जयपुर से जयकुमार मंगल ने लिखा- 'दामन में दाग ही दाग' (पत्रिका, 26 नवम्बर) समाचार पढ़ा तो एक दिन पहले की सारी खुशियां काफूर हो गईं। समाचार था- नवनिर्वाचित बिहार विधानसभा में कुल 243 विधायकों में 141 विधायक दागी छवि के चुने गए।
दस साल पहले मुझे रोजगार की तलाश में बिहार छोड़ना पड़ा था। बिहार की खराब छवि के चलते एक आम बिहारवासी को अन्य प्रांतों में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। नीतीश कुमार के शासन में बिहार की छवि बदली। इसलिए उनके फिर शासन में आने से अन्य प्रांतों में रहने वाले बिहारी भी बहुत खुश हैं। लेकिन उक्त समाचार से वे जरूर निराश हुए होंगे। कम-से-कम मुझे तो निराशा हुई। जिस 'दागी' छवि ने बिहार को गर्त में धकेल रखा है- उससे उबरने में अभी पता नहीं कितना समय लगेगा। नि:संदेह नीतीश कुमार पर अभी तक ऐसा कोई 'दाग' नहीं है। तभी तो बिहारवासियों ने उन्हें भारी मतों से जिताया है। उन पर भी भारी उत्तरदायित्व है कि वह 'दागियों' से अपने को दूर रखें। अच्छा तो यही होता कि वे दागियों को टिकट ही नहीं देते।'
प्रिय पाठकगण! बिहार में विधानसभा चुनावों पर पूरे देश की नजर टिकी थी। विश्लेषक इन चुनावों को कई मायनों में भिन्न बता रहे थे। चुनाव परिणाम के बाद अलग-अलग विश्लेषण भी सामने आए। पाठकों का विश्लेषण क्या है, यह भी जान लीजिए।
उदयपुर से प्रताप सिखवाल ने लिखा- 'बिहार में जद (यू)-भाजपा गठबंधन सरकार ने इस बार दो नए रिकार्ड कायम किए हैं। एक तो यह कि किसी गठबंधन सरकार को इतना भारी बहुमत पहले कभी नहीं मिला। दूसरा यह कि इतनी तादाद में 'दागी' उम्मीदवार पहले कभी नहीं जीते। यह बिहार विधानसभा का नया रिकार्ड है, जिसमें 141 'दागी' माननीय विधायकों में 85 माननीय वे हैं जिन पर हत्या और हत्या का प्रयास जैसे संगीन जुर्म के मामले चल रहे हैं। गुलाब कोठारी जी (काले हीरे, 27 नवम्बर) ने सही लिखा- 'बिल्ली को दूध की रखवाली का ठेका!' जिस विधानसभा में बहुमत दागी सदस्यों का हो, वह जनता का भला कर पाएगी- यह नीतीश कुमार के लिए सबसे बड़ी चुनौती का सबब होगा।'
कोटा से अश्विनी श्रीवास्तव ने लिखा- 'राजनीतिक दलों में स्वच्छ छवि का उम्मीदवार चिराग लेकर ढूंढ़ने से भी नहीं मिलेगा, यह बात तो समझ में आती है। लेकिन गुंडा तत्वों को राजनीतिक दलों का टिकट कैसे मिल जाता है? यह सोचने की बात है। दिखने में ये सब उम्मीदवार चुनाव जीतकर आए हैं, इसलिए लोकतांत्रिक हैं। परन्तु हकीकत यह है कि जनता के सामने कोई विकल्प नहीं है। मैं 'काले हीरे' में व्यक्त किए गए इस विचार से पूर्णत: सहमत हूं कि चुनाव आयुक्त को ही आपराधिक छवि के लोगों पर चुनाव लड़ने से रोक लगा देनी चाहिए। राजनीति में सफाई अभियान तभी शुरू होगा। इस सम्बन्ध में मुझे राजनीतिक दलों से कोई उम्मीद नजर नहीं आती।'
भोपाल से विवेक तोमर ने लिखा- 'राजनीतिक दलों की हालत चुनाव परिणाम के बाद प्रकाशित हुए तथ्यों से स्पष्ट है जिनमें जद (यू), भाजपा, राजद, लोजपा, कांग्रेस आदि सभी दल शामिल हैं। जो दल जितनी ज्यादा सीटें जीता उसके उतने ज्यादा प्रत्याशियों पर ही संगीन केस दर्ज हैं। जद (यू) के विजयी 115 विधायकों में आधे से ज्यादा (58) दागी और इनमें भी 43 वे हैं जिन पर हत्या और हत्या के प्रयास के मामले दर्ज हैं। एक सदस्य तो ऐसा है, जिस पर अकेले हत्या के दस और हत्या के प्रयास के आठ मामले समेत कुल 17 केस दर्ज हैं। आश्चर्य होता है, जब 'पार्टी विद् डिफरेंस' का नारा देने वाली भाजपा के विजयी 91 उम्मीदवारों में से 58 दागी सदस्य चुनकर आ गए। लालू की राजद और पासवान की लोजपा की बात छोड़ दें तो विजयी 4 कांग्रेसियों में से 3 दागी हैं।'
उज्जैन से चन्द्रकान्त पाण्डे ने लिखा- 'बिहार में नीतीश कुमार का अब तक का शासन आश्चर्यजनक उपलब्धियों से भरा है। बिहार का मतलब कुछ साल पहले तक भ्रष्टाचार, अपराध, गरीबी और बेरोजगारी था, जिसे नीतीश के सुशासन ने एक नई पहचान दी। यह नीतीश के शासन में ही हुआ, जब चुनाव के दौरान कोई बूथ कैप्चरिंग नहीं हुई। कोई हत्या नहीं हुई। प्रदेश का विकास करने वाली राज्य सरकारों का पार्टी मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन होना चाहिए। चाहे वह नीतीश की सरकार हो या नरेन्द्र मोदी की या फिर नवीन पटनायक की। इन सभी मुख्यमंत्रियों ने अच्छा कार्य करके दिखाया है।'
अहमदाबाद से सुषमा बिरवानी ने लिखा- 'लोग अब नतीजे देने वाली सरकारों को वोट देने लगे हैं- यह शुभ लोकतांत्रिक संकेत हैं। राष्ट्रव्यापी दुष्प्रचार के बावजूद नरेन्द्र मोदी को गुजरात की जनता ने भारी मतों से जिताया था। भाजपा के सहयोग के बगैर नवीन पटनायक उड़ीसा में बहुत अच्छी तरह से शासन कर रहे हैं। साफ है, जो काम करेगा, जनता उसी को चुनेगी।'
जोधपुर से दीपेश प्रजापति ने लिखा- 'सुशासन देने वालों को जनता पसंद करती है, इसका मतलब यह नहीं है कि आपराधिक और भ्रष्ट छवि के लोगों को भी जनता पसंद करती है।'
कोटा से कौशल गुप्ता ने लिखा- 'बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने अच्छा काम किया तो जनता ने उन्हें पुरस्कार भी दे दिया। लेकिन बिहार की राजनीति को अगर नीतीश साफ-सुथरा नहीं बना सके तो यह उनकी विफलता होगी। वे दागियों से दूरी रखें। उन्हें बिहार की सूरत के साथ-साथ बिहार की राजनीति की सीरत भी
चमकानी होगी।'
दाग ही दाग
सुरक्षा से खिलवाड़
बेंगलूरु से अरुणा और आनंद विज ने लिखा-'भारत के संवेदनशील रक्षा प्रतिष्ठानों में शुमार मुंबई स्थित कोलाबा डिफेंस स्टेशन एरिया में आदर्श हाउसिंग सोसायटी की 100 मीटर ऊंची इमारत भ्रष्टाचार की सबसे कलंकित नजीर बन चुकी है। सबसे कलंकित इसलिए कि इसमें भ्रष्टाचारियों ने न देश की सुरक्षा का ख्याल रखा और न ही देश की रक्षा के लिए मर मिटे शहीदों (करगिल) की विधवाओं का, जिनके नाम पर इस इमारत की नींव रखी गई थी। 26/11 का हमला याद करके कांप जाते हैं। उस दिन हम मुंबई में ही थे। पाकिस्तानी आतंककारियों ने जो कुछ किया वह देश के सीने में खंजर घोंपने जैसा था। उस घटना से हमें सबक सीखना चाहिए था। लेकिन आदर्श हाउसिंग सोसायटी यह साबित करती है कि हम देश की सुरक्षा को लेकर कितने गैर जिम्मेदार हैं। चंद रुपयों के लालच में सब-कुछ बेच देते हैं। सेना की इंजीनियरिंग ट्रांसपोर्ट फेसिलिटी, जहां हथियारबंद वाहन पार्क किए जाते हैं, से सिर्फ 27 मीटर दूर है यह 31 मंजिला इमारत। सेना और नौसेना के डिपो- जिनसे सैनिकों को हथियारों, विस्फोटकों और संवेदनशील उपकरणों की आपूर्ति की जाती है- सिर्फ 100 मीटर दूर है, इस इमारत से। कोई भी इसकी ऊंची छत पर खड़ा होकर हमारे इन रक्षा प्रतिष्ठानों को आसानी से निशाना बना सकता है। इसलिए इस पूरे इलाके में तटीय नियमन क्षेत्र अधिसूचना लागू है जिसके तहत यहां बहुमंजिला इमारतों के निर्माण पर रोक है। लेकिन भ्रष्टाचारियों के लिए क्या तो कानून और क्या राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला!'
प्रिय पाठकगण! पिछले दिनों मीडिया में लगातार कई बड़े-बड़े भ्रष्टाचार के मामले सुर्खियों में रहे। इनमें खास तौर पर कॉमनवेल्थ खेल, 2 जी स्पैक्ट्रम और आदर्श हाउसिंग सोसायटी से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सिलसिलेवार खबरें प्रकाशित/प्रसारित हुईं। प्राय: हर रोज नए तथ्य उजागर हो रहे हैं। भ्रष्टाचार की खबरों पर पाठक त्वरित प्रतिक्रिया करते हैं। आप कॉमनवेल्थ पर पाठकों के विचार (नाक की चिंता) पढ़ चुके हैं। इस बार आदर्श सोसायटी पर पाठकों की राय जानते हैं।
जयपुर से डॉ. रमेश नारायण के अनुसार- 'आदर्श हाउसिंग सोसायटी का घोटाला सन् 20003 में ही सामने आ चुका था जब एक स्वयंसेवी संस्था की सूचनाओं के आधार पर इंडियन एक्सप्रेस के एक पत्रकार ने यह मामला उजागर किया। लेकिन मुंबई के बिल्डरों और नेताओं का गठजोड़ इतना ताकतवर है कि मामले को दबा दिया गया। यहां तक कि लोकसभा को भी गुमराह किया गया। यह तो भला हो नौसेना के वायस एडमिरल संजीव भसीन का, जिन्होंने इस बिल्डिंग को लेकर पिछले दिनों नौसेना प्रमुख को लिखा। भसीन ने सुरक्षा कारणों से बिल्डिंग की मौजूदगी पर आपत्ति जताई। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इसके बाद यह मुद्दा जोरों से उठा और अशोक राव चव्हाण को कुर्सी छोड़नी पड़ी।'
इंदौर से पंकज डोभाल ने लिखा- 'मुंबई में बिल्डरों की लॉबी सभी राजनीतिक दलों के लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी है। इसलिए कोई इसको खत्म करना नहीं चाहता। शिवसेना के मुख्यमंत्री मनोहर जोशी को जमीन घोटाले के कारण सत्ता छोड़नी पड़ी थी। लेकिन उसके बाद क्या हुआ? कांग्रेस के तीन मुख्यमंत्रियों के नाम आदर्श सोसायटी घोटाले में आ रहे हैं। भाजपा के एक नेता ने तो अपने ड्राइवर को भी फ्लैट दिलवा दिया। राकांपा के अजीत पवार का नाम भी आया है। कौन बचा है इस हमाम में? ऐसी स्थिति में अशोक चव्हाण के जाने और पृथ्वीराज चव्हाण के आने से कुछ फर्क नहीं पड़ेगा। आलाकमान केवल नेताओं की अदला-बदली करता है, किसी को सजा क्यों नहीं देता?'
उदयपुर से विनोद कृष्ण सेंगर ने लिखा- 'आदर्श हाउसिंग सोसायटी की नींव ही असत्य और फर्जीवाड़े पर टिकी है। बिल्डिंग के प्रमोटर ने करगिल शहीदों की विधवाओं, करगिल हीरोज तथा भारतीय सेनाओं में उल्लेखनीय योगदान करने वालों के नाम पर सोसायटी की रूपरेखा तैयार की थी। लेकिन बाद में फ्लैटों की ऐसी बंदरबाट हुई कि राजनेता, बड़े अफसर, उनके नाते-रिश्तेदारों को फ्लैटों की रेवडि़यां बांट दी गईं। बिल्डिंग के कुल 103 फ्लैट्स में से 37 ही सेना से संबंधित लोगों को दिए गए। इनमें सिर्फ 3 करगिल युद्ध सम्बन्धी हैं। और अब खबर आई है कि इनमें भी दो फर्जी नाम हैं।'
भोपाल से भूपेन्द्र ठुकराल ने लिखा- 'अफसरों, नेताओं और बड़े सैन्य अधिकारियों में फ्लैट लेने की होड़ क्यों मची, यह साफ जाहिर है। जिस फ्लैट की बाजार में 8 करोड़ रुपए कीमत थी, वह उन्हें 85 लाख रुपए में दिया गया।'
उज्जैन से राज शर्मा ने लिखा- 'सोसायटी के ये फ्लैट्स मुंबई के सर्वाधिक पॉश इलाके में है। यहां जमीन के भाव सबसे महंगे हैं। लेकिन सवाल तो सुरक्षा का है। यह रक्षा मंत्रालय की जमीन थी जो सेना के कब्जे में थी। कोई परिन्दा भी जहां नहीं फटक सकता, वहां भू-माफियाओं ने जमीन हड़प ली।'
कोटा से जयसिंह चौधरी ने लिखा- 'सोसायटी का घोटाला कॉमनवेल्थ और टेलीकॉम घोटाले से ज्यादा गंभीर है, क्योंकि इसमें देश की सुरक्षा सम्बन्धी पहलू जुड़े हैं इसलिए इसमें लिप्त सभी भ्रष्टाचारियों के नाम उजागर होने चाहिए और सबको सजा मिलनी चाहिए।'
सूरत से दीपक एस. खत्री ने लिखा- 'पर्यावरण मंत्रालय ने इस बिल्डिंग को गिराने की चेतावनी दी है। अव्वल तो ऐसा करना मुश्किल होगा। मगर सुरक्षा कारणों से बिल्डिंग गिराई जाती है तो इसका पूरा खमियाजा भ्रष्टाचार में लिप्त एक-एक व्यक्ति से वसूल करना चाहिए। चाहे वह नेता हो, या अफसर।'
कश्मीर किसका?
- क्या कश्मीर में शांति के लिए भारत सरकार को पाकिस्तान से बातचीत करनी चाहिए?
- क्या कश्मीर का भारत में विलय अंतिम नहीं है?
- क्या कश्मीरवासी सचमुच आजादी मांग रहे हैं और भारत को उसे स्वीकार कर लेना चाहिए?
- और, क्या कश्मीर कभी भारत का अभिन्न अंग नहीं रहा?
किसने क्या कहा, गौर करें।
- कश्मीर मसले का स्थायी समाधान पाकिस्तान को शामिल किए बिना नहीं हो सकता- दिलीप पडगांवकर (श्रीनगर में)
- कश्मीर का भारत में विलय अंतिम नहीं है- उमरअब्दुल्ला (श्रीनगर में)
- अब आजादी ही कश्मीर का रास्ता है- सैयद अली शाह गिलानी (हुर्रियत के कट्टरपंथी नेता, दिल्ली की एक सेमिनार में)
- कश्मीर कभी भी भारत का अभिन्न अंग नहीं रहा- अरुंधति राय (दिल्ली की इसी सेमिनार में)
सेवानिवृत्त शिक्षक आत्माराम गर्ग (जयपुर) ने लिखा, 'पत्रिका (25 अक्टूबर) में जब पढ़ा कि दिलीप पडगांवकर ने श्रीनगर दौरे में कहा कि कश्मीर समस्या का समाधान पाकिस्तान को शामिल किए बगैर नहीं हो सकता तो मुझे बड़ा आघात लगा। मैं पडगांवकर साहब की लेखनी का प्रशंसक रहा हूं। लेकिन उनके इस बयान से असहमत हूं। पूरी दुनिया जानती है कि कश्मीर घाटी में नफरत का जहर फैलाने वाला कौन है? भारत ने एक बार नहीं सैकड़ों बार अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की कारगुजारियों के सबूत रखे हैं।
कौन नहीं जानता पाक की शह पर कश्मीर के गैर मुस्लिमों को आतंकित करके योजनाबद्ध ढंग से
निकाला गया? आज लाखों कश्मीरवासी घर-बार और संपत्ति छोड़कर भारत के विभिन्न हिस्सों में शरणार्थियों की तरह रहने को मजबूर हैं। अपनी धरती से बिछुड़ने का गम कैसा होता है, कोई इनसे पूछे। इन सबको वापस कश्मीर में बसाए बगैर कश्मीर समस्या का समाधान कैसे सोचा जा सकता है।'
जबलपुर से डॉ. सतीश चंद्र दुबे ने लिखा- 'अगर पडगांवकर का कश्मीर से आशय पाक अधिकृत कश्मीर से है तो उनके बयान का स्वागत है। पाकिस्तान ने कश्मीर के जिस हिस्से को बलपूर्वक हड़प रखा है, उसे वापस पाने के लिए बातचीत में कोई हर्ज नहीं। भारतीय संसद ने 1994 में यह सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किया था कि पाक के कब्जे से कश्मीर को मुक्त कराके उसे पुन: भारत में शामिल करना है। यह संकल्प संसद का ही नहीं, पूरे देशवासियों का है। रही जम्मू-कश्मीर की बात तो इसमें पाकिस्तान का क्या काम? यह भारत का अंदरूनी मामला है। क्या बलूचिस्तान की समस्या के लिए पाकिस्तान कभी भारत को बातचीत के लिए आमंत्रित करेगा?'
इंदौर से जितेन्द्र पी. मालवीय ने लिखा, 'उमर अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री पद पर एक क्षण के लिए भी काबिज नहीं रहना चाहिए। आखिर उन्होंने पद की गरिमा भुलाकर गैर संवैधानिक बयान जो दिया। उमर अब्दुल्ला 26 अक्टूबर1947 की तारीख कैसे भूल गए, जब कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने अपनी रियासत का विलय भारत में करने की स्वीकृति दी। आजादी के बाद पांच सौ रियासतों का विलय भी भारत में इसी प्रकार हुआ। और ये सभी हिस्से आज विधिक तौर पर भारत के अभिन्न अंग हैं। फिर उमर अब्दुल्ला ने कैसे कहा कि कश्मीर का भारत में विलय अंतिम नहीं।'
देशबंधु पालीवाल (उदयपुर) ने लिखा- 'बड़े अफसोस की बात है कि अरुंधति राय जैसी बुद्धिजीवी लेखिका ने यह बयान दिया कि कश्मीर कभी भी भारत का अभिन्न अंग नहीं रहा। उन्हें प्राचीन भारत का ग्रंथ 'राजतरंगिणी' पढ़ना चाहिए जिसमें लेखक और इतिहासवेत्ता कल्हण ने कश्मीर का इतिहास लिखा है। महर्षि कश्यप ने इस क्षेत्र को बसने योग्य बनाया। सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के मगध साम्राज्य का कश्मीर भी एक हिस्सा था। चन्द्रगुप्त के पौत्र सम्राट अशोक ने राजधानी श्रीनगर को बसाया। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने तत्कालीन कश्मीरी राजा दुर्लभवद्र्धन के राज्य का वर्णन अपने यात्रा-वृत्तांत में किया है। महाकवि भवभूति और वाक्पतिराज ने कश्मीर में ही कालजयी साहित्य रचा।'
प्रीति कुमावत, नवलगढ़ (झुंझुनूं) ने लिखा, 'भारत में अभिव्यक्ति की आजादी है, इसका मतलब यह नहीं कि जिस राष्ट्र ने यह आजादी आपको दी है आप उसको ही तोड़ने की बात करें। कश्मीर की आजादी की बात कहकर इन लोगों ने भारत के करोड़ों लोगों की भावनाओं को आहत किया है।'
विनय व्यास (रायपुर) ने लिखा, 'भारत के मुकुट कश्मीर पर आज पड़ोसी मुल्कों की बुरी नजर है। पाक अधिकृत कश्मीर में चीन ने डेरा जमा लिया है। वहां चीन निरन्तर अपनी शक्ति बढ़ा रहा है। विश्व पर नजर रखने के लिए भौगोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सम्पूर्ण कश्मीर को वह अपने पिछलग्गू देश पाकिस्तान के कब्जे में देखना चाहता है। भारत को इस साजिश से सावधान रहना होगा।'
सुमन्त सिंह सोलंकी (जोधपुर) ने लिखा, 'यह सही है कि कश्मीर की समस्या अतीत में की गई कुछ गलतियों का परिणाम है। इसमें जवाहरलाल नेहरू द्वारा कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में ले जाना, धारा- 370 और सैनिकों की कुछ ज्यादतियां भी शामिल हैं। लेकिन कश्मीर का मतलब केवल कश्मीर घाटी नहीं है। लद्दाख और जम्मू भी इसी राज्य के हिस्से हैं इसलिए केवल घाटी में चंद लोगों की राय सम्पूर्ण कश्मीर पर थोपी नहीं जा सकती।'
सोमदेव सोढी (भोपाल) ने लिखा, 'कश्मीर सदियों से भारत का अभिन्न अंग था, है और भविष्य में भी रहेगा। भारत के दुश्मनों को यह बात अच्छी तरह जान लेनी चाहिए।'
नोबेल शांति पुरस्कार
अजमेर से डॉ. रोहित श्रीवास्तव ने लिखा- '9 अक्टूबर (पत्रिका) को जब यह समाचार पढ़ा कि चीन की जेल में बंद विद्रोही नेता लियू जियाबाओ को नोबेल शांति पुरस्कार (2010) विजेता घोषित किया गया है तो अंदाजा लग गया था कि चीन की क्या प्रतिक्रिया होगी और कैसी होगी। ज्यादा प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। इधर पुरस्कार की घोषणा हुई, उधर ड्रेगन ने अपना रंग-रूप दिखाना शुरू कर दिया। सबसे पहले तो चीन में इस समाचार के प्रसारण पर ही रोक लगा दी। इसके बाद उसने नोबेल समिति को कोसा। चीन की प्रतिक्रिया थी- एक अपराधी को सम्मानित कर नोबेल समिति ने अपने ही नियमों की अवहेलना की है। फिर नार्वे की सरकार को धमकाया। इतना ही नहीं लियू की पत्नी लियू जिया को बीजिंग में उनके घर में नजरबंद कर दिया। किसी मीडियाकर्मी को उनसे बात करने की इजाजत नहीं दी गई। दो दिन बाद जिया को पुलिस बिना बताए कहीं ले गई। फिर पता चला कि पुलिस ने उन्हें जेल में बंद पति से कुछ देर के लिए मिलवाया। लियू जियाबाओ को पत्नी से ही नोबेल पुरस्कार की जानकारी मिली। चीन के इस रवैये से शायद ही किसी को आश्चर्य हुआ होगा। जियाबाओ को शांति का नोबेल मिलना चाहिए या नहीं, यह बहस उतनी महत्वपूर्ण नहीं है, जितनी यह कि जिस व्यक्ति को चीन ने अपराधी घोषित करके जेल में बंद कर रखा है, आखिर उसका अपराध क्या है? नोबेल पुरस्कार ने पूरी दुनिया को यह जानने का अवसर दे दिया है। और यही चीन की बौखलाहट का सबसे बड़ा कारण है।'
भोपाल से अजित रैना ने लिखा- 'लियू जियाबाओ को पिछले दो दशक में बार-बार जेल में बंद किया गया। अभी वह 11 साल जेल की सजा काट रहे हैं। उनका अपराध यह है कि वह लोकतंत्र और मानवाधिकारों का समर्थन करते हैं। वे शांतिपूर्ण बदलाव के समर्थक हैं। उन्होंने चीन में राजनीतिक और संवैधानिक सुधारों की मांग की। उनका अपराध यह है कि वे चीन में एक पार्टी की सत्ता का विरोध करते हैं। उनका अपराध यह भी है कि उन्होंने वर्ष 1989 में थ्यानमन चौक में चीनी सरकार के नरसंहार का विरोध किया और चार्टर 8 का मसौदा तैयार किया। ऐसे 'अपराधी' को नोबेल पुरस्कार के लिए चुना जाए और दुनिया उसके लंबे अहिंसक संघर्ष को मान्यता दे, यह चीनी सर्व- सत्तावादी सरकार को कब सहन होगा।'
प्रिय पाठकगण! गत वर्ष अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया तो दुनिया भर में उसकी आलोचना हुई थी। दूसरी ओर इस वर्ष नोबेल शांति पुरस्कार पर चीन के अलावा शायद ही किसी देश ने आपत्ति की है। अमरीकी राष्ट्रपति के नोबेल पुरस्कार पर पाठकों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। आइए देखें पाठकों की इस बार क्या प्रतिक्रिया है।
जयपुर से इन्द्रदेव दवे ने लिखा- 'नोबेल शांति पुरस्कार कई बार विवादों में रहा है। लेकिन हर बार नोबेल समिति का चयन गलत हो, यह सही नहीं है। जियाबाओ के चयन से सिर्फ चीन नाखुश है। किसी देश को खुश या नाराज करना नोबेल पुरस्कार का आधार नहीं बन सकता। जियाबाओ को नोबेल पुरस्कार देने के लिए डेसमंस टूटू और लेक वालेसा जैसे विश्व प्रतिष्ठित लोग मुहिम चलाए हुए थे।'
जबलपुर से दमयन्ती सिन्हा ने लिखा- 'चीन सरकार की नीतियों से असहमति का मतलब है, जेल। प्रतिरोध के स्वर को सरकारी तानाशाही फौज और पुलिस के दम पर कुचल देती है। थ्यानमन चौक में 2500 लोगों को टैंकों के तले कुचल दिया गया जिनमें अधिकांश संख्या छात्रों की थी। 'द न्यूयार्क टाइम्स' ने सही लिखा कि चीन में कम्युनिस्ट पार्टी की सत्ता पर एकाधिकारवादी पकड़ के खिलाफ उठा हर स्वर देशद्रोह माना जाता है।'
बेंगलुरु से के.के. नायर ने लिखा -'चीन भले ही दुनिया में बड़ी आर्थिक ताकत हो। उसने अपने नागरिकों को भौतिक समृद्धि भी भले खूब प्रदान की हो, लेकिन मानवाधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों को वहां कोई जगह नहीं।'
उदयपुर से डी.एन. पालीवाल ने लिखा- 'चीन अपनी आर्थिक और सैन्य ताकत की धौंस पूरे विश्व को दिखाता है, लेकिन एक लेखक और चिन्तक के साधारण विरोध को भी सहन नहीं कर पाता।'
इंदौर से जीवन सिंह ने लिखा- 'धारा से विपरीत बहने का जज्बा रखने वाले शांतिप्रिय बदलाव के समर्थक लोग चीन को पसंद नहीं। ऐसे लोगों को वह अपनी सैनिक ताकत से कुचलना चाहता है। फिर चाहे वह लियू जियाबाओ हो या दलाईलामा।'
आयकर सर्वे के समाचार : गत दिनों एक प्रसिद्ध भुजिया निर्माता और एक ज्वैलर के ठिकानों पर आयकर सर्वे के बारे में पत्रिका में प्रकाशित समाचारों पर जयपुर के डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने लिखा- ''मैंने एक बात लक्ष्य की है कि इस तरह के समाचारों में अगर उनका संबंध किसी बड़े प्रतिष्ठान से होता है तो आरोपी का नाम लेने से परहेज किया जाता है। जबकि अगर ऐसी कार्रवाई किसी छोटे व्यापारी, व्यक्ति या प्रतिष्ठान पर होती है तो बेझिझक उसका नाम ले लिया जाता है। जैसे मिलावट के मामले में मावा या मिठाई विक्रेताओं के नाम तुरन्त लिख दिए गए। मेरे ख्याल से अगर किसी कानूनी विवाद से बचने के लिए ऐसा किया जाए तब तो ठीक है वरना अखबार का दायित्व यह भी है कि गैरकानूनी कार्रवाई में लिप्त प्रतिष्ठानों को जनता के सामने बेनकाब करें। इनका नाम लेने में संकोच क्यों होना चाहिए?''
प्रिय पाठकगण! डॉ. अग्रवाल का अनुमान सही है। कानूनी विवाद से बचने के लिए आम तौर पर ऐसा किया जाता है। कई बार आयकर विभाग कार्रवाई के कई दिन बाद तक यह बताने की स्थिति में नहीं होता कि दोष सिद्ध हुआ है कि नहीं। कई बार विभाग तत्काल करदाता की अघोषित आय और उस पर बकाया कर का पूरा विवरण जारी कर देता है। लेकिन दोनों स्थितियों में व्यक्ति या फर्म का नाम विज्ञप्ति में जाहिर नहीं करता। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति या फर्म नाम छपने पर कानूनी कारवाई करता है तो अखबार के पास समाचार की सत्यता सिद्ध करने के लिए कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं होता। दूसरी ओर मिलावट आदि के मामलों में बाकायदा नाम सहित संबंधित विभाग विज्ञप्ति जारी करता है। यह राज्य और केन्द्र सरकार के विभागों की अलग-अलग और विसंगत कार्य-प्रणाली का उदाहरण है। अगर आयकर विभाग विज्ञप्ति में नाम देना शुरू कर दे तो अखबार उसे कभी नहीं रोकेगा। अलबत्ता, सरकार की विसंगत कार्य प्रणालियों को सामने लाने का दायित्व भी मीडिया पर है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।
अयोध्या और मीडिया
पिछले साठ साल से चल रहे देश के सबसे संवेदनशील मुकदमे का फैसला आने के बाद भारत में शांति और सदभाव का माहौल देखकर दुनिया के कई देश अचंभित हैं। आखिर यह हुआ कैसे? क्या कट्टरपंथी ताकतें और क्षुद्र राजनीति करने वाली शक्तियां खत्म हो गईं? या जनता की परिपक्व सोच ने इन शक्तियों को खामोश रहने को मजबूर कर दिया? विश्लेषक अपने-अपने निष्कर्ष निकाल रहे हैं। इसमें दो राय नहीं कि शांति का श्रेय देश की जनता को है। लेकिन जनता की सोच को दिशा देने में मीडिया की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही। पाठकों की प्रतिक्रियाओं का यही निचोड़ है।
इंदौर से अवधेश श्रीवास्तव ने लिखा- 'अयोध्या मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ का फैसला आने से पहले जितनी आशंकाएं व्यक्त की गई थीं, वे सब निर्मूल सिद्ध हुई। क्या इसलिए कि सरकार ने सुरक्षा की चाक-चौबन्द व्यवस्था कर रखी थी? या इसलिए कि दोनों समुदायों के कट्टरपंथी तत्त्व खामोश रहे? या फिर इसलिए कि इस मुद्दे पर राजनीति करने वाले दलों ने अपना रवैया बदल लिया? मेरी राय में इनमें से किसी को भी अयोध्या फैसले के बाद रही शांति का श्रेय नहीं दिया जा सकता। इसका वास्तविक श्रेय दोनों समुदाय की परिपक्व होती सोच को दिया जाएगा। हालांकि जनता की परिपक्व सोच के कई कारण हैं, लेकिन मुझे इसमें मीडिया का रोल सबसे अहम नजर आता है। अखबारों ने अयोध्या प्रकरण की बहुत सकरात्मक कवरेज की। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी इस बार सराहनीय रोल निभाया। आखिर तथ्यपूर्ण जानकारियों और सदभाव व भाईचारे के सोद्देश्य संदेशों का जनमानस पर असर पड़ता ही है। मुकदमें के कानूनी पहलुओं को सामने रखकर भी एक तरह से मीडिया ने लोगों की जानकारी बढ़ाई।'
जयपुर से दीपेन्द्र सिंह सोलंकी ने लिखा- 'अयोध्या मामले से जुड़ी पिछले दिनों प्रकाशित 'पत्रिका' की सभी खबरें मैंने बहुत गौर से पढ़ीं। मुझे हर समाचार से नई और प्रेरक जानकारियां मिली। इलाहाबाद हाइकोर्ट का फैसला आने से काफी पहले (23 सितम्बर) 'पत्रिका' में प्रकाशित 'रिश्तों की नींव बहुत मजबूत' ने मुझे बड़ा प्रभावित किया। कश्मीर से लेकर केरल तक दोनों समुदायों के ऐसे कई धर्मस्थल हैं जहां दोनों धर्मों के लोग समान श्रद्धा भाव से जाते हैं। मुस्लिम होते हुए भी टीपू सुल्तान ने कई वैदिक मंदिर बनवाए। अतीत की बात छोड़ें और आज की नूर फातिमा (पत्रिका 29 सितम्बर 'मंदिर-मस्जिद से बड़ा देश') की बात करें तो वही सदभाव नजर आता है। वाराणसी की नूर फातिमा ने अपने मोहल्ले में शिव मंदिर बनवाया। इसी तरह 'भाईचारे पर नहीं आए आंच' (29 सितम्बर), 'अमन को किसी की नजर न लगे' (30 सितम्बर) तथा 'न जीत न हार' (30 सितम्बर) आदि समाचारों ने भी अयोध्या मामले की वास्तविक स्थिति को समझाने में मेरी बहुत मदद की। देश के युवाओं का दृष्टिकोण (पत्रिका सर्वे 28 सितम्बर) भी पता चला।'
बीकानेर से अब्दुल सलाम भाटी ने लिखा- 'बीकानेर शायद देश में पहला शहर है जहां पाकिस्तान के कायदे आजम जिन्ना के नाम पर सड़क बनी हुई है। यहां की गंगा-जमुनी संस्कृति बहुत मजबूत है। शायद इसीलिए यहां के लोगों ने पिछले दिनों सभी प्रमुख अखबारों और न्यूज चैनल्स के अयोध्या मसले को बहुत गौर से देखा और सकारात्मक कवरेज को सराहा।'
कई पाठकों ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले की विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में दोनों पक्षों की ओर से अपील करने के निर्णय पर भी प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं।
बाड़मेर से तेजसिंह चौधरी ने लिखा- 'उच्च न्यायालय ने न्यायसंगत फैसला किया है, तभी तो पूरे देश ने फैसले का स्वागत किया है पर दोनों तरफ कुछ लोग अपवाद हैं जो अब भी पुराना राग अलाप रहे हैं। उनके लिए गुलाब कोठारी ('राम-ओ-रहीम' 2 अक्टूबर) ने सही लिखा- 'आपको देशवासियों का सम्मान करना चाहिए जिन्होंने किस तरह अपने सब्र का परिचय दिया है। उनकी स्वीकृति के बिना कोर्ट (सुप्रीम कोर्ट) में चुनौती देना वाजिब नहीं कहा जाएगा। क्योंकि आप धर्म या सम्प्रदाय के प्रतिनिधि ही हैं, मालिक नहीं।'
भोपाल से रतिमोहन तिवारी ने लिखा- 'दोनों समुदायों की ओर से मामले की अपील की घोषणा से यह तो जाहिर है कि दोनों पक्षों को सुप्रीम कोर्ट का फैसला मानना होगा। बातचीत से न सही, न्यायालय से ही सही, इस समस्या का समाधान देश के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगा।'
झालावाड़ से श्रीमती गायत्री देवी ने लिखा- 'राजनीति वाले आग न लगाएं और मीडिया वाले उसे सुलगने न दें तो अयोध्या प्रकरण के शांतिपूर्ण समाधान को कोई नहीं रोक सकता।'
कोटा से प्रमोद सेन ने लिखा- 'अयोध्या मामले का हल जल्दी निकल आएगा क्योंकि इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले के बाद अब यह मुद्दा राजनीतिक दलों और कट्टरपंथी नेताओं के हाथ से निकल चुका है। जरूरत है जनमानस को निरन्तर जागरूक रखने की। यह काम मीडिया बखूबी कर सकता है।'
प्रिय पाठकगण!
मीडिया जनता की ही अभिव्यक्ति है। जनता इस मुद्दे के गुण-दोषों को पहचान चुकी है। अतीत से उसने बहुत कुछ सीखा है, मीडिया ने तो उसे याद भर दिलाया है। 1992 के बाद बहुत समय गुजर चुका है। एक पूरी पीढ़ी (युवा वर्ग) नए सोच और विचार के साथ हमारे सामने है, जिसे अनदेखा करना किसी के लिए आसान नहीं।
'हम भगवान नहीं'
पिछले दिनों 'पत्रिका' में राजस्थान में रेजीडेन्ट डॉक्टरों की हड़ताल से सम्बन्धित समाचार टिप्पणियां, लोगों की राय और सम्पादकीय प्रकाशित किए गए थे। प्रिन्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में डॉक्टरों का यह आन्दोलन सुर्खियों में रहा। इधर कई डॉक्टरों की शिकायत है कि उनके बारे में एकतरफा कवरेज हुई। उनका पक्ष जानने की किसी ने कोशिश नहीं की। उनको बार-बार 'भगवान' सम्बोधित करके कटघरे में खड़ा किया गया।
महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, जयपुर के मनोचिकित्सक डॉ. पार्थ सिंह ने लिखा- 'डॉक्टरों को भगवान-भगवान कहकर उन पर व्यंग्य किया जा रहा है, उन्हें खलनायक के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है। बस, बहुत हुआ, हमें बख्श दें। हम भगवान नहीं, आम नागरिक हैं। आम भारतीय नागरिक- जो सम्मान और सुरक्षा के साथ जीना चाहता है... और इतना चाहना तो कोई अपराध नहीं।'
डॉ. पार्थ ने लिखा- 'रेजीडेन्ट डॉक्टरों की असंवेदनशीलता की खबरें तो टीका-टिप्पणियों के साथ बड़े-बड़े अक्षरों में प्रकाशित की गई, परन्तु उन पर ढाए गए जुल्म पर दो लाइन तक नहीं लिखी गई। जोधपुर में पुलिस ने हॉस्टल में घुसकर रेजीडेन्ट डॉक्टरों के साथ जैसा बर्ताव किया, वैसा तो शायद अजमल कसाब जैसे आतंककारियों के साथ भी नहीं किया गया। 37 मेडिकल छात्रों को गम्भीर चोटें आईं। कई तो शायद अब आजीवन अपंग बन जाएं। ये है भगवानों के साथ बर्ताव करने का तरीका? चिकित्सकों को भगवान का दर्जा दिया जाना ही उनके भावनात्मक शोषण की वजह बन गया है। जब-जब चिकित्सकों ने अपनी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा के मुद्दे उठाए हैं, तब-तब उनको 'भगवान' होने का पाठ पढ़ाकर टरका दिया गया। फौजी और चिकित्सक की यही विडम्बना है। उनके जायज हक को उनके कर्त्तव्यों की याद दिलाकर ठुकरा दिया जाता है।'
'कर्त्तव्य परायणता का ठीकरा चिकित्सकों के सिर ही क्यों फोड़ा जाए? पुलिसकर्मी नागरिकों के रक्षक के रूप में भगवान हैं मगर वो थानों में बलात्कार करने से नहीं चूकते। देश निर्माण करने वाले इंजीनियर भी भगवान का रूप हैं, पर वो केवल अपने बैंक खातों का निर्माण करते रहते हैं। पत्रकार आजादी और अभिव्यक्ति के रक्षक के रूप में भगवान हुए पर आज वे भी बड़े-बड़े राजनेताओं और धनकुबेरों से पैसे लेकर उनकी खबरें छापते हैं। आज हालत यह है कि नई पीढ़ी चिकित्सक बनना ही नहीं चाहती। अनेक स्कूलों में जीव-विज्ञान का संकाय ही समाप्त कर दिया गया है? क्योंकि पूरी उम्र खपने के बाद भी उन्हें न अच्छा वेतन मिलता है, न सम्मान। ऊपर से कोई भी ऐरा-गैरा आकर उनसे मारपीट कर जाता है। रेजीडेन्ट डॉक्टरों के हड़ताल पर जाने से जो क्षति हुई वह अपूरणीय है, और इसका चिकित्सकों को बेहद अफसोस है। बिना इलाज के मौत हो जाना सभ्य समाज पर कलंक है। लेकिन ये हालात जिन परिस्थितियों में बने वे बेहद विचारणीय हैं।'
और अन्त में उन्होंने लिखा- 'कहा गया कि जो मांगें डॉक्टरों ने रखी वे बिना हड़ताल किए शान्तिपूर्ण तरीके से भी तो रखी जा सकती थी। परन्तु क्या व्यवहार में हमारा प्रशासन और सरकार शान्तिपूर्वक की गई मांगों को सुनते हैं?'
लगभग इसी तरह के विचार कोटा मेडिकल कॉलेज के छात्र (नाम स्पष्ट नहीं), महेन्द्र उपाध्याय, नेहा सिंह, प्रिया सिंघल, प्रवीण प्रजापत, (सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज, बीकानेर) सुप्रिया अग्रवाल, मोहनलाल भार्गव आदि रेजीडेन्ट डॉक्टर तथा उनके शुभचिन्तकों ने व्यक्त किए हैं। कुछ डॉक्टरों ने 8 सितम्बर को 'प्रवाह' में प्रकाशित 'प्रायश्चित जरूरी' (भुवनेश जैन) टिप्पणी पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जोधपुर की घटना के वीडियो लिंक भेजकर प्रश्न पूछे हैं कि इनमें आपको कौन हैवान नजर आता है डॉक्टर या पुलिस? और लिखा- 'भगवान को तो सब माफ करके अगले दिन अपने फूटे सिर और टूटी टांगें लेकर समाज की सेवा करनी चाहिए।'
एक मेडिकल छात्र ने लिखा- 'गुंडागर्दी पुलिस करती है और आप हमें बदनाम करते हो। प्रायश्चित तो आपको करना चाहिए।'
प्रिय पाठकगण! डॉक्टरों के इस आक्रोश से जाहिर है कि उन्होंने चौतरफा उठे विरोध और जन आक्रोश के स्वरों को नहीं सुना। 5, 6 व 7 सितम्बर को राज्य में रेजीडेन्ट डॉक्टरों की हड़ताल पर बहुत कुछ लिखा-कहा जा चुका है। हड़ताल का किसी ने समर्थन नहीं किया। उल्टे चिकित्सकों के आन्दोलन की जितनी भर्त्सना हुई, उतनी किसी की नहीं। इस दौरान जिन 70 मरीजों की मृत्यु हुई, उनके परिजनों को वे कैसेसमझाएँगे कि मरीजों की मौत स्वाभाविक कारणों से हुई। डॉक्टरी बहुत संवेदनशील कर्म है। तभी तो आपको 'भगवान' कहते हैं। मीडिया नहीं, आम आदमी का सम्बोधन है यह। वह दिल से डॉक्टर का सम्मान करता है। यह भी सच है कि जोधपुर में डॉक्टरों पर पुलिस ज्यादती की किसी ने प्रशंसा नहीं की। सभी ने पुलिसकर्मियों को दोषी माना। अखबार के समाचार और टिप्पणियों से भी यह स्पष्ट है। अलबत्ता सरकारी स्तर पर इस मामले में अभी तक पुख्ता कार्रवाई नहीं हुई। सरकारी कामकाज का अपना ढर्रा है। ऐसे मामलों में उसे अपनी शैली बदलनी चाहिए। पर डॉक्टरों को तो निसंदेह अपने रवैये पर विचार करना चाहिए। रेजीडेन्ट डॉक्टरों के बात-बात पर हड़ताल पर जाने के लिए बदनाम होने के कारण वे अपनी जायज मांगों के प्रति भी आमजन की सहानुभूति खोते जा रहे हैं। मीडिया को दोष देने और अन्यों से तुलना करने से क्या होगा? वे अपने चारों तरफ देखें। कौन उनके साथ हड़ताल में खड़ा हुआ? निसंदेह डॉक्टर सम्मान और सुविधाओं के हकदार हैं, लेकिन वे जीवन और मृत्यु से जुड़े अपने पेशे के कठोर कर्त्तव्य को भी नजरअंदाज न करें।
चीन की हरकतें
जयपुर से डा. दुष्यन्त कौशिक ने लिखा- 'पत्रिका के २८ अगस्त अंक में चीन को लेकर जो सामग्री प्रकाशित की गई, वह चीन की चालबाजियों का कच्चा चिट्ठा है। चीन की हरकतें नई तो नहीं हैं, लेकिन अब उसने नए मुद्दे उठाने शुरू कर दिए हैं। जैसे कश्मीर का मुद्दा। पाकिस्तान के साथ उसकी दोस्ती पुरानी है। फिर भी कश्मीर मुद्दे को वह दोनों देशों का अन्दरूनी मामला बताता रहा है। पहले उसकी पैंतरेबाजियां अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, लद्दाख क्षेत्रों तक थीं। अब कश्मीर मुद्दे को चीन ने बहुत सोच-समझाकर उठाया है। वह भारत को उकसाना चाहता है। पर धन्य हैं हम और हमारी सरकार। आज भी हमारा रवैया 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' जैसा बना हुआ है। एक बार हम अपनी पीठ में छुरा घुपवा चुके हैं। अब दूसरी बार चीन हमारे सीने में ही खंजर घोंपने को आमादा है।'
प्रिय पाठकगण! भारत की उत्तरी सैन्य कमान के कमाण्डर लेफ्टिनेंट जनरल बी।एस. जसवाल को चीन का वीजा देने से इनकार का मामला हाल ही सुर्खियों में आया। रक्षा विशेषज्ञों, राजनीतिक विश्लेषकों और कूटनीतिज्ञों के बीच यह मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है। दूसरी ओर चीन की हरकतों की नई-नई जानकारियां लगातार उजागर हो रही हैं। ऐसे में भारत को क्या करना चाहिए? अनेक लोग महसूस करते हैं कि भारत-चीन सम्बन्धों पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है। चीन की नई गतिविधियों और भारत के रवैए को लेकर पाठकों ने जबरदस्त प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं, जो दोनों देशों के रिश्तों की समीक्षा के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
अहमदाबाद से प्रो. दीपक सोनी ने लिखा- 'लेफ्टिनेंट जनरल जसवाल के बहाने चीन ने कश्मीर मुद्दे पर अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं कि वह पाकिस्तान के साथ है। हालांकि चीन के अब तक के रुख से भी साफ जाहिर था कि वह भारत के साथ नहीं है। लेकिन इतने स्पष्ट तौर पर उसने यह बात कभी स्वीकार नहीं की थी। यानी कश्मीर मसले पर चीन ने भारत के समक्ष दोहरा खतरा पैदा कर दिया है। एक, कूटनीतिक स्तर पर और दूसरा सामरिक स्तर पर। 'न्यूयार्क टाइम्स' ने हाल ही यह उजागर किया कि पाकिस्तान ने पाक अधिकृत कश्मीर के गिलगिट-बलिस्तान क्षेत्र का नियंत्रण चीन को सौंप दिया है। चीन यहां रेल और सड़क मार्ग बनवा रहा है। यह क्षेत्र विधिक तौर जम्मू-कश्मीर राज्य का हिस्सा है। इन तथ्यों की रोशनी में भारत की कूटनीति और रक्षा नीति दोनों फेल साबित हो रही हैं।'
कोटा के दीपेन्द्र सिंह ने लिखा- 'लेफ्टिनेंट जसवाल को वीजा से इनकार करना भारत का अपमान है। आखिर जसवाल सरकारी यात्रा पर बीजिंग जाने वाले थे। इस यात्रा के लिए वार्षिक रक्षा वार्ता के दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा समझाौते के लिए आपसी सहमति बनी थी। इसमें तय हुआ था कि दोनों देश एक-दूसरे के जनरल स्तर के सैन्य अधिकारी भेजेंगे। चीन का इससे पलट जाना अन्तरराष्ट्रीय कूटनीतिक संहिता के खिलाफ है।'इंदौर से शैलेन्द्र कुमार 'भारतीय' ने लिखा- 'चीन गरम और भारत नरम' यह नीति आखिर कब तक चलेगी? यह हमारी सैन्य गुप्तचर सेवा की नाकामी ही कही जाएगी कि गिलगित क्षेत्र में चीनी गतिविधियों की जानकारी हमें अमरीका से मिल रही है। फर्ज करें कि हमारे गुप्तचरों को यह जानकारी थी तो सवाल है, हमारी सरकार ने इस पर क्या कदम उठाया?'
जोधपुर से दामोदर अवस्थी ने लिखा- 'भारत को रक्षात्मक की बजाए आक्रामक कूटनीति अपनानी होगी। हमारी रक्षात्मक कूटनीति का ही यह नतीजा है कि आज चीन हमारे सिर (कश्मीर) पर आ बैठा है। 'चाणक्य नीति' भारत में ईजाद हुई, पर इस्तेमाल चीन कर रहा है, वह भी हमारे ही खिलाफ!'उदयपुर से गौरव मेहता ने लिखा- 'भारत को दक्षिण पूर्व एशिया खासकर, फिलीपींस, इण्डोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम, बर्मा, नेपाल आदि देशों से मजबूत सम्बन्ध बनाने चाहिए। जापान, कोरिया जैसे विकसित राष्ट्रों को ज्यादा तरजीह देनी चाहिए।'
भोपाल से अजीज अहमद ने लिखा- 'चीन को जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की तो फिक्र है, लेकिन पाक अधिकृत कश्मीर के गिलगित-बलिस्तान के स्थानीय शिया मुस्लिमों की जरा भी फिक्र नहीं, जिनके लोकतांत्रिक अधिकार पाकिस्तान बेरहमी से कुचल रहा है।'
बेंगलूरु से निर्मल अलेक्सेन्द्र ने लिखा- 'चीन की कारगुजारियों की लम्बी फेहरिस्त है। चीन ने २००८ में रिकार्ड २७० बार भारत में घुसपैठ की। गत वर्ष जुलाई में भारतीय सीमा के भीतर चीनी लाल सेना फिर घुस आई और अपने देश का नाम लिख दिया। हिमाचल के स्पीति और जम्मू-कश्मीर के लद्दाख इलाकों में चीनी घुसपैठ हुई। अरुणाचल प्रदेश को चीन दक्षिण तिब्बत कहकर अपना क्षेत्र बताता है। सिक्किम को चीन २००३ में मान्यता दे चुका था। लेकिन यहां भी वह घुसपैठ करता रहता है। भारतीय सीमा क्षेत्र के पास मिसाइलें तान देता है। इन सबके जवाब में हमारे रक्षा मंत्री ए।के. एंटनी क्या कहते हैं- हमारे रक्षा सम्बन्धों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। चीन के साथ हमारे करीबी सम्बन्ध हैं। यह तो हद है। यह सहनशीलता नहीं कायरता है।'
श्रीगंगानगर से पवन बग्गा ने लिखा- 'हमें चीन से पूछना चाहिए कि वह पाकिस्तान को रक्षा सहायता क्यों देता है, जो आतंकवाद का जनक है। हम चीन से यह भी पूछें वह हमारी १९६२ में हथियाई ४३ हजार वर्ग किमी. भूमि कब लौटाएगा? हमें पूछना चाहिए कि चीन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता को कब समर्थन देगा? हम चीन से यह भी पूछें कि वह तिब्बतवासियों को लोकतांत्रिक अधिकारों से कब तक वंचित रखेगा? हम पूछें कि चीन भारतीय कश्मीरी नागरिकों और अरुणाचलवासियों को वीजा की सुविधा कब शुरू करेगा?'






