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कुदरत का कहर : मीडिया का भेदभाव!

जम्मू-कश्मीर की बाढ़ को लेकर मीडिया ने जो संवेदनशीलता दिखाई वह देश के उत्तर-पूर्व (असम, मेघालय, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश) में आई बाढ़ में कहीं नजर नहीं आई। जबकि बाढ़ का कहर और उससे प्रभावितों की त्रासदी किसी भी तरह कमतर नहीं थी।
क्या मीडिया ने देश के दो अलग-अलग हिस्सों में आई बाढ़ की कवरेज में भेदभाव बरता? निस्संदेह, जम्मू-कश्मीर में पिछले 60 वर्षों की यह सबसे भीषण बाढ़ थी। वहां के लोगों ने झोलम का ऐसा रूप पहले कभी नहीं देखा था। राज्य के ढाई हजार से अधिक गांवों में बाढ़ ने कहर बरपाया। 300 से अधिक लोगों की जान चली गई। 10 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हुए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी तत्परता से बाढ़ प्रभावित इलाकों का हवाई सर्वेक्षण करने के बाद कहा- 'यह राष्ट्रीय स्तर की आपदा है।' उन्होंने एक हजार करोड़ रुपए की बाढ़ पीडि़तों की सहायता की घोषणा की। सरकारी तंत्र ने सक्रियता दिखाई। सेना के बचाव व राहत कार्य तेजी से शुरू हुए।
शायद इसीलिए राष्ट्रीय मीडिया ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में लगातार दस दिन तक जम्मू-कश्मीर की बाढ़ सुर्खियों में रही। 'जन्नत' कहे जाने वाले कश्मीर में कुदरत का कहर कयामत बनकर किस तरह टूटा, इसकी हकीकत मीडिया ने देश को बताई।
लाइव रिपोर्टिंग, जलप्लावन की दर्दनाक तस्वीरें, पीडि़तों की आप-बीती तथा मानवीय संवेदनाओं को छूने वाले वृत्तांत मीडिया के जरिए ही देश के लोगों ने पढ़े, सुने और देखे। पीडि़त परिवारों के बिछुड़े लोगों को मिलाने और उनके बारे में जानकारियां देने में मीडिया की अहम भूमिका सामने आई। लोगों ने यह भी देखा कि घाटी में आम दिनों में सेना पर पत्थर बरसाने वालों ने किस तरह सेना की रहनुमाई में बाढ़ से अपनी जान बचाई।
सही है, जब देश के किसी हिस्से में तबाही मची हो तो राष्ट्रीय मीडिया उसकी अनदेखी कैसे कर सकता है। आपको याद होगा, पिछले साल उत्तराखंड में बाढ़ ने भयानक कहर बरपाया था। 6 हजार लोगों की जानें चली गईं। ४ हजार से ज्यादा गांव जलमग्न हो गए। उत्तराखंड की त्रासदी भीषणतम त्रासदियों में से एक थी। उस दौरान राष्ट्रीय मीडिया जिस तरह तत्पर हुआ, उसी तरह कश्मीर में भी हुआ। हां, तब 24 घंटे चलने वाले चैनलों ने जरूर अति कर दी थी। उसकी आलोचना भी की गई थी लेकिन उस वक्त मीडिया, खासकर चौबीस घंटे चलने वाले न्यूज चैनलों की पेशेगत जिम्मेदारी को लेकर इंसानी भेदभाव और अनदेखी का कोई आरोप नहीं लगाया जा सकता था। मगर यह आरोप इस बार कश्मीर की बाढ़ के दौरान मीडिया कवरेज खासकर न्यूज चैनलों पर की गई रिपोर्टिंग को लेकर अवश्य लग चुका है। इसे अगर और स्पष्ट कहूं तो यह कि जम्मू-कश्मीर की बाढ़ को लेकर मीडिया ने जो संवेदनशीलता दिखाई वह देश के उत्तर-पूर्व (असम, मेघालय, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश) में आई बाढ़ में कहीं नजर नहीं आई। जबकि बाढ़ का कहर और उससे प्रभावितों की त्रासदी किसी भी तरह कमतर नहीं थी।
जम्मू-कश्मीर की तरह ही उत्तर-पूर्वी राज्यों का एक बड़ा हिस्सा भीषण बाढ़ की तबाही से जूझा रहा था। कश्मीर में बाढ़ से सिर्फ एक सप्ताह पहले तक ब्रह्मपुत्र ने झोलम से भी अधिक रौद्र रूप धारण कर रखा था। उत्तर-पूर्व के राज्यों में बाढ़ की क्या स्थिति है और वहां के लोग किन परिस्थितियों से गुजर रहे हैं इसकी एक झालक भी चौबीस घंटे चलने वाले हमारे इन राष्ट्रीय कहे जाने वाले चैनलों में दिखाई नहीं पड़ी। जो थोड़ी बहुत सूचनात्मक तौर पर जानकारियां सामने आईं वह भी प्रिंट मीडिया के जरिए। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को हत्या, बलात्कार, गॉसिप या फिर मनोरंजन परक कथा-कहानियों से ही फुरसत नहीं थी। केन्द्र सरकार ने तो उत्तर-पूर्वी राज्यों की बाढ़ को बहुत हल्के में लिया ही, मीडिया ने भी यही किया। मानों टीवी चैनल्स सरकार का अनुसरण करने में लगे हों। उत्तर-पूर्व के राज्यों में कुल मिलाकर २० लाख से भी अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित हुए थे। अकेले असम के १६ जिलों में १२ लाख लोग बाढ़ से बुरी तरह पीडि़त थे। (पत्रिका: २८ अगस्त) जबकि सिर्फ डेढ़-पौने दो लाख पीडि़तों को ही सरकारी राहत शिविरों में शरण दी जा सकी थी। ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों ने असम में लगातार हुई बारिश से भारी तबाही मचा रखी थी। दो हजार से अधिक गांव पूरी तरह जलमग्न थे। दूर-दराज के ग्रामीण इलाके हर तरह के सम्पर्क  से कटे हुए थे। कच्चे झाोंपड़ों में रहने वाली गरीब ग्रामीण आबादी को अस्तित्व का संघर्ष करते हुए देखा जा सकता था। लोग पेड़ के डंठल की नावें बनाकर खतरनाक ढंग से उफनते पानी को पार कर रहे थे। ये हालात कुछ प्रेस एजेन्सियों के हवाई सर्वेक्षणों और तस्वीरों में कुछ राष्ट्रीय अखबारों के जरिए सामने आए। अगर असम सहित उत्तर-पूर्वी राज्यों में बाढ़ की विभीषिका की आपको वास्तविक थाह लेनी है तो गूगल सर्च करके देखिए।  प्रेस एजेन्सियों के फोटोग्राफ्स और विवरण सारी स्थिति बयां कर देंगे। मेघालय में जिंजिरम नदी के कारण काफी तबाही हुई। करीब सवा लाख लोग बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हुए। मणिपुर के लाम्फेलपेट इलाके के कई हिस्सों में नाम्बुल नदी के उफान ने बरबादी मचाई। अरुणाचल प्रदेश में लगातार बारिश तथा सियांग और संबासिरी नदियों में उफान से जनजीवन अस्त-व्यस्त रहा। प्रदेश का पूर्वी सियांग और लोहित जिला अन्य हिस्सों से कट गया था। छितरी आबादी और विकट क्षेत्र के कारण बाढ़ प्रभावितों की वहां कोई मदद करने वाला नहीं था लेकिन केन्द्र सरकार ने अनदेखी की तो मीडिया भी सोया रहा। सरकार का असम की बाढ़ के प्रति नजरिया केन्द्रीय मंत्री वी.के. सिंह के बयान से ही स्पष्ट था। वी.के. सिंह 'डेवलपमेंट ऑफ नॉर्थ-इस्टर्न रीजन' (डीओएनईआर) के प्रभारी मंत्री हैं। प्रेट्र के संवाददाता ने जब उनसे असम में बाढ़ के हालात के बारे में पूछा तो उनका जवाब था- 'असम में बाढ़ कोई नई बात नहीं है।' असम सहित उत्तर-पूर्व के ज्यादातर राज्य हर वर्ष बाढ़ की विभीषिका से जूझाते हैं, यह वहां के निवासियों का जज्बा है लेकिन क्या इसीलिए हमें उनकी पीड़ा से कोई सरोकार नहीं? यह कैसी संवेदनहीनता है? देश के नागरिकों के बीच भेदभाव करने की यह कैसी मानसिकता है? इन स्थितियों में जम्मू-कश्मीर में अगर सरकार की तत्परता तथा असम में उदासीनता को जम्मू-कश्मीर राज्य में आसन्न चुनाव से जोड़कर देखा जाए तो क्या गलत है? खैर, सरकार और विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने राजनीतिक कारणों से यह विभेद करते हैं लेकिन मीडिया भी यही करे तो यह गंभीर चिन्ता का विषय होना चाहिए। उत्तर-पूर्व के लोगों में यह भावना और मजबूत होगी कि सरकार तो है ही देश का मीडिया भी उनकी समस्याओं को लेकर संवेदनहीन है। मीडिया, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने हाल ही देश के दो अलग-अलग हिस्सों में आई बाढ़ को लेकर जो रवैया अपनाया, उससे तो यह प्रमाणित भी हुआ है

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मीडिया में 'ट्राई' की सिफारिशें

चाहे किसी भी दल की सरकार हो, बातें तो सभी मीडिया की स्वतंत्रता की करती हैं लेकिन कोई भी सरकार मीडिया को पूरी तरह स्वतंत्रता देना चाहती नहीं। स्वतंत्र मीडिया लोकतंत्र का रक्षक तो हो सकता है लेकिन सरकार का रक्षक भी हो, यह जरूरी नहीं।

'ट्राई' (टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी आफ इंडिया) ने एक बार फिर भारतीय मीडिया को सरकारी दखल और बड़ी कंपनियों के बढ़ते एकाधिकार के खतरों से आगाह किया है। हालांकि 'ट्राई' ने पांच वर्ष पूर्व अपनी विस्तृत रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी लेकिन इतना समय बीत जाने के बाद भी सरकार ने कुछ नहीं किया। इस स्थिति पर चिन्ता जाहिर करते हुए 'ट्राई' ने हाल ही अपनी ताजा सिफारिशें सरकार को भेजी हैं। इन सिफारिशों में कहा गया है कि न केवल सरकार को मीडिया में हस्तक्षेप करने से दूर रहना चाहिए, बल्कि मीडिया में पूंजी के माध्यम से स्थापित किए जा रहे एकाधिकार व वर्चस्व के खतरों को रोकने का भी प्रयास करना चाहिए।
'ट्राई' ने और भी कई सिफारिशें की हैं जिनका सम्बन्ध इलेक्ट्रॉनिक ही नहीं, प्रिंट मीडिया से भी है। 'ट्राई' के पास प्रसारण नियमन का ही अधिकार है। शायद इसीलिए उसकी सिफारिशें और उन्हें जारी करने के अधिकार को लेकर प्रिंट मीडिया में कुछ लोगों ने एतराज जताया है। सवाल किया जा रहा है कि मीडिया-उद्योग ने आज जो स्वरूप धारण कर लिया है, वह बिना विशाल पूंजी के कैसे टिक पाएगा? सवाल अपनी जगह सही है। इसका समाधान मुश्किल मगर असंभव नहीं है। लेकिन इसकी आड़ में मीडिया से जुड़े बुनियादी मुद्दों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। 'ट्राई' की सिफारिशों को इसी दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है। 'ट्राई' की बुनियादी दो सिफारिशों पर ही गौर करें तो उनमें आपत्ति की कोई बात नजर नहीं आती।
 मीडिया में सरकारी दखलंदाजी को लेकर देश में एक पाखंड साफ तौर पर देखा जा सकता है। चाहे किसी भी दल की सरकार हो, सभी बातें तो मीडिया की स्वतंत्रता की करती हैं लेकिन कोई भी सरकार मीडिया को पूरी तरह स्वतंत्रता देना चाहती नहीं। स्वतंत्र मीडिया लोकतंत्र का रक्षक तो हो सकता है लेकिन सरकार का रक्षक भी हो, यह जरूरी नहीं। सरकार के घपले घोटाले और शासन की विसंगतियों को लोगों के सामने लाना मीडिया का काम है। सरकार को यही रास नहीं आता और वह मीडिया को काबू में करने के प्रत्यक्ष व परोक्ष हथकंडे अपनाने लगती है। सरकार नियंत्रित या निर्देशित मीडिया कभी अपनी भूमिका को सही ढंग से नहीं निभा सकता। उसका पतन अवश्यंभावी है। ऐसे में अगर 'ट्राई' मीडिया को सरकार की दखलंदाजी से बचाने की सिफारिश करता है तो इसमें गलत क्या है।
 इसी तरह एकाधिकार भी किसी उद्योग के विकास में सबसे बड़ी बाधा है। खासकर मुक्त अर्थव्यवस्था में तो यह एक गंभीर रोग से कम नहीं। भारतीय मीडिया में एकाधिकार की चर्चा ने पिछले दिनों तब जोर पकड़ा जब रिलायंस इंडस्ट्रीज ने नेटवर्क-१८ को खरीद लिया जिसके तहत कई न्यूज चैनल और वेब पोर्टल्स संचालित होते हैं। 'ट्राई' ने अपनी सिफारिशों में न केवल एकाधिकार को मीडिया उद्योग के लिए घातक बताया है बल्कि मीडिया में मालिकाना हक और नियंत्रण के अन्तर को भी स्पष्ट किया है। 'ट्राई' के अनुसार बिना बहुलांश हिस्सेदारी के भी मीडिया इकाइयों पर नियन्त्रण किया जा सकता है। नियंत्रण' को 'ट्राई' ने विस्तृत परिभाषित किया है। मीडिया के विकास में 'ट्राई' ने बड़ी कंपनियों के एकाधिकार और नियंत्रण दोनों को एक बुराई मानते हुए अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य एच.एच.आई. (हरफिंडाल हर्शमैन इंडेक्स) पद्धति की सिफारिश की है। साथ ही मीडिया में होल्डिंग और क्रॉस होल्डिंग की समीक्षा के लिए सुझााव दिया है कि ऐसे पूंजी निवेश की हर तीन साल में समीक्षा होनी चाहिए।  भारत में मीडिया में मालिकाना हक को लेकर 'क्रास मीडिया ऑनरशिप' पर कोई पाबंदी नहीं है। इससे काफी घालमेल हुआ है। मीडिया में क्रॉस ऑनरशिप के प्रचलित दोनों रूपों पर भारत में कोई प्रतिबंध नहीं है, जबकि अमरीका और कई यूरोपीय देशों में 'हारिजेन्टल क्रॉस मीडिया ऑनरशिप' प्रतिबंधित है।
जब एक मीडिया-कंपनी मीडिया से इतर दूसरे क्षेत्र में निवेश करे तो इसे 'हारिजेन्टल क्रॉस मीडिया ऑनरशिप' कहा जाता है। मीडिया में कई ऐसी कंपनियां या घराने प्रवेश कर चुके हैं जो अपना कारोबार चमकाने के लिए मीडिया को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। मीडिया के नियम और मूल्यों से उनका कोई सरोकार नहीं। भारतीय मीडिया-उद्योग में यह प्रवृत्ति निरन्तर बढ़ती जा रही है, जो मीडिया में कई बुराइयों को जन्म दे रही है। इसलिए अगर 'ट्राई' ने मीडिया में ऐसे पूंजी निवेश की निरन्तर समीक्षा की बात कही है और एच.एच.आई. पद्धति लागू करने की सिफारिश की है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए। प्रिन्ट हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया- राजनेताओं के स्वामित्व वाली अधिकतर मीडिया इकाइयों में खबरों को किस तरह राजनीतिक रंग दिया जाता है यह सर्वविदित है। शायद इसीलिए 'ट्राई' ने राजनीतिक संगठनों को भी मीडिया-उद्योग में निवेश और हस्तक्षेप से रोके जाने की सिफारिश
की है।
 'ट्राई' ने उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में मीडिया पर निगरानी के लिए एक स्वतंत्र प्राधिकरण का गठन करने की जो सिफारिश की है, उस पर विचार-विमर्श की जरूरत है। मीडिया के स्वतंत्र विकास के लिए मीडिया के भीतर ही नियामक संस्था होनी चाहिए- इसे लेकर मीडिया से जुड़े ज्यादातर पक्ष एकमत हैं। किसी बाहरी संस्था के माध्यम से मीडिया पर निगरानी की कोई भी नियामक संस्था सार्थक भूमिका निभा पाएगी, इसमें संदेह है। फिर भी 'ट्राई' की दोनों बुनियादी सिफारिशें निर्विवाद हैं जिन्हें मानने में सरकार और मीडिया-उद्योग को भी कोई परहेज नहीं होना चाहिए।

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सरकार का ट्विटर पर चहकना


आजकल ट्विटर पर अभिनेता से लेकर राजनेता तक सभी चहकते (ट्विट करते) हैं। शायद इसीलिए पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने पेट्रोल में कीमतों की कमी की घोषणा अपने ट्विटर अकाउंट पर की। यह पहला अवसर है, जब किसी महत्वपूर्ण निर्णय की जानकारी सरकार ने औपचारिक प्रेस-विज्ञप्ति या प्रेस कान्फे्रन्स की बजाय सोशल नेटवर्किंग के जरिए दी। वह भी पेट्रोल में कीमतों की कमी की तिथि से पूरे चौबीस घंटे पहले। मीडिया को यह खबर ट्विटर से मिली और आम जनता के लिए सार्वजनिक हुई। वैसे कह सकते हैं कि मंत्री ने जब पेट्रोल की कीमत घटाने की जानकारी अपने ट्विटर अकाउंट पर दी तभी यह सूचना सार्वजनिक हो गई थी, लेकिन भारत जैसे देश में ट्विटर पर या मंत्री को फोलो करने वाले लोगों की सीमित तादाद है। सही मायने में आम लोगों के हित की यह सूचना मीडिया के जरिए ही लोगों तक पहुंच पाई।
ऐसे में यह स्वाभाविक सवाल है कि सरकार को अपने महत्वपूर्ण निर्णयों की जानकारी 'ट्विटर', 'फेसबुक' आदि सोशल नेटवर्किंग माध्यमों से देनी चाहिए या मीडिया के मार्फत आम जन तक पहुंचानी चाहिए? प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने अपने मंत्रियों और अफसरों को सोशल मीडिया से जुड़ने के निर्देश दिए थे। स्वयं प्रधानमंत्री भी ट्विटर के जरिए लोगों तक संदेश पहुंचाते हैं। जनता के वोटों से चुनी हुई सरकार जनता से सतत संवाद के लिए इन माध्यमों का उपयोग करे तो शायद किसी को भी एतराज नहीं होगा। अनेक राजनेता 'ट्विटर', 'फेसबुक' आदि माध्यमों पर मौजूद हैं और समय-समय पर अपने प्रशंसकों-मित्रों-शुभचिन्तकों आदि से संवाद करते हैं। विभिन्न मुद्दों पर उनकी राय, सम्मति, प्रतिक्रियाएं मीडिया में सुर्खियां भी बनती हैं। लेकिन सरकार का कोई महत्वपूर्ण निर्णय, वह भी ऐसा जो सीधे जनता से जुड़ा हो- अगर उसे मंत्रीजी अपने 'ट्विटर' अकाउंट पर डालकर इतिश्री कर ले तो इसे क्या कहना चाहिए। सरकार के महत्वपूर्ण व नीतिगत निर्णयों की सूचनाओं-घोषणाओं के लिए सोशल नेटवर्किंग पर निर्भरता सही नहीं मानी जा सकती। बल्कि कई विश्लेषकों की राय में तो यह एक खतरनाक प्रवृत्ति है। भाजपा के पूर्व नेता गोविन्दाचार्य तो इसे पब्लिक रिकार्ड एक्ट का उल्लंघन मानते हैं और अदालत में जनहित याचिका दायर कर चुके हैं। अगर समय रहते सोशल मीडिया-प्रेमी सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया तो उसके नतीजे भी भुगतने पड़ सकते हैं।
सोशल मीडिया के दुरुपयोग और उसके दुष्परिणाम के विश्व में सैकड़ों उदाहरण हैं। इसमें जितना खुलापन है, उतनी अराजकता भी। किसी भी तरह के नियन्त्रण और नियमन से मुक्त यह माध्यम कई बार सरकारों की फांस बन चुका है। इसका मतलब यह भी नहीं कि सोशल मीडिया की सकारात्मक भूमिका नगण्य है। लेकिन यह एक दुधारी तलवार है। मौजूदा केन्द्र सरकार सोशल मीडिया की शक्ति और कमजोरियों से नावाकिफ होगी, यह सोचना नादानी होगी। सरकार में आने से पहले भाजपा के कई नेता सोशल नेटवर्किंग पर सक्रिय रहे हैं। नरेन्द्र मोदी तो काफी पहले ही सोशल नेटवर्क पर लोकप्रिय राजनेता का खिताब हासिल कर चुके थे। ऐसे में मौजूदा केन्द्र सरकार की सोशल मीडिया पर निर्भरता को सहज ही समझाा जा सकता है। दरअसल, सोशल मीडिया और मुख्य मीडिया के मूलभूत स्वरूप और उनमें परस्पर भिन्नता है।
सोशल मीडिया एक निरपेक्ष माध्यम है। इसमें आप इकतरफा संवाद लम्बे समय तक कायम रख सकते हैं। आप जानते हैं लोग आपके 'फॉलोवर' या दूसरे शब्दों में आपके 'समर्थक' होते हैं। वे आपके शब्दों की प्रतीक्षा करते हैं और जब आप उन्हें व्यक्त कर देते हैं तो वे आपकी तारीफ करते हैं। कई तो प्रशंसा के पुल बांध देते हैं। कुछ आलोचक भी होते हैं, लेकिन दिखावे के। वास्तविक आलोचक या विश्लेषकों को कोई पसंद नहीं करता और उन्हें आमतौर पर प्रतिबंधित (ब्लॉक) कर दिया जाता है। अव्वल तो कोई असुविधाजनक सवाल आपसे करता ही नहीं। किसी ने कर भी दिया तो आप उसकी आसानी से अनदेखी कर सकते हैं। 'ट्विटर' में तो वैसे भी १४० अक्षरों की सीमा बंधी है। यानी एक सुविधाजनक परिस्थिति आपको सोशल मीडिया पर उपलब्ध है। इसका सबसे ज्यादा फायदा राजनेता उठा रहे हैं। प्रचार का प्रचार और जवाबदेही नगण्य। सरकार में बैठे नेता के लिए तो यह और भी मुफीद है। मंत्री का सोशल मीडिया के जरिए लोगों से संवाद बुरी चीज नहीं है, लेकिन इसे राजनीतिक सुविधा का माध्यम बना देना अनुचित है।
यह सुविधा मुख्य मीडिया में सहज उपलब्ध नहीं है। हालांकि मीडिया के जो मौजूदा हालात हैं उनमें राजनेता, राजनीतिक दल और सरकार ही नहीं, पहुंचवाला कोई भी व्यक्ति मीडिया से अनुकूल सुविधाएं हासिल कर लेता है। लेकिन मुख्यधारा का मीडिया अपने स्वरूप में ही सोशल मीडिया से इतना भिन्न है कि वह कहीं न कहीं या किसी न किसी स्तर पर आपको जवाबदेही के लिए मजबूर कर सकता है।
मीडिया की इसी शक्ति ने उसे अनेक विपरीत परिस्थितियों के बावजूद कायम रखा है। मीडिया 'ट्विटर' की तरह निरपेक्ष नहीं है। न ही वह 'फेसबुक' की तरह किसी एक कंपनी या व्यक्ति द्वारा संचालित है। सोशल मीडिया में कुछ नियम और विधियां तय हैं जो निरपेक्ष भाव से स्वत: काम करती रहती है। उसका यह तंत्र अच्छे और बुरे की पहचान नहीं कर सकता। इसके विपरीत मीडिया एक जीवन्त माध्यम है। उसके संचालक ही नहीं, उसमें कार्यरत मीडियाकर्मी भी हर क्षण चौकन्ने रहते हैं। उनमें परस्पर कड़ी प्रतिस्पद्र्र्धा है। वह अलग-अलग रूपों और नामों में मौजूद है। कहीं वह प्रिंट मीडिया है तो कहीं वह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। प्रिंट में भी दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक कई स्तर हैं तो इलेक्ट्रॉनिक में भी दृश्य और श्रव्य दोनों माध्यम हैं। न्यूज चैनलों की पूरी शृंखला है। ऐसे में लोगों के प्रति जवाबदेही से बचना मुश्किल है, खासकर किसी सरकारी प्रतिनिधि का। यही बंदिश शायद सरकार को रास नहीं आ रही है और उसने एक सुविधाजनक रास्ता अख्तियार कर लिया है। लेकिन अगर सरकार ने यही राह अपनाने का फैसला कर लिया है तो माना जाएगा कि वह मुख्यधारा के मीडिया की तो अनदेखी कर ही रही है, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेही का भी अनादर कर रही है।

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मीडिया का मित्र सोशल वीडियो

कैमरे ने सब कुछ बयान कर दिया और दोषियों को सींखचों के पीछे पहुंचा दिया।  कल्पना कीजिए पीडि़त बच्चों के माता-पिता कैमरे के फुटेज लेकर सीधे कानून का दरवाजा खटखटाते तो क्या होता। बहुत संभव है, पुलिस उन्हें टरका देती। मामला ही दर्ज नहीं करती। जैसा कि अक्सर होता है।

कुछ दिनों पहले यह खबर आपने पढ़ी होगी जिसमें कुछ वीडियो-चित्र भी छपे थे। इन चित्रों में आन्ध्र प्रदेश के एक स्कूल का प्रधानाचार्य तीन नेत्रहीन बच्चों को बेरहमी से पीट रहा था। बच्चे दर्द से चिल्ला रहे थे और रहम की गुजारिश कर रहे थे। मगर प्रधानाचार्य इन बच्चों को बेदर्दी से छड़ी लेकर पीटे जा रहा था। सभी बच्चे दस साल से भी कम उम्र के थे। खास बात यह कि प्रधानाचार्य स्वयं नेत्रहीन था। स्कूल के किसी कर्मचारी ने इस घटना की वीडियो रिकार्डिंग कर ली। वीडियो यू-ट्यूब पर साझाा हुआ तो लोगों को इस घटना का पता चला। प्रधानाचार्य और उसका साथ देने वाले स्कूल के सचिव को गिरफ्तार कर लिया गया।
इसी तरह कोलकाता के एक घर में महिला ट्यूटर ने तीन साल के मासूम बच्चे को बुरी तरह पीटकर जख्मी कर दिया। फिर बच्चे की मां को धमकाया कि पुलिस में शिकायत करने की गलती मत करना लेकिन जब कैमरे के चित्र मीडिया में प्रकाशित हुए तो ट्यूटर के होश ठिकाने आ गए। गिड़गिड़ाई, खूब माफी मांगी। मामला पुलिस में दर्ज हो गया। दरअसल, ट्यूटर की सारी करतूत घर में लगे सीसी टीवी कैमरे में कैद हो गई थी। एक तरफ केन्द्र सरकार बच्चों को पीटने वालों के खिलाफ कानून को कड़ा बनाने की तैयारी कर रही है वहीं दूसरी तरफ ऐसी घटनाओं में बढ़ोतरी बेहद दुखद है।
  कहने की जरूरत नहीं, अगर उपरोक्त घटनाओं के वीडियो या सीसी टीवी चित्र नहीं होते तो इन घटनाओं की किसी को भनक तक नहीं लगती। मीडिया को भी नहीं। न जाने कब से नेत्रहीन बच्चे प्रधानाचार्य के जुल्म सह रहे थे। तीन साल का मासूम भी ट्यूटर का जुल्म बयान करने में सक्षम नहीं था। कैमरे ने सब कुछ बयान कर दिया और दोषियों को सींखचों के पीछे पहुंचा दिया। सवाल है क्या अकेले कैमरे ने? क्या कैमरे में कैद केवल तस्वीरें ही पीडि़तों को न्याय दिलाने में पर्याप्त थी? या इन तस्वीरों के सार्वजनीकरण ने भी यह काम किया? कल्पना कीजिए पीडि़त बच्चों के माता-पिता कैमरे के फुटेज लेकर सीधे कानून का दरवाजा खटखटाते तो क्या होता। बहुत संभव है, पुलिस उन्हें टरका देती। मामला ही दर्ज नहीं करती। जैसा कि अक्सर होता है। पीडि़त ही बार-बार चक्कर काटते, परेशान होते। कई तरह के सवाल-जवाब उन्हीं से किए जाते। अपराधियों का बाल तक बांका नहीं होता। इन परेशानियों की कल्पना करके ही अनेक पीडि़त चुप लगाकर बैठ जाने में ही अपना भला समझाते हैं। भले ही उनके पास प्रामाणिक सबूत हों। शायद इन्हीं परिस्थितियों ने सोशल नेटवर्किंग को बहुत मजबूत कर दिया है। और कुछ नहीं तो आम जन तक तो उनकी शिकायत पहुंच ही जाएगी, यही सोच ऐसी कई घटनाओं को प्रामाणिक तौर पर सामने ला रही है जो पहले संभव नहीं थी, या बहुत मुश्किल थी।
  इसीलिए पिछले कुछ वर्षों में वीडियो या सीसी टीवी कैमरों का प्रचलन तेजी से बढ़ा है। सीसी टीवी का इस्तेमाल जहां आम तौर पर प्रतिष्ठानों, दुकान-शोरूम तथा महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक स्थलों पर अधिक है वहीं वीडियो कैमरे का इस्तेमाल आम हो चला है। मोबाइल फोन में वीडियो बनाने की सुविधा के कारण हर कोई वीडियो शूट कर लेता है। सामान्य श्रेणी के वीडियो भी घटनाओं की त्वरित रिकार्डिंग में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा जाते हैं। शौकिया तौर पर की गई वीडियोग्राफी और उसे सोशल नेटवर्किंग पर साझाा करने का प्रचलन लोकप्रियता की हदें छू रहा है। वीडियो रिकार्डिंग करके उसे मोबाइल फोन के जरिए आसानी से यू-ट्यूब पर साझाा किया जा सकता है। इसलिए केवल भारत में लाखों वीडियो रोजाना अपलोड किए जा रहे हैं। यू-ट्यूब पर दुनिया में हर मिनट लगभग सौ घंटे से भी अधिक समय के वीडियो साझाा किए जा रहे हैं। इनमें अनेक वीडियो अभिव्यक्ति और सूचनाओं का मजबूत माध्यम बनते जा रहे हैं। यह मुख्यधारा के मीडिया के लिए मित्रवत और महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। दिल्ली में चलती मेट्रो ट्रेन के खुले दरवाजे का वीडियो इसी का परिणाम है। मुम्बई में पहली बारिश में रिलायंस की मेट्रो में पानी टपकने का वीडियो भी पिछले दिनों राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खी बना था। ऐसी कई घटनाएं मीडिया में प्रकाशित और चर्चित हुई हैं जो किसी पत्रकार या मीडिया फोटोग्राफर की बजाय आम जन से सीधे या सोशल नेटवर्किंग के जरिए सामने आईं। मुख्य धारा के मीडिया के लिए यह शुभ संकेत है। इससे सूचनाओं के स्रोत का दायरा विस्तृत हो गया है। जो व्यक्ति पाठक या दर्शक है वही व्यक्ति पत्रकार भी हो सकता है। 'सिटीजन जर्नलिज्म' की अवधारणा यही है जो मीडिया को एक नई पहचान दिलाती है। मगर एक दूसरा पहलू भी है। सोशल नेटवर्किंग पर रोजाना लाखों की तादाद में वीडियो साझाा किए जा रहे हैं। कौन प्रामाणिक है और कौन नहीं, यह फैसला करना बहुत मुश्किल है। कई वीडियो अपरिपक्व व आधी-अधूरी सूचनाओं पर भी आधारित होते हैं। ऐसे में तथ्यों की प्रामाणिकता की जांच जरूरी है। मीडिया कर्मियों को इस संबंध में सचेत रहने की आवश्यकता है। हालांकि ऐसी तकनीकों पर दुनिया भर में काम चल रहा है जिनसे असली व नकली वीडियो की पहचान हो सकेगी। मानव अधिकारों के लिए कार्य करने वाली संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने सिटीजन एविडेंस लैब नामक एक वेबसाइट शुरू की है। इस वेबसाइट के जरिए इंटरनेट पर उपलब्ध वीडियो की प्रामाणिकता को जांचा जा सकेगा। अभी यह शुरुआती चरण में है। इसे कितनी सफलता मिलेगी, कहा नहीं जा सकता। फिर भी इंटरनेट के मायाजाल में तैरती करोड़ों वीडियो फिल्मों की सत्यता जानने की दिशा में यह एक स्वागत योग्य प्रयास है। ऐसे प्रयास जब तक पूरी तरह सफल न हों, तब तक सोशल नेटवर्किंग के जरिए मीडिया में फुटेज का उपयोग करते समय सावधानी तो बरतनी ही होगी।

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रोबोट और सॉफ्टवेयर पत्रकारिता

तो क्या रिपोर्टर के रूप में मानव पत्रकार की भूमिका खत्म हो जाएगी? आंकड़े, तथ्य, सूचनाओं आदि का जाल तो ठीक, भावनाओं और संवेदनाओं का क्या होगा? क्या विज्ञान, तकनीक, कम्प्यूटर, सॉफ्टवेयर का मायाजाल पत्रकारिता की नई परिभाषा गढ़ेगा?

अगर आपको कहें कि यूक्रेन में मलेशियाई विमान को मार गिराने की खबर सबसे पहले एक रोबोट ने 'ब्रेक' की तो आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी? यकीनन आप चौंक उठेंगे। हालांकि यह हकीकत नहीं सिर्फ कल्पना है दोस्तो लेकिन यह कल्पना आने वाले दिनों में शीघ्र हकीकत में बदल जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। विकसित देशों में रोबोट पत्रकारिता तेजी से बढ़ती जा रही है। अभी इसका उपयोग कारपोरेट कंपनियों से संबंधित आर्थिक खबरों में ही ज्यादातर किया जा रहा है लेकिन अन्य खबरों में भी जिस तरह रोबोट के प्रयोग किए गए हैं, उससे भविष्य की तस्वीर का अनुमान लगाया जा सकता है। रोबोट पत्रकारिता दुनिया भर के 'न्यूज रूम' में बढ़ रही है। विभिन्न विषयों के सॉफ्टवेयर तैयार किए जा रहे हैं। इन्हें पहले से तैयार डाटा टैम्पलेट में डालकर रोबोट के जरिए पेश किया जा रहा है।
रोबोट की दैत्याकार कार्य-क्षमता के सामने इन्सान बौना है। रोबोट सैकण्ड से भी कम समय में एक सम्पूर्ण न्यूज स्टोरी तैयार कर सकता है। विमान कहां गिरा, कितने बजे हादसा हुआ? घटना स्थल की लोकेशन क्या है, विभिन्न देशों से कितनी दूरी पर है। इसी क्षेत्र में पहले कितने विमान हादसे हुए। दुनिया भर में कब-कब, कहां-कहां यात्री विमानों पर हमले हुए- सब कुछ पलक झपकते तैयार। खबर की यह रफ्तार हो तो फिर रिपोर्टर की क्या जरूरत! घटना घटित होने पर जानकारी मिलते ही पूरा समाचार तैयार। शायद इसीलिए रोबोट को भविष्य का पत्रकार कहा जा रहा है।
 तो क्या रिपोर्टर के रूप में मानव पत्रकार की भूमिका खत्म हो जाएगी? आंकड़े, तथ्य, सूचनाओं आदि का जाल तो ठीक, भावनाओं और संवेदनाओं का क्या होगा? क्या विज्ञान, तकनीक, कम्प्यूटर, सॉफ्टवेयर का मायाजाल पत्रकारिता की नई परिभाषा गढ़ेगा? रोबोट पत्रकारिता के प्रवेश के साथ ही ये सवाल भी उठ रहे हैं।
रोबोट पत्रकारिता की वास्तविक शुरुआत इस वर्ष मार्च में अमरीकी अखबार 'द लॉस एंजलिस टाइम्स' ने की, जब उसने रोबोट की लिखी भूकम्प पर पहली खबर प्रकाशित की। रोबोट ने भूकम्प के दौरान तुरन्त स्वचलित रूप से एक छोटी-सी रिपोर्ट तैयार कर दी। करीब सौ-सवा सौ शब्दों की इस खबर की शुरुआत रोबोट ने इस तरह की- 'सोमवार की सुबह 6.25 बजे कैलिफोर्निया के वेस्टवुड से 5 मील दूर हल्का भूकम्प आया जिसकी तीव्रता 4.7 थी...' इस समाचार में सभी आवश्यक जानकारियां थीं। यहां तक कि समाचार स्रोत के तौर पर अमरीका के ज्योलॉजिकल सर्वे विभाग का हवाला भी दिया गया था। पत्रकार और प्रोग्रामर केन श्वेन्के के अनुसार यह खबर मात्र तीन मिनट में वेबसाइट पर प्रकाशित हो गई थी। श्वेन्के ने ही यह प्रोग्राम विकसित किया जो भूकंप के दौरान रोबोट को तत्काल सक्रिय कर देता है। भूकम्प के अलावा यह प्रोग्राम शहर में होने वाले अपराध की खबरों को भी तैयार करता है। श्वेन्के कहते हैं- रोबोट काफी समय बचाता है। कुछ खास तरह की खबरों के लिए यह उतनी ही अच्छी तरह सूचनाएं जुटाता है जैसे कि दुनिया में कोई और जुटाएगा।
  रोबोट और सॉफ्टवेयर पत्रकारिता की धारणा को कुछ सर्वेक्षणों ने और भी बल प्रदान कर दिया है। कुछ माह पूर्व 'जर्नलिज्म प्रैक्टिस' नामक एक जर्नल ने सॉफ्टवेयर पत्रकारिता पर एक अध्ययन जारी किया। इसमें एक ही विषय पर लिखी गई दो अलग-अलग खबरों की तुलना की गई थी। पहली खबर मानव-पत्रकार ने लिखी और दूसरी खबर सॉफ्टवेयर द्वारा लिखी गई थी। परिणाम आश्चर्यजनक रहा। जहां पत्रकार की खबर रोचक और सुसंगत थी, वहीं सॉफ्टवेयर की लिखी खबर तुलनात्मक रूप से ज्यादा तथ्यों वाली, ज्यादा वस्तुनिष्ठ और ज्यादा विश्वसनीय थी। अमरीकी पत्रकार डेरेक मीड के अनुसार पत्रकारिता की वर्तमान दिशा तकनीक में तब्दील हो रही है। हैरत की बात यह है कि आम पाठक के लिए दोनों खबरों में अन्तर करना मुश्किल हो रहा है। यह अध्ययन स्वीडन के कार्लस्टेड विश्वविद्यालय के क्रिस्टर क्लेरवाल द्वारा किया गया था।
  सॉफ्टवेयर पर पत्रकारिता की निर्भरता निरन्तर बढ़ रही है। हाल ही में एसोशिएटेड प्रेस ने घोषणा की कि वह 'वर्डस्मिथ' नामक स्वचलित सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करेगी। इस अन्तरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी के अनुसार वह प्रत्येक तिमाही में रोबोट लिखित 4,440 खबरें जारी करेगी। यह संख्या मानव पत्रकार लिखित खबरों से दस गुणा अधिक है। यह प्रारंभिक स्थिति है। पूरी क्षमता से जब रोबोट काम करेगा तो उसकी गति कई गुणा बढ़ जाएगी। फिलहाल ये खबरें कारपोरेट कंपनियों से संबंधित आर्थिक रिपोर्टें होंगी।
  इससे पूर्व याहू एक एप्प तैयार कर चुका है जिसका नाम है- समली। समली मूल पाठ को स्वत: ही संक्षिप्त अथवा सम्पादित करके उसमें खास बिन्दुओं को जोड़ देता है। यह तकनीक भी कई तरह की खबरों में मददगार है।
द लॉस एंजिलिस टाइम्स, एसोशिएटेड प्रेस, याहू जैसे दिग्गजों का सॉफ्टवेयर तथा रोबोट पत्रकारिता में प्रवेश तथा 'द गार्जियन', 'फोब्र्स' एवं कई अन्य मीडिया कंपनियों का इस क्षेत्र में प्रायोगिक परीक्षण और दिलचस्पी इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भविष्य की पत्रकारिता किस दिशा में जा रही है। शायद इसीलिए यह सवाल किया जा रहा है कि क्या रोबोट पत्रकार मानव पत्रकार से श्रेष्ठ साबित होंगे? साथ ही यह भी कि क्या रोबोट हमारी नौकरियां छीन लेंगे? प्रोग्रामर केन श्वेन्के कहते हैं- रोबोट की बनाई खबरें असली पत्रकारों की जगह नहीं लेंगी। रोबोट केवल उपलब्ध डाटा को जल्दी से जल्दी एकत्रित करने और उसे प्रसारित करने में मदद करेंगे। वे कहते हैं- 'मेरी नजर में रोबोट किसी की नौकरी नहीं लेगा बल्कि यह हर किसी की नौकरी को रुचिकर बनाएगा।' तकनीकी विषयों के वरिष्ठ लेखक विल ओरेमस के अनुसार- 'रोबोट अपनी खबरों में 'कौन', 'कहां', 'क्या', 'कब' जैसे सवालों के जवाब तो दे सकता है मगर 'क्यों' का जवाब सिर्फ मानव-पत्रकार के पास ही मिल सकता है। जाहिर है, जब तक 'क्यों' का जवाब नहीं मिल जाता तब तक लेखन अधूरा है। पाठक या दर्शक का जिज्ञासु मन कई प्रश्न को जन्म देता है जिनका जवाब देने की क्षमता सिर्फ मानव में है, कम्प्यूटर या किसी रोबोट में नहीं। रोबोट के लिए 'वर्डस्मिथ' सॉफ्टवेयर बनाने वाली कंपनी 'ऑटेमेटेड इनसाइट्स' के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रोबी एलन के अनुसार 'हमारी तकनीक किसी डाटा विश्लेषक का अनुकरण तो कर सकती है लेकिन यह किसी पत्रकार का अनुकरण नहीं कर सकती। इसलिए मुझे पत्रकारों के भविष्य को लेकर कोई संशय नहीं है।' रोबोट पत्रकारिता पर जाने-माने अमरीकी लेखक केविन रूज का तो यहां तक कहना है कि अगर हम अपने जीवन में लगातार एक जैसी चीजों को दोहराना चाहते हैं जिसमें दिमाग लगाने की कोई जरूरत नहीं तो हमें भी रोबोट बन जाना चाहिए।
साफ है तकनीक अभी तक इन्सान का कोई विकल्प नहीं खोज पाई है।

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सोशल मीडिया बनाम सरकार

 कोई शक नहीं सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले बढ़े हैं, तो वैसे ही इसका दुरुपयोग करने वाले भी बढ़े हैं। सवाल है कि क्या इसका एक मात्र उपाय 'बैन' लगाना है? विशेषज्ञों ने जो उपाय खोज निकाले हैं उनकी तरफ सरकार का ध्यान होना चाहिए।

  महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री अजित पवार ने विधानसभा में कहा कि सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगना चाहिए, क्योंकि सोशल मीडिया नफरत फैलाने का जरिया बन चुका है। फेसबुक पर आपत्तिजनक पोस्ट के मामले में गत दिनों पुणे के एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की हत्या कर दी गई थी। उप मुख्यमंत्री ने इसी संदर्भ में अपनी यह मांग केन्द्र सरकार के समक्ष रखी है।
इसमें दो राय नहीं कि धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने अथवा नफरत और हिंसा फैलाने के उद्देश्य से सोशल मीडिया का दुरुपयोग करने वालों पर रोक लगनी चाहिए। ऐसे असामाजिक तत्त्वों की पहचान करके उन्हें सजा भी मिलनी चाहिए। लेकिन अफसोस की बात है कि जब भी ऐसी कोई घटना घटित होती है, सत्ताधीश सोशल मीडिया पर बैन लगाने की मांग कर डालते हैं। मानों सोशल मीडिया के दुरुपयोग का एक ही रामबाण उपाय है कि उसे प्रतिबंधित कर दो। दो साल पहले उत्तर-पूर्व राज्यों के लोगों का देश के विभिन्न हिस्सों से पलायन की घटनाओं के बाद भी संसद में कुछ सांसदों ने सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाने की मांग की थी। पूर्व केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल सोशल मीडिया पर लगाम लगाने की अच्छी-खासी तैयारी कर चुके थे। परन्तु इसके विरोध के उठते स्वरों में उन्हें अपने कदम पीछे की ओर खींचने पड़े। सिब्बल ने कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं के खिलाफ सोशल नेटवर्किंग पर की गई विपरीत टिप्पणियों के चलते यह प्रयास किया था। यानी हिंसा और नफरत की आपराधिक घटनाओं से ही नहीं, राजनीतिक कारणों से भी सोशल मीडिया के पर कतरने की कोशिशें होती रही हैं।
कोई शक नहीं जैसे सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले बढ़े हैं, वैसे ही इसका दुरुपयोग करने वाले भी बढ़े हैं। सवाल है कि क्या इसका एक मात्र उपाय 'बैन' लगाना है? कानूनी और इससे भी बढ़कर तकनीकी उपायों पर गंभीरता से बात क्यों नहीं की जाती है? जहां तक कानूनी उपाय की बात है, उसके लिए सूचना तकनीक कानून की धारा ६६-ए मौजूद है। पर यह भी सच्चाई है कि शासन ने अब तक इस कानून का दुरुपयोग ही अधिक किया है।
आपको कई घटनाएं याद होंगी। कैसे महाराष्ट्र में ठाणे की पुलिस ने दो निर्दोष लड़कियों को रात में घर से उठाकर थाने में बंद कर दिया था। इनमें एक लड़की ने बाल ठाकरे के निधन पर मुम्बई बंद पर फेसबुक पर अपनी राय जाहिर की थी और दूसरी लड़की ने उसे 'लाइक' किया था। प. बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का उदाहरण भी आपको याद होगा। जाधवपुर यूनिवर्सिटी के दो प्रोफेसरों को सिर्फ इसलिए जेल भेज दिया था कि उन्होंने मुख्यमंत्री का कार्टून बनाकर फेसबुक पर डाल दिया था। कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की गिरफ्तारी में भी धारा ६६-ए का दुरुपयोग किया गया था। बाद में इस धारा के इस्तेमाल पर पुलिस के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कुछ दिशा-निर्देश भी तय किए। इससे सायबर अपराधों पर अंकुश लगाने में कुछ हद तक मदद मिली है। फिर भी सोशल मीडिया के दुरुपयोग को रोकने में सूचना तकनीक कानून अपर्याप्त है। इसका मतलब यह भी नहीं कि सोशल मीडिया का दुरुपयोग केवल 'बैन' लगाकर ही रोका जा सकता है। सरकारों को यही एक मात्र उपाय क्यों सूझता है? उनका ध्यान पता नहीं उन उपायों पर क्यों नहीं जाता जो सायबर विशेषज्ञ सुझाते रहे हैं। इन उपायों से गलत सूचनाएं देने वाले असामाजिक तत्त्वों की कुछ हद तक पहचान की जा सकती है। हालांकि अभी विस्तृत अनुसंधान और शोध कार्य बाकी है। लेकिन फेसबुक, ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग पर झाूठ को पकड़ने के लिए यूरोपीय देशों में लाइ डिटेक्टर पर काम किया जा रहा है। इस प्रणाली से यह विश्लेषण किया जा सकेगा कि ऑनलाइन पोस्ट सत्य है या असत्य। यह भी पता चलेगा कि जिस अकाउंट से पोस्ट किया गया है, कहीं वो गलत सूचनाएं फैलाने के लिए तो नहीं बनाया गया है।
 कहा जा रहा है कि सोशल मीडिया का दुरुपयोग करने वालों पर प्रभावी जवाबी कार्यवाही के लिए सरकारों व पुलिस-प्रशासन की मदद करने के उद्देश्य से यह प्रणाली विकसित की जा रही है। इस अनुसंधान से यूरोपीय देशों के पांच विश्वविद्यालय जुड़े हैं। इनमें ब्रिटेन के शेफील्ड विश्वविद्यालय की मुख्य शोधकर्ता डा. कैलिना बोनशेवा के अनुसार यह लाइ डिटेक्टर सूचनाओं के स्रोत को वर्गीकृत करेगा जिससे उनके सच को जांचा-परखा जा सके। डा. कैलिना के अनुसार इस सिस्टम के खोज के परिणाम एक विजुअल डैशबोर्ड पर दिखाई देंगे ताकि यूजर जान सके कि कहीं यह अफवाह तो नहीं। सच-झाूठ को पकड़ने या अफवाह फैलाने वालों की पहचान करने में यह प्रणाली सफल होगी- यह भरोसा खोजकर्ताओं को है। एकबारगी इसमें अंदेशा भी हो तो भी सरकारों के लिए यह अच्छी खबर है। खासकर, उनके लिए जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में भरोसा रखती हैं।
सायबर विशेषज्ञों ने अब तक जो उपाय खोज निकाले हैं उनकी तरफ सरकार का ध्यान होना चाहिए। इस क्षेत्र में जो अनुसंधान हो रहे हैं उसमें भी दिलचस्पी रखी जानी चाहिए। सरकारों को सोशल मीडिया का दुरुपयोग रोकने के वैकल्पिक उपायों पर ज्यादा जोर देना चाहिए न कि उस पर बैन लगाने के। केन्द्र की नई सरकार सोशल मीडिया समर्थक बताई जाती है। इसलिए उससे ऐसी उम्मीद करना बेमानी नहीं।
नेता का मुखौटा
टीवी पर 'लाइव' बहस के दौरान कई बार राजनेताओं की समझदारी का मुखौटा उतर जाता है। बात भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी की है। ए.बी.पी. न्यूज पर 'आप' पार्टी के प्रतिनिधि पर वे ऐसे उखड़े कि भाषा और तहजीब की मर्यादाएं भूल गए। आप प्रतिनिधि ने भ्रष्टाचार के किसी मामले में अरुण जेटली की चुप्पी पर नकवी से सवाल पूछा। नकवी उस पर स्क्रीन पर ही बरस पड़े- जेटली तुम्हारे बाप के नौकर नहीं हैं। एंकर की टोकाटोकी के बीच नकवी बोलते ही चले गए और यह वाक्य दोहराते रहे। यही नहीं उन्होंने आप के पेनलिस्ट को 'बेइमान' और 'बदतमीज' के विशेषणों से भी अलंकृत कर डाला।

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हिन्दी मीडिया के लिए खास दिन

 हिन्दी केवल सम्प्रेषण या अभिव्यक्ति का माध्यम भर नहीं है। यह एक विशाल समाज की संस्कृति को जानने-समझने का महत्त्वपूर्ण जरिया भी है।
बीते माह पत्रकारिता से जुड़े दो महत्त्वपूर्ण दिवस गुजरे। माह की शुरुआत (3 मई) प्रेस स्वतंत्रता दिवस से हुई जिसकी चर्चा इस स्तंभ में की गई थी। माह का अन्त (30 मई) हिन्दी पत्रकारिता दिवस से हुआ। हालांकि दोनों अवसरों पर पत्रकारिता-जगत में कुछ खास हलचल देखने को नहीं मिली लेकिन मीडिया चाहे तो इन अवसरों का पूरा लाभ उठा सकता है। 3 मई जहां मीडिया की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी को परखने का एक वैश्विक अवसर है तो 30 मई का संबंध भी भारत में  विशाल पाठक समूह से है। इस बहाने हम हिन्दी पत्रकारिता से जुड़े विविध मसलों पर विमर्श कर सकते हैं। देखा जाए तो अपने पाठक-श्रोता-दर्शक के विराट समूह के प्रति विश्वास और प्रतिबद्धता के मूल्यांकन का यह सुनहरा अवसर हो सकता है।
यह सही है कि 30मई का सीधा संबंध हिन्दी के अखबारों से है लेकिन जिस घटना से यह प्रेरित है वह पूरे हिन्दी मीडिया जगत के लिए महत्त्वपूर्ण है। चाहे प्रिन्ट हो या इलेक्ट्रॉनिक या फिर सोशल मीडिया ही क्यों न हो! जो भी हिन्दी पत्रकारिता के दायरे में आता है, उन सबके लिए इसका महत्त्व है। 30  मई 1826  यानी 188 वर्ष पूर्व हिन्दी का पहला अखबार कोलकाता से निकला था- 'उदंत मार्तंड'। पं. जुगल किशोर शुक्ला के संपादकत्व में यह अखबार एक साल बाद बंद हो गया था लेकिन हिन्दी में पत्रकारिता की लौ प्रदीप्त कर गया। उस वक्त रेडियो, टीवी नहीं थे। लिहाजा इसे क्यों नहीं सम्पूर्ण हिन्दी पत्रकारिता का प्रस्थान बिन्दु कहा जाए? 'उदन्त मार्तंड' की प्रकाशन तिथि 30 मई हिन्दी पत्रकारिता दिवस बन गई। दुर्भाग्य से यह दिवस कुछ औपचारिक सभा-संगोष्ठियों से अधिक महत्त्व नहीं पा सका है। हिन्दी में पत्रकारिता सिखाने वाले संस्थान और विश्वविद्यालयों के विभाग भी कुछ खास नहीं कर पाए हैं। बेहतर होगा कि हिन्दी में पत्रकारिता करने वाले मीडिया के सभी रूप- जिनमें अखबार, टीवी चैनल, सामुदायिक रेडियो, सोशल मीडिया आदि शामिल हैं- मिलकर इस दिशा में प्रयास करें। अखबार और समाचार-चैनल सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। देश में सबसे बड़ा पाठक-श्रोता-दर्शक समूह हिन्दी में है। हिन्दी केवल सम्प्रेषण या अभिव्यक्ति का माध्यम भर नहीं है। यह एक विशाल समाज की संस्कृति को जानने-समझने का महत्त्वपूर्ण जरिया भी है। इसलिए हिन्दी मीडिया यह देखे कि इस समाज की जरूरतें और आकांक्षाएं क्या हैं। उसकी मीडिया से क्या अपेक्षाएं हैं। उन अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए उसे जो कुछ करना चाहिए, क्या वह कर रहा है? खबरों की विश्वसनीयता का स्तर क्या है तथा जो सामग्री वह अपने पाठकों-श्रोताओं को दे रहा है, उसके प्रति उनका क्या नजरिया है। भाषाई मीडिया के बारे में भी उसे अपनी जानकारी पुख्ता करनी होगी। उसकी अच्छाइयों को आत्मसात करने की जरूरत है तो कमियों से सबक लेने की।
 हिन्दी मीडिया को अंग्रेजी मीडिया की पेशेगत कुशलता और गुणवत्ता से तुलनात्मक आकलन करना होगा। साथ ही उसकी बुराइयों से दूर रहना होगा। अनुकरण और अनुवाद की निर्भरता से छुटकारा पाने की जरूरत है। भाषा को लेकर हिन्दी मीडिया को स्व-मूल्यांकन करना निहायत जरूरी है। नई पीढ़ी के नाम पर जो भाषा वह परोस रहा है, उसके दीर्घकालीन परिणामों पर भी उसकी निगाह होनी चाहिए। मेधावी युवा हिन्दी मीडिया में अपना भविष्य क्यों नहीं देखता, इस पर विचार हो। हिन्दी पत्रकार को प्रशिक्षण के बेहतरीन अवसर सुलभ हों। संवाद-सम्प्रेषण के लिए उसके पास आधुनिक संसाधन हों। दरअसल, हिन्दी मीडिया के लिए करने को इतने काम हैं कि उनकी एक लम्बी सूची गिनाई जा सकती है। सवाल यह है कि सुधार और मूल्यांकन का काम साल में केवल एक विशेष दिवस पर ही क्यों हो- हर दिन क्यों न हो? ठीक बात है। स्व-मूल्यांकन निरन्तर चलने वाली एक सतत प्रक्रिया है इसके बावजूद दिवस-विशेष से इसे जोड़ कर देखना जरूरी है। ये दिवस हमें न केवल प्रेरित करते हैं बल्कि निरन्तर बेहतर करने के लिए सजग भी रखते हैं। हिन्दी पत्रकारिता दिवस एक महत्त्वपूर्ण अवसर है। हिन्दी मीडिया-जगत के लिए तो खास तौर पर। क्यों न हम इसे वर्ष का एक यादगार दिवस बना दें।
ब्रेकिंग न्यूज!
समाचार चैनल कभी-कभी बड़ी गलतियां कर जाते हैं। नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री मनोनीत होने पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि पर पुष्प अर्पित करने राजघाट गए। सभी समाचार चैनलों ने कवरेज की । हिन्दी के एक समाचार चैनल ने भी रिपोर्ट दिखाई। नरेन्द्र मोदी पुष्पांजलि अर्पित कर रहे थे। पूरे परदे पर दृश्य था। तभी बड़े-बड़े शब्दों में लिखा हुआ फोटो-शीर्षक प्रकट हुआ- मोदी की समाधि पर नरेन्द्र मोदी। यह बाकायदा 'ब्रेकिंग न्यूज' थी जो कई देर तक चली। बाद में संभवत: ठीक कर ली गई।

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