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छपे हुए शब्दों का असर

चिंतक लुई बोर्खेज के अनुसार-मनुष्य के ढेर सारे आविष्कारों में किताबें सर्वाधिक विस्मयकारी आविष्कार है। दूसरे आविष्कारों से हमारे शरीर का विस्तार होता है। सिर्फ किताबें ही हैं, जो हमारी कल्पनाओं और स्मृतियों को विस्तार देती हैं। बोर्खेज के कथन को किताबों तक सीमित रखने की बजाय हम इसे प्रिंट मीडिया पर भी लागू कर सकते हैं।


यह सही है कि युवा पीढ़ी डिजीटल प्रेमी है। लेकिन साहित्य के मामले में वह अब भी छपे हुए शब्दों पर ज्यादा भरोसा करती है। कम-से-कम जयपुर साहित्य उत्सव से तो यही लगा। पांच दिवसीय इस उत्सव में युवाओं की भागीदारी बड़ी तादाद में थी। लेखकों को सुनने और उनसे संवाद करने में युवा सबसे आगे रहे।
अक्सर यह कहा जाता है कि नई पीढ़ी किताबों से दूर होती जा रही है। उसका पढऩा-लिखना डिजीटल दुनिया में सिमट कर रह गया है। साहित्य उत्सव में आए अमरीकी लेखक गैरी शेंटनहार्ट ने तो एक सत्र के दौरान ही कहा—अमरीका में लेखक ज्यादा और पाठक कम हैं। क्योंकि युवा किताबें बिल्कुल नहीं पढ़ते। उन्होंने बाकायदा आंकड़ा देकर चौंकाया— अमरीका में 17 मिलियन रायटर हैं जबकि पाठक हैं महज 60 हजार। संभव है शेंटनहार्ट के बयान में अतिशयोक्ति हो। उनके कथन का एक आशय यह भी हो कि अमरीकी युवा पीढ़ी लेखकों को पढ़ती तो है, लेकिन किताबों की बजाय डिजीटल माध्यमों से। शायद यही वजह है कि अमरीका में किताबों और पत्र-पत्रिकाओं के डिजीटल संस्करण खासे लोकप्रिय हैं। पिछले दिनों 80 साल पुरानी साप्ताहिक पत्रिका 'न्यूजवीक' का प्रिंट संस्करण बंद हो गया। यह पत्रिका अब सिर्फ ऑनलाइन उपलब्ध है। अमरीका में मानो कोई फर्क नहीं पड़ा। लेकिन भारत में अभी यह स्थिति नहीं आई है। आप आश्वस्त हो सकते हैं, युवा पीढ़ी किताबों और छपे माध्यमों से इतनी दूर नहीं गई है। वह किताबों या कहें साहित्य को गंभीरता से जांच-परख रही है। स्वयं भी लिख-पढ़ रही है। अनेक विधाओं में सृजन कर रही है। छपे हुए शब्दों का असर कायम है। यहां प्रिंट माध्यमों का भविष्य फिलहाल सुरक्षित है। इसलिए प्रकाशन व्यवसाय की चमक बढ़ी है। भारत देशी-विदेशी भाषाओं की पुस्तकों के प्रकाशन और बिक्री के लिहाज से एक बड़ा और प्रभावशाली बाजार है।
दरअसल यह छपे हुए शब्दों का असर है। हमारे दौर के प्रभावी चिन्तकों में शुमार लुई बोर्खेज के अनुसार—मनुष्य के ढेर सारे आविष्कारों में किताबें सर्वाधिक विस्मयकारी आविष्कार है। दूसरे आविष्कारों से हमारे शरीर का विस्तार होता है। सिर्फ किताबें ही हैं, जो हमारी कल्पनाओं और स्मृतियों को विस्तार देती हैं। बोर्खेज के कथन को किताबों तक सीमित रखने की बजाय हम इसे प्रिंट मीडिया पर भी लागू कर सकते हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विस्तार के साथ ही प्रिंट मीडिया का भी विस्तार हुआ। चौबीस घंटे दिखाए जाने वाले समाचार चैनलों के बावजूद अखबारों की प्रसार संख्या बढ़ी। भारत ही नहीं, दुनिया भर में। बोलती तस्वीरें लुभाती तो हैं, लेकिन चेतना का विस्तार नहीं करती। एक समय बाद फिर शब्दों की तरफ लौटने का मन करता है। साहित्य उत्सव में लेखकों की तरह पत्रकारों की भी अच्छी-खासी उपस्थिति साहित्य और पत्रकारिता के रिश्तों को दर्शाती है। वे लोग भी कम न थे, जो मीडिया में कॉलम लिखते हैं, चर्चाओं में बराबर भाग लेते हैं या किसी न किसी रूप में जुड़े हैं। शोभा डे, गुरु चरणदास, फेहमिदा रियाज एडवर्ड गिराडेंट, परंजय गुहा ठाकुरता से लेकर तरुण तेजपाल, शोमा चौधरी, पीटर ब्रूक, रवीश कुमार, ओम थानवी, आशुतोष आदि मीडिया कर्मियों की भागीदारी से यह अहसास पुख्ता होता है कि लेखन की सामाजिक स्वीकार्यता और प्रतिष्ठा कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसीलिए लेखक और पाठक के अन्तर्संबंध गहराई तक जुड़े होते हैं। लेखन और पठन दोनों ही सृजनात्मक क्रिया है और सृजनात्मक प्रक्रिया का उत्कर्ष रूप कागज, कैनवास, कूंची, कलम आदि माध्यमों में बेहतर संभव है।
थोड़े से लोगों का बोलबाला
मीडिया के विभिन्न माध्यमों में होने वाली चर्चाओं और बहसों में अक्सर चुनीन्दा लोग ही भाग लेते रहते हैं। इसलिए अभिव्यक्ति में वैचारिक विविधता की कमी नजर आती है। भारत जैसे वैविध्य वाले देश में कुछ खास तरह के विचारों को स्थापित करने का माध्यम बन कर रह गया है, भारतीय मीडिया। यह निष्कर्ष मीडिया स्टडीज ग्रुप का है, जिसने अपने सर्वेक्षण में पाया कि मीडिया में थोड़े से लोग ही सभी मुद्दों पर बहस करते नजर आते हैं। इसलिए घूम-फिरकर एक-से विचार बार-बार दोहराये जाते हैं। इस स्थिति का सरकार और वर्चस्वशाली लोग फायदा उाठते हैं। ग्रुप ने तीन अलग-अलग सर्वे किए। एक सर्वे दूरदर्शन, दूसरा आकाशवाणी और तीसरा विभिन्न निजी चैनलों से सम्बंधित था। दूरदर्शन सर्वे में यह पाया कि आपातकाल के समय सरकार ने अपनी नीतियों के प्रचार-प्रसार के लिए कुछ थोड़े से पत्रकारों का इस्तेमाल किया था। यही बात आकाशवाणी पर भी लागू होती है। निजी चैनलों के सर्वे में भी ग्रुप ने पाया कि यहां भी थोड़े से लोग ही किसी मुद्दे पर बहस करते दिखाई दिए। कुछ लोग तो ऐसे भी थे जो एक समय किसी और चैनल पर दिख रहे थे तो थोड़ी देर बाद दूसरे चैनल पर भी वही मौजूद थे। सरकारी लोकसभा चैनल पर आने वाले वक्ताओं के बारे में सर्वेक्षण का आकलन है कि 6 माह में कुल 989 लोगों को वक्ता के तौर पर बुलाया गया। जबकि बुलाए जाने की जरूरत 2000 लोगों की थी। इनमें भी कुछ लोगों को तो 17-18 बार बुलाया गया। केन्द्रीय आकाशवाणी में 10 लोगों को 179 बार अलग-अलग कार्यक्रमों में बुलाया गया। इस सर्वे में उत्तर-पूर्व के राज्यों का कोई वक्ता किसी समाचार या बहस के हिस्से के रूप में नहीं दिखा। ज्यादातर दिल्ली और आसपास के लोग नजर आए। सर्वे में आकाशवाणी जैसे माध्यम पर वर्ष भर प्रसारित कार्यक्रमों के विषय का विश्लेषण किया गया, तो यह तथ्य सामने आया कि ग्रामीण इलाके, दलित, अल्पसंख्यक युवाओं पर एक फीसदी से कम और आदिवासी के मुद्दे पर एक भी कार्यक्रम प्रसारित नहीं किया गया।
 इस स्थिति पर जाने-माने विश्लेषक विजय प्रताप का आकलन है कि पहले केवल एक चैनल दूरदर्शन हुआ करता था जिस पर सरकारी प्रवक्ता होने का आरोप आम था। अब ढेर सारे निजी चैनलों के बावजूद थोड़े से लोग ही सरकारी और निजी चैनलों में बार-बार दिख रहे हैं। इससे उदारीकरण के दौर में भी विचारों और अभिव्यक्ति में विविधता की दरिद्रता साफ देखी जा सकती है। समाज में हाशिये पर बैठे लोगों के बारे में चिन्तन बहुत कम नजर आता है।

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2040 में गांधी परिवार

कल्पनालोक
आज मक्खनलाल बहुत चिन्तामग्न है। क्या होगा, क्या नहीं होगा। राजन गांधी पार्टी की कमान संभालने के लिए राजी होंगे कि नहीं। अरे, हम पार्टी वर्करों की भावनाओं का ख्याल भी है कि नहीं राजन बाबा को? पूरे दस साल हो गए हैं गुहार लगाते-लगाते। हम ही क्या, देश की सारी युवा-शक्ति उनकी  मुरीद है। उनकी तरफ आशा भरी नजरों से देख रही है। लेकिन राजन बाबा है कि टस से मस नहीं हो रहे। बड़े शर्मीले हैं। अपने डैडी पर गए हैं। उनकी ट्रू कॉपी है। देखा नहीं, 27 बरस पहले आदरणीय राहुल गांधी जी को किस तरह मनाया था कांग्रेसजनों ने मिलकर?
मेरे पापाजी बताते हैं कि जयपुर चिन्तन शिविर में हम सब बिड़ला ऑडिटोरियम के मुख्य द्वार पर धरना देकर बैठ गए थे। राहुल जी तैयार ही नहीं हो रहे थे पार्टी की कमान संभालने को। इतने शर्मीले कि पूज्य सोनिया जी के कहने पर भी मान नहीं रहे थे। सोनिया जी ने कहा, बेटे राहुल, अब मान भी जाओ। जरा देखो इन देशभक्तों की तरफ। कितने घंटों से ये इस भरी सर्दी में बैठे हैं। ऊपर से मौसम खराब। बारिश होने वाली है। किसी को निमोनिया हो गया तो? फिर मेरा भी तो ख्याल करो। उम्रदराज हो गई हूं मैं। तबीयत भी ठीक नहीं रहती। मान जाओ बेटा। 14  साल से भार संभाले हूं। एक-एक करके कई प्रदेश हाथ से निकल गए। अगर दिल्ली भी निकल गई तो? पिताजी बताते हैं कि तब आदरणीय राहुल जी पिघल गए थे।
हम सब कांग्रेसजन ने खूब खुशियां मनाईं। जोरदार आतिशबाजी की। नारे लगे। जयकारे हुए। देश का नेता कैसा हो, राहुल गांधी जैसा हो। नारे इतने गूंजे कि बिड़ला ऑडिटोरियम की गूंज नाहरगढ़ तक सुनाई दी। लेकिन लाल किले तक नहीं पहुंची।
राहुल जी तब प्रधानमंत्री नहीं बन पाए थे। कार्यकर्ताओं के लंबे इंतजार के बाद, वे पिता बनने की तैयारी कर रहे थे। फिर राजन बाबा की 10, जनपथ पर किलकारियां गूंजी। बुआ आदरणीय प्रियंका गांधी वाड्रा ने शिशु की बलैया ली। बोली, मॉम पर गया है। लंबी पारी खेलेगा। फूफाजी रॉबर्ट वाड्रा सोने का पालना 'गिफ्ट' लेकर आए। बोले, दादी मॉम पर गया है। सबकी बोलती बंद कर देगा। बहन मिराया और भैया रेहन बोले-बिल्कुल नाना पर गया है। हवाई जहाज उड़ाएगा। उन्हीं दिनों मुझे पिताजी ने सीख दी, बेटा मक्खन, तुम्हीं मांग कर डालो। वरना कोई और बाजी मार ले जाएगा। राजन बाबा कान्वेन्ट में भर्ती करा दिए गए थे।
मैंने अधिवेशन में मांग कर डाली, पार्टी की कमान हमारे युवराज (राजन बाबा) के कंधों पर डाली जाए। राजन गांधी है तो पार्टी है। पार्टी है तो देश है। देश है तो मक्खन है। एक नहीं सैकड़ों मक्खन लालों की आवाज गूंज उठी। सब बेचैन हो उठे। यह कैसे आगे निकल गया। हम कौन से मक्खन लाल से कम हैं। फिर तो चारों ओर से आवाजें आने लगीं। देश का नेता कैसा हो- राजन गांधी जैसा हो। देश की युवा आंधी! राजन गांधी! राजन गांधी!!
भीड़ में कोई चिल्लाया, 'अरे सपूतों, राजन बाबा के अभी दूध के दांत भी नहीं टूटे। जरा सब्र करो। मक्खन लालों की और तेज आवाज गूंजी—और नहीं बस और नहीं, गम के बादल और नहीं। तभी मक्खन लाल ने माइक थाम लिया— साथियों, हमें फिर चुनौती दी जा रही है, जिसे चाहे वह प्रदर्शन कर रहा है। कोई जन्तर-मन्तर पर, कोई इंडिया गेट पर। कोई टोपी लगाकर। कोई झंडा उठाकर। साथियों, हम पार्टी का संविधान बदलेंगे। अगर राजन बाबा जवान हो गए तो फिर आदरणीय राहुल जी की तरह शरमाने लगेंगे। ना-ना करेंगे। अब यह देश और इन्तजार नहीं कर सकता। वर्ना हम एक बार फिर धरना देकर बैठ जाएंगे। फिर चाहे हमें बुखार हो या निमोनिया। भीड़ में नारे गूंज उठे—
देश का नेता कैसा हो—
राजन बाबा जैसा हो..
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कैमरा झूठ नहीं बोलता!

मीडिया में कैमरे की कितनी अहम भूमिका है, इसकी अहमियत तब सामने आई, जब दिल्ली पुलिस के एक सिपाही सुभाष तोमर की हत्या का मामला दर्ज हुआ। एक टीवी चैनल ने उस दिन की घटना की वह फुटेज दिखा दी, जिसमें सुभाष तोमर दिखाई दे रहे थे।  दो युवा उन्हें होश में लाने की कोशिश कर रहे थे। इनमें एक युवक था और दूसरी युवती।

कैमरा झूठ नहीं बोलता। कैमरा चाहे सी.सी. टीवी का हो या फिर न्यूज टीवी का। सच्चाई को कैद कर ही लेता है। मीडिया में कैमरे की कितनी अहम भूमिका है, इसका उदाहरण दिल्ली में सामूहिक बलात्कार की घटना के विरोध में हुए एक प्रदर्शन में देखने को मिला। यह प्रदर्शन भी देश भर में हुए अनेक प्रदर्शनों की तरह टीवी चैनलों ने कवर किया था और भुला दिया गया था। लेकिन इसकी अहमियत तब सामने आई, जब दिल्ली पुलिस के एक सिपाही सुभाष तोमर की हत्या का मामला दर्ज हुआ। सुभाष तोमर उस दिन प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए अपनी ड्यूटी पर तैनात थे। दिल्ली पुलिस का आरोप था कि निषेधाज्ञा के दौरान हिंसा पर उतारू भीड़ ने पुलिस पर पथराव किया। इससे सुभाष तोमर गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें गंभीरावस्था में राममनोहर लोहिया अस्पताल में भरती कराया गया, जहां दो दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई। पुलिस ने निषेधाज्ञा भंग करने सहित, सिपाही पर हमले और हत्या के प्रयास आदि विभिन्न धाराओं में 8 प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया था, जिनमें कुछ छात्र भी थे। बाद में हत्या की धारा भी जोड़ दी गई।
कई लोगों को यह बात गले नहीं उतर रही थी। ज्यादती तो पुलिस ने की थी। निहत्थे छात्र-छात्राओं, युवाओं और बुजुर्गों तक पर पुलिस ने बेरहमी से लाठियां बरसाई थीं। टीवी चैनलों पर लोगों ने यह सब देखा भी। अखबारों में फोटुएं भी छपीं। प्रदर्शनकारी आम नागरिक थे। हमलावर नहीं। वे देश की राजधानी में एक छात्रा के साथ दिल दहला देने वाला दुष्कर्म करने वाले दरिन्दों और दिल्ली की लचर पुलिस व्यवस्था से बेहद खफा थे और अपना गुस्सा प्रकट कर रहे थे। जिन आठ प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने पकड़ा उनमें एक को छोड़कर कोई भी किसी राजनीतिक दल या संगठन से संबद्ध नहीं था। क्या ये लोग हमलावर हो सकते थे? यह सवाल कौंध रहा था। इसी बीच एक टीवी चैनल ने उस दिन की घटना की वह फुटेज दिखा दी, जिसमें सुभाष तोमर दिखाई दे रहे थे। सिपाही की वर्दी में सुभाष तोमर जमीन पर पड़े थे। दो युवा उन्हें होश में लाने की कोशिश कर रहे थे। इनमें एक युवक था और दूसरी युवती। युवती सिपाही का सिर सहला रही थी। युवक सिपाही की एडिय़ों पर मालिश कर रहा था। दोनों मिलकर बेहोश सिपाही की मदद कर रहे थे। दृश्य इतना स्पष्ट था कि न केवल सिपाही सुभाष तोमर, बल्कि आस-पास का परिवेश भी साफ नजर आ रहा था। न तो सड़क पर पत्थर दिखाई दे रहे थे, न ही खून का एक कतरा। सिपाही के बदन पर कोई घाव नजर नहीं आ रहा था। सुभाष तोमर की उम्र ४६ वर्ष थी। ऐसा लग रहा था वे थककर गिर पड़े हों। लेकिन यह सब अनुमान था। सिपाही कैसे बेहोश हुआ? क्या उस पर किसी ने हमला किया? टीवी फुटेज से तो कुछ पता नहीं चल रहा था। शायद पहले की घटना कैमरे में रिकार्ड नहीं हुई होगी। लेकिन यह साफ था कि सिपाही सुभाष तोमर के कोई बाहरी चोट या जख्म नहीं था। न आसपास पथराव का कोई सबूत था। यानी पथराव से सिपाही के गंभीर रूप से घायल होने की दिल्ली पुलिस की कहानी की पोल खुल गई थी। चैनल ने कई बार यह फुटेज दिखाए। अपनी फुटेज देखकर टीवी पर वह युवक स्वयं प्रकट हो गया, जो सिपाही की मदद कर रहा था। योगेन्द्र नामक यह युवक दिल्ली में पत्रकारिता का विद्यार्थी है। उसने चैनल पर उस दिन का घटनाक्रम विस्तार से बता दिया।
उसने बताया कि प्रदर्शनकारियों के पीछे कुछ सिपाही दौड़ रहे थे। तभी एक सिपाही रुका और जमीन पर गिर पड़ा। उसके साथ के अन्य सिपाही आगे निकल गए। योगेन्द्र व उसकी दोस्त पाओली दौड़कर सिपाही के पास पहुंचे। योगेन्द्र ने न केवल सिपाही को होश में लाने की कोशिश की, बल्कि राममनोहर लोहिया अस्पताल पहुंचाने में भी मदद की। योगेन्द्र अस्पताल में काफी देर तक रुका। उसने एक पुलिस इन्सपेक्टर को अपना नाम, पता और मोबाइल नं. दर्ज कराया और घर चला गया। योगेन्द्र ने जब टीवी पर फुटेज देखी तो उसे माजरा समझा में आया कि वह सिपाही सुभाष तोमर थे। बाद में पाओली ने भी टीवी पर आकर योगेन्द्र की बातों की पुष्टि की। बाकी कहानी कैमरे ने बयान कर ही दी थी। सिपाही सुभाष तोमर पर किन लोगों ने हमला किया? हमला किया भी या नहीं? या फिर वे थककर स्वयं ही गिर पड़े? ये जांच के विषय हैं। लेकिन दिल्ली पुलिस के आला अफसरों ने एक सिपाही की आड़ लेकर जो कहानी गढ़ी, उसकी कैमरे ने पोल खोल दी। यह एक मिसाल है, जो पूरे देश में पुलिस के कामकाज और रवैये को दर्शाती है। दिल्ली पुलिस की चौतरफा निन्दा हो रही थी। शायद इसीलिए पुलिस प्रदर्शनकारियों को हिंसक ठहराकर निर्दोष लोगों पर किए गए लाठी चार्ज के अपने गुनाह पर परदा डालना चाहती थी। लेकिन वह कामयाब नहीं हो सकी। पुलिस ने जिन आठ प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया, उनमें दो छात्रों के बारे में पुलिस की पोल सी.सी. टीवी के कैमरों ने खोल दी। ये दोनों छात्र घटना स्थल से काफी दूर उस वक्त मैट्रो में सफर कर रहे थे। ट्रेन में और मैट्रो स्टेशन पर लगे सी.सी. टीवी कैमरों ने हकीकत बयां कर दी।
तो ये हैं कैमरे की करामात। दूध का दूध और पानी का पानी। निर्दोष को बचाने और दोषी पर शिकंजा कसने में इस कैमरे की बड़ी भूमिका है।
मीडिया पर पाबंदी
स्वतंत्र मीडिया से कौन डरता है? इसका जवाब है, या तो वह जो अत्याचार करता है, या वह जो जनता से कुछ छिपाना चाहता है। चीन की सरकार यही कर रही है। चीन में मीडिया पर कई तरह की पाबंदियां हैं। ये पाबंदियां चीन में सरकार चला रही कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से लगाई हुई है। पार्टी का चीन के मीडिया पर पूरी तरह नियंत्रण है। इसका विरोध करने की किसी में हिम्मत नहीं। लेकिन गत 7 जनवरी को 'सदर्न वीकेंड' नामक एक साप्ताहिक चीनी अखबार के पत्रकारों ने इसके खिलाफ आवाज बुलंद की। कम्युनिस्ट पार्टी के स्थानीय कार्यालय के बाहर अखबार के सैकड़ों पत्रकार इकट्ठे   हुए और नारे लगाए। यही नहीं, अखबार ने कम्युनिस्ट पार्टी के प्रांतीय नेता तुओ झोन को हटाने के लिए सरकार को एक खुला खत भी लिखा, जो अखबार ने प्रकाशित किया। जानकारों का कहना है कि यह चीन में मीडिया पर नियंत्रण के विरोध में उठी आवाज की शुरुआत है। चीन में आखिर एक अखबार ने मीडिया पर पाबंदी को चुनौती देने का साहस तो किया!

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जहां तय है खबरों की दरें

कल्पना करें, जब सरकार का शक्तिशाली व साधन-सम्पन्न तंत्र ही खबरों की खरीद-फरोख्त करेगा, तो मीडिया को भ्रष्टाचार के दलदल में धकेलने से भला कौन रोक पाएगा? छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार ने कुछ प्रमुख टीवी चैनलों पर मनचाही खबरें दिखाने के लिए किस तरह सरकारी खजाना खोल दिया, इसकी पोल 'इंडियन एक्सप्रेस ने खोली है।

यह सही है, 'पेड न्यूज' के अधिकांश मामलों में मीडिया दोषी है। लेकिन दूसरी ओर मीडिया को भ्रष्ट करने में चुनावी उम्मीदवार, राजनीतिक दलों, नेताओं के अलावा कारपोरेट घरानों को भी कम जिम्मेदार नहीं माना जाता। अब इसमें एक नाम और जुड़ गया है और वह है छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार। सरकार भी खबरें खरीदती हैं, यह पहला उदाहरण है। कल्पना करें, जब सरकार का शक्तिशाली व साधन-सम्पन्न तंत्र ही खबरों की खरीद-फरोख्त करेगा, तो मीडिया को भ्रष्टाचार के दलदल में धकेलने से भला कौन रोक पाएगा? छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार ने कुछ प्रमुख टीवी चैनलों पर मनचाही खबरें दिखाने के लिए किस तरह सरकारी खजाना खोल दिया, इसकी पोल 'इंडियन एक्सप्रेस' ने पिछले दिनों प्रकाशित एक विस्तृत समाचार रिपोर्ट में खोल दी।
'छत्तीसगढ़ गवर्नमेंट पे'ज फार आल द टीवी न्यूज देट इज फिट टू बाय' हैडलाइन से प्रकाशित इस रिपोर्ट में जो तथ्य और आंकड़े दिए गए हैं, वे छत्तीसगढ़ में टीवी चैनलों और राज्य सरकार दोनों पर बदनुमा दाग है। रिपोर्ट में हालांकि 2009 से 2011 तक के ही ब्यौरे हैं, लेकिन अब सब कुछ ठीक हो गया होगा, यह मानने का कोई कारण नजर नहीं आता। सरकारी कार्यक्रमों खासकर, मुख्यमंत्री की कवरेज के लिए स्थानीय टीवी चैनलों ने बाकायदा कई पैकेज बना रखे हैं। सबकी अलग-अलग दरें निर्धारित हैं। एक टीवी चैनल का उदाहरण देखिए—मुख्यमंत्री के भाषण व अन्य महत्वपूर्ण सरकारी कवरेज के लिए 2 मिनट का स्पेशल पैकेज। रोजाना 15 बार प्रसारण। कीमत 3.28 करोड़ रु. प्रतिवर्ष। इसी तरह मुख्यमंत्री की जनसभाओं की 10 मिनट लाइव कवरेज की कीमत 48 लाख रु. प्रतिवर्ष। (हर माह 4  प्रसारण) एक और पैकेज है—टिकर। रोजाना 10 घंटे दिखाए जाने वाले इस टिकर पैकेज की कीमत है 60 लाख रु. प्रतिवर्ष। एक और स्पेशल पैकेज है जिसमें सरकारी कार्यक्रमों की आधा घंटा कवरेज है। यह राष्ट्रीय नेटवर्क के लिए भी भेजी जाती है। इस पैकेज की कीमत है—50 लाख रुपए प्रतिवर्ष। (हर माह दो कार्यक्रमों का प्रसारण) टीवी स्क्रीन पर एक पट्टिका दिखाने का भी छोटा पैकेज है, जिसमें बच्चों के साथ मुख्यमंत्रीजी की फोटो दिखाने का प्रावधान है। इसकी कीमत है 14.6 लाख रु. प्रतिवर्ष। ये सारे पैकेज निजी टीवी चैनल की ओर से सरकार को 2010-11 के कार्यक्रमों की कवरेज के लिए प्रस्तावित किए गए थे।
'इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट में कई टीवी चैनलों की प्रसारित खबरों का तिथिवार ब्यौरा भी छपा है, जिनकी अलग-अलग कीमतें प्रस्तावित की गईं। इन्हें अखबार ने 'मैन्यूफ्रेक्चर्ड न्यूज' कहा है। इस 'मैन्यूफ्रेक्चर्ड न्यूज' के दो-एक उदाहरणों से ही पता चल जाएगा कि सरकार किस तरह अपने पक्ष में खबरें प्रायोजित कराती हैं। इनमें विरोधियों से लेकर माओवादी तक शामिल हैं। जाहिर है, प्रायोजित या फिर नकली खबरों ने सरकार का नैतिक बल कमजोर कर दिया। शायद इसीलिए राज्य सरकार राज्य के बजट प्रसारण के लिए भी चैनलों को कीमत चुकाती है। अखबार की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2011 में राज्य सरकार ने बजट प्रसारण के लिए चार टीवी चैनलों को 25 लाख रु. का भुगतान किया। यही नहीं, बस्तर में गरीब आदिवासियों को अनाज वितरण का सरकारी कार्यक्रम टीवी पर दिखाने के लिए टीवी चैनलों को 14.26  लाख रु. की कीमत चुकाई गई। किसी के भी जेहन में यह सवाल कौंध सकता है, आखिर यह सब क्या है? सरकार को क्या जरूरत है ऐसा करने की? अपनी जन कल्याणकारी योजनाओं के लिए सरकार को मीडिया का मोहताज क्यों होना चाहिए? क्यों सरकार लालायित है मीडिया में अपनी पब्लिसिटी के लिए? स्पष्ट है, सरकार की नीयत में खोट है। अगर सरकार पब्लिसिटी ही चाहती है तो बाकायदा विज्ञापन जारी करे। विज्ञापन-सामग्री को खबर का रूप देना जनता से धोखा है। यही सवाल मीडिया से भी है। जन कल्याणकारी योजनाओं और कार्यक्रमों की जानकारी लोगों तक पहुंचाना मीडिया का काम है। इनकी जमीनी हकीकत बताना भी मीडिया का फर्ज है। जनहित में सूचनाओं का प्रसार और खबरों का विश्लेषण मीडिया नहीं तो और कौन करेगा? इन कार्यों की कीमत कैसी? आश्चर्यजनक रूप से सरकार और मीडिया ने अपने-अपने तर्कों में लीपापोती की है। छत्तीसगढ़ सरकार और स्थानीय चैनल जिन्हें विज्ञापन या प्रायोजित खबरें बता रहे हैं, वे साधारण खबरों के रूप में ही लोगों के सामने परोसी गईं, विज्ञापन के रूप में नहीं। चतुराई बरतते हुए भले ही कुछेक अपवाद छोड़ दिए गए हों, लेकिन भ्रष्टाचार का यह धंधा छत्तीसगढ़ में आज भी खूब फल-फूल रहा है। वह भी राज्य सरकार के सरपरस्ती में।
सरकारी मकानों पर             
पत्रकारों के कब्जे
मीडिया और सरकार के भ्रष्ट गठजोड़ का एक और उदाहरण मध्यप्रदेश से है। मामला मीडिया संस्थानों की बजाय मीडिया कर्मियों से ज्यादा जुड़ा है। मध्यप्रदेश में सरकारी मकानों पर 210 पत्रकार बरसों से कब्जा जमाए बैठे हैं। इन पत्रकारों पर 14 करोड़ रु. से अधिक की किराया राशि बकाया है। यह चौंकाने वाली जानकारी अगर राज्य सरकार की ओर से स्वाभाविक तौर पर आई होती तो और बात थी। जानकारी सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त हुई है। इस आधार पर एक रिटायर्ड सरकारी अधिकारी ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की है। आरोप है कि दो या तीन साल के लिए आवंटित सरकारी मकान में कुछ पत्रकार तो 37 वर्षों से कब्जा जमाए हुए हैं। इस दौरान राज्य में पांच-छह सरकारें तो आई होंगी। किसी भी सरकार ने इन पत्रकारों से मकान खाली कराने या किराया वसूल करने की कोशिश क्यों नहीं की? जाहिर है, हर सरकार अपने हित साधने के लिए पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई करने से बचती रही। हालांकि 210 आवंटित सरकारी मकानों पर 11 मकानों में अदालत का स्टे है और 23 मकान खाली भी कराए गए हैं। लेकिन अब भी 176 मकानों पर पत्रकारों के अनधिकृत कब्जे हैं। क्या इनके खिलाफ सरकार कोई कार्रवाई कर रही है या फिर कोर्ट के आदेश का इंतजार कर रही है?

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मनोरंजन, मजाक और मौत!

यह पाठकों, मीडिया और सरकार, तीनों के लिए महत्वपूर्ण समय है। जहां मीडिया को अपनी सीमा का ध्यान रखना चाहिए। वहीं सरकारों को भी आलोचना बर्दाश्त करनी चाहिए। कोई भी सरकार आदर्श सरकार नहीं होती। इसलिए आलोचना से ऊपर नहीं हो सकती। ऐसे में मीडिया अगर जनहित के मुद्दे उठाकर लोगों का ध्यान खींचे, तो क्या बुराई है?
रेडियो जॉकी की 'हॉक्स कॉल' के बाद मौत को गले लगा लेने वाली नर्स जेसिंथा सल्दान्हा का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। जेसिंथा मीडिया के एक क्रूर मजाक का शिकार बन गई। भारतीय मूल की जेसिंथा सल्दान्हा लंदन के मशहूर किंग एडवर्ड सप्तम अस्पताल में नर्स थी। उसकी ड्यूटी एक खास मरीज की सेवा में लगी थी। यह खास मरीज थी ब्रिटेन के शाही परिवार की बहू केट मिडिल्टन, जो इन दिनों गर्भवती हैं।
गत सप्ताह अस्पताल की रिसेप्शनिस्ट के पास फोन आया। यह फोन ऑस्ट्रेलिया के २ डे एफ.एम. के दो रेडियो जॉकी ने मिलकर किया। महिला जॉकी मेल ग्रेग ने ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय का स्वांग रचते हुए कहा, 'क्या मैं अपनी बहू केट से बात कर सकती हूं।' रिसेप्शनिस्ट ने तत्काल फोन मिला दिया। उधर से नर्स जेसिंथा ने बात की। निस्संदेह जेसिंथा ने महारानी एलिजाबेथ समझकर ही रेडियो जॉकी से बात की। उसे जरा भी संदेह नहीं हुआ, क्योंकि बीच-बीच में वह एक पुरुष आवाज भी सुन रही थी, जिसे महारानी 'प्रिंस चाल्र्स' कहकर सम्बोधित कर रही थी। प्रिंस चाल्र्स का रोल माइकल क्रिश्चियन निभा रहा था। जेसिंथा ने शाही बहू की तबीयत का पूरा ब्यौरा भी दिया और चिंतित महारानी को ढांढस भी बंधाया कि उनकी बहू ठीक हैं और सो रही हैं। जेसिंथा ने भोलेपन में मरीज से मिलने का माकूल समय भी बता दिया। तभी दोनों रेडियो जॉकी ठहाका लगाकर हंस पड़े। हकीकत पता चलने पर जेसिंथा बहुत शर्मिन्दा हुई। अगले दिन वह अपने फ्लैट में फंदे से लटकी पाई गई। आत्महत्या से पूर्व उसने तीन पत्र लिखे। पत्र में उसने अपनी मौत के लिए दोनों रेडियो जॉकी को जिम्मेदार ठहराया। उसके शव को भारत लाकर उड्डुपी के पास पैतृक गांव में गमगीन माहौल के बीच अंतिम संस्कार कर दिया गया।
एक कत्र्तव्यनिष्ठ नर्स की दुखद मृत्यु ने झकझोर दिया। सोशल मीडिया में गुस्सा फूट पड़ा। रेडियो जॉकी व एफ.एम. चैनल की जबर्दस्त निन्दा की गई। लंदन में शोकसभा कर जेसिंथा को श्रद्धांजलि दी गई। ऑस्ट्रेलिया की प्रधानमंत्री जूलिया गेलार्ड ने इसे 'भयानक हादसा' बताया। खबर है २ डे एफ.एम. रेडियो की लोकप्रियता में गिरावट आ गई। कई विज्ञापनदाताओं ने रेडियो से मुंह फेर लिया। ऑस्ट्रेलिया के संचार और मीडिया प्राधिकरण ने स्वत: संज्ञान लेकर रेडियो के खिलाफ जांच शुरू कर दी।
इधर सोशल नेटवर्क पर कई लोगों ने मांग की है कि शाही बहू केट मिडिल्टन के होने वाले बच्चे का नाम जेसिंथा रखा जाए। कुछ लोगों ने सोशल नेटवर्क पर वेबपेज बनाया, 'नेम द रॉयल बेबी जेसिंथा इन द मेमोरी ऑफ नर्स जेसिंथा सल्दान्हा'। 'हॉक्स कॉल' करते हुए दोनों रेडियो जॉकी को अंदाज नहीं था कि बात इस हद तक पहुंच जाएगी। वे तो नर्स को मजाक का पात्र बनाकर श्रोताओं का मनोरंजन करना चाहते थे। नर्स ही क्यों, किसी का भी मजाक उड़ाकर लोगों का मनोरंजन हो, तो क्या हर्ज है! यही सोच आज मीडिया पर हावी है। जेसिंथा त्रासदी की वजह भी यही है। ब्रिटिश पत्रकार एंड्रयू ब्राउन ने 'द गार्जियन' में सही लिखा कि मीडिया को अपने कामकाज के तरीकों पर गौर करने की जरूरत है।
छत्तीसगढ़ में प्रेस का दमन
मीडिया ही क्यों, सरकारों को भी अपने कामकाज के तरीकों पर गौर करने की जरूरत है। जनता के वोटों से चुनी हुई सरकारें जब जनता के हकों पर ही कुठाराघात करें, तो लोकतंत्र का खतरे में पडऩा निश्चित है। छत्तीसगढ़ में यही हो रहा है। यहां की रमन सिंह सरकार प्रेस का दमन करने में सबको पीछे छोड़ चुकी है। सरकार जब सत्ता के मद में डूब जाती है, तो उसे ठकुरसुहाती के अलावा कुछ पसंद नहीं आता। सरकारी तंत्र के घपले-घोटाले उजागर करके पत्रिका ने लोगों के हकों पर हो रहे कुठाराघात की ओर ध्यान खींचा। यही नहीं, मुख्यमंत्री रमन सिंह के भी कुछ कारनामों को उजागर किया, जो पहली बार छत्तीसगढ़ की जनता के सामने आए। सरकार की भवें तन गईं। पत्रिका को सरकारी विज्ञापन बंद कर दिए गए। इसकी परवाह न करते हुए पत्रिका जनता के प्रति अपना दायित्व लगातार निभाता रहा। पिछले विधानसभा सत्र में पत्रिका संवाददाताओं के प्रवेश पत्र निरस्त कर दिए गए थे।
पत्रिका को सुनवाई का मौका तक नहीं दिया। अगला सत्र शुरू होने के बावजूद पत्रिका संवाददाताओं के विधानसभा प्रवेश पर रोक जारी है। जबकि जब छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के निर्देश हैं कि पत्रिका के आवेदन करने पर उसके संवाददाताओं को विधानसभा कवरेज के लिए प्रवेश पत्र जारी करने पर निर्णय करें। विधानसभा लोकतंत्र का मंदिर है, जहां कानून का सम्मान होता है। न्यायालय के आदेश के बावजूद पत्रिका संवाददाताओं को प्रवेश से रोकना क्या कानून और न्याय की अवहेलना नहीं है?
छत्तीसगढ़ की जनता को जानने का हक है कि सदन में उसके हितों के लिए राज्य सरकार क्या कदम उठा रही है। इस हक से वंचित करना जनता की अवहेलना है, जिसने सरकार को सत्ता सौंपी। यह सीधे अभिव्यक्ति व प्रेस की स्वतंत्रता का दमन है। यह दूसरी बात है कि पत्रिका अपने स्रोतों से विधानसभा के समाचार प्रकाशित कर रहा है और जनता के प्रति अपना दायित्व निभा रहा है।  
गांव का 'स्मार्ट' अखबार
गत दिनों अखबारों की दुनिया में एक नई शुरुआत हुई। लखनऊ के पास छोटे से गांव कुनौरा से नया हिन्दी अखबार निकला—'गांव कनेक्शन'। यह गांवों की 'स्मार्ट' तस्वीर पेश करेगा। अखबार के सम्पादक नीलेश मिश्र के अनुसार, मीडिया में यह भ्रान्ति है कि गांव का मतलब सिर्फ खेती-बाड़ी या फिर ऑनर किलिंग है। आप कुनौरा आकर देखिए। यहां लोगों को डेनिम्स पहने हुए और गांव की स्टॉल पर मोमोज खाते हुए देख सकते हैं। 'गांव कनेक्शन' का पहला अंक ही स्मार्ट तेवर के साथ आया है। एक फीचर ग्रामीण शादियों में लोकप्रिय हो रहे 'बुफे डिनर' पर है, तो एक लेख बलिया के निवेश बैंकर पर है, जो मूलत: न्यूयार्क में स्थित है।
'गांव कनेक्शन' में युवा ग्रामीण पत्रकारों को रखा गया है, जिनमें ज्यादातर संवाददाता मॉस कम्यूनिकेशन व पत्रकारिता स्कूलों के स्थानीय विद्यार्थी हैं।

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अखबारों की महत्वपूर्ण भूमिका

सबसे बड़ी खामी धारा 66-ए में यह है कि अगर आपकी बात से किसी को नाराजगी हुई तो वह आपके खिलाफ मामला दर्ज करवा सकता है। और इस पर पुलिस का एक सिपाही भी आपको थाने ले जाकर बैठा सकता है। ऐसे में सर्वोच्च अदालत की दखलंदाजी से इस कानून की कमियों, अस्पष्टताओं को दूर करने के हर संभव प्रयास  करने पड़ेंगे

आपको याद होगा, जिस दिन शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे की अन्त्येष्टि हुई, उस दिन समूचा मुम्बई महानगर बंद रहा। बंद डर की वजह से रहा या ठाकरे के प्रति सम्मानवश, इस बहस में पड़े बगैर हम यह कहेंगे कि इस पर भिन्न राय रखने वालों को अपना मत प्रकट करने का पूरा अधिकार है। मुम्बई की दो लड़कियों ने फेसबुक पर अपनी राय जाहिर की। बल्कि राय सिर्फ शाहीन ने जाहिर की थी। उसकी दोस्त रेणु ने महज उसका समर्थन किया था। शाहीन की राय थी कि किसी की मृत्यु पर पूरे शहर को बंद कर देना कहां तक जायज है? इसे पढ़कर शिव सैनिक भड़क गए। शाहीन के चाचा के क्लिनिक पर तोडफ़ोड़ की तथा पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी। पुलिस रात को ही दोनों लड़कियों को पकड़कर ले गई। लड़कियों ने तत्काल माफी मांग ली। अपना फेसबुक अकाउंट भी बंद कर दिया। यह घटना संभवत: मुम्बई के एक इलाके पालघर तक सिमटकर रह जाती। लेकिन इस घटना का विवरण टाइम्स ऑफ इंडिया ने अगली सुबह प्रकाशित कर दिया। अगले दिन बाकी अखबारों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी यह घटना सुर्खियों में छा गई। अदालत में जमानत के बाद तीसरे दिन ये लड़कियां जेल से छूट पाईं। महाराष्ट्र सरकार की नींद खुली। लड़कियों के खिलाफ मामला बंद कर दिया गया। इतना ही नहीं, दो पुलिस अधिकारियों को निलंबित भी कर दिया गया। सरकार ने आदेश दिया कि अब से धारा ६६-ए के तहत मामलों को पुलिस महानिरीक्षक स्तर का अधिकारी ही देखेगा।
और अब इस धारा को देश की सर्वोच्च अदालत में चुनौती मिल गई। दिल्ली की छात्रा श्रेया सिंघल की जनहित याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सहित, महाराष्ट्र, प. बंगाल, दिल्ली और पुड्डुचेरी की सरकारों को नोटिस जारी करके चार सप्ताह के भीतर अपना पक्ष रखने को कहा है। इन राज्यों में सूचना तकनीक कानून के दुरुपयोग की घटनाएं पिछले दिनों प्रकाश में आई थीं। कुछ अरसा पूर्व पुड्डुचेरी के रवि श्रीनिवासन को भी पुलिस घर से पकड़कर ले गई थी। रवि ने ट्विटर पर वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम के बेटे कार्ति चिदम्बरम और सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा के बारे में समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों के आधार पर अपनी राय व्यक्त की थी। इसी तरह पश्चिम बंगाल में जाधवपुर विश्वविद्यालय के दो प्रोफेसरों को भी इसलिए जेल जाना पड़ा, क्योंकि इनमें से एक ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर कार्टून बनाया था और दूसरे ने अन्य लोगों को भेज दिया था। सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर व्यक्त की गई अभिव्यक्तियों को जिस तरह से दबाने की कोशिशें की गई, उससे लोगों में यह संदेश गया कि सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने पर तुली है। स्वीकार किया जा रहा है कि सूचना तकनीक कानून के तहत मिले अधिकारों का पुलिस और शासन ने दुरुपयोग ही किया। शासन में बैठे कई लोग इस बात को मानते हैं कि सूचना कानून को सही ढंग से परिभाषित नहीं किया गया। सूचना तकनीक मंत्री कपिल सिब्बल भी मानते हैं कि इस कानून में कई खामियां हैं। सबसे बड़ी खामी धारा 66-ए में यह है कि अगर आपकी बात से किसी को नाराजगी हुई तो वह आपके खिलाफ मामला दर्ज करवा सकता है। और इस पर पुलिस का एक सिपाही भी आपको थाने ले जाकर बैठा सकता है। ऐसे में सर्वोच्च अदालत की दखलंदाजी से इस कानून की कमियों को दूर करने का प्रयास होगा। संसद में हंगामा और बिना बहस कानून पारित होने से ऐसी ही विसंगतियां पैदा होती हैं।
कानून, मीडिया और कोयले की कालिख
सौ करोड़ की जबरन वसूली के मामले में जी न्यूज की दलील काम नहीं आई। अपने दो सम्पादकों की गिरफ्तारी में अभिव्यक्ति की आजादी के मुद्दे पर उसे समर्थन नहीं मिला। उल्टे सोशल मीडिया में लोगों का गुबार फूट पड़ा। मामला जिस रूप में सामने आया उससे जी न्यूज की काफी किरकिरी हुई। लिहाजा कानून को अपना काम करने देना चाहिए।
कानून को कोयले की कालिख भी मिटानी चाहिए। सांसद और उद्योगपति नवीन जिन्दल की कंपनी जिन्दल स्टील एंड पावर लि. जे.एस.पी.एल. पर गंभीर आरोप हैं। इसलिए कहीं जिन्दल दो सम्पादकों के वीडियो टेप के बहाने खुद को पाक साबित करने की कोशिश तो नहीं कर रहे? कैग की रिपोर्ट में बहुत कुछ साफ है। इसके बावजूद सीबीआई जे.एस.पी.एल. व उससे जुड़ी कंपनियों पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं कर सकी है। केन्द्र की सरकार अपने सांसद के कारनामों पर चुप्पी साधे हुए हैं। वह २ जी स्पेक्ट्रम की तरह सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बगैर कुछ नहीं करना चाहती। कैग की रिपोर्ट और मीडिया में आए तथ्य बताते हैं कि नवीन जिन्दल की कंपनी कोयला खदानों का आवंटन पाने और गरीब किसानों की जमीनें लेने में अग्रणी है। उनके पास झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और मध्यप्रदेश में कोयला खदानें हैं। कैग की रिपोर्ट के बाद जांच के दौरान यह बात सामने आई कि जे.एस.पी.एल. ने १६ कोयला खदानों के ब्लॉक्स हासिल करने के लिए आवेदन किया था। यह बात भी सामने आई कि कुछ कंपनियां, जिन्हें कोल ब्लॉक्स आवंटित हुए, वे भी नवीन जिन्दल की कंपनी से जुड़ी हुई हैं। इनमें नलवा स्पंज आइरन लि., गगन स्पंज आइरन लि. तथा मोनेट इस्पात एंड एनर्जी लि. कंपनियों के नाम शामिल हैं। मोनेट इस्पात संदीप जाजोडिया की कंपनी है, जो नवीन जिन्दल के निकट रिश्तेदार हैं। इन सभी मामलों की तह में जाने की जरूरत है। कुछ कंपनियां ही कोयला खदानों पर कब्जा जमाने की कोशिश में क्यों लगी हैं? उनके आपस में तार क्यों जुड़े हुए हैं? क्यों वे नाम बदलकर काम करती हैं? उनकी राज्यों व केन्द्र की सरकारों से क्या साठगांठ है? प्रशासनिक तंत्र क्यों उन पर मेहरबान रहता है? ये सारे सवाल मीडिया के सामने चुनौती की तरह हैं। केन्द्रीय जांच ब्यूरो अव्वल तो इनकी तह तक शायद ही जाए। अगर गया भी, तो परिणाम हासिल होगा, इसकी उम्मीद कम है। कई बड़े-बड़े नाम सामने आ चुके हैं। सजा किसी एक को भी अभी तक नहीं मिली। सजा मिलना तो दूर, अभी तक उनके खिलाफ कानून का शिकंजा कसता हुआ भी नजर नहीं आ रहा है।

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खुलेपन की आड़ में

माउस के एक क्लिक पर ऐसी दुनिया खुल जाती है, जहां कोई नैतिक या सामाजिक वर्जना नहीं। इस बारे में हिन्दी व अंग्रेजी की कई प्रतिष्ठित कही जाने वाली पत्रिकाएं कुछ ज्यादा ही एक दूसरे से होड़ करती हुई लगती हैं। खुलेपन की आड़ में अश्लीलता परोसी जा रही है। प्रतिष्ठित पत्रिकाएं यह सब बौद्धिकता के आवरण में लपेटकर कर रही हैं।


यह सही है कि युवा पीढ़ी की सोच में काफी खुलापन आ गया है। यह भी सच है कि सिनेमा व टीवी इसमें अहम भूमिका निभा रहे हैं, रही-सही कसर इंटरनेट पूरी कर रहा है। माउस के एक क्लिक पर ऐसी दुनिया खुल जाती है, जहां कोई नैतिक या सामाजिक वर्जना नहीं। सारी हदें पार हो जाती हैं। ऐसे में युवा-वर्ग को पत्र-पत्रिकाओं से जोड़े रखने की बड़ी चुनौती है।
इस चुनौती का जवाब प्रिंट मीडिया दो तरीके से दे सकता है। एक तो यह कि वह भी वो सब करने लगे जो ये इलेक्ट्रॉनिक्स माध्यम कर रहे हैं। या फिर दूसरा तरीका यह कि प्रिंट मीडिया अपनी अलग उपयोगिता और पहचान को मजबूत बनाए। दैनिक अखबार खबरों व सूचनाओं के माध्यम से इस चुनौती का काफी हद तक मुकाबला करने में सफल हुए हैं। लेकिन अनेक साप्ताहिक व मासिक पत्रिकाएं सस्ती लोकप्रियता के दलदल में धंसती हुई नजर आती हैं। इस बारे में हिन्दी व अंग्रेजी की कई प्रतिष्ठित कही जाने वाली पत्रिकाएं कुछ ज्यादा ही एक दूसरे से होड़ करती हुई लगती हैं। यह होड़ युवाओं के भविष्य की आवश्यकताओं और उनकी समस्याओं को लेकर होती तो कुछ और बात थी। होड़ इस बात को लेकर है कि युवाओं को रिझाने में कौन-सी पत्रिका आगे है। कुछ पत्रिकाएं तो सस्ती 'ए' फिल्मों व पोर्न साइटों को भी पीछे छोडऩा चाहती हैं। खुलेपन की आड़ में युवाओं को अश्लीलता परोसी जा रही है।
दिलचस्प बात यह है कि प्रतिष्ठित पत्रिकाएं यह सब बौद्धिकता के आवरण में लपेटकर कर रही हैं। कभी फिटनेस व सौन्दर्य के नाम पर, तो कभी प्रेम व रोमांस के नाम पर, कभी कला व साहित्य के नाम पर, तो कभी आधुनिक लाइफ स्टाइल और सेक्स सर्वे के नाम पर युवाओं को गुमराह किया जा रहा है। हर दूसरे-तीसरे माह सेक्स पर इन पत्रिकाओं के विशेष अंक आप देख सकते हैं। अगर यह नहीं तो कवर स्टोरी जरूर होगी। पोर्न स्टार सन्नी लियोन और मॉडल पूनम पांडे के उत्तेजक फोटोग्राफ्स बड़े चाव से छापे जा रहे हैं। हिन्दी-अंग्रेजी की कुछेक पत्रिकाएं तो इस बात के लिए जानी जाने लगी हैं कि वे साल में एक-दो 'धांसू' सेक्स सर्वे अंक जरूर निकालेंगी। सामग्री का स्तर, खासकर प्रस्तुतीकरण देखकर कोई भी अंदाज लगा सकता है कि इनका वास्तविक उद्देश्य क्या है। फोटो का चयन, शीर्षक-उपशीर्षकों की भाषा, उत्तेजक विवरण, कथन आदि को बॉक्स बनाकर अलग से हाईलाइट करने की शैली इन पत्रिकाओं को खूब आती है।
दिल्ली की एक मशहूर हिन्दी पत्रिका ने इस बार (14 नवम्बर 2012) साहित्य में सेक्स विषय पर कवर स्टोरी प्रकाशित की है। इसमें 'दुनिया की सबसे ज्यादा बिकने वाली इरॉटिक किताब' के बारे में जानकारी देते हुए बताया गया है कि इसे हिन्दी में लाने की तैयारी की जा रही है। साथ ही कवर पर पत्रिका ने पूछा कि 'क्या हिन्दी समाज स्त्री के लिखे सेक्स साहित्य के लिए तैयार है?' पत्रिका ने कुछ देसी-विदेशी 'इरॉटिक' किताबों के चटखारेदार अंश भी प्रकाशित किए हैं।
इसमें दो राय नहीं कि सेक्स कोई वर्जित विषय नहीं है। लेकिन इसे प्रस्तुत किस नीयत से किया गया है, यह देखना जरूरी है। विषय का प्रस्तुतीकरण इसका प्रमाण आप देता है। अधिकांशतया इन विषयों को पत्रिकाएं चटखारेदार बनाने की कोशिश कर रही हैं। इस कोशिश में श्लील-अश्लील के बीच की झाीनी रेखा पाट दी जाती है। चूंकि ये पत्रिकाएं घरों में पढ़ी जाती हैं, इसलिए चिन्ता करने की जरूरत है। श्लील और अश्लील की बहस होती रही है। लेकिन भारतीय मूल्यों में विश्वास रखने वाले परिवार यह अच्छी तरह समझाते हैं कि दोनों में फर्क करने वाली बारीक रेखा कब, कहां और क्यों शुरू होती है।
इसके बावजूद बुद्धिजीवियों का एक तबका इस विषय को केवल पश्चिम के नजरिए से देखता है और अपने निष्कर्ष भारतीय समाज पर थोपने की कोशिश करता है। यह तबका पश्चिमी लोगों के यौन व्यवहार में  बी.डी.एस.एम. (बॉन्डेज, डिसीप्लिन, सैडिज्म और मैसोथिज्म) का बहुत रस लेकर बखान करता है और ब्रिटिश लेखिका ई.एल. जेम्स की किताब 'फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे' पर फिदा है। यह तबका मानता है कि अंग्रेजों के साथ ही भारतीय मध्य वर्ग ने भी विक्टोरिया के जमाने की नैतिकता को किनारे लगा दिया है। ये पत्रिकाएं भी यही कर रही हैं, जिसका बुरा असर न केवल युवाओं पर बल्कि किशोर-किशोरियों व बच्चों पर भी पड़ रहा है।
ताकतवर कौन?
ताकतवर लोगों के परिजनों के भ्रष्टाचार पर अगर आप ट्विट करते हों, तो सावधान हो जाएं! पुलिस आपको पकड़कर बंद कर सकती है। पुड्डूचेरी के इंजीनियर रवि श्रीनिवास के साथ पिछले दिनों ऐसा ही हुआ। उन्होंने केन्द्रीय वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम के बेटे कार्ति चिदम्बरम और सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा के बारे में प्रकाशित खबरों पर ट्विट किया था। इसे एक मामूली बात समझकर वे भूल भी गए थे कि अचानक सुबह-सुबह पुलिस उनके घर पहुंच गई और गिरफ्तार करके ले गई। बीबीसी की हिन्दी सेवा से बातचीत में रवि श्रीनिवास ने बताया कि पुलिस स्टेशन पर उन्हें बताया गया कि कार्ति चिदम्बरम ने उनके खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई है, इसलिए उन्हें गिरफ्तार किया गया।
रवि के अनुसार, एक पुलिस वाले ने मुझसे संकेत में ही पूछा कि तुमने ताकतवर लोगों को छूने की कोशिश क्यों की? रवि को शिकायत है कि ट्वीटर पर मैंने इससे भी ज्यादा तीखे ट्वीट देखे हैं। मैं अभी तक समझ नहीं पाया हूं कि उन्हें एक ऐसे आदमी की परवाह क्यों हुई, जो सिर्फ 16 लोगों के लिए ही ट्विट करता है। यह गौरतलब बात है कि रवि श्रीनिवास के ट्विटर पर सिर्फ 16 फॉलोअर्स थे, लेकिन इस घटना के बाद यह आंकड़ा ढाई हजार को पार कर गया है। इसे कहते हैं असली ताकत! अभिव्यक्ति की इसी शक्ति से अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते हैं।

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