते, परेशान होते। कई तरह के सवाल-जवाब उन्हीं से किए जाते। अपराधियों का बाल तक बांका नहीं होता। इन परेशानियों की कल्पना करके ही अनेक पीडि़त चुप लगाकर बैठ जाने में ही अपना भला समझाते हैं। भले ही उनके पास प्रामाणिक सबूत हों। शायद इन्हीं परिस्थितियों ने सोशल नेटवर्किंग को बहुत मजबूत कर दिया है। और कुछ नहीं तो आम जन तक तो उनकी शिकायत पहुंच ही जाएगी, यही सोच ऐसी कई घटनाओं को प्रामाणिक तौर पर सामने ला रही है जो पहले संभव नहीं थी, या बहुत मुश्किल थी।
  इसीलिए पिछले कुछ वर्षों में वीडियो या सीसी टीवी कैमरों का प्रचलन तेजी से बढ़ा है। सीसी टीवी का इस्तेमाल जहां आम तौर पर प्रतिष्ठानों, दुकान-शोरूम तथा महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक स्थलों पर अधिक है वहीं वीडियो कैमरे का इस्तेमाल आम हो चला है। मोबाइल फोन में वीडियो बनाने की सुविधा के कारण हर कोई वीडियो शूट कर लेता है। सामान्य श्रेणी के वीडियो भी घटनाओं की त्वरित रिकार्डिंग में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा जाते हैं। शौकिया तौर पर की गई वीडियोग्राफी और उसे सोशल नेटवर्किंग पर साझाा करने का प्रचलन लोकप्रियता की हदें छू रहा है। वीडियो रिकार्डिंग करके उसे मोबाइल फोन के जरिए आसानी से यू-ट्यूब पर साझाा किया जा सकता है। इसलिए केवल भारत में लाखों वीडियो रोजाना अपलोड किए जा रहे हैं। यू-ट्यूब पर दुनिया में हर मिनट लगभग सौ घंटे से भी अधिक समय के वीडियो साझाा किए जा रहे हैं। इनमें अनेक वीडियो अभिव्यक्ति और सूचनाओं का मजबूत माध्यम बनते जा रहे हैं। यह मुख्यधारा के मीडिया के लिए मित्रवत और महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। दिल्ली में चलती मेट्रो ट्रेन के खुले दरवाजे का वीडियो इसी का परिणाम है। मुम्बई में पहली बारिश में रिलायंस की मेट्रो में पानी टपकने का वीडियो भी पिछले दिनों राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खी बना था। ऐसी कई घटनाएं मीडिया में प्रकाशित और चर्चित हुई हैं जो किसी पत्रकार या मीडिया फोटोग्राफर की बजाय आम जन से सीधे या सोशल नेटवर्किंग के जरिए सामने आईं। मुख्य धारा के मीडिया के लिए यह शुभ संकेत है। इससे सूचनाओं के स्रोत का दायरा विस्तृत हो गया है। जो व्यक्ति पाठक या दर्शक है वही व्यक्ति पत्रकार भी हो सकता है। 'सिटीजन जर्नलिज्म' की अवधारणा यही है जो मीडिया को एक नई पहचान दिलाती है। मगर एक दूसरा पहलू भी है। सोशल नेटवर्किंग पर रोजाना लाखों की तादाद में वीडियो साझाा किए जा रहे हैं। कौन प्रामाणिक है और कौन नहीं, यह फैसला करना बहुत मुश्किल है। कई वीडियो अपरिपक्व व आधी-अधूरी सूचनाओं पर भी आधारित होते हैं। ऐसे में तथ्यों की प्रामाणिकता की जांच जरूरी है। मीडिया कर्मियों को इस संबंध में सचेत रहने की आवश्यकता है। हालांकि ऐसी तकनीकों पर दुनिया भर में काम चल रहा है जिनसे असली व नकली वीडियो की पहचान हो सकेगी। मानव अधिकारों के लिए कार्य करने वाली संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने सिटीजन एविडेंस लैब नामक एक वेबसाइट शुरू की है। इस वेबसाइट के जरिए इंटरनेट पर उपलब्ध वीडियो की प्रामाणिकता को जांचा जा सकेगा। अभी यह शुरुआती चरण में है। इसे कितनी सफलता मिलेगी, कहा नहीं जा सकता। फिर भी इंटरनेट के मायाजाल में तैरती करोड़ों वीडियो फिल्मों की सत्यता जानने की दिशा में यह एक स्वागत योग्य प्रयास है। ऐसे प्रयास जब तक पूरी तरह सफल न हों, तब तक सोशल नेटवर्किंग के जरिए मीडिया में फुटेज का उपयोग करते समय सावधानी तो बरतनी ही होगी।

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रोबोट और सॉफ्टवेयर पत्रकारिता

तो क्या रिपोर्टर के रूप में मानव पत्रकार की भूमिका खत्म हो जाएगी? आंकड़े, तथ्य, सूचनाओं आदि का जाल तो ठीक, भावनाओं और संवेदनाओं का क्या होगा? क्या विज्ञान, तकनीक, कम्प्यूटर, सॉफ्टवेयर का मायाजाल पत्रकारिता की नई परिभाषा गढ़ेगा?

अगर आपको कहें कि यूक्रेन में मलेशियाई विमान को मार गिराने की खबर सबसे पहले एक रोबोट ने 'ब्रेक' की तो आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी? यकीनन आप चौंक उठेंगे। हालांकि यह हकीकत नहीं सिर्फ कल्पना है दोस्तो लेकिन यह कल्पना आने वाले दिनों में शीघ्र हकीकत में बदल जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। विकसित देशों में रोबोट पत्रकारिता तेजी से बढ़ती जा रही है। अभी इसका उपयोग कारपोरेट कंपनियों से संबंधित आर्थिक खबरों में ही ज्यादातर किया जा रहा है लेकिन अन्य खबरों में भी जिस तरह रोबोट के प्रयोग किए गए हैं, उससे भविष्य की तस्वीर का अनुमान लगाया जा सकता है। रोबोट पत्रकारिता दुनिया भर के 'न्यूज रूम' में बढ़ रही है। विभिन्न विषयों के सॉफ्टवेयर तैयार किए जा रहे हैं। इन्हें पहले से तैयार डाटा टैम्पलेट में डालकर रोबोट के जरिए पेश किया जा रहा है।
रोबोट की दैत्याकार कार्य-क्षमता के सामने इन्सान बौना है। रोबोट सैकण्ड से भी कम समय में एक सम्पूर्ण न्यूज स्टोरी तैयार कर सकता है। विमान कहां गिरा, कितने बजे हादसा हुआ? घटना स्थल की लोकेशन क्या है, विभिन्न देशों से कितनी दूरी पर है। इसी क्षेत्र में पहले कितने विमान हादसे हुए। दुनिया भर में कब-कब, कहां-कहां यात्री विमानों पर हमले हुए- सब कुछ पलक झपकते तैयार। खबर की यह रफ्तार हो तो फिर रिपोर्टर की क्या जरूरत! घटना घटित होने पर जानकारी मिलते ही पूरा समाचार तैयार। शायद इसीलिए रोबोट को भविष्य का पत्रकार कहा जा रहा है।
 तो क्या रिपोर्टर के रूप में मानव पत्रकार की भूमिका खत्म हो जाएगी? आंकड़े, तथ्य, सूचनाओं आदि का जाल तो ठीक, भावनाओं और संवेदनाओं का क्या होगा? क्या विज्ञान, तकनीक, कम्प्यूटर, सॉफ्टवेयर का मायाजाल पत्रकारिता की नई परिभाषा गढ़ेगा? रोबोट पत्रकारिता के प्रवेश के साथ ही ये सवाल भी उठ रहे हैं।
रोबोट पत्रकारिता की वास्तविक शुरुआत इस वर्ष मार्च में अमरीकी अखबार 'द लॉस एंजलिस टाइम्स' ने की, जब उसने रोबोट की लिखी भूकम्प पर पहली खबर प्रकाशित की। रोबोट ने भूकम्प के दौरान तुरन्त स्वचलित रूप से एक छोटी-सी रिपोर्ट तैयार कर दी। करीब सौ-सवा सौ शब्दों की इस खबर की शुरुआत रोबोट ने इस तरह की- 'सोमवार की सुबह 6.25 बजे कैलिफोर्निया के वेस्टवुड से 5 मील दूर हल्का भूकम्प आया जिसकी तीव्रता 4.7 थी...' इस समाचार में सभी आवश्यक जानकारियां थीं। यहां तक कि समाचार स्रोत के तौर पर अमरीका के ज्योलॉजिकल सर्वे विभाग का हवाला भी दिया गया था। पत्रकार और प्रोग्रामर केन श्वेन्के के अनुसार यह खबर मात्र तीन मिनट में वेबसाइट पर प्रकाशित हो गई थी। श्वेन्के ने ही यह प्रोग्राम विकसित किया जो भूकंप के दौरान रोबोट को तत्काल सक्रिय कर देता है। भूकम्प के अलावा यह प्रोग्राम शहर में होने वाले अपराध की खबरों को भी तैयार करता है। श्वेन्के कहते हैं- रोबोट काफी समय बचाता है। कुछ खास तरह की खबरों के लिए यह उतनी ही अच्छी तरह सूचनाएं जुटाता है जैसे कि दुनिया में कोई और जुटाएगा।
  रोबोट और सॉफ्टवेयर पत्रकारिता की धारणा को कुछ सर्वेक्षणों ने और भी बल प्रदान कर दिया है। कुछ माह पूर्व 'जर्नलिज्म प्रैक्टिस' नामक एक जर्नल ने सॉफ्टवेयर पत्रकारिता पर एक अध्ययन जारी किया। इसमें एक ही विषय पर लिखी गई दो अलग-अलग खबरों की तुलना की गई थी। पहली खबर मानव-पत्रकार ने लिखी और दूसरी खबर सॉफ्टवेयर द्वारा लिखी गई थी। परिणाम आश्चर्यजनक रहा। जहां पत्रकार की खबर रोचक और सुसंगत थी, वहीं सॉफ्टवेयर की लिखी खबर तुलनात्मक रूप से ज्यादा तथ्यों वाली, ज्यादा वस्तुनिष्ठ और ज्यादा विश्वसनीय थी। अमरीकी पत्रकार डेरेक मीड के अनुसार पत्रकारिता की वर्तमान दिशा तकनीक में तब्दील हो रही है। हैरत की बात यह है कि आम पाठक के लिए दोनों खबरों में अन्तर करना मुश्किल हो रहा है। यह अध्ययन स्वीडन के कार्लस्टेड विश्वविद्यालय के क्रिस्टर क्लेरवाल द्वारा किया गया था।
  सॉफ्टवेयर पर पत्रकारिता की निर्भरता निरन्तर बढ़ रही है। हाल ही में एसोशिएटेड प्रेस ने घोषणा की कि वह 'वर्डस्मिथ' नामक स्वचलित सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करेगी। इस अन्तरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी के अनुसार वह प्रत्येक तिमाही में रोबोट लिखित 4,440 खबरें जारी करेगी। यह संख्या मानव पत्रकार लिखित खबरों से दस गुणा अधिक है। यह प्रारंभिक स्थिति है। पूरी क्षमता से जब रोबोट काम करेगा तो उसकी गति कई गुणा बढ़ जाएगी। फिलहाल ये खबरें कारपोरेट कंपनियों से संबंधित आर्थिक रिपोर्टें होंगी।
  इससे पूर्व याहू एक एप्प तैयार कर चुका है जिसका नाम है- समली। समली मूल पाठ को स्वत: ही संक्षिप्त अथवा सम्पादित करके उसमें खास बिन्दुओं को जोड़ देता है। यह तकनीक भी कई तरह की खबरों में मददगार है।
द लॉस एंजिलिस टाइम्स, एसोशिएटेड प्रेस, याहू जैसे दिग्गजों का सॉफ्टवेयर तथा रोबोट पत्रकारिता में प्रवेश तथा 'द गार्जियन', 'फोब्र्स' एवं कई अन्य मीडिया कंपनियों का इस क्षेत्र में प्रायोगिक परीक्षण और दिलचस्पी इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भविष्य की पत्रकारिता किस दिशा में जा रही है। शायद इसीलिए यह सवाल किया जा रहा है कि क्या रोबोट पत्रकार मानव पत्रकार से श्रेष्ठ साबित होंगे? साथ ही यह भी कि क्या रोबोट हमारी नौकरियां छीन लेंगे? प्रोग्रामर केन श्वेन्के कहते हैं- रोबोट की बनाई खबरें असली पत्रकारों की जगह नहीं लेंगी। रोबोट केवल उपलब्ध डाटा को जल्दी से जल्दी एकत्रित करने और उसे प्रसारित करने में मदद करेंगे। वे कहते हैं- 'मेरी नजर में रोबोट किसी की नौकरी नहीं लेगा बल्कि यह हर किसी की नौकरी को रुचिकर बनाएगा।' तकनीकी विषयों के वरिष्ठ लेखक विल ओरेमस के अनुसार- 'रोबोट अपनी खबरों में 'कौन', 'कहां', 'क्या', 'कब' जैसे सवालों के जवाब तो दे सकता है मगर 'क्यों' का जवाब सिर्फ मानव-पत्रकार के पास ही मिल सकता है। जाहिर है, जब तक 'क्यों' का जवाब नहीं मिल जाता तब तक लेखन अधूरा है। पाठक या दर्शक का जिज्ञासु मन कई प्रश्न को जन्म देता है जिनका जवाब देने की क्षमता सिर्फ मानव में है, कम्प्यूटर या किसी रोबोट में नहीं। रोबोट के लिए 'वर्डस्मिथ' सॉफ्टवेयर बनाने वाली कंपनी 'ऑटेमेटेड इनसाइट्स' के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रोबी एलन के अनुसार 'हमारी तकनीक किसी डाटा विश्लेषक का अनुकरण तो कर सकती है लेकिन यह किसी पत्रकार का अनुकरण नहीं कर सकती। इसलिए मुझे पत्रकारों के भविष्य को लेकर कोई संशय नहीं है।' रोबोट पत्रकारिता पर जाने-माने अमरीकी लेखक केविन रूज का तो यहां तक कहना है कि अगर हम अपने जीवन में लगातार एक जैसी चीजों को दोहराना चाहते हैं जिसमें दिमाग लगाने की कोई जरूरत नहीं तो हमें भी रोबोट बन जाना चाहिए।
साफ है तकनीक अभी तक इन्सान का कोई विकल्प नहीं खोज पाई है।

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सोशल मीडिया बनाम सरकार

 कोई शक नहीं सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले बढ़े हैं, तो वैसे ही इसका दुरुपयोग करने वाले भी बढ़े हैं। सवाल है कि क्या इसका एक मात्र उपाय 'बैन' लगाना है? विशेषज्ञों ने जो उपाय खोज निकाले हैं उनकी तरफ सरकार का ध्यान होना चाहिए।

  महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री अजित पवार ने विधानसभा में कहा कि सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगना चाहिए, क्योंकि सोशल मीडिया नफरत फैलाने का जरिया बन चुका है। फेसबुक पर आपत्तिजनक पोस्ट के मामले में गत दिनों पुणे के एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की हत्या कर दी गई थी। उप मुख्यमंत्री ने इसी संदर्भ में अपनी यह मांग केन्द्र सरकार के समक्ष रखी है।
इसमें दो राय नहीं कि धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने अथवा नफरत और हिंसा फैलाने के उद्देश्य से सोशल मीडिया का दुरुपयोग करने वालों पर रोक लगनी चाहिए। ऐसे असामाजिक तत्त्वों की पहचान करके उन्हें सजा भी मिलनी चाहिए। लेकिन अफसोस की बात है कि जब भी ऐसी कोई घटना घटित होती है, सत्ताधीश सोशल मीडिया पर बैन लगाने की मांग कर डालते हैं। मानों सोशल मीडिया के दुरुपयोग का एक ही रामबाण उपाय है कि उसे प्रतिबंधित कर दो। दो साल पहले उत्तर-पूर्व राज्यों के लोगों का देश के विभिन्न हिस्सों से पलायन की घटनाओं के बाद भी संसद में कुछ सांसदों ने सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाने की मांग की थी। पूर्व केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल सोशल मीडिया पर लगाम लगाने की अच्छी-खासी तैयारी कर चुके थे। परन्तु इसके विरोध के उठते स्वरों में उन्हें अपने कदम पीछे की ओर खींचने पड़े। सिब्बल ने कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं के खिलाफ सोशल नेटवर्किंग पर की गई विपरीत टिप्पणियों के चलते यह प्रयास किया था। यानी हिंसा और नफरत की आपराधिक घटनाओं से ही नहीं, राजनीतिक कारणों से भी सोशल मीडिया के पर कतरने की कोशिशें होती रही हैं।
कोई शक नहीं जैसे सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले बढ़े हैं, वैसे ही इसका दुरुपयोग करने वाले भी बढ़े हैं। सवाल है कि क्या इसका एक मात्र उपाय 'बैन' लगाना है? कानूनी और इससे भी बढ़कर तकनीकी उपायों पर गंभीरता से बात क्यों नहीं की जाती है? जहां तक कानूनी उपाय की बात है, उसके लिए सूचना तकनीक कानून की धारा ६६-ए मौजूद है। पर यह भी सच्चाई है कि शासन ने अब तक इस कानून का दुरुपयोग ही अधिक किया है।
आपको कई घटनाएं याद होंगी। कैसे महाराष्ट्र में ठाणे की पुलिस ने दो निर्दोष लड़कियों को रात में घर से उठाकर थाने में बंद कर दिया था। इनमें एक लड़की ने बाल ठाकरे के निधन पर मुम्बई बंद पर फेसबुक पर अपनी राय जाहिर की थी और दूसरी लड़की ने उसे 'लाइक' किया था। प. बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का उदाहरण भी आपको याद होगा। जाधवपुर यूनिवर्सिटी के दो प्रोफेसरों को सिर्फ इसलिए जेल भेज दिया था कि उन्होंने मुख्यमंत्री का कार्टून बनाकर फेसबुक पर डाल दिया था। कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की गिरफ्तारी में भी धारा ६६-ए का दुरुपयोग किया गया था। बाद में इस धारा के इस्तेमाल पर पुलिस के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कुछ दिशा-निर्देश भी तय किए। इससे सायबर अपराधों पर अंकुश लगाने में कुछ हद तक मदद मिली है। फिर भी सोशल मीडिया के दुरुपयोग को रोकने में सूचना तकनीक कानून अपर्याप्त है। इसका मतलब यह भी नहीं कि सोशल मीडिया का दुरुपयोग केवल 'बैन' लगाकर ही रोका जा सकता है। सरकारों को यही एक मात्र उपाय क्यों सूझता है? उनका ध्यान पता नहीं उन उपायों पर क्यों नहीं जाता जो सायबर विशेषज्ञ सुझाते रहे हैं। इन उपायों से गलत सूचनाएं देने वाले असामाजिक तत्त्वों की कुछ हद तक पहचान की जा सकती है। हालांकि अभी विस्तृत अनुसंधान और शोध कार्य बाकी है। लेकिन फेसबुक, ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग पर झाूठ को पकड़ने के लिए यूरोपीय देशों में लाइ डिटेक्टर पर काम किया जा रहा है। इस प्रणाली से यह विश्लेषण किया जा सकेगा कि ऑनलाइन पोस्ट सत्य है या असत्य। यह भी पता चलेगा कि जिस अकाउंट से पोस्ट किया गया है, कहीं वो गलत सूचनाएं फैलाने के लिए तो नहीं बनाया गया है।
 कहा जा रहा है कि सोशल मीडिया का दुरुपयोग करने वालों पर प्रभावी जवाबी कार्यवाही के लिए सरकारों व पुलिस-प्रशासन की मदद करने के उद्देश्य से यह प्रणाली विकसित की जा रही है। इस अनुसंधान से यूरोपीय देशों के पांच विश्वविद्यालय जुड़े हैं। इनमें ब्रिटेन के शेफील्ड विश्वविद्यालय की मुख्य शोधकर्ता डा. कैलिना बोनशेवा के अनुसार यह लाइ डिटेक्टर सूचनाओं के स्रोत को वर्गीकृत करेगा जिससे उनके सच को जांचा-परखा जा सके। डा. कैलिना के अनुसार इस सिस्टम के खोज के परिणाम एक विजुअल डैशबोर्ड पर दिखाई देंगे ताकि यूजर जान सके कि कहीं यह अफवाह तो नहीं। सच-झाूठ को पकड़ने या अफवाह फैलाने वालों की पहचान करने में यह प्रणाली सफल होगी- यह भरोसा खोजकर्ताओं को है। एकबारगी इसमें अंदेशा भी हो तो भी सरकारों के लिए यह अच्छी खबर है। खासकर, उनके लिए जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में भरोसा रखती हैं।
सायबर विशेषज्ञों ने अब तक जो उपाय खोज निकाले हैं उनकी तरफ सरकार का ध्यान होना चाहिए। इस क्षेत्र में जो अनुसंधान हो रहे हैं उसमें भी दिलचस्पी रखी जानी चाहिए। सरकारों को सोशल मीडिया का दुरुपयोग रोकने के वैकल्पिक उपायों पर ज्यादा जोर देना चाहिए न कि उस पर बैन लगाने के। केन्द्र की नई सरकार सोशल मीडिया समर्थक बताई जाती है। इसलिए उससे ऐसी उम्मीद करना बेमानी नहीं।
नेता का मुखौटा
टीवी पर 'लाइव' बहस के दौरान कई बार राजनेताओं की समझदारी का मुखौटा उतर जाता है। बात भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी की है। ए.बी.पी. न्यूज पर 'आप' पार्टी के प्रतिनिधि पर वे ऐसे उखड़े कि भाषा और तहजीब की मर्यादाएं भूल गए। आप प्रतिनिधि ने भ्रष्टाचार के किसी मामले में अरुण जेटली की चुप्पी पर नकवी से सवाल पूछा। नकवी उस पर स्क्रीन पर ही बरस पड़े- जेटली तुम्हारे बाप के नौकर नहीं हैं। एंकर की टोकाटोकी के बीच नकवी बोलते ही चले गए और यह वाक्य दोहराते रहे। यही नहीं उन्होंने आप के पेनलिस्ट को 'बेइमान' और 'बदतमीज' के विशेषणों से भी अलंकृत कर डाला।

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हिन्दी मीडिया के लिए खास दिन

 हिन्दी केवल सम्प्रेषण या अभिव्यक्ति का माध्यम भर नहीं है। यह एक विशाल समाज की संस्कृति को जानने-समझने का महत्त्वपूर्ण जरिया भी है।
बीते माह पत्रकारिता से जुड़े दो महत्त्वपूर्ण दिवस गुजरे। माह की शुरुआत (3 मई) प्रेस स्वतंत्रता दिवस से हुई जिसकी चर्चा इस स्तंभ में की गई थी। माह का अन्त (30 मई) हिन्दी पत्रकारिता दिवस से हुआ। हालांकि दोनों अवसरों पर पत्रकारिता-जगत में कुछ खास हलचल देखने को नहीं मिली लेकिन मीडिया चाहे तो इन अवसरों का पूरा लाभ उठा सकता है। 3 मई जहां मीडिया की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी को परखने का एक वैश्विक अवसर है तो 30 मई का संबंध भी भारत में  विशाल पाठक समूह से है। इस बहाने हम हिन्दी पत्रकारिता से जुड़े विविध मसलों पर विमर्श कर सकते हैं। देखा जाए तो अपने पाठक-श्रोता-दर्शक के विराट समूह के प्रति विश्वास और प्रतिबद्धता के मूल्यांकन का यह सुनहरा अवसर हो सकता है।
यह सही है कि 30मई का सीधा संबंध हिन्दी के अखबारों से है लेकिन जिस घटना से यह प्रेरित है वह पूरे हिन्दी मीडिया जगत के लिए महत्त्वपूर्ण है। चाहे प्रिन्ट हो या इलेक्ट्रॉनिक या फिर सोशल मीडिया ही क्यों न हो! जो भी हिन्दी पत्रकारिता के दायरे में आता है, उन सबके लिए इसका महत्त्व है। 30  मई 1826  यानी 188 वर्ष पूर्व हिन्दी का पहला अखबार कोलकाता से निकला था- 'उदंत मार्तंड'। पं. जुगल किशोर शुक्ला के संपादकत्व में यह अखबार एक साल बाद बंद हो गया था लेकिन हिन्दी में पत्रकारिता की लौ प्रदीप्त कर गया। उस वक्त रेडियो, टीवी नहीं थे। लिहाजा इसे क्यों नहीं सम्पूर्ण हिन्दी पत्रकारिता का प्रस्थान बिन्दु कहा जाए? 'उदन्त मार्तंड' की प्रकाशन तिथि 30 मई हिन्दी पत्रकारिता दिवस बन गई। दुर्भाग्य से यह दिवस कुछ औपचारिक सभा-संगोष्ठियों से अधिक महत्त्व नहीं पा सका है। हिन्दी में पत्रकारिता सिखाने वाले संस्थान और विश्वविद्यालयों के विभाग भी कुछ खास नहीं कर पाए हैं। बेहतर होगा कि हिन्दी में पत्रकारिता करने वाले मीडिया के सभी रूप- जिनमें अखबार, टीवी चैनल, सामुदायिक रेडियो, सोशल मीडिया आदि शामिल हैं- मिलकर इस दिशा में प्रयास करें। अखबार और समाचार-चैनल सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। देश में सबसे बड़ा पाठक-श्रोता-दर्शक समूह हिन्दी में है। हिन्दी केवल सम्प्रेषण या अभिव्यक्ति का माध्यम भर नहीं है। यह एक विशाल समाज की संस्कृति को जानने-समझने का महत्त्वपूर्ण जरिया भी है। इसलिए हिन्दी मीडिया यह देखे कि इस समाज की जरूरतें और आकांक्षाएं क्या हैं। उसकी मीडिया से क्या अपेक्षाएं हैं। उन अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए उसे जो कुछ करना चाहिए, क्या वह कर रहा है? खबरों की विश्वसनीयता का स्तर क्या है तथा जो सामग्री वह अपने पाठकों-श्रोताओं को दे रहा है, उसके प्रति उनका क्या नजरिया है। भाषाई मीडिया के बारे में भी उसे अपनी जानकारी पुख्ता करनी होगी। उसकी अच्छाइयों को आत्मसात करने की जरूरत है तो कमियों से सबक लेने की।
 हिन्दी मीडिया को अंग्रेजी मीडिया की पेशेगत कुशलता और गुणवत्ता से तुलनात्मक आकलन करना होगा। साथ ही उसकी बुराइयों से दूर रहना होगा। अनुकरण और अनुवाद की निर्भरता से छुटकारा पाने की जरूरत है। भाषा को लेकर हिन्दी मीडिया को स्व-मूल्यांकन करना निहायत जरूरी है। नई पीढ़ी के नाम पर जो भाषा वह परोस रहा है, उसके दीर्घकालीन परिणामों पर भी उसकी निगाह होनी चाहिए। मेधावी युवा हिन्दी मीडिया में अपना भविष्य क्यों नहीं देखता, इस पर विचार हो। हिन्दी पत्रकार को प्रशिक्षण के बेहतरीन अवसर सुलभ हों। संवाद-सम्प्रेषण के लिए उसके पास आधुनिक संसाधन हों। दरअसल, हिन्दी मीडिया के लिए करने को इतने काम हैं कि उनकी एक लम्बी सूची गिनाई जा सकती है। सवाल यह है कि सुधार और मूल्यांकन का काम साल में केवल एक विशेष दिवस पर ही क्यों हो- हर दिन क्यों न हो? ठीक बात है। स्व-मूल्यांकन निरन्तर चलने वाली एक सतत प्रक्रिया है इसके बावजूद दिवस-विशेष से इसे जोड़ कर देखना जरूरी है। ये दिवस हमें न केवल प्रेरित करते हैं बल्कि निरन्तर बेहतर करने के लिए सजग भी रखते हैं। हिन्दी पत्रकारिता दिवस एक महत्त्वपूर्ण अवसर है। हिन्दी मीडिया-जगत के लिए तो खास तौर पर। क्यों न हम इसे वर्ष का एक यादगार दिवस बना दें।
ब्रेकिंग न्यूज!
समाचार चैनल कभी-कभी बड़ी गलतियां कर जाते हैं। नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री मनोनीत होने पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि पर पुष्प अर्पित करने राजघाट गए। सभी समाचार चैनलों ने कवरेज की । हिन्दी के एक समाचार चैनल ने भी रिपोर्ट दिखाई। नरेन्द्र मोदी पुष्पांजलि अर्पित कर रहे थे। पूरे परदे पर दृश्य था। तभी बड़े-बड़े शब्दों में लिखा हुआ फोटो-शीर्षक प्रकट हुआ- मोदी की समाधि पर नरेन्द्र मोदी। यह बाकायदा 'ब्रेकिंग न्यूज' थी जो कई देर तक चली। बाद में संभवत: ठीक कर ली गई।

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एग्जिट पोल और चुनाव नतीजे

अंतिम मतदान और चुनाव परिणाम की घोषणा के बीच का अधिकांश समय मीडिया में विभिन्न एजेंसियों के एग्जिट पोल पर केन्द्रित विश्लेषणों में गुजरा। एग्जिट पोल कितने उपयोगी और खरे हैं, इस पर फिर बहस हुई।
मतदान करने के बाद हर कोई जानने को उत्सुक रहता है कि चुनाव परिणाम क्या होगा। एग्जिट पोल की संरचना शायद इसीलिए हुई होगी। १२ मई की शाम अब तक का सबसे लम्बा लोकसभा चुनाव सम्पन्न होते ही टीवी चैनलों पर एग्जिट पोल की झाड़ी लग गई। लोगों ने भी इन्हें रुचि लेकर देखा और पढ़ा। नौ चरणों के मतदान की प्रतीक्षा काफी उबाऊ हो चली थी। अंतिम मतदान के बाद सबकी नजरें चुनाव परिणामों पर टिकी थी। इसमें दो राय नहीं कि लोगों की जिज्ञासा का सम्पूर्ण समाधान १६ मई के चुनाव परिणामों से ही हुआ। इस बार देश के करीब ५५ करोड़ नागरिकों ने मतदान में हिस्सेदारी निभाई थी। अंतिम मतदान और चुनाव परिणाम की घोषणा के बीच का अधिकांश समय मीडिया में विभिन्न एजेंसियों के एग्जिट पोल पर केन्द्रित विश्लेषणों में गुजरा। एग्जिट पोल कितने उपयोगी और खरे हैं, इस पर बहस हुई। एग्जिट पोल हमेशा बहस और विवाद का विषय रहे हैं। यहां हम यह जानते हैं कि गत चार माह के दौरान देश में हुए दो चुनावों के दौरान एग्जिट पोल की भूमिका क्या रही। नवम्बर-दिसम्बर 2013 में पांच राज्यों के चुनाव के बाद अप्रेल-मई 2014 में लोकसभा चुनाव हुए। विधानसभा चुनाव के दौरान मुख्यत: पांच एग्जिट पोल सामने आए। ये थे- इंडिया टुडे- ओ.आर.जी., टाइम्स नाऊ- सी वोटर, आई.बी.एन.7- सी.एस.डी.एस., ए.बी.पी.- नीलसन और टुडेज- चाणक्य। लोकसभा चुनाव के दौरान मुख्यत: छह एग्जिट पोल रहे। ये थे- टाइम्स नाऊ-ओ.आर.जी., सी.एन.एन.आई.बी.एन.- सी.एस.डी.एस., हेडलाइन्स टुडे- सिसरो, ए.बी.पी.- नीलसन, न्यूज 24-टुडेज चाणक्य और सी वोटर-इंडिया टीवी।
लोकसभा चुनाव में सभी एग्जिट पोल में भाजपा नीत एन.डी.ए. को आगे और कांग्रेस नीत यू.पी.ए. को पीछे बताया गया। यहां तक कि सभी सर्वेक्षणों में एन.डी.ए. को पूर्ण बहुमत मिलता बताया गया। केवल टाइम्स नाऊ- ओ.आर.जी. के सर्वेक्षण ने एन.डी.ए. को पूर्ण बहुमत (272) के आंकड़े से दूर (257) रखा। हालांकि यू.पी.ए. को इसने भी काफी पीछे (135) माना। लेकिन नरेन्द्र मोदी या भाजपा के पक्ष में लहर का अनुमान कोई भी नहीं लगा पाया सिवाय एक सर्वेक्षण एजेन्सी के। न्यूज-24 टुडेज चाणक्य ने अकेले भाजपा को पूर्ण बहुमत के आंकड़े से काफी आगे (291) पहुंचा दिया जो चुनाव परिणाम (282) के करीब रहा। इसी सर्वे में एन.डी.ए. को 340 सीटें दी गईं जो अनुमान के काफी करीब 336 (चुनाव परिणाम) रही। लेकिन कांग्रेस की इतनी दुर्गति होगी, इसका अनुमान कोई नहीं लगा पाया। यू.पी.ए. के लिए सर्वाधिक उदार टाइम्स नाऊ का सर्वे रहा जिसने उसे 135 सीटें दी। लेकिन कांग्रेस को सभी ने दो अंकों में ही समेट कर रखा। जहां तक तीसरे मोर्चे या अन्य का सवाल है तो इनके हिस्से में आई सीटों 148 (चुनाव परिणाम) के आस-पास ही प्राय: सभी सर्वेक्षणों के निष्कर्ष रहे। सी.एन.एन.आई.बी.एन.- सी.एस.डी.एस. का एग्जिट पोल को ही अपवाद (170) कह सकते हैं। लोकसभा चुनाव के संदर्भ में अगर इन एग्जिट पोल का आकलन करें तो यह कहना पड़ेगा कि सोलहवीं लोकसभा की तस्वीर कैसी बनेगी, इसका काफी हद तक आभास मतदाताओं को मिल चुका था। बाद में चुनाव परिणाम ने इसकी पुष्टि भी की। यह जरूर है कि भाजपा के प्रति मतदाता ऐसा ऐतिहासिक रुझान दिखाएंगे- यह आकलन एग्जिट पोल नहीं कर सके। लेकिन यह आकलन तो कोई नहीं कर सका था।
भाजपा भी नहीं। एग्जिट पोल लोगों की जिज्ञासाओं को सहलाने का काम कर सकते हैं। शान्त करने का नहीं। एग्जिट पोल चुनाव परिणाम की दिशा बता सकते हैं। और यही एग्जिट पोल ने किया। दिसम्बर माह में हुए पांच राज्यों के चुनावों में भी यही हुआ था। एग्जिट पोल के निष्कर्ष चुनाव नतीजों के काफी करीब रहे। लगभग सभी सर्वे में बताया गया कि दिल्ली में शीला दीक्षित और राजस्थान में अशोक गहलोत की कांग्रेस सरकारें खतरे में हैं। हालांकि दिल्ली और राजस्थान में दलों की सीटों के आकलन में ज्यादातर सर्वेक्षण गड़बड़ाए लेकिन हार-जीत के नतीजे कमोबेश वही रहे जो चुनाव परिणाम में सामने आए। छत्तीसगढ़ में भाजपा-कांग्रेस के बीच कड़ा मुकाबला बताया गया। इसके बावजूद सभी सर्वेक्षणों में भाजपा को बढ़त बताई गई थी। मध्य प्रदेश में सभी एग्जिट पोल में भाजपा की सत्ता में वापसी दर्शाई गई थी। यह दूसरी बात है कि दो-तिहाई सीटों से वापसी का अनुमान सिर्फ एक सर्वे ही लगा पाया। दिल्ली में हालांकि 'आप' पार्टी को लेकर ज्यादातर सर्वेक्षण सही अनुमान नहीं लगा पाए थे लेकिन त्रिशंकु विधानसभा के संकेत जरूर दे दिए थे। राजस्थान में जिस कदर कांग्रेस की दुर्गति हुई, उसका अनुमान कोई एग्जिट पोल नहीं लगा पाया। भाजपा की वापसी के मामले में सबके निष्कर्ष समान थे।
   एक बार फिर यही कि एग्जिट पोल चुनाव परिणाम की केवल दिशा बताते हैं, नतीजे नहीं। यह सही है कि दिशा बताने में भी एग्जिट पोल पूर्व में कई बार चूके हैं इसके बावजूद लोकतांत्रिक ढांचे में इन सर्वेक्षणों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में जो उपयोगिता है, वह बनी रहेगी।

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संस्कृत को आधुनिक परिवेश से जोडऩा होगा : प्रो. शास्त्री

साक्षात्कार
'संस्कृत को जब तक हम आधुनिक परिवेश में नहीं देखेंगे और नए संदर्भ से नहीं जोड़ेंगे, तब तक संस्कृत का सुधार  नहीं होगा।'
यह कहना है, राष्ट्रीय संस्कृत आयोग के अध्यक्ष, जाने-माने विद्वान, संस्कृत के प्रथम भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त लेखक और पद्मभूषण  से सम्मानित प्रो. सत्यव्रत शास्त्री का।
 आम धारणा है कि सरकारी आयोग अथवा संस्थान बंधे-बंधाए ढांचे और लीक पर चलने के अभ्यस्त होते हैं। किसी नएपन की उम्मीद उनसे नहीं की जाती। प्रो. शास्त्री इससे उलट उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। वे संस्कृत आयोग के कामकाज और भूमिका को प्रासंगिक बनाना चाहते हैं। इसलिए संस्कृत के महत्त्व व उपयोगिता को नए सिरे से परिभाषित करते हैं। राष्ट्रीय जन-जीवन में उपेक्षित हो चली संस्कृत की महत्ता को प्रतिष्ठापित करने के लिए वे ८४ वर्ष की आयु में भी किसी युवा की तरह संकल्पबद्ध नजर आते हैं।
हाल ही में वे जयपुर आए तो उनसे मुलाकात का सुयोग मिला। वे धाराप्रवाह बोलते हैं। उनकी स्मरण शक्ति गजब है। श्लोक, कविताएं, उद्धरण आदि उन्हें खूब याद रहते हैं। बातचीत में वे इनका भरपूर उपयोग करते हैं। वे संस्कृत के परम्परागत पंडितों से अलग दिखाई पड़ते हैं और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की गतिविधियों पर पूरी पकड़ रखते हैं। केन्द्र सरकार ने ५८ साल बाद संस्कृत आयोग का फिर से गठन किया। दिसंबर २०१३ में आयोग बनाया गया और उन्हें अध्यक्ष पद का उत्तरदायित्व सौंपा। वे बताते हैं, १९५६ में पं. जवाहर लाल नेहरू की सरकार ने पहला संस्कृत आयोग गठित किया था। उस दौर का भारत अलग था। अब नया भारत है। आज की आवश्यकताएं बदल गई हैं। इसलिए आयोग को भी अपना नजरिया बदलना होगा। देश में संस्कृत की रीति-नीति निर्धारित करने का आयोग पर वृहत्तर उत्तरदायित्व है। प्रो. शास्त्री संस्कृत आयोग की भूमिका और उद्देश्य को लेकर स्पष्ट दृष्टिकोण रखते हैं। वे आयोग को वैचारिक उदारता और समन्वयवादी स्वरूप देना चाहते हैं, जो आज की परिस्थितियों के अनुकूल हो। वे संस्कृत की रीति-नीति निर्धारित करने में देश में व्यापक जन-भागीदारी के समर्थक हैं। उन्होंने एक प्रश्नावली तैयार करवाई है जो देश भर में संस्कृत विद्वानों, संस्थाओं और संस्कृत में रुचि रखने वाले प्रत्येक समूह को भेजी जा रही है। वे चाहते हैं कि संस्कृत को आधुनिक संदर्भों से जोडऩे के लिए आयोग को पर्याप्त संख्या में सुझााव प्राप्त हो। उनका मानना है कि संकीर्ण और कट्टरपंथी दुराग्रहों से संस्कृत का नुकसान ही अधिक हुआ है। जब तक हम संस्कृत को आधुनिक परिवेश में नहीं देखेंगे, तब तक सुधार नहीं होगा। आज के वैश्विक युग में वही भाषा टिक सकती है जो समय की जरूरतों को पूरा करे।
तो क्या संस्कृत में आज की आवश्यकताओं को पूरा करने का सामथ्र्य है?
'बिल्कुल है। संस्कृत अत्यन्त समृद्ध भाषा है। आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की ऐसी कोई शाखा-प्रशाखा नहीं है जो संस्कृत में मौजूद नहीं।' वे कहते हैं, संस्कृत में विशाल साहित्य लिखा गया है। संस्कृत में खगोल शास्त्र है, गणित है, नक्षत्रों के बारे में समृद्ध जानकारियां हैं। कृषि विज्ञान पर अनेक ग्रंथ लिखे गए हैं। संस्कृत में पेड़-पौधों के बारे में इतनी विस्तृत सूचनाएं हैं जो संभवत: आज के वनस्पति शास्त्र (बोटनी) में भी नहीं होगी। संस्कृत में हवाई जहाज (विमान शास्त्र) पर सदियों पहले ग्रंथ लिखे गए हैं। चिकित्सा-विज्ञान में तो भरपूर साहित्य है। लाखों ग्रंथ पांडुलिपियों के रूप में मौजूद हैं जिनका अभी पूरी तरह से अध्ययन ही नहीं हुआ है। वे बताते हैं कि भारत सरकार के पास ५० लाख पांडुलिपियों की सूचना है जिनमें अकेले संस्कृत की ३० लाख पांडुलिपियां हैं। इनमें ज्ञान-विज्ञान की भरपूर सामग्री समाहित है।
प्रो. शास्त्री मानते हैं कि एक भाषा के रूप में संस्कृत में वे तमाम संभावनाएं हैं जिनकी आज जरूरत है। कमी इस बात की है कि हम संस्कृत में निहित शक्ति और संभावनाओं को आज के समाज के साथ जोड़ कर नहीं चल पा रहे।
'क्या इसीलिए संस्कृत समाज से कट गई है? आज का युवा संस्कृत में भविष्य और रोजगार की संभावनाएं क्यों नहीं देखता?'
'क्योंकि हमने संस्कृत को परम्परागत शिक्षण और कर्मकांड तक सीमित करके रख दिया है। या फिर संस्कृत शिक्षा को इतना दुरुह बना दिया है कि सीखने की रुचि ही खत्म हो जाए। युवा पीढ़ी संस्कृत में तब तक उदासीन रहेगी, जब तक हम संस्कृत को आज की जरूरतों और भविष्य की संभावनाओं से नहीं जोड़ देते। संस्कृत को कम्प्यूटर से जोड़ा जाए। संस्कृत का की-बोर्ड बन गया है, लेकिन उसे संचालित करने वाले ऑपरेटर नहीं है। हमें संस्कृत शिक्षा और आधुनिक सूचना तकनीक के बीच तालमेल बिठाना होगा। संस्कृत शिक्षण भी सरल बनाना होगा।' प्रो. शास्त्री का स्पष्ट मत है कि संस्कृत में रोजगार की संभावनाएं कम नहीं हैं। अगर हम उन पर विचार करें तो कई नए द्वार खुल सकते हैं। संस्कृत का एक अन्तरराष्ट्रीय स्वरूप है। हम इसे पर्यटन से भी जोड़ सकते हैं। जैसे चीन, जापान और कंबोडिया, ताइवान, थाईलैंड आदि द. पूर्व एशियाई देश भारत में धार्मिक पर्यटन के लिए खूब आते हैं। वे भारत में बुद्ध से संबंधित स्थलों का भ्रमण करते हैं। इन पर्यटकों को यह कमी बहुत खलती है कि इन धर्म स्थलों की जानकारी कोई उन्हें अपनी भाषा में बताए। हम युवा पर्यटक गाइड तैयार कर सकते हैं। इसके लिए संस्कृत विद्यार्थियों को इन देशों की भाषाओं का ज्ञान कराया जाना चाहिए। संस्कृत विद्यार्थी के लिए इनकी भाषा सीखना बहुत आसान है। क्योंकि द.पूर्व एशियाई देशों की भाषा में संस्कृत के शब्द बहुतायत में है।
चीनी भाषा में संस्कृत के ३६०० शब्द हैं। संस्कृत जानने वाला थाईलैण्ड की भाषा समझा सकता है। साथ ही संस्कृत की शिक्षण प्रक्रिया भी सरल करनी होगी। हमें बच्चे की समझा और रुझाान को देखना होगा और भारी-भरकम शब्दों की बजाय सरलीकरण पर जोर देना होगा। प्रो. शास्त्री उदाहरण से समझााते हैं— 'बच्चे को संस्कृत का ज्ञान शुरू में उन शब्दों से कराएं जिनसे वह परिचित है। जैसे गौ (गाय) जंगल (वन), घास (चारा) आदि शब्दों से निर्मित वाक्य— गो जंगले घासं खादति। इस वाक्य का हर शब्द बच्चा जानता है। इसी तरह दूध के लिए संस्कृत का दुग्ध बच्चे का परिचित शब्द है। ऐसे जाने-माने शब्दों का उपयोग करके पाठ्यक्रम तैयार हो तो संस्कृत सीखना उसके लिए आसान होगा और वह सीखने में रुचि भी लेगा।'
प्रो. शास्त्री कहते हैं कि संस्कृत शिक्षा को भारतीय भाषाओं से जोड़ा जाए। प्रत्येक भारतीय इससे जुड़ेगा। संस्कृत जानने वाला अधिकांश भारतीय भाषाओं को समझा सकता है चाहे मराठी हो या तेलुगु, मलयालम हो या कन्नड़, तमिल हो या बंगाली या फिर उडिय़ा—सभी में संस्कृत की बड़ी हिस्सेदारी है। इन भाषाओं को संस्कृत परस्पर जोड़ती है। संस्कृत सारी भाषाओं की कड़ी है। इसीलिए राष्ट्रीय जन-जीवन में सर्व-स्वीकार्य है।
प्रो. शास्त्री न केवल संस्कृत आयोग अध्यक्ष के रूप में बल्कि एक विद्वान के तौर पर भी संस्कृत को आधुनिक जन-जीवन से जोडऩे के प्रबल पक्षधर हंै। २९ सितंबर १९३० को जन्मे प्रो. शास्त्री का सम्पूर्ण जीवन संस्कृत के प्रचार-प्रसार में समर्पित रहा है। उन्होंने १९५५ में दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य शुरू किया। अपने चालीस वर्ष के कार्यकाल में उन्होंने विभागाध्यक्ष व कला संकायध्यक्ष का पदभार भी संभाला। वे जगन्नाथ विश्वविद्यालय, पुरी के कुलपति भी रहे। उन्होंने जर्मनी, कनाडा, बेल्जियम, फ्रांस, अमरीका, इंग्लैण्ड सहित द. पूर्वी एशियाई अनेक देशों में भ्रमण किया और संस्कृत के प्रसार में योगदान किया। उन्होंने थाईलैण्ड के राजपरिवार को संस्कृत शिक्षा से जोड़ा और वहां के शिल्पाकोर्न विश्वविद्यालय में संस्कृत अध्ययन केन्द्र खुलवाया। उनको संस्कृत सेवाओं के लिए थाईलैण्ड, इटली, रोमानिया और कनाडा के कई महत्वपूर्ण पुरस्कार मिल चुके हैं। देश में ही उनके नाम पुरस्कार और मान-सम्मान तथा अलंकरणों की एक लम्बी फेहरिस्त है। उनके नाम करीब ६५ पुरस्कार दर्ज हैं। संस्कृत साहित्य रचनाओं में उनका अविस्मरणीय योगदान है। उन्होंने संस्कृत और अंग्रेजी में गद्य और पद्य में अनेक पुस्तकें लिखी हैं। उनमें सर्वाधिक चर्चित पुस्तक 'श्रीरामकीर्ति महाकाव्यम्' है जिसके लिए उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।
वे मानते हैं कि हमारे अतीत को समझाने के लिए ही नहीं, अन्य भारतीय भाषाओं को जानने-समझाने के लिए भी संस्कृत का ज्ञान आवश्यक है। संस्कृत के जरिए ही हम कई देशों की जड़ों को पहचान सकते हैं। संस्कृत आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी सदियों पहले थी।
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