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कठघरे में है मीडिया!

सेना से जुड़ी खबरों को लेकर मीडिया की आलोचना हो रही है। कई प्रेक्षकों का कहना है कि 'ब्रेकिंग न्यूज' और एक-दूसरे को पीछे छोड़ने की होड़ में मीडिया मर्यादाएं लांघ रहा है। मीडिया से अपेक्षा की गई कि वह अपनी सीमा में रहे। केवल मीडिया को कठघरे में खड़ा कर देना ठीक नहीं। हमें जितना प्यार देश से है, उतना अभिव्यक्ति की आजादी से भी है। ये दोनों एक दूसरे के विरोधी नहीं, पूरक हैं।


हाल ही सेना से जुड़े मामलों की खबरों को लेकर मीडिया कटघरे में है। पहले, प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को लिखी गई थलसेनाध्यक्ष वी.के. सिंह की गोपनीय चिट्ठी लीक हुई। उसके बाद सेना की दो इकाइयों की सरकार को बिना सूचित किए दिल्ली की ओर कूच करने की सनसनीखेज खबर सामने आई। यही नहीं, एक न्यूज चैनल ने यह खबर प्रसारित की कि अगर जंग हुई तो भारतीय सेना 10 दिन तक ही लड़ पाएगी, क्योंकि सेना के पास इतना गोला-बारूद ही बचा है।
इन खबरों को लेकर मीडिया की आलोचना हो रही है। कई प्रेक्षकों का कहना है कि 'ब्रेकिंग न्यूज' और एक-दूसरे को पीछे छोड़ने की होड़ में मीडिया मर्यादाएं लांघ रहा है। वह अपनी जिम्मेदारियों को भूल गया है। इधर, केन्द्र सरकार और सेनाध्यक्ष का भी मानना है कि मीडिया को ऐसी खबरें प्रकाशित नहीं करनी चाहिए जिससे सेना और सरकार के बीच गलतफहमियां बढ़ें। यह दूसरी बात है कि दोनों तरफ से ही कुछ बयानबाजी ऐसी हुईं जिससे आपसी गलतफहमियां बढ़ीं। परन्तु मीडिया से अपेक्षा की गई कि वह अपनी सीमा में रहे।
एक पाठक ने लिखा—प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ईमानदार राजनेताओं में गिने जाते हैं। वी.के. सिंह की छवि भी ईमानदार जनरल की रही है। लेकिन मीडिया की खबरों ने दुर्भाग्य से इन तीनों को कटघरे में खड़ा कर दिया। पाठक का तर्क  है कि ईमानदार व्यक्ति भ्रष्ट लोगों की आंखों में खटकता है। उसके इर्द-गिर्द भ्रष्ट लोगों का गिरोह सक्रिय हो जाता है। तीनों शख्सियतें इसी कुचक्र का शिकार हो रही है। इसमें मीडिया का इस्तेमाल किया जा रहा है। मीडिया जाने-अनजाने भ्रष्ट और स्वार्थी तत्वों के हाथों खेल रहा है।
प्रिय पाठकगण! इसमें दो राय नहीं ऊपर जिन खबरों का जिक्र किया गया उनमें मीडिया के एक हिस्से ने अभिव्यक्ति की आजादी का अतिरंजित प्रयोग किया। खबरों के प्रस्तुतीकरण में अपेक्षित संयम नहीं बरता गया। इसलिए मीडिया का यह रवैया गैर जिम्मेदाराना मानने में किसी को शायद आपत्ति न हो।
संवेदनशील मसलों की रिपोर्टिंग बहुत सोच-समझकर की जानी चाहिए। इसमें कुछ गलत नहीं। आपत्ति तब होती है, जब संवेदनशीलता के नाम पर सच्चाई पर परदा डालने की अपेक्षा की जाए। सच्चाई छुपाने से समस्या टल सकती है, खत्म नहीं हो सकती। हमारा लक्ष्य समस्याओं का खात्मा होना चाहिए न कि टालना। फिर स्पष्ट करूं कि संवेदनशील मसलों पर मीडिया पूरी जिम्मेदारी बरते। सच्चाई पर परदा डालने की उससे अपेक्षा न की जाए तो ही बेहतर है। संवेदनशील तथ्यों की गोपनीयता सुनिश्चित करने का वैधानिक उत्तरदायित्व शासन-तंत्र पर है। मीडिया पर यह थोपा नहीं जाना चाहिए। वरना मीडिया की स्वतंत्रता की सीमा-रेखा कब लांघ दी जाए, इसकी कोई भनक भी नहीं लगेगी। सरकार तो आजकल वैसे भी मीडिया के 'पर' कतरने पर तुली है। चाहे वह किसी दल की हो। सभी भ्रष्ट सत्ताधीशों और रसूखदारों की आंखों में मीडिया की आजादी खटक रही है। कहीं विशेषाधिकार के नाम पर, तो कहीं गोपनीयता और संवेदनशीलता के नाम पर। ऐसे वातावरण में मीडिया की जिम्मेदारी और बढ़ गई है।
मीडिया ने सेना को लेकर सनसनीखेज खबरें छापने में रुचि दिखाई, उतनी ही सीएजी की रिपोर्ट में दिखानी चाहिए जो सेना की रक्षा तैयारियों की खामियों को लेकर पिछले साल दिसम्बर में आई थी। अफसोस की बात यह है कि हमारे जनप्रतिनिधियों ने भी प्रधानमंत्री को लिखा पत्र लीक होने को तो देशद्रोह कृत्य बताया, लेकिन सीएजी की रिपोर्ट पर खामोश रहे। अगर वे सचमुच देश की सुरक्षा को लेकर चिन्तित हैं तो उन्हें इस रिपोर्ट पर रक्षा मंत्रालय समेत केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा करना चाहिए था। सीएजी की रिपोर्ट क्यों नहीं देश का मुद्दा बनी, क्यों मीडिया की रिपोर्ट मुद्दा बन गई, इस पर ठंडे दिमाग से विचार करने की जरूरत है।
इंडियन एक्सप्रेस में सेना की दो इकाइयों के कूच करने की खबर सनसनी तो पैदा करती है, लेकिन यह सवाल भी उठाती है कि क्यों सेना के एक रूटीन अभ्यास ने सत्ता के गलियारों में हड़कम्प मचा दी। क्या इसे सेनाध्यक्ष की संभावित बर्खास्तगी से जोड़कर देखा गया? क्या सरकार और सेना में विश्वास के रिश्ते इतने कमजोर हो गए? क्या दुनिया की सबसे ताकतवर सेनाओं में शुमार हमारी सेना और सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की सरकार के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है? इन सवालों को खारिज करना जितना आसान है, उतना ही कठिन है इनका सामना करना। सच्चाई से आंख चुराकर केन्द्र सरकार अपनी व्यवस्थागत खामियों और जवाबदेही से बच नहीं सकती। जरूरत है तो खामियों को दूर करने की न कि परदा डालने की। मीडिया को या फिर सेनाध्यक्ष को कटघरे में खड़ा करके यही कोशिश की जा रही है। यह सही है कि उम्र विवाद की टीस में सेनाध्यक्ष ने भी कुछ गलतियां की हैं। बेशक, उन्हें की गई14 करोड़ घूस की पेशकश पर परदा नहीं पडऩा चाहिए था। उस पर कार्रवाई होनी चाहिए थी। इसमें सेनाध्यक्ष और सरकार बराबर दोषी है। लेकिन सरकार खुद पाक साफ रहकर अकेले सेनाध्यक्ष को निशाना बना रही है। क्या सरकार और सेनाध्यक्ष के बीच खींचतान का नतीजा नहीं है कि मीडिया में कई गोपनीय तथ्य लीक किए जा रहे हैं?
केवल मीडिया को कटघरे में खड़ा कर देने से इन सवालों का जवाब नहीं मिल सकता। हमें जितना प्यार देश से है, उतना अभिव्यक्ति की आजादी से भी है। ये दोनों एक दूसरे के विरोधी नहीं, पूरक हैं। भारतीय मीडिया इतना गैर जिम्मेदाराना नहीं कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मसलों की अनदेखी कर दे। सेना की दो इकाइयों की दिल्ली कूच सम्बंधी खबर को गौर से पढ़ें तो साफ हो जाएगा कि यह सेना के विद्रोह की बजाय सरकार के भय पर केन्द्रित है। सवाल है, जिस दिन सेनाध्यक्ष ने अपनी उम्र विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाई उस दौरान सरकार इतनी सशंकित क्यों थी कि सेना के रुटीन अभ्यास से घबरा गई। जबकि सेनाध्यक्ष तो अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का ही इस्तेमाल कर रहे थे। मीडिया भी यही कर रहा है।

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मीडिया संस्थान, पत्रकारों पर हमले

पत्रकारों से मारपीट, अपहरण से लेकर हत्याएं व मीडिया के दफ्तरों पर संगठित हमलों की पृष्ठभूमि का सबब यही है कि मीडिया की आवाज को दबाया जाए। वह आवाज जो सच्चाई सामने लाती है।

भारत के उ. पूर्वी राज्यों में मीडिया किन हालात से गुजर रहा है, इसकी एक झलक वहां के एक पत्रकार ने बयां की है। 50 वर्षीय प्रदीप फेंजौबम इम्फाल फ्री प्रेस के मालिक हैं और इसी अखबार के सम्पादक रहे हैं। हाल ही अंग्रेजी दैनिक 'द हिन्दू' में उनका इंटरव्यू प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने मणिपुर सहित उ. पूर्वी राज्यों में अखबार, टीवी चैनल्स और पत्रकारों के सामने आ रही कठिनाइयों का जिक्र किया।
प्रदीप के अनुसार क्षेत्र के पत्रकार हर समय भयपूर्ण माहौल में काम करते हैं। यहां सत्तारूढ़ दल हो, या विरोधी दल- सभी यही चाहते हैं कि उनकी भेजी हुई विज्ञप्ति अखबार में ज्यों की त्यों छपे। अगर कोई पत्रकार विज्ञप्ति से विपरीत तथ्य उजागर करता है और सच्चाई लिखता है तो उसकी खैर नहीं। या तो पत्रकार की पिटाई की जाती है या उसका अपहरण कर लिया जाता है। कई मामलों में तो पत्रकार की हत्या भी कर दी जाती है। प्रदीप के अनुसार मणिपुर में पिछले वर्षों में विभिन्न अखबारों के छह सम्पादकों का अपहरण करके हत्या की जा चुकी है। उन्होंने बताया- 'हम (पत्रकार) जिन्दगी का जोखिम उठाकर कलम चलाते हैं। स्वयं मेरे अखबार का रिपोर्टर कोन्साम रिषिकान्त 2008 में एक उग्रवादी द्वारा मारा जा चुका है। आज मणिपुर के पत्रकारों के लिए बंदूक के खौफ के साये में कलम चलाना कोई नई बात नहीं रह गई है।'
प्रिय पाठकगण! मीडिया संस्थानों और पत्रकारों पर हमले लगातार हो रहे हैं। देश में शायद ही कोई राज्य होगा, जहां पत्रकारों पर हमले नहीं किए गए हों। अलबत्ता, मणिपुर सहित उत्तरी पूर्वी राज्यों के जो हालात यहां बयां किए गए हैं, वे और भी ज्यादा खराब हैं। मीडिया पर हमले कहीं पर भी हों, किसी भी कारण से हों, गंभीर चिन्ता का विषय होना चाहिए। इसी स्तंभ में पाठक कई बार मीडिया पर हमले की विभिन्न घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रियाएं व्यक्त कर चुके हैं। शायद ही किसी पाठक ने मीडिया पर हमलों की पैरवी की होगी। मीडिया वास्तविक हालात की तस्वीर जनता के सामने रखता है, जबकि ऊंचे पदों पर बैठे लोग और निहित स्वार्थी तत्व हमेशा सच्चाई को छुपाना चाहते हैं। सच्चाई उजागर होने पर जनता के सामने उनकी पोल खुल जाती है। लिहाजा वे पत्रकारों और मीडिया संस्थानों पर हमले करवाते हैं। अफसोस की बात है कि मीडिया की आवाज को खामोश करने की कोशिशों का अभी तक कोई माकूल उपाय नहीं किया जा सका है।
पिछले माह मध्य प्रदेश के एक पत्रकार चन्द्रिका रॉय की परिवार सहित हत्या कर दी गई। पत्नी सहित उनके दो मासूम बच्चों को भी मौत की नींद में सुला दिया गया। वास्तविक स्थिति का खुलासा होना अभी बाकी है। मध्य प्रदेश में प्रतिपक्ष के नेता अजय सिंह का आरोप है कि चन्द्रिका रॉय अवैध खनन माफिया की आंख की किरकिरी बने हुए थे।
पाठकों को यह याद होगा, इन्दौर में दो वर्ष पहले पत्रिका पर सुनियोजित हमले किए गए थे, जब अखबार ने भूमाफियाओं की पोल खोलनी शुरू की। हॉकरों-वितरकों से पत्रिका के बंडल छीनकर उनकी क्रूरतापूर्वक पिटाई की गई। पाठकों में  इसकी जबर्दस्त प्रतिक्रिया हुई और लोकसभा में भी मामला गूंजा।
इसी माह की शुरुआत में बेंगलुरु में वकीलों के एक समूह ने पत्रकारों पर हमला बोल दिया। पत्रकार अदालत में कर्नाटक के पूर्व मंत्री जी.जनार्दन रेड्डी के खिलाफ अवैध खनन के मुकदमे की कवरेज करने गए थे। वकीलों का समूह इस बात को लेकर पत्रकारों से खफा था कि पिछले माह जब वे ऐसा ही उग्र प्रदर्शन कर रहे थे, तो मीडिया ने उनकी नेगेटिव कवरेज की। भंवरी अपहरण कांड की कवरेज कर रहे पत्रकारों पर जोधपुर में अभियुक्तों के रिश्तेदारों और समर्थकों ने हमला बोल दिया था।
मुम्बई के खोजी पत्रकार ज्योतिर्मय डे (जेडी) की हत्या को भी पाठक भूले नहीं होंगे, जो महाराष्ट्र के अंडर वल्र्ड सरगनाओं की सच्चाइयों को उजागर कर रहे थे। महाराष्ट्र में ही रेव पार्टी की कवरेज करने गए पत्रकारों पर समाजकंटकों का हमला सुर्खियां बना था। शिव सेना से जुड़े कार्यकर्ताओं द्वारा टीवी चैनलों और अखबार के दफ्तरों में तोड़-फोड़ की घटनाएं कई बार दोहराई जा चुकी हैं। कश्मीर, उड़ीसा, तमिलनाडू, बंगाल, आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में भी पत्रकार राजनीतिक दलों, अपराध समूहों, उग्रवादी संगठनों, कट्टरपंथियों के हमलों का शिकार होते रहे हैं।
पत्रकारों से मारपीट, अपहरण से लेकर हत्याएं तथा मीडिया के दफ्तरों पर संगठित हमलों की पृष्ठभूमि का एकमात्र सबब यही है कि मीडिया की आवाज को दबाया जाए। लोकतंत्र में असहमति जताने का हक सभी को है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी। दोनों की अपनी-अपनी मर्यादाएं हैं। लेकिन मीडिया से असहमति या शिकायतें दर्ज करने के वैधानिक तरीकों को छोड़कर हिंसक करतूतों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
मीडिया की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) में दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है, जिसकी रक्षा हर कीमत पर ही जानी चाहिए, लेकिन इस स्थिति का गंभीर पहलू यह है कि न तो राज्य सरकारें और न केन्द्र सरकार लोकतंत्र के चौथे पाये के महत्व और उपयोगिता को लेकर फिक्रमंद नजर आती हैं। सरकार चाहे किसी भी दल की हो। उल्टे मीडिया संस्थानों पर हमलों में कई बार उनकी कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं परोक्ष भूमिका स्पष्ट नजर आती है। यह इस समस्या का सर्वाधिक भयावह पक्ष है।

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पेड न्यूज : दोषी मीडिया पर कार्रवाई हो

पांच राज्यों में चुनाव परिणाम की तस्वीर आज साफ हो जाएगी, लेकिन उन अखबारों और टीवी चैनलों के नाम कब सामने आएंगे, जिन्होंने उम्मीदवारों के पक्ष में पैसे लेकर खबरें प्रकाशित कीं?
यह सवाल कई पाठकों के जेहन में उठ रहा होगा। खासकर, तब जब चुनाव आयोग द्वारा 167 उम्मीदवारों को पेड न्यूज के लिए नोटिस जारी किये गए । तीन मार्च को अंतिम चरण का मतदान संपन्न होने से पहले ये नोटिस जारी किये गये थे। इसलिए संभव है पेड न्यूज के आरोपी उम्मीदवारों की संख्या और बढ़ जाए। पाठकों को बता दूं कि इन चुनावों में खड़े करीब 7 हजार उम्मीदवारों में से एक हजार से भी अधिक उम्मीदवारों पर पेड न्यूज के आरोप लगाए गए थे। यह स्थिति सात चरणों में हुई मतदान प्रक्रिया के बीच के दिनों की है। चुनाव संपन्न होने तक यह आंकड़ा कहां तक पहुंचा होगा, इसका अंदाजा ही लगाया जा सकता है। जितने ज्यादा उम्मीदवार, उतनी ही ज्यादा पेड न्यूज की शिकायतें। आयोग ने चुनिंदा शिकायतों पर ही नोटिस जारी किये। लेकिन यह स्पष्ट है कि तमाम प्रयासों के बावजूद पेड न्यूज नामक मर्ज बढ़ता जा रहा है।
सवाल है-आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। कौन है इसके लिए जिम्मेदार ? क्या इस मर्ज का कोई इलाज नहीं ? बड़ा सवाल यह है कि मीडिया संस्थानों के नाम सामने आ जाएंगे, तब भी क्या उनका कुछ बिगड़ पाएगा, पिछली बार की तरह? यह बात तो सभी जानते हैं कि आज के अधिकांश नेता और राजनीतिक दलों की साख जनता की नजर में काफी गिर चुकी है। शायद ही किसी को अपनी जीत का पक्का भरोसा हो। हर कोई वे सारे हथकंडे आजमाना चाहता है, जिनसे जीत सुनिश्चित हो सके। उन्हीं में से एक हथकंडा पेड न्यूज है। उम्मीदवार अपने पक्ष में एक कृत्रिम माहौल मीडिया के जरिए पैदा करना चाहता है। वह अपने प्रचारकों द्वारा बढ़ा-चढ़ा कर तैयार की गई खबरों का प्रकाशन व प्रसारण कराता है। इसके लिए वह मीडिया संस्थानों को अनाप-शनाप भुगतान करता है।
इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति के लिए जन प्रतिनिधि, राजनीतिक दल और मीडिया तीनों ही जिम्मेदार हैं। यह सही है कि मीडिया का एक हिस्सा इस अनैतिक गठबंधन से खुद को बचाए हुए है। इनमें पत्रिका समूह का नाम प्रमुख है। भारतीय प्रेस परिषद की सूची में पेड न्यूज के लिए पत्रिका को छोड़कर कई बड़े अखबारों के नाम दर्ज हैं। दरअसल, जिस तेजी से पेड न्यूज का महारोग बढ़ता जा रहा है, उससे कुछेक मीडिया संस्थानों का बचे रहना किसी चमत्कार से कम नहीं। शायद पाठकों में अटूट विश्वास ही उनकी शक्ति का वास्तविक आधार बना हुआ है।
सवाल फिर भी शेष है। आखिर क्या है पेड न्यूज नामक इस मर्ज का इलाज? भारतीय प्रेस परिषद ने पिछले आम चुनावों में पेड न्यूज की हकीकत जानने के लिए एक समिति गठित की थी। समिति ने पूरी छानबीन के बाद अपनी रिपोर्ट परिषद को सौंप दी। समिति के एक सदस्य वरिष्ठ पत्रकार परंजाय गुहा ठाकुरता के अनुसार- ' पेड न्यूज संबंधी रिपोर्ट में इन सभी अखबारों और मीडिया संस्थानों क ा जिक्र किया गया, जिन्होंने पैसे लेकर खबरें छापी थीं। हमने उन सभी संस्थानों को अपना पक्ष रखने का मौका दिया, लेकिन दोषी अखबारों और मीडिया संस्थानों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। '
परिणाम सामने है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव अभियान के दौरान अखबार फिर पैकेज लेकर उम्मीदवारों के पास पहुंच गए। हालांकि अधिकांश अखबार क्षेत्रीय, भाषाई व स्थानीय हैं, पर यह स्पष्ट है कि इन मीडिया संगठनों को किसी का खौफ नहीं था। पंजाब विधानसभा चुनाव के दौरान एक राजनीतिक दल के प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि कुछ अखबारों ने उनके मुख्य उम्मीदवारों की पच्चीस दिन तक कवरेज के लिए दो करोड़ रुपए पैकेज की मांग रखी। जाहिर है, दोषी पाये जाने के बावजूद पिछली बार किसी अखबार के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होने से हौसले बढ़ गए।
दूसरी तरफ पेड न्यूज मामले में दोष सिद्ध होने पर चुनाव आयोग ने बीस अक्टूबर 2011 को उत्तरप्रदेश की बिसौली विधानसभा सदस्य उमिलेश यादव की सदस्यता खत्म कर दी थी। पेड न्यूज में यह पहली सजा थी। 167 उम्मीदवारों पर भी चुनाव आयोग की तलवार लटक रही है। ऐसे में मीडिया कब तक बचा रहेगा। उस पर लोगों की उंगलियां उठना स्वाभाविक है। आज उम्मीदवार और दलों की तरह मीडिया की साख भी खतरे में है।
भाजपा की चुनाव प्रक्रिया सुधार समिति के अध्यक्ष किरीट सोमैया के अनुसार-अगले चुनावों में पेड न्यूज साबित होने पर अखबार व टीवी चैनल मालिक व पत्रकारों पर आपराधिक मामले दर्ज किए जाएंगे। गत वर्ष जब वे जयपुर आए तो उनका दावा था कि उनकी समिति ने ही ऐसा सुझााव दिया था, जिसे केंद्रीय चुनाव आयोग ने मंजूर कर लिया और अगले चुनावों से इस पर अमल हो सकता है। निश्चय ही अगर ऐसा होता है तो चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया को जमीनी सच्चाई का पता चल जाएगा। जनता और सत्ता के बीच सेतु की विनम्र भूमिका निभाने वाले मीडिया के उस वर्ग के लिए यह चुनौती होगी कि वह मीडिया में घुस आए इस महारोग का जड़ से खात्मा कब और कैसे कर पाएगा? जब तक पेड न्यूज खत्म नहीं होगी, इसके अपराध की काली छाया संपूर्ण मीडिया जगत पर मंडराती रहेगी।

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सिर्फ रस्म निभाना है!


राजस्थान रोडवेज धुलंडी पर प्रदेश की महिलाओं को निशुल्क यात्रा की सुविधा मुहैया करवाएगा। यह खबर जिसने भी पढ़ी, उसे सरकार के इस फैसले पर हैरत हुई होगी। धुलंडी पर होली खेली जाती है। बहुत कम लोग सफर के लिए निकलते हैं। महिलाएं तो और भी कम निकलती हैं। ऐसे में निशुल्क बस यात्रा की सुविधा कितनी महिलाएं उठा पाएंगी? फैसला करते समय किसी अधिकारी के दिमाग में यह बात नहीं आई होगी—यकीन करना मुश्किल है। धुलंडी 8 मार्च को है। 8 मार्च को महिला दिवस भी है। इस अवसर पर प्रदेश की महिलाओं को राज्य सरकार निशुल्क यात्रा का तोहफा देना चाहती है। इसमें कोई हर्ज नहीं है, लेकिन फैसला करते समय यह तो सोचा होता कि इसका लाभ बहुत कम महिलाएं उठा पाएंगी। अन्य समुदाय की महिलाएं भी धुलंडी पर कम ही बाहर निकलती हैं। तो क्या अफसरों ने जानते-बूझते यह फैसला किया? महिला दिवस पर महिलाओं को खुश करने की इस रस्म अदायगी का तर्क समझ से परे है। खुद रोडवेज हर साल आधिकारिक तौर पर धुलंडी पर बसों का संचालन बंद रखता है। रोडवेज केवल शाम को बसें चलाता है, जब लोग होली खेल चुके होते हैं। होली के पर्व की इस सांस्कृतिक परम्परा का निर्वाह करते-करते अचानक धुलंडी पर बसों के संचालन का फैसला करना शायद ही किसी को भाएगा। महिलाओं को भी नहीं। अगर महिलाओं को लाभान्वित ही करना है, तो यह फैसला किसी और दिन के लिए टाला जा सकता था, लेकिन जब उद्देश्य ही रस्म अदायगी करना हो तो महिलाओं के हित-अहित की किसे परवाह है! राज्य सरकार रक्षाबंधन पर भी महिलाओं को निशुल्क यात्रा की छूट देती है। याद करें पिछला रक्षाबंधन। पूरे प्रदेश में महिलाओं की भीड़ उमड़ पड़ी थी। रोडवेज बसों में महिलाएं व बच्चे ठूंस-ठूंस कर भर दिए गए थे। बच्चों का क्या हाल हुआ था—लोगों को आज भी याद है। कुव्यवस्थाओं का आलम यह था कि जगह-जगह महिलाओं और उनके परिजनों ने रोडवेज को कोसा। लोग प्रतीक्षा कर रहे थे, लेकिन बसें नदारद थीं। बहुत कम तादाद में बसें चलाई गईं। महिलाओं को लाभान्वित करने का सरकार का फैसला अफसरों की नादानी का शिकार बन गया। बसों की संचालन और लोगों की संख्या का आकलन करने में रोडवेज बिल्कुल नाकाम रहा। एक अच्छे फैसले की किरकिरी हुई। यही इस बार किया गया। फर्क इतना-सा है कि पिछली बार बसें कम पड़ गई थीं—इस बार बसें महिला यात्रियों के लिए तरस सकती हैं। संभव है, ऐसा न भी हो, लेकिन यह तय है कि इस सुविधा का लाभ अधिकाधिक महिलाओं को नहीं मिल पाएगा, जो सरकार की इस घोषणा का वास्तविक उद्देश्य था।

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मीडिया है आंख और कान


बाहुबलियों के खिलाफ कोई राजनीतिक दल शिकायत दर्ज नहीं कराता, क्योंकि सब दलों में बाहुबली मौजूद हैं। सब दलों को वोट चाहिए। इसलिए जीतने के लिए सारे हथकंडे आजमाए जाते हैं। जनता बेचैन है। उसकी आवाज चुनावी कोलाहल और बाहुबलियों के खौफ में कहीं दब जाती है। ऐसे में मीडिया जनता की आवाज बने और चुनाव आयोग उसे सुने तो निष्पक्ष और निर्भय चुनाव संभव है, यही लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत है।


मीडिया जनता के मुद्दों को उठाकर किस तरह संवैधानिक संस्थाओं का ध्यान आकर्षित करता है और ये संस्थाएं मीडिया की खबरों का किस तरह जनहित में उपयोग कर सकती हैं, इसका एक अच्छा उदाहरण हाल ही में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने दिया। पत्रिका ने 15 फरवरी को चर्चित हस्तियों से ज्वलन्त मुद्दों पर बातचीत का नया कार्यक्रम शुरू किया—'पत्रिका ग्रुप इन कनवरसेशन विद न्यूज मेकर।' इस कार्यक्रम की पहली कड़ी में एस.वाई. कुरैशी को आमंत्रित किया गया। सम्पादकीय टीम ने उनसे बातचीत की। जहिर है, बातचीत का केन्द्रीय विषय चुनाव सम्बंधी ज्वलन्त मुद्दों को लेकर था। उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों में चुनाव के संदर्भ में उनसे कई सवाल पूछे गए। एक सवाल था— 'बाहुबलियों के डर से कोई इनके खिलाफ चुनाव आयोग को शिकायत नहीं करता। ऐसे में बाहुबल के आधार पर कई लोग चुनाव जीतकर आ जाते हैं?'
जवाब में मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा— 'अब ऐसा संभव नहीं होता। चुनाव के दौरान प्रत्येक पोलिंग बूथ की वीडियो मॉनिटरिंग होती है। 24 घंटे आयोग बाहुबलियों की वीडियो रिकार्डिंग करवाता है। इसके अलावा मीडिया के कैमरों की पैनी नजर से बच पाना और भी कठिन है।' संभव है उनकी बात में कुछ अतिश्योक्ति हो, लेकिन इसी क्रम में चुनाव आयुक्त ने एक महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा— 'हमने कई मीडिया रिपोर्टों के आधार पर बाहुबलियों और धन बांटने वालों के खिलाफ कार्रवाई की है। मीडिया को हम अपने आंख और कान मानकर चलते हैं।'
प्रिय पाठकगण! मुख्य चुनाव आयुक्त का यह कथन देश की सभी संवैधानिक संस्थाओं सहित व्यवस्था-तंत्र की उन समस्त इकाईयों के लिए नजीर है, जो जन-शिकायतों के बगैर कोई कार्रवाई न कर सकने की विवशता जताते हैं। कई सरकारी विभाग तो हाथ बांधे बैठे रहते हैं। सबके सामने घटना घटित होती है। जिस विभाग पर कार्रवाई का जिम्मा है वह आंखें मूंदे हैं। भले ही लोगों के कान फट रहे हों, मगर उनको कुछ सुनाई नहीं देता। उनके पास शिकायत जो नहीं आई। सरकारी कामकाज का यह एक सामान्य ढर्रा बन गया है। क्या इससे निजात पाना जरूरी नहीं?
बाहुबलियों के खिलाफ कोई राजनीतिक दल शिकायत दर्ज नहीं कराता, क्योंकि सब दलों में बाहुबली मौजूद हैं। चुनाव के दौरान कोई दल जोखिम मोल नहीं लेता। सब जानते-बूझाते चुप हैं। सब दलों को वोट चाहिए। इसलिए जीतने के लिए सारे हथकंडे आजमाए जाते हैं। जनता बेचैन है। उसकी आवाज चुनावी कोलाहल और बाहुबलियों के खौफ में कहीं दब जाती है। ऐसे में मीडिया जनता की आवाज बने और चुनाव आयोग उसे सुने तो निष्पक्ष और निर्भय चुनाव संभव है, यही तो लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत है।
मीडिया हर चुनाव में बाहुबलियों के कारनामे उजागर करता रहा है। कई बाहुबली आज जेलों में बंद हैं तो उसका काफी श्रेय मीडिया को है। लेकिन अकेले मीडिया भी सब कुछ नहीं कर सकता। सरकारी एजेन्सियों को भी तत्पर होने की जरूरत है। पिछले वर्षों में चुनाव आयोग ने शिकंजा कसना शुरू किया तो बाहुबलियों के तेवर ढीले पडऩे लगे। आयोग के अपने तंत्र ने तो काम किया ही, साथ ही उसने मीडिया रिपोर्टों और सूचनाओं को भी आधार बनाया।
यह सही है कि मीडिया का एक हिस्सा अपनी अनेक गैर-प्रामाणिक खबरों की वजह से अविश्वसनीय होता जा रहा है, फिर भी कई मीडिया घराने जनता में अपनी विश्वसनीयता और प्रामाणिकता को बरकरार रखे हुए है। शायद इसीलिए आज भी जनता के अधिकाधिक मुद्दे उठाने में जितना मीडिया कामयाब है उतना कोई दूसरा नहीं। उच्च न्यायालय अनेक मामलों में स्व-प्रेरित प्रसंज्ञान लेते हैं। इनमें ज्यादातर मीडिया के उठाए मुद्दे शामिल हैं। पत्रिका की कई खबरें माननीय न्यायालय में सुनवाई का आधार बनी हैं। पूरे जयपुर शहर को जलापूर्ति करने वाले रामगढ़ बांध क्षेत्र में अतिक्रमण और भू-आवंटन को लेकर की गई समाचार शृंखला 'मर गया रामगढ़' इसका ताजा उदाहण है।
तात्पर्य यह है कि जब उच्च न्यायालय और चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाएं अखबार की खबरों पर कार्रवाई कर सकती हैं, तो अन्य संस्थाएं क्यों नहीं। जब तक सरकारी आदेश नहीं हो जाता, महकमे सोते रहते हैं। मीडिया में घपले-घोटाले उजागर होते रहते हैं, सरकारी महकमों को कोई फर्क नहीं पड़ता। हालांकि कई बार शासन-तंत्र मीडिया की सूचनाओं पर सक्रिय होता दिखाई पड़ता है। अनेक मामलों में उसके कानों में जूं तक नहीं रेंगती। मध्य प्रदेश में विधायक रमेश मेंदोला के झूठे शपथ पत्र को लेकर पत्रिका ने प्रमाण सहित समाचार प्रकाशित किए, लेकिन उनका कुछ नहीं बिगड़ा। और तो और, प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी तक ने, प्रकरण में कुछ नहीं किया। बावजूद इसके कि उन्हें सम्बन्धित सारे कागजात दे दिए गए थे। हालांकि खबरें छपने के बाद विधायक को अदालत से जमानत अवश्य करानी पड़ी। मगर सरकार चुप रही।
शासन-तंत्र की हठधर्मिता के ऐसे कई उदाहरण भरे पड़े हैं। अखबार ऐसी सैकड़ों खबरें, सूचनाएं और मुद्दे रोजाना सामने लाते हैं, जो जनता की समस्याओं से ताल्लुक रखते हैं। इन पर अगर सम्बंधित संस्थाएं कार्रवाई करने की ठान ले तो जनता की अनेक समस्याओं का समाधान संभव है। मीडिया का अपना सूचना-तंत्र है। यह सरकारी नेटवर्क से अधिक प्रभावी है और तत्परता से कार्य करता है। आदर्श हाउसिंग घोटाला सर्वप्रथम मीडिया ने उजागर किया था, जो एक आर.टी.आई. कार्यकर्ता के जरिए 2003 में ही सामने आ चुका था। अगर सरकारी एजेन्सियों ने उस वक्त इस रिपोर्ट पर ध्यान दिया होता तो 8 साल तक यह मामला सरकारी फाइलों में दबा नहीं रहता। कॉमनवेल्थ खेल घोटाले को लेकर भी खबरें छप रही थीं, लेकिन सुनने-देखने वाले आंख कान बंद थे। 2 जी स्पैक्ट्रम और पाम ऑयल घोटाले में सरकार का यही रवैया रहा, जो बाद में गलत निकला। भंवरी देवी अपहरण कांड में शुरू से मंत्री और विधायक का नाम सामने आ रहा था, लेकिन राजस्थान सरकार ने उनके खिलाफ कार्रवाई कोर्ट की दखल के बाद ही की। सरकारों का यह रवैया मीडिया के प्रति उसके रुख को स्पष्ट करता है।

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आप कैसा अखबार पसंद करेंगे?

अंग्रेजी के दो भारतीय अखबारों के बीच ब्रांड की दिलचस्प जंग छिड़ी हुई है। यह जंग यू-ट्यूब, फेसबुक सहित कई सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर इन दिनों यूजर्स में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। इस विवरण का उद्देश्य सिर्फ यह है कि पाठक जान सकें कि वर्तमान में खबरों की प्रकृति और गुणवत्ता को लेकर क्या चल रहा है। वास्तविक निर्णायक तो पाठक ही हैं कि अखबार का आदर्श रूप कैसा हो खासकर, विशाल युवा पाठक वर्ग।

क्या आप ऐसा अखबार चाहते हैं जिसे पढ़ते हुए आप ऊंघने लगें और सो जाएं? या फिर ऐसा अखबार पढ़ना पसन्द करेंगे जो प्रतियोगिता के युग में आपको पीछे रखे और बुद्धू साबित कर दे?
प्रिय पाठकगण! ये सवाल मेरे नहीं हैं। ये सवाल अंग्रेजी के दो अखबारों के हैं, जो उन्होंने एक दूसरे के खिलाफ अपने विज्ञापन अभियान में उठाये हैं। इन दोनों भारतीय अखबारों के बीच ब्रांड की दिलचस्प जंग छिड़ी हुई है। यह जंग यू-ट्यूब, फेसबुक सहित कई सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर इन दिनों यूजर्स में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। आइए देखें माजरा क्या है।
पहला अखबार अपनी विज्ञापन फिल्म में सफेद वस्त्रधारी एक ऐसे व्यक्ति को दिखाता है जो हर परिस्थिति में सोता हुआ ही नजर आता है। आप पूछेंगे कौन है यह व्यक्ति? यह व्यक्ति प्रतिस्पर्धी अखबार का पाठक है। इसके हाथ या बगल में वही अखबार सिमटा है।
दृश्य देखिए- विजेता ट्रॉफी के साथ पूरी टीम फोटो खिंचवा रही है। सभी खिलाड़ी चुस्त मुस्कान के साथ गर्व से तने हैं। तभी कैमरे का फोकस इस व्यक्ति पर पड़ता है जो ग्रुप फोटो के दौरान लापरवाही से खर्राटे भरता नजर आता है। पृष्ठभूमि में बजता हुआ मजेदार दक्षिण भारतीय संगीत, इस दृश्य को भरपूर मनोरंजक बना देता है।
दूसरा दृश्य। सार्वजनिक वितरण के लिए पानी का टैंकर खड़ा है। उस पर बेशुमार प्लास्टिक के पाइप लटके हैं। जल संकट के दौर में बस्तीवासियों में पानी भरने की होड़ मची है। लेकिन यह व्यक्ति खाली बरतन के साथ चैन से ऊंघ रहा है। जाहिर है वह सोता रहेगा और खाली हाथ घर लौटेगा। पृष्ठभूमि में वही मजेदार संगीत।
एक और दृश्य देखिए। आतंककारी गोलियां बरसा रहा है। चारों तरफ अफरा-तफरी है। तभी कैमरे का फोकस गली के एक कोने में उभरता है। यह व्यक्ति यहां भी नींद निकाल रहा है। गोली कभी भी इसकी खोपड़ी के आर-पार हो सकती है। लेकिन इसे तो नींद से ही फुरसत नहीं।
ऐसे और भी कई दृश्य हैं। विपरीत, डरावने व चुनौतीपूर्ण हालात में भी यह व्यक्ति सोता रहता है। आखिर करे भी तो क्या। नींद है ही ऐसी चीज! तभी अंग्रेजी में स्लोगन दिखाया जाता है- 'क्या आप ऐसी खबरों से चिपके हैं जिन्हें पढ़कर आपको नींद आती है?' साथ ही मशीन पर धड़ाधड़ छपते हुए पहला अखबार अपना विज्ञापन दिखाता है और 'जागो चेन्नई' का नारा देता है। मानो कहता है 'वह' नहीं 'यह' अखबार पढि़ए। यही है आपको जगाये रखने वाला समाचार-पत्र!!
सहज जिज्ञासा होती है, अब दूसरा अखबार क्या करेगा? दूसरा अखबार भी कम नहीं। उक्त विज्ञापन का करारा जवाब देता है। खास बात यह कि दूसरा अखबार युवा-वर्ग के बहाने प्रतिस्पर्धी अखबार पर निशाना साधता है जो सटीक मार करता है।
देखिए -
एक कॉलेज परिसर में छात्र-छात्राओं पर प्रश्नों की बौछार की जाती है। मानों उनका सामान्य ज्ञान परखा जा रहा हो। प्रश्नकर्ता पूछता है- भारत का उपराष्ट्रपति कौन है? जवाब आते हैं- प्रतिभा पाटिल....आर.आर.पाटिल.......एपीजे अब्दुल कलाम ....(कुछ छात्र सिर खुजलाते हैं, कुछ होंठ चबाते हैं।) दूसरा सवाल पूछा जाता है- हैरी पॉटर शृंखला किसने लिखी? जवाब- जूलियस सीजर...(ज्यादातर छात्र-छात्राएं जवाब ही नहीं दे पाते)। तीसरा सवाल- बिजनेस टायकून रतन टाटा का उत्तराधिकारी कौन है? ज्यादातर छात्रों के जवाब आते हैं- उनका बेटा....रतन टाटा का सन.....एक छात्र नाम बोलता है- मुकेश अंबानी...यानी रतन टाटा का बेटा मुकेश अंबानी!... अगला सवाल- एटीएम का फुल फार्म क्या है? जवाब- एनी टाइम मशीन......ऑल टाइम मशीन... (कुछ छात्र निरुत्तर। खिसियाई हंसी हंसते हैं)। मेजर ध्यानचंद कौनसा खेल खेलते थे? कोई जवाब नहीं दे पाता। लगता है किसी ने उनका नाम ही नहीं सुना। ये सभी युवा बुद्धू साबित होते हैं।
इसके बाद प्रश्नकर्ता उनसे बॉलीवुड सितारों के बारे में सवाल पूछता है। कौनसी हीरोइन का नाम जीरो साइज से जुड़ा है? करीना....करीना...करीना। इस बार जवाबों से परिसर गूंज उठता है। अगला सवाल: रितिक रोशन का उप नाम क्या है? डुगू...डुगू....डुगू... ऐश्वर्या के लड़का हुआ या लड़की? फिर सभी धड़ाधड़ जवाब देते हैं- लड़की...लड़की...!
और फिर आखिरी सवाल। कौन-सा अखबार पढ़ते हैं आप? सभी छात्र एक अखबार का नाम दोहराते हैं जो बीप की ध्वनि में खो जाता है। लेकिन होठों की आकृति से साफ पता चलता है कि वे विपक्षी अखबार का नाम ले रहे हैं। इसी के साथ दूसरा अखबार भी अपना विज्ञापन दिखाता है और स्लोगन देता है- उस अखबार से आपको आगे रखे। युवा वर्ग को लक्ष्य करके किए गए इस प्रहार का जवाब पहला अखबार फिर देता है। इस बार उसके विज्ञापन का केन्द्र भी युवा है। वह उनमें जोश जगाता है- पलक पकड़कर उठो और हवा पकड़कर चलो...तुम चलो तो हिन्दुस्तान चले...चलो अकड़कर चलो।
इस विस्तारपूर्वक विवरण का उद्देश्य सिर्फ यह है कि पाठक जान सकें कि वर्तमान में खबरों की प्रकृति और गुणवत्ता को लेकर मीडिया में क्या चल रहा है। वास्तविक निर्णायक तो पाठक ही हैं कि अखबार का आदर्श रूप कैसा हो खासकर, विशाल युवा पाठक वर्ग। जिसके बारे में विज्ञापन में आंशिक सचाई ही बताई गई। इस वर्ग के बारे में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के एक बड़े हिस्से का खयाल है कि युवा सिर्फ मनोरंजन और फैशन जैसे विषयों को ही पसंद करता है। यही अधूरी सोच आज के मीडिया को भटका रहा है और वह तरह-तरह की बेतुकी सामग्री परोस रहा है। भारत में भ्रष्टाचार को लेकर चले सबसे बड़े आन्दोलन में अन्ना हजारे का साथ देने वालों में  80 फीसदी युवा थे। हरेक सही मुद्दे के साथ आज का युवा खड़ा है। बशर्त है उसे सही नीयत से उठाया जाए। उसे न पाखंड पसन्द है, न बेईमानी। वह पूरी तरह पारदर्शी है। यही आज के आम युवा भारतीय की तस्वीर है। इसे पत्रिका जैसे कुछ अखबारों ने ही समझा है। तभी तो वे विशाल पाठक-वर्ग में पढ़े और सराहे जाते हैं।

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राहत की सांस

जयपुर साहित्य उत्सव के आयोजकों को अगर अल्पसंख्यक समुदाय की भावनाओं की तनिक भी कद्र होती, तो वे आयोजन के अंतिम दिन सलमान रुश्दी की वीडियो कान्फ्रेंसिंग की घोषणा नहीं करते। आयोजकों की यह कैसी खुराफात थी!
यह जानते-समझते कि रुश्दी की आयोजन में किसी तरह की शिरकत एक समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचा सकती है—आयोजन के ठीक आखिरी दिन रुश्दी के वीडियो कान्फ्रेंसिंग का कार्यक्रम तय कर दिया। माना कि आयोजक इस बात की गारण्टी ले रहे थे कि रुश्दी विवादास्पद पुस्तक— 'सैटेनिक वर्सेज' के बारे में कुछ नहीं बोलेंगे। यह भी कि रुश्दी अपनी एक अन्य पुस्तक 'मिडनाइट्स चिल्ड्रन' पर ही बात करेंगे। इसके बावजूद यह सवाल तो बना रहेगा कि किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आपको क्या हक है? और बात जब एक समुदाय की भावनाओं से जुड़ी हो, तो यह सवाल न केवल आयोजकों से, बल्कि लेखक बिरादरी से भी पूछने का हक बनता है। मामला केवल अभिव्यक्ति की आजादी का नहीं है— यह सीधे-सीधे भावनाओं से भी जुड़ा है।

जिसे लेखन में पर्याप्त महत्व दिया गया है। रुश्दी के आने का कार्यक्रम रद्द करने का सही फैसला था। लेकिन बाद में रुश्दी का सम्मेलन के जरिए इतना प्रचार-प्रसार हुआ कि मानों एक समुदाय को चिढ़ाया जा रहा हो कि लो और रोको रुश्दी को। रही-सही कसर उन चार लेखकों ने पूरी कर दी, जिन्होंने विवादास्पद पुस्तक के अंश पढ़कर बखेड़ा खड़ा कर दिया। बखेड़ा इन लेखकों ने किया या करवाया गया, लेकिन इसका संदेश अच्छा नहीं गया। आयोजकों की कुटिल मनोवृत्ति के चलते न केवल कानून तोड़ा गया, बल्कि एक समुदाय की भावनाओं को फिर ठेस पहुंचाने की कोशिश की गई। ऐसा लगा जैसे साहित्य सम्मेलन के आयोजक समुदाय विशेष के सब्र का इम्तिहान लेने पर तुले हैं। ऐसा क्यों? कहीं यह परपीड़ा से खुश होने की संकीर्ण मानसिकता तो नहीं! या फिर आयोजन के प्रचार-प्रसार की व्यावसायिक भूख! तर्क दे सकते हैं कि रुश्दी न तो खुद सशरीर आयोजन में उपस्थित हो रहे थे और न ही वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिए वे कोई विवादास्पद वक्तव्य देने वाले थे फिर उन्हें क्यों रोका गया? बात इतनी आसान होती तो उनकी किताब को प्रतिबंधित करने की नौबत ही नहीं आती। रुश्दी ने 'सैटेनिक वर्सेज' में जो कुछ लिखा उससे मुस्लिम वर्ग नाखुश था तो इसका मतलब यह नहीं कि वह सिर्फ किताब से खफा था। उसकी नाराजगी रुश्दी से भी है। इसलिए कम से कम तात्कालिक तौर पर तो आयोजन को रुश्दी की छाया से दूर रखा ही जा सकता था।
आयोजकों ने सब जानते-बूझते हुए भी रुश्दी की वीडियो कान्फ्रेंसिंग का ऐलान करके गैर-जिम्मेदारी का ही परिचय दिया। जिस जयपुर में वे यह आयोजन कर रहे थे, उस शहर की फिजां खराब करने का उन्हें कोई हक नहीं। शुक्र है, सब कुछ शान्ति से निपट गया। अगर लोग भड़क जाते और कुछ अनहोनी हो जाती तो आयोजकों का कुछ बिगड़ता या नहीं, साहित्य की जरूर बदनामी होती। उसका दर्द जयपुर सालों भोगता। साहित्य लोगों को जोडऩे के लिए है, तोडऩे या मतभेद पैदा करने के लिए नहीं।

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