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अभिव्यक्ति पर अंकुश की धारा

सोशल साइट्स पर आपत्तिजनक टिप्पणी मामले में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की इजाजत के बगैर किसी को गिरफ्तार न करने का मुद्दा चर्चा में है। दो राय नहीं, धारा 66-ए विवादित धारा है। समय की मांग है कि सूचना तकनीक कानून व्यावहारिक बने।  सुनिश्चित किया जाए कि संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को इस कानून से ठेस नहीं पहुंचे।

सुप्रीम कोर्ट ने 16 मई को एक फैसले में व्यवस्था दी कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की इजाजत के बगैर किसी को गिरफ्तार न किया जाए। जनभावनाओं के मद्देनजर केन्द्र सरकार ने गत 9 जनवरी को सूचना तकनीक कानून की विवादित धारा 66-ए को लेकर राज्यों को दिशा-निर्देश जारी किए थे। सुप्रीम कोर्ट ने एक तरह से उस पर मुहर ही लगाई है। इस कानून का कई राज्यों में दुरुपयोग हो चुका है। फेसबुक, ट्विटर आदि सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सामान्य असहमति दर्ज करने वाले कई नागरिकों को पुलिस पकड़कर जेल में डाल चुकी है। इसका सबसे शर्मनाक उदाहरण गत वर्ष नवम्बर में महाराष्ट्र के ठाणे शहर के पालघर पुलिस थाने में सामने आया।
आपको याद होगा, गत वर्ष 18 नवम्बर को शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के निधन पर बंद के खिलाफ फेसबुक पर टिप्पणी करने और उसे पसंद (लाइक) करने पर ठाणे की दो लड़कियों को गिरफ्तार किया गया था। शिव सैनिकों ने इन लड़कियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। उसके बाद आनन-फानन में रातोंरात सम्बंधित थाने का इन्सपेक्टर लड़कियों को गिरफ्तार कर थाने ले आया। पुलिस ने यह गिरफ्तारी सूचना तकनीक कानून की धारा 66-ए के तहत की थी। इस धारा के खिलाफ देश भर में आवाजें उठीं। अदालत में जमानत के बाद तीसरे दिन ये लड़कियां जेल से छूट पाईं। भारी आलोचना के बाद महाराष्ट्र सरकार की नींद खुली। लड़कियों के खिलाफ मामला बंद करना पड़ा। दो पुलिस अफसर निलंबित हुए। इस घटना के बाद ही केन्द्र सरकार ने राज्यों को दिशा-निर्देश जारी किए जिसके तहत कहा गया कि केवल पुलिस महानिरीक्षक और पुलिस अधीक्षक स्तर के अधिकारी ही इस धारा के तहत किसी की गिरफ्तारी के लिए अधिकृत होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने इसी की पुष्टि की है।
ध्यान देने की बात यह है कि शीर्ष अदालत ने अभी इस धारा की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर अपना कोई फैसला नहीं सुनाया है। यह मामला अभी लंबित है। धारा 66-ए का भविष्य इसी फैसले पर निर्भर है। ठाणे प्रकरण के बाद इस धारा को अदालत में चुनौती दी गई थी। दिल्ली विश्वविद्यालय में कानून की छात्रा श्रेया सिंघल की जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 30 नवम्बर 2012 को केन्द्र सरकार सहित महाराष्ट्र, प. बंगाल, दिल्ली और पुड्डुचेरी की सरकारों को नोटिस जारी किए थे। इन राज्यों में धारा 66-ए के दुरुपयोग की घटनाएं प्रकाश में आई थीं। ठाणे की घटना के कुछ अरसा पूर्व पुड्डुचेरी के रवि श्रीनिवासन को भी पुलिस घर से पकड़कर ले गई थी। रवि ने ट्विटर पर वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम के बेटे कार्ति चिदम्बरम और सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा के बारे में अपनी राय व्यक्त की थी। प. बंगाल में जाधवपुर विश्वविद्यालय के दो प्रोफेसरों को भी जेल की हवा खानी पड़ी, क्योंकि इनमें से एक ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर कार्टून बनाया था और दूसरे प्रोफेसर ने कार्टून अन्य लोगों को ई-मेल से भेजा था। मुम्बई में कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की गिरफ्तारी पर बवाल मचा। सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर व्यक्त अभिव्यक्तियों को जिस तरह दबाने की कोशिशें की गईं, उससे लोगों को लगा कि सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने पर तुली है। प्रिन्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी सरकार की इन कार्रवाइयों का कड़ा विरोध हुआ। परिणामस्वरूप आज केन्द्र सरकार भी स्वीकार कर रही है कि धारा 66-ए के तहत मिले अधिकारों का पुलिस व शासन ने दुरुपयोग ही किया है।
सुप्रीम कोर्ट की ताजा व्यवस्था इसी दृष्टिकोण को मजबूती देती है। पालघर थाने के निचले दर्जे के पुलिस कर्मचारी जिस तरह लड़कियों को पकड़कर थाने में ले आए, वह कतई उचित नहीं था। न्यायमूर्ति वी.एस. चौहान व न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की पीठ की इस व्यवस्था के बाद सबकी निगाहें मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर व जस्टिस जे. चेलमेश्वर की पीठ पर टिकी हैं, जो मुख्य मामले की सुनवाई कर रही है। श्रेया सिंघल ने जनहित याचिका में धारा 66-ए को निरस्त करने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि इस धारा से नागरिकों को मिले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का हनन हो रहा है। यह धारा संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन है। याचिका में शीर्ष अदालत से मांग की गई है कि पुलिस को दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 41 व156(1) में मिले गिरफ्तारी के अधिकार को अनुच्छेद 19 (1) यानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अनुकूल बनाया जाए।
धारा 66-ए की कई विसंगतियों और विरोधाभासों को लेकर कानूनविद् अपनी राय प्रकट कर चुके हैं। इसमें दो राय नहीं कि यह एक विवादित धारा है। सूचना तकनीक कानून वर्ष 2000 में बनाया गया था और 2008 में इसे संशोधित करते हुए धारा 66-ए जोड़ी गई थी। समय की मांग है सूचना तकनीक कानून को व्यावहारिक बनाया जाए। विवादित बिन्दुओं पर गौर किया जाए। कम-से-कम यह सुनिश्चित किया जाए कि संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को इस कानून से कोई ठेस नहीं पहुंचे।
'टैम' का पलटवार
टीवी के दर्शकों की संख्या का हिसाब-किताब रखने वाली एजेन्सी 'टैम' (टेलीविजन ऑडियंस मैजरमेंट) पर विवादों के बावजूद टीवी प्रसारण उद्योग आज भी इसी एजेन्सी पर निर्भर है। टैम मीडिया रिसर्च प्रा.लि. की मीडिया रेटिंग को लेकर जब-तब विवाद छिड़ते रहे हैं। एन.डी. टीवी और प्रसार भारती 'टैम' पर गलत आंकड़े देने का आरोप लगा चुके हैं। अब बारी 'टैम' की है। 'टैम' ने अपने द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों को गलत ढंग से पेश करने तथा स्वयं को नम्बर वन टीवी चैनल घोषित करने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने का मुद्दा उठाया है। 'टैम' के अनुसार खास अवसरों पर चैनलों की यह प्रवृत्ति अकसर सामने आती है। चुनावों के दौरान सारे चैनल स्वयं को नंबर वन बताने लगते हैं। 'टैम' ने इस प्रवृत्ति पर अंकुश के लिए एक स्टैंडर्ड मीडिया गाइड लाइन जारी की है। इसमें कहा गया है कि 'टैम' डाटा भारतीय टीवी दर्शकों के व्यवहार को अच्छी तरह समझता है। 'टैम' ने डाटा और आंकड़े जुटाने के तरीकों में काफी बदलाव किया है। अत: जब भी कोई चैनल अपनी पोजिशन का दावा करे तो वह साफ तौर पर समय, दिन और बाजार का भी उल्लेख करे ताकि लोगों को सही तथ्यों की जानकारी मिल सके। इतना ही नहीं 'टैम' ने अपनी टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग पाइन्ट्स) व्यवस्था में पारदर्शिता के लिए छह सदस्यीय पैनल का गठन भी किया है। 'टैम' की यह कवायद उसकी विवादित छवि को धोने में कितनी मददगार होगी, यह आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन अपने ऊपर होते टीवी चैनलों के हमलों का उसने माकूल जवाब देने की 'जुगत' जरूर कर ली है।

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कभी अति, कभी अनदेखी

दर्शकों-श्रोताओं से दूर जाकर कोई चैनल अपना अस्तित्व कायम नहीं रख सकता, लेकिन क्या यह सचमुच टीआरपी की अंधी दौड़ है या कुछ और भी? समाचार चैनलों का मौजूदा बर्ताव (या भटकाव!) कई सवाल खड़े करता है, लेकिन मीडिया को सबसे ऊपर उठकर देखने की जरूरत है खासकर, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को।

कई बार मीडिया समान महत्व के मुद्दों में से किसी एक को उछालकर बाकी मुद्दों से आंख फेर लेता है। मान लेता है कि अपना दायित्व पूरा हुआ। कई बार मीडिया कमतर मुद्दों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है, लेकिन जरूरी मुद्दों की अनदेखी कर जाता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में तो भेड़चाल साफ दिखाई पड़ती है। नरेन्द्र मोदी के भाषणों की सजीव प्रसारण की होड़ शुरू हुई, तो कोई चैनल पीछे रहना नहीं चाहता। जो चैनल मोदी को पानी पी-पी कर कोसते थे, वे भी इस होड़ में शामिल हो गए। टीआरपी के लिए सब जायज है। ठीक है, दर्शकों-श्रोताओं से दूर जाकर कोई चैनल अपना अस्तित्व कायम नहीं रख सकता, लेकिन क्या यह सचमुच टीआरपी की अंधी दौड़ है या कुछ और भी? समाचार चैनलों का मौजूदा बर्ताव (या भटकाव!) कई सवाल खड़े करता है। चुनाव नजदीक आ रहे हैं। राजनीतिक दलों के लिए उन मुद्दों को उछालना कोई नई बात नहीं है, जो उनके सियासी हितों को पूरे करते हों। जिन मुद्दों से सियासी हित नहीं सधते, ऐसे मुद्दे उनके लिए कोई मायने नहीं रखते हैं। लेकिन मीडिया को इससे ऊपर उठकर देखने की जरूरत है, खासकर, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को।
सरबजीत सिंह का ही मामला लें। ऐसा नहीं है कि अफजल गुरु को फांसी के बाद ही सरबजीत का मुद्दा उठा। समाचार चैनल काफी पहले से ही यह मुद्दा उठाते रहे हैं। सरबजीत की बहन दलजीत कौर के विस्तृत बयान, इंटरव्यू, परिजनों की प्रतिक्रियाएं आदि को लेकर चैनल भावुक कहानियां दिखाते रहे हैं। कई बार ऐसा भी देखा गया कि किसी एक चैनल ने बिना किसी संदर्भ या प्रसंग के सरबजीत के परिजनों से बातचीत कर ली, तो दूसरे चैनल भी शुरू हो गए। यह सही है कि सरबजीत का मामला हटकर है, लेकिन चैनलों में इस मुद्दे को लेकर जिस तरह विवेकहीन प्रतिस्पर्धा रही, उससे सरबजीत मानों दो देशों के बीच सम्बंधों के प्रतीक बन गए। इसीलिए सरबजीत की हत्या पर भारत में जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई। राजनेताओं ने इसी का फायदा उठाकर खूब बयान दिए। अपनी-अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश हुई। हर कोई मीडिया में बयान देकर मानो अपने को दर्ज करा देना चाहता हो। मीडिया के जरिए जो भावनात्मक उफान पैदा किया गया, उसका लाभ उठाने में कोई पीछे नहीं छूटा। पंजाब की अकाली सरकार ने तुरत-फुरत सरबजीत को शहीद का दर्जा दे डाला। ऊपर से तीन दिन का राजकीय शोक! राहुल गांधी का कभी कोई बयान नहीं आया था, वे भी सरबजीत के परिजनों को ढांढस बंधाने जा पहुंचे। अंत्येष्टि में शामिल होने के लिए भिखीविंड में होड़ मच गई। मीडिया के कैमरे इतने कि आंखें चौंधिया जाएं। हर कोई शवयात्रा को 'लाइव' बनाने में जुट गया।
पाकिस्तान में पहले भी ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं। थोड़े दिन पहले ही लाहौर की उसी कोट लखपत जेल में चमेल सिंह को कैदियों ने मार डाला, जहां सरबजीत पर हमला किया गया था। लेकिन चमेल सिंह के लिए किसी ने दो आंसू भी नहीं बहाये। कम-से-कम ऐसा ज्वार तो बिल्कुल नहीं उठा, जो सरबजीत के मामले में हुआ। क्या इसलिए कि मीडिया ने चमेल सिंह के मुद्दे को उछाला नहीं? या फिर इसलिए कि चमेल सिंह का मामला किसी राजनीतिक दल का हित नहीं साधता था? भारत के कितने कैदियों के साथ पाकिस्तान में क्या बर्ताव हो रहा है, किसी चैनल ने जानने की कोशिश नहीं की। कोट लखपत जेल में ही बंद 20 भारतीय कैदी तो ऐसे हैं, जो मानसिक रूप से बीमार हो चुके हैं। पकड़े जाते वक्त ये लोग बिल्कुल स्वस्थ थे। लेकिन जेल में इनके साथ हुए बर्ताव ने इन्हें लगभग पागल होने की कगार पर पहुंचा दिया। इनके साथ क्या बदसलूकी और उत्पीडऩ हुआ होगा, इसका अंदाजा ही लगाया जा सकता है। सारे मानवाधिकारी मौन हैं।
दोनों देशों के बंदियों के लिए बनी भारत-पाकिस्तान न्यायिक समिति ने हाल ही पाकिस्तान दौरे में पाया कि कराची, रावलपिंडी और लाहौर में बंद 535 कैदियों में से 469 को तो नियमानुसार भारतीय दूतावास के अधिकारियों से मिलने तक नहीं दिया गया। गौरतलब है कि इनमें 483 गरीब मछुआरे हैं, जो मछली पकड़ते वक्त अनजाने में सीमा पार कर गए। समुद्र में सीमा का भ्रम हो ही जाता है। रोजी-रोटी की तलाश में गए अक्सर दोनों देशों के मछुआरे पकड़े जाते हैं। उन्हें छोड़ा भी जाता है। लेकिन पाकिस्तानी जेलों का जो हाल है, उसमें थोड़े समय में ही बंदी के साथ जो बर्ताव होता है, वह असहनीय है। भारत सरकार के विदेश मामलों के मंत्रालय के अनुसार पाकिस्तान की जेलों में 1,184 भारतीय बंदी हैं। इन्हें मुक्त कराने में केन्द्र सरकार क्या कर रही है तथा इन बंदियों का पाकिस्तान में क्या हाल है, यह जानना भी जरूरी है। लेकिन इनके परिजनों की व्यथा मीडिया में अक्सर स्थानीय विवरणों में गुम होकर रह जाती है।
इतना ही नहीं, सबसे दुखद मुद्दा तो उन 53 सैन्य कर्मियों का है, जो 1965 व १1971 के युद्ध में सीमा की रक्षा करते हुए पाक सैनिकों के हत्थे चढ़ गए। इनका आज तक कोई पता नहीं चल पाया है कि ये जिन्दा हैं या मर गए। पाकिस्तान इनके बारे में खामोश है। इनके दुखी परिजन अपनी पीड़ा व्यक्त करते रहे हैं। मेजर एस.सी. गुलेरी के परिजन पिछले 42 साल से उनके घर लौटने का इंतजार कर रहे हैं। मेजर का वाकिया कम दर्दनाक नहीं। दो दिन पहले उनकी शादी हुई थी। 1971 का युद्ध छिड़ गया। अचानक सेना से बुलावा आया और वे सरहद पर चले गए। लेकिन वापस कभी नहीं लौटे। कैप्टन जे.सी. शर्मा के परिजन भी लंबे अरसे से उनके घर लौटने का इंतजार कर रहे हैं। ये लोग वे थे, जो हमारी रक्षा करने के लिए सीमा पर गए थे। समय-समय पर इन 53 युद्ध बंदियों के परिजन भारत सरकार से मांग करते रहे हैं, लेकिन सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंगती। इन्हें लेकर केन्द्र सरकार क्यों इतनी लाचार है? इस दौरान विभिन्न राजनीतिक दल केन्द्र की सत्ता में रहे। किसी ने भी भारत के युद्ध बंदियों को लेकर गंभीर प्रयास नहीं किए। क्यों? मीडिया के लिए यह मुद्दा कभी इतना महत्वपूर्ण नहीं रहा, जितना हाल में सरबजीत का रहा। सरबजीत का मुद्दा उठाना, गलत नहीं। गलत दूसरे मुद्दों की अनदेखी है। सरबजीत की प्रतिक्रिया भारत में सनाउल्लाह के रूप में सामने आई। अगर यह सिलसिला चल पड़े तो कितना खतरनाक होगा? इन दोनों मामलों को लेकर जो सियासी नफा-नुकसान भारत के राजनीतिक दलों से जुड़ा है, वही पाकिस्तान में भी है। 10 मई को पाकिस्तान में चुनाव है। सियासी पार्टियां अपनी-अपनी चालें चल रही हैं। वे दोनों मामलों को अपने ढंग से भुनाने की कोशिश कर रही हैं। वे मीडिया को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करना चाहती हैं। मीडिया इस दिशा में अधिक सजग नहीं दिखता। वह किस मामले में अति करेगा, तथा किस मामले की अनदेखी; कुछ भी कहना आसान नहीं।

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कैमरे की करामात

मीडिया में कैमरे की अहमियत एक बार फिर सामने आई है। कैमरे में कैद सच्चाई दरअसल, जनमत को ही निर्मित करती है, जिसकी अनदेखी करना आसान नहीं। दिल्ली में एसीपी बी.एस. अहलावत ने निर्ममता से किशोरी को थप्पड़ जड़े। अगर यह घटना कैमरे में कैद नहीं हुई होती तो पुलिस अफसर के खिलाफ जो त्वरित कार्रवाई हुई, वह कभी नहीं होती।


19 अप्रेल को न्यूज चैनलों पर आपने यह 'सीन' जरूर देखा होगा। दिल्ली में प्रदर्शनकारी किशोरी को बेरहमी से थप्पड़ मारता पुलिस अफसर। लड़की हतप्रभ और भयभीत। पीछे हटती हुई। लेकिन पुलिस अफसर नहीं थमा। लड़की को धक्का मारा। फिर एक जोरदार थप्पड़ और जड़ा। लड़की के कान से खून बह निकला। सरेआम पुलिस अफसर की यह गैरकानूनी हरकत मीडिया के कैमरों में कैद हो चुकी थी। फिर क्या था। चंद क्षणों में ही चैनलों पर प्रसारित होने लगी। किसी विवरण या कमेन्टरी की कोई जरूरत नहीं थी। पूरा वाकया कैमरे के जरिए जस का तस लोगों के सामने आ गया। घटना की गंभीरता और उसके संभावित परिणाम को सरकारी-तंत्र अच्छी तरह भांप चुका था। आनन-फानन में आदेश हुए—किशोरी को थप्पड़ मारने वाला पुलिस अफसर निलम्बित।
मीडिया में कैमरे की अहमियत एक बार फिर सामने आई। कोई शक नहीं, अगर यह घटना कैमरे में कैद नहीं हुई होती तो पुलिस अफसर के खिलाफ जो त्वरित कार्रवाई हुई, वह कभी नहीं होती।
बीनू रावत नामक यह किशोरी अपने साथियों के साथ विरोध का इजहार कर रही थी। विरोध पुलिस के प्रति था, जिसकी अकर्मण्यता और लापरवाही की वजह से पूर्वी दिल्ली के इलाके में पांच वर्षीय एक मासूम बालिका से नृशंसतापूर्वक दुष्कर्म किया गया था। बालिका जिन्दगी और मौत के बीच अस्पताल में जूझ रही थी। 16 दिसम्बर के दामिनी कांड के बाद देशव्यापी प्रदर्शन और फिर दुष्कर्मियों के खिलाफ सख्त कानून बनने के बावजूद घटी इस घटना के खिलाफ बीनू रावत और उसके साथियों का गुस्सा जायज था। ऐसी परिस्थिति में पुलिस से धैर्य और संयम की उम्मीद थी।
खासकर, एक जिम्मेदार पुलिस अफसर से तो यह अपेक्षा की ही जा सकती थी। लेकिन उसने अपनी असलियत दिखा दी। एसीपी बी.एस. अहलावत ने जिस निर्ममता से किशोरी को थप्पड़ जड़े, वह पुलिस की दरिन्दगी को ही दर्शाती है। पुलिस के इस रूप को सब जानते हैं। लेकिन कोई कुछ नहीं कर पाता। क्यों? क्योंकि पुलिस ताकतवर है। आम आदमी की इसके सामने कोई औकात नहीं। पुलिस ही क्यों, शक्ति और सत्ता से सम्पन्न दबंगों को सब चुपचाप बर्दाश्त करते हैं। क्योंकि वे कानून को जेब में रखते हैं। उसकी मनमानी व्याख्या कर सकते हैं। व्यक्ति या किसी कमजोर समूह के विरोध की वे परवाह नहीं करते। उन्हें थोड़ा-बहुत फर्क तभी पड़ता है, जब जनमत का दबाव उन पर पड़ता है। कैमरे में कैद सच्चाई दरअसल, जनमत को ही निर्मित करती है, जिसकी अनदेखी करना आसान नहीं। शायद इसीलिए एसीपी अहलावत को तुरत-फुरत निलंबित करना सरकार की मजबूरी बन गई।
मीडिया का कैमरा समय-समय पर अपनी करामात दिखा चुका है। सी.सी. टीवी के कैमरों का भी इसमें कम योगदान नहीं। पिछली बार दामिनी कांड के खिलाफ दिल्ली में ही प्रदर्शन के दौरान हुई सिपाही सुभाष तोमर की मृत्यु को पुलिस ने हत्या करार दिया और 8 बेकसूर प्रदर्शनकारियों को हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था। निश्चय ही पुलिस की प्रदर्शनकारियों के प्रति यह बदले की कार्रवाई थी, जो उसने खीज में आकर की। लेकिन दिल्ली मेट्रो स्टेशनों पर लगे सी.सी. टीवी के कैमरों तथा एक टीवी चैनल के कैमरे की फुटेज ने सारी पोल खोल दी। तहलका का सेना में हथियारों की खरीद में घूस कांड, सांसदों के सवाल के बदले रिश्वत तथा भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष बंगारु लक्ष्मण के मामले मीडिया कैमरों के ऐसे ही स्टिंग से सामने आए थे। हालांकि न तो रिश्वतखोरी खत्म हुई, न भ्रष्टाचार और न ही पुलिस की ज्यादतियां—फिर भी कैमरे की ये आंखें उन लोगों को सावधान तो करती ही हैं, जो अपनी जिम्मेदारियों को खूंटी पर टांग देते हैं।
पत्रकार पर हमला
जैसे, कैमरा झाूठ नहीं बोलता, वैसे ही कलम भी सच्चाई को छिपा नहीं सकती। शायद इसीलिए पत्रकारों और लेखकों को सबसे ज्यादा उत्पीडऩ का शिकार होना पड़ता है। ताजा मामला पत्रिका के छत्तीसगढ़ संस्करण के रायगढ़ ब्यूरो प्रमुख प्रवीण त्रिपाठी का है। प्रवीण ने भाजपा पार्षद आशीष ताम्रकार के खिलाफ लिखने की जुर्रत की तो उन्हें पार्षद और उसके गिरोह के लोगों के जानलेवा हमले का शिकार होना पड़ा। प्रवीण गंभीर रूप से घायल हैं और अस्पताल में भरती हैं। दुआ करें कि वे जल्दी ठीक हों और सच्चाई की लड़ाई को और भी मजबूती से लडऩे में सक्षम हों।
पार्षद ताम्रकार ने योजनाबद्ध ढंग से पत्रिका ब्यूरो प्रमुख को एक स्थान पर बुलाया और अपने 15 साथियों के साथ उन्हें हॉकी-लाठियों से बुरी तरह से पीटा। घटना के बाद पार्षद फरार है। उसके खिलाफ हत्या के प्रयास का मामला दर्ज है, लेकिन पुलिस उसे गिरफ्तार नहीं कर सकी है। स्वाभाविक है, छत्तीसगढ़ के पत्रकारों में इस घटना को लेकर गहरा आक्रोश है। आखिर पार्षद ने पत्रकार पर हमला क्यों किया? कोयले के अवैध खनन को लेकर 'पत्रिका' में खबरें छपी थीं। छत्तीसगढ़ में प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किस तरह राजनीतिक संरक्षण के तहत हो रहा है तथा पार्षद की उसमें क्या भूमिका है, यही सच्चाई बयान की थी प्रवीण त्रिपाठी ने अपनी रिपोर्ट में। यही नहीं, फर्जी राशन कार्ड बनवाने में भी पार्षद की भूमिका को उजागर किया था। भला भाजपा पार्षद को यह सब कैसे बर्दाश्त होता। राज्य में उसकी पार्टी की सरकार है।
शर्मनाक बात तो यह कि सरकार और पार्टी के जिम्मेदार लोग घटना पर चुप्पी साधे हुए हैं। मानो पार्षद के कृत्य में उनका परोक्ष समर्थन हो। ऐसा व्यक्ति तो पार्षद बनने के लायक तक नहीं है। यह स्थिति अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता में विश्वास करने वाले सभी लोगों के लिए बेहद चिन्तनीय है। वैसे भी दुनिया में प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में भारत की गिनती फिसड्डी देशों में होती है। वर्ष 2013 में जारी रिपोर्टर्स विदाउट बोर्डर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 179 देशों की सूची में भारत का 140वां स्थान है। गत वर्ष भारत 131वें स्थान पर था। ऐसी घटनाएं प्रेस की स्वतंत्रता को बाधित ही करती हैं। खासकर तब, जब पत्रकारों या मीडिया संस्थानों पर हमलों की घटनाओं पर सरकार चुप्पी साधे रहती है।
अपना कर्तव्य निभा रहे पत्रकार पर हमले के खिलाफ राज्य सरकार की खामोशी कई सवाल पैदा करती है। प्रेस परिषद को ऐसे मामलों में तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए। मीडिया से असहमति या शिकायत दर्ज करने के वैधानिक उपायों को छोड़कर हिंसक करतूतों को कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता। पार्षद को सजा तो मिलनी ही चाहिए पार्टी से भी  उसका निष्कासन होना चाहिए।

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खोजी पत्रकारिता की मिसाल

आ ई.सी.आई.जे. 160 खोजी पत्रकारों का अन्तरराष्ट्रीय संगठन है। ये पत्रकार 60  से अधिक देशों के बाशिन्दे हैं। वर्ष 1997 में स्थापित किए गए इस संगठन का मुख्यालय वाशिंगटन यानी उसी अमरीका में है, जो जूलियन असांजे को किसी भी कीमत पर हासिल करना चाहता है। फर्क इतना है कि असांजे अकेले थे और उनकी कार्य-प्रणाली का केन्द्र-बिन्दु अमरीका था।

आपको याद होगा, अमरीका जैसा शक्तिशाली देश एक खोजी पत्रकार जूलियन असांजे का जानी-दुश्मन बन गया था। विकीलीक्स के संस्थापक इस पत्रकार ने कई गोपनीय दस्तावेज उजागर किए थे। पूरी दुनिया में अमरीकी सरकार की कथनी व करनी की पोल खुल गई थी। पोल इतनी प्रामाणिक थी कि अमरीका से कोई जवाब देते नहीं बना। अमरीका ही नहीं, कई देशों की सरकारों, राजनेताओं, नौकरशाहों और अमीरों की पोल खोलने में जूलियन असांजे अग्रणी रहे। वे आज भी कई देशों की सरकारों की आंख की किरकिरी बने हुए हैं। विकीलीक्स का ताजा रहस्योद्घाटन राजीव गांधी और जॉर्ज फर्नांडीज को लेकर किया गया है। हालांकि कई लोग जूलियन असांजे को परम्परागत पत्रकार नहीं मानते, लेकिन असांजे ने जो काम किया, वह खोजी पत्रकारिता-जगत में मील का पत्थर बन गया।
पत्रकारिता-जगत में ऐसा ही कार्य फिर हुआ है। इस बार यह कार्य एक अकेले पत्रकार की बजाय खोजी पत्रकारों के एक अन्तरराष्ट्रीय समूह ने किया है। अगर आप आई.सी.आई.जे. (इंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑफ इन्वेस्टीगेटिव जर्नलिस्ट्स) के दावे को माने तो यह सचमुच पत्रकारिता-जगत की अद्भुत घटना है। इस समूह ने काला धन विदेश में छिपाने वाले देशों और लोगों के बारे में जो दस्तावेजी सबूत एकत्र किए हैं, वे आंख खोल देने वाले हैं। हजारों स्वयंसेवी संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आन्दोलनकारियों के प्रयासों के बावजूद सरकारों के कानों में जूं तक नहीं रेंगती। ज्यादातर देशों की सरकारें और अमीरों की मिलीभगत के चलते काले धन की समस्या का आज तक कोई समाधान नहीं हो पाया। माना जाता है कि अगर काला धन नहीं छिपाया जाए और टैक्स चोरी नहीं की जाए, तो दुनिया में गरीबी और भुखमरी खत्म हो सकती है। लेकिन इस मामले में क्या पूंजीवादी और क्या कम्युनिस्ट, सभी देशों में एक-सा हाल है। आई.सी.आई.जे. की रिपोर्ट के अनुसार विदेशों में कंपनियों और ट्रस्टों के जरिए निवेश तथा गोपनीय वित्तीय लेन-देन करने वाले 170 देशों की सूची उसके पास हैं। आंकड़ा सुनकर चौंकिएगा नहीं, 1 लाख 20 हजार कंपनियां उन देशों में खुली हुई हैं, जिन्हें 'टैक्स हैवन' देश कहा जाता है। काला धन छिपाने या उसे सफेद करने के लिए दुनिया भर के अमीरों में यह चलन किस कदर आम है, यह खोजी पत्रकारों के इस समूह की रिपोर्ट में बताया गया है। ब्रिटिश वर्जिन आइलैण्ड्स में अमरीका, कनाडा, चीन, भारत, पाकिस्तान, ईरान, थाईलैण्ड, मंगोलिया, इंडोनेशिया आदि दुनिया भर के अनेक देशों की कंपनियों और लोगों ने निवेश कर रखे हैं।
आई.सी.आई.जे. का दावा है कि उसके पास लाखों दस्तावेज हैं, जिनसे मालूम चलता है कि ऐसी कंपनियों और लोगों के बीच क्या गठजोड़ है तथा कब कितना नकद धन कहां, किसे हस्तान्तरित किया गया। समूह ने दुनिया भर के लोगों सहित ६१२ भारतीयों के नाम भी उजागर किए हैं, जिनमें ज्यादातर उद्योग-जगत के लोग हैं। इनमें सीबीआई और आयकर विभाग की जांच के दायरे में आए कई उद्यमी हैं। विदेशों में भारतीय नागरिकों के काले धन को लेकर बहुत कुछ लिखा-कहा जा चुका है। केन्द्र सरकार को सब मालूम है। वह काले धन के खिलाफ कुछ भी क्यों नहीं करना चाहती, यह भी सब जानते हैं। कमोबेश यही हालात बाकी देशों के हैं। हालांकि कुछ देशों की सरकारों ने पहल की है, लेकिन ठोस परिणाम सामने नहीं आए। कारण साफ है, काले धन का कारोबार करने वालों की ऊंची पहुंच, सत्ता में दखल, कानूनी पेचीदगियां और सरकारों के संरक्षण के चलते उनकी चोरी पकडऩा मुश्किल और चुनौती भरा काम रहा है, लेकिन सबूतों के साथ जिस व्यापक स्तर पर (25 लाख फाइलें) आई.सी.आई.जे. ने दस्तावेज एकत्र किए हैं, उन्हें झाुठलाना किसी के लिए भी आसान नहीं है। आई.सी.आई.जे.160 खोजी पत्रकारों का अन्तरराष्ट्रीय संगठन है। ये पत्रकार 60 से अधिक देशों के बाशिन्दे हैं। वर्ष 1997 में स्थापित किए गए इस संगठन का मुख्यालय वाशिंगटन यानी उसी अमरीका में है, जो जूलियन असांजे को किसी भी कीमत पर हासिल करना चाहता है। फर्क इतना है कि असांजे अकेले थे और उनकी कार्य-प्रणाली का केन्द्र-बिन्दु अमरीका था। इसके उलट आई.सी.आई.जे. एक अन्तरराष्ट्रीय समूह है, जिसमें दुनिया के कई जाने-माने खोजी पत्रकार शामिल हैं। साथ ही इस समूह की कार्यप्रणाली का केन्द्र कोई एक राष्ट्र न होकर समूची दुनिया है। यही वजह है कि इस समूह का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। वैश्विक स्तर पर भी इसने अपनी साख कायम की है। आई.सी.आई.जे. के सलाहकार मंडल में  बिल कोवाश, रोजनल कैमन एल्वीस, फिलिप नाइटले, ग्वेन लिस्टर, ब्रांट हस्टन जैसे पत्रकार हैं। आस्ट्रेलियन पत्रकार गेराल्ड रील समूह के डायरेक्टर तथा अर्जेन्टाइना की मरिना वाकर ग्वारा डिप्टी डायरेक्टर हैं। रील को खोजी पत्रकारिता करते हुए रिपोर्टर और सम्पादक के तौर पर २६ वर्षों का अनुभव है। उन्होंने 'सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड' तथा 'द एज' जैसे अखबारों में काम किया। आई.सी.आई.जे. का उद्देश्य खोजी पत्रकारिता के जरिए बेहतर दुनिया के निर्माण में योगदान करना है। समूह राष्ट्रीय सीमाओं में बंधकर कार्य करने की बजाय वैश्विक दृष्टिकोण अपनाता है। उसका कार्य क्षेत्र सीमा पार की आपराधिक गतिविधियों, भ्रष्टाचार और सत्ता-शक्ति को उत्तरदायित्वपूर्ण बनाने पर केन्द्रित है। समूह का मानना है कि विकास और अंतरराष्ट्रीयकरण से मानव समाज पर कई तरह के दबाव बढ़ गए हैं। शक्ति-सम्पन्न लोग सत्ता और बाजार पर काबिज होकर जन हित की अनदेखी कर रहे हैं। ऐसे हालात में जब पत्रकारिता को अपनी आंख और कान खुले रखने हैं और खोजी पत्रकारिता की दुनिया को सबसे अधिक जरूरत है, तब आई.सी.आई.जे. जैसे समूह संगठन की भूमिका और अधिक बढ़ जाती है। इस समूह में पत्रकारों के अलावा अनेक देशों के मीडिया संस्थान भी सम्बद्ध हैं। इनमें प्रमुख हैं— बीबीसी वल्र्ड सर्विस, द इंटरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून, ला मोन्डे (फ्रांस), अल मुन्डो (स्पैन), 'त्राऊ' (नीदरलैण्ड्स), फोहा दे साओ पालो (ब्राजील), ला सोइन (बैल्जियम), नोवाया गजेटा (रूस), द साउथ चाइना मोर्निंग पोस्ट (हांगकांग), द गार्जियन (ब्रिटेन), द संडे टाइम्स (ब्रिटेन), द हफिंग्टन पोस्ट (अमरीका), द एज (आस्ट्रेलिया), द इंडियन एक्सप्रेस (भारत)। आई.सी.आई.जे. हर दो साल बाद खोजी पत्रकारिता के लिए एक अन्तरराष्ट्रीय स्पर्धा प्रायोजित करता है, जिसके तहत चयनित पत्रकार को डेनियल पर्ल अवार्ड से नवाजा जाता है। बहरहाल, इस पत्रकार समूह ने गोपनीय निवेश और काले धन को लेकर जो तथ्य उजागर किए हैं, वह अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर खोजी पत्रकारिता का बेहतरीन उदाहरण है।

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सितारे को सजा या माफी!

क्या कानून और संविधान की गरिमा नहीं रखी जाए? क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना हो? क्या न्याय का सिद्धान्त भंग हो? इसमें कोई शक नहीं कि राज्यपाल को माफी का अधिकार संविधान प्रदत्त है, लेकिन इस अधिकार का उपयोग करते हुए हमें नहीं भूलना चाहिए कि इन्साफ कहीं से भी आहत न हो। क्या संजय दत्त की माफी की मांग करते हुए इसका ध्यान रखा गया है?




फिल्म अभिनेता संजय दत्त को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार सजा हो या फिर राज्यपाल उनकी सजा माफ कर दें? इस बहस में जहां प्रिन्ट मीडिया की संतुलित भूमिका रही, वहीं न्यूज चैनलों की भूमिका पर अंगुलियां उठ रही हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तत्काल बाद ही ज्यादातर न्यूज चैनल संजय दत्त के पक्ष में भावपूर्ण माहौल बनाने में जुट गए। वे संजय दत्त को इस तरह से पेश कर रहे थे मानो एक सितारे के साथ बहुत बड़ा अन्याय हो गया हो। संजय दत्त की फिल्मों के चुन-चुन कर दृश्य दिखाए जाने लगे। उनकी गांधीगिरी वाली फिल्मी भूमिका को बार-बार उभारा गया। उनके जुड़वां बच्चों, पत्नी मान्यता, सांसद बहन प्रिया दत्त और माता-पिता सुनील दत्त व नरगिस को लेकर भावुक कहानियां बताई जाने लगीं। बॉलीवुड सितारों के एक-एक करके इंटरव्यू लिए गए। सबने एक स्वर में कहा- संजू बाबा बहुत नेक इन्सान हैं। रही-सही कसर प्रेस परिषद अध्यक्ष जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने पूरी कर दी। उन्होंने कहा, संजय दत्त को माफी मिलनी चाहिए। जस्टिस काटजू ने महाराष्ट्र के राज्यपाल को पत्र लिखा कि संजय दत्त संविधान के अनुच्छेद १६१ के तहत माफी के हकदार हैं। वे पहले ही १८ माह जेल भुगत चुके हैं, इसलिए राज्यपाल महोदय को उनकी बाकी सजा माफ कर देनी चाहिए। इसके बाद तो राजनीतिक दलों के नेताओं में भी संजय दत्त को बचाने की होड़-सी लग गई। कांग्रेस, सपा, एनसीपी आदि दल जहां संजय दत्त के पक्ष में हैं, तो भाजपा, शिव सेना विरोध में उतर पड़ी हैं। दरअसल, सवाल पक्ष या विरोध का नहीं है। सवाल इससे कहीं ऊपर उठकर है। क्या कानून और संविधान की गरिमा नहीं रखी जाए? क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना हो? क्या न्याय का सिद्धान्त भंग हो? इसमें कोई शक नहीं कि राज्यपाल को माफी का अधिकार संविधान प्रदत्त है, लेकिन इस अधिकार का उपयोग करते हुए हमें नहीं भूलना चाहिए कि इन्साफ कहीं से भी आहत न हो। न्याय के प्रति पीडि़तों व आम जन की भावनाओं को ठेस न पहुंचे। क्या राज्यपाल से संजय दत्त की माफी की मांग करते हुए इसका ध्यान रखा गया? टीआरपी की होड़ में न्यूज चैनलों ने भी सब कुछ भुला दिया। संजय का अतीत दरकिनार कर दिया गया, जिसकी सोशल मीडिया में खूब आलोचना हो रही है। यहां तक कहा जा रहा है कि एक अपराधी को कानूनसम्मत सजा दिलाने में मीडिया को अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए। लोगों की इस धारणा के पीछे निश्चय ही १९९३ का स्याह अतीत है, जिसे याद कर आज भी रूह कांप उठती है।
मुम्बई में १२ मार्च १९९३ को दोपहर डेढ़ बजे से बम धमाके शुरू हुए। सवा दो घंटे तक जगह-जगह धमाके होते रहे। चीख-पुकार के बीच २५७ निर्दोष लोगों की मौत हो गई। ७१३ घायल हो गए। पूरी मुंबई दहल गई। ये धमाके भारत के पहले सुनियोजित शृंखलाबद्ध धमाके थे। आतंक का एक नया और भयावह चेहरा सामने आया। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा, विस्फोट की घटनाओं में पाकिस्तान का पूरा हाथ था। मुंबई की अलग-अलग जगहों पर विस्फोटक रखने के लिए जिन १९ अपराधियों को चुना गया, उनमें १७ को पाकिस्तान में ट्रेनिंग दी गई। पाकिस्तान से लौटकर इन लोगों ने विस्फोटों को अंजाम दिया। हथियार और विस्फोटक भी तस्करी करके लाए गए। इनके सरगना दाउद इब्राहिम, टाइगर मेमन व कई गुर्गे भागकर पाकिस्तान चले गए और आज वहां शान से रह रहे हैं। यह पहला अवसर है, जब सुप्रीम कोर्ट ने भारत में भारतीयों द्वारा की गई आतंकी घटना के लिए पाकिस्तान को सीधे दोषी ठहराया है।
खैर... विस्फोटों में संजय दत्त का कोई हाथ नहीं था। टाडा कोर्ट ने पहले ही उन्हें आपराधिक साजिश से बरी कर दिया था और उन्हें छह साल की सजा सुना दी थी। ध्यान रहे यह सजा उन्हें ए.के. ५६ रायफल और एक पिस्तौल अवैध रूप से रखने पर सुनाई गई थी। आतंकी इसी रायफल का इस्तेमाल करते हैं। धमाकों के लिए भारत में तस्करी से लाए गए हथियारों में से एक संजय दत्त के पास भी पहुंची। आखिर कैसे? संजय दत्त तब ३३ वर्ष के दुस्साहसी और एक लापरवाह नौजवान थे। लापरवाही का खमियाजा भुगतना ही पड़ता है। संजय दत्त ने भी भुगता। सबक भी सीखे होंगे, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि संजय दत्त का मामला एक सामान्य लापरवाही तक सीमित नहीं है। यह एक ऐसी घटना से जुड़ा हुआ है, जो शायद ही कभी भुलाई जाएगी। लाखों-करोड़ों लोगों की भावनाएं भी इससे जुड़ी हैं। पीडि़तों और मृतकों के परिजनों की तो है ही। इसलिए कानूनसम्मत जो भी सजा हो, वह उन्हें भुगतनी होगी। जाने-माने कानूनविद् जस्टिस आर.एस. सोढ़ी के अनुसार, 'संजय दत्त बहुत सस्ते में छूट गए। उन्हें सिर्फ पांच वर्ष की सजा मिली है, जो उनके अपराध के हिसाब से बहुत कम है। इससे उन्हें संतुष्ट हो जाना चाहिए।' सही है, एक बार टाडा कानून में मुकदमा दर्ज हो जाने के बाद हटाया नहीं जाता। टाडा में बंद जब्बुनिशा काजी से पूछिए, जिसकी दलील है कि उसका गुनाह तो संजय दत्त से भी कम था। सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील कमलेश जैन का कहना है- 'बेशक उस वक्त (बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद) मुंबई के हालात भयावह थे और पुलिस से संजय दत्त और उनके परिवार को सुरक्षा नहीं मिल रही थी। इसलिए उन्होंने भय व अपने बचाव में गैर-कानूनी तरीके से हथियार रखे, लेकिन अपने आप में यह दलील नाकाफी है। आखिर बहुत सारे लोग मुम्बई में उसी हालात में रह रहे थे और अगर वे भी यही कदम उठाते, तो क्या होता?'
जैसा कि पहले कहा, एके-५६ रायफल आतंकी रखते हैं। बेशक संजय दत्त ने इसका इस्तेमाल नहीं किया। आतंकियों से उनका परिचय भी नहीं होगा, परन्तु हथियारों की तस्करी करने और उनकी अवैध खरीद-बिक्री करने वाले असामाजिक तत्वों के सम्पर्कों में तो वे आए ही थे। कानून के जानकार कहते हैं कि मुम्बई में इतना बड़ा आतंकी मनसूबा कामयाब नहीं होता, अगर जिम्मेदार तंत्र के साथ ही स्थानीय लोगों ने भी लापरवाही न बरती होती। संजय दत्त तो एक नामी परिवार से ताल्लुक रखते थे। उन्हें तो खास सावधानी बरतनी चाहिए थी। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक इन्सान की जिम्मेदारी तय करता है। सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीशों जस्टिस पी. सदाशिवम व जस्टिस बी.एस. चौहान ने फैसला सुनाते हुए कहा कि दत्त परिवार के रुतबे के बावजूद यह नहीं माना जा सकता कि संजय दत्त अवैध ढंग से हथियार रखें। उन्हें सजा पूरी करनी ही होगी। संजय दत्त को माफी की मांग करना सुप्रीम कोर्ट की मंशा की अवमानना ही मानी जाएगी। संजय दत्त को माफ किया जाता है, तो यह संदेश जाएगा कि बड़े और रुतबे वाले लोग अपराध करके बच निकलते हैं या फिर रियायत पा लेते हैं भले ही शीर्ष अदालत उन्हें दोषी माने। आम जनता के इन मनोभावों को मीडिया को भी अनदेखा नहीं करना चाहिए।

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राजनीति के 'सेफ्टी वॉल्व!

आगामी चुनावों को देखते हुए टीवी चैनल के लाइसेंस के लिए सरकार के पास 152 आवेदन आए हैं। आधे से ज्यादा (80) आवेदन न्यूज चैनल के लिए हैं।  ज्यादातर न्यूज चैनल घाटे में हैं, तो नए चैनल के लिए कतार क्यों लगी हुई है? न्यूज चैनल भले घाटे में हों, उसके मालिक का दूसरा धंधा खूब चमक रहा है। दरअसल, वह मीडिया के कारोबार में आया ही इसलिए कि उसके दूसरे धंधे को कवच मिल सके।

हाल ही खबर थी कि आगामी चुनावों को देखते हुए कई नए न्यूज चैनल शीघ्र लांच हो सकते हैं। टीवी चैनल के लाइसेंस के लिए सरकार के पास 152 आवेदन पत्र आए हुए हैं। इनमें आधे से ज्यादा (80) आवेदन न्यूज चैनल के लिए हैं। ज्यादातर आवेदन रीजनल चैनल के लिए हैं। बताया जाता है इस समय देश में करीब 800 टीवी चैनल हैं, जिनमें न्यूज चैनलों की संख्या करीब 400 है।
पहले न्यूज चैनल शुरू करने के लिए लाइसेंस शुल्क 3 करोड़ रुपए था। इसे वर्ष 2011 में बढ़ाकर 20 करोड़ रुपए कर दिया गया। न्यूज चैनल शुरू करने के लिए करीब सौ सवा सौ करोड़ रुपए की न्यूनतम पूंजी की जरूरत पड़ती है।
 ध्यान देने की बात यह भी है कि ज्यादातर न्यूज चैनल घाटे में चल रहे हैं। अब सवाल यह है कि इसके बावजूद नए न्यूज चैनल के लिए आवेदनकर्ताओं की कतार क्यों लगी हुई है? न्यूज चैनल भले ही घाटे में चल रहा हो, उसके मालिक का दूसरा धंधा खूब चमक रहा है। दरअसल, वह मीडिया के कारोबार में आया ही इसलिए कि उसके दूसरे धंधे को कवच मिल सके। विशुद्ध मीडिया का कारोबार करने वाले गिने-चुने ही हैं। कोई रियल स्टेट के धंधे में तो कोई चिटफंड कंपनी चला रहा है। कोई निर्माण उद्योग में है, तो कोई राजनीति में हाथ आजमा रहा है। चुनाव से बात शुरू की थी, सो फिलहाल यहां राजनीति की ही चर्चा कर रहा हूं। धंधे की तरह ही राजनीति को चमकाने के लिए भी न्यूज चैनलों का इस्तेमाल किया जा रहा है। बीते वर्षों में राजनेताओं ने इस पर तेजी से काम किया है। वे सीधे मीडिया के मालिक बन रहे हैं। हालांकि दक्षिण भारत में यह मीडिया-राजनीति काफी समय से है, पर अब यह पूरे देश में फैल रही है। हर दल के नेता इस पर कब्जा जमा रहे हैं। इंडिया न्यूज चैनल हरियाणा के कांग्रेसी नेता विनोद शर्मा का है। इनके बेटे मनु शर्मा को मीडिया की सक्रियता के कारण ही जेसिका लाल की हत्या के आरोप में पकड़ा गया और अब वह आजीवन कारावास की सजा भुगत रहा है। पिता आज तीन-तीन न्यूज चैनलों के मालिक हैं। मीडिया समीक्षकों का कहना है कि यह कारोबार गलत लोगों के लिए 'सेफ्टी वॉल्व' की तरह काम करता है। हरियाणा के पूर्व गृह राज्य मंत्री गोपाल कांडा के पास पांच टीवी चैनलों के लाइसेंस हैं। ये वही गोपाल कांडा हैं, जो एयर होस्टेस गीतिका शर्मा की आत्महत्या के मुख्य आरोपी हैं। इनका न्यूज चैनल हरियाणा न्यूज उस वक्त गोपाल कांडा को समाज सेवी के रूप में प्रस्तुत कर रहा था, जब मीडिया कांडा को अपराधी और तिकड़मी राजनेता के तौर पर दर्शा रहा था। कांडा के और भी धंधे हैं।
पंजाब में शिरोमणि अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल केवल अपनी पार्टी में ही मालिकाना हक नहीं रखते, बल्कि पंजाब के लोकप्रिय टीवी चैनल पीटीसी और पीटीसी न्यूज के भी मालिक हैं। पिछले साल पंजाब विधानसभा चुनावों के दौरान राहुल गांधी ने बादल पर यह आरोप लगाया था कि उन्होंने अपने चैनल को पार्टी के प्रचार का मंच बना रखा है। पंजाब के इतिहास में पहली बार हुआ, जब एक ही पार्टी ने दुबारा सत्ता हासिल की। अकाली दल फिर सत्ता में आ गया। निश्चय ही इसमें पीटीसी न्यूज का भी योगदान रहा होगा। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी तृणमूल की ओर से पश्चिम बंग टीवी की घोषणा कर चुकी हैं, तो माकपा के अवीक दत्ता आकाश बांगला और 24 घंटा टीवी चैनलों के मालिक हैं। आंध्रप्रदेश में वाई.एस. राजशेखर रेड्डी की छवि के बाद उनके पुत्र जगन मोहन रेड्डी के पास राजनीतिक तौर पर ताकतवर बनने के लिए जो सबसे मुफीद हथियार है वह है उनका साक्षी टीवी। साक्षी मीडिया समूह को स्थापित करने के दौरान की गई वित्तीय अनियमितताओं के आरोप में उन्हें गत वर्ष सीबीआई ने गिरफ्तार किया था। तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष के. चन्द्रशेखर राव टी-न्यूज चैनल के मालिक है। तमिलनाडु में एआईडीएमके की जयललिता और डीएमके के कलानिधि मारन जया टीवी और सन टीवी के जरिए न केवल राजनीति चमका चुके हैं, बल्कि अच्छा-खासा धन भी कमा रहे हैं। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एच.डी. कुमार स्वामी की पत्नी अनिता कुमार स्वामी कन्नड़ टीवी चैनल कस्तूरी टीवी चला रही है। कांग्रेस के राजीव शुक्ला पत्नी अनुराधा प्रसाद के साथ न्यूज-24 चैनल के मालिक हैं, तो महाराष्ट्र में विजय दर्डा आईबीएन-लोकमत मराठी न्यूज चैनल के मालिक हैं। असम में मतंग सिंह एन.ई. टीवी तथा फोकस टीवी के मालिक हैं। उनके राजनीतिक पुनस्र्थापन में उनके न्यूज चैनलों की बड़ी भूमिका रही है। बीजू जनता दल के सांसद बैजयन्त जय पांडा की पत्नी जग्गी मंगल पांडा उड़ीसा में ओटीवी की मालकिन हैं। पांडा के लिए चैनल एक प्रभावी हथियार भी है।
राजनीतिक वर्चस्व के लिए इसका इस्तेमाल हो रहा है। विरोधी को हड़काने और खुद को स्थापित करने के लिए इस माध्यम का दुरुपयोग किया जा रहा है। हालांकि इन चैनलों पर खबरों की शुचिता, विश्वसनीयता के भी सवाल खड़े हैं, पर फिलहाल ये गौण हैं। न्यूज चैनल के जरिए जब दूसरे कई लाभ हों तो यह घाटे का सौदा नहीं। लाइसेंस के लिए जो आवेदन लंबित हैं, उनमें कितने राजनेताओं के हैं, यह स्पष्ट नहीं, लेकिन यह स्पष्ट है कि 400 से भी अधिक न्यूज चैनलों के बावजूद क्यों नए लाइसेंस पाने की कतार लगी है।
पकड़े गए रंगे हाथ!!
न्यूज चैनलों पर राजनीतिक पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं। इनमें रीजनल ही नहीं राष्ट्रीय और बड़े कहे जाने वाले चैनल भी शामिल हैं। ताजा मामला एनडी टीवी का है। पटल पर राजनीतिक बहस चल रही थी। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के संदर्भ में प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद बयान दे रहे थे। बयान में रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस-भाजपा की तुलना की। इसी दौरान पीछे से किसी ने एंकर को निर्देश दिया— 'कांग्रेस को डिफेंड कर देना'। यह वाक्य लाइव प्रसारण के दौरान सबको सुनाई दे गया। संभवत: यह निर्देश प्रोग्राम कंट्रोलर ने दिया होगा। एंकरिंग निधि कुलपति कर रही थी। चोरी पकड़ी गई। वाक्य रिकॉर्ड हो गया, जिसे एक दर्शक ने बाकायदा यू-ट्यूब पर डाल दिया। फेसबुक पर एक यूजर ने लिखा— 'तकनीक बड़ी मायावी होती है। आपको छिपा भी सकती है और आपका पर्दाफाश भी कर सकती है। तकनीक सचमुच दुधारी तलवार है। गत दिनों राज्य सभा की कार्यवाही के लाइव प्रसारण के दौरान ही राजीव शुक्ला का यह वाक्य— 'सदन स्थगित कर दीजिए' भी खूब चर्चित हुआ था। उन्होंने यह बात चुपके से उप सभापति पी.जे. कुरियन को कही थी, लेकिन रिकॉर्ड हो गई और भेद खुल गया

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प्रेस परिषद का दोहरा रवैया

भारतीय प्रेस परिषद की रिपोर्ट को जहां एक ओर सराहा गया है, वहीं आलोचना भी की गई है।  जो मुद्दे उठाए गए हैं, उस पर व्यापक चर्चा की जरूरत है। सरकारी विज्ञापन ही नहीं, कॉरपोरेट विज्ञापनों को लेकर भी एक स्पष्ट नीति की जरूरत है जिसके तहत प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा की जा सके। क्या प्रेस की स्वतंत्रता का मसला एक राज्य तक सीमित है? प्रेस परिषद के सीमित अधिकार हैं, लेकिन जो है उनके इस्तेमाल में भेदभाव की कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए। 

  बिहार में अखबारों की स्थिति को लेकर भारतीय प्रेस परिषद की रिपोर्ट पर मीडिया जगत में दो तरह की परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। एक तबका मानता है कि यह रिपोर्ट पूर्वाग्रह से ग्रसित है। रिपोर्ट में जो कहा गया है वह कमोबेश सभी राज्यों पर लागू होता है फिर अकेला बिहार ही क्यों? दूसरे तबके की राय में प्रेस परिषद ने ज्वलंत मुद्दा उठाया है। बिहार में अखबारों के हालात सचमुच दयनीय है।
प्रेस परिषद की तीन सदस्यीय समिति ने बिहार में ११ माह पड़ताल करके एक रिपोर्ट तैयार की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बिहार में प्रेस पर सेंसरशिप है और वहां आपातकाल जैसे हालात हंै। नीतिश सरकार ने अखबारों की स्वतंत्रता का गला घोंट रखा है। सरकारी विज्ञापन चहेते अखबारों को ही दिये जाते हैं। चूंकि सरकारी विज्ञापन अखबारों की आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, इसलिए इनका इस्तेमाल अखबारों पर अंकुश लगाने के लिए किया जा रहा है। अखबार सरकार के दबाव में हैं इसलिए बिहार में भ्रष्टाचार और दूसरे महत्त्वपूर्ण मुद्दों की उपेक्षा की जा रही है। सरकारी उपलब्धियों और तारीफों की ही एक तरफा तस्वीर पेश की जा रही है। अत: प्रेस परिषद की मांग है कि बिहार में सरकारी विज्ञापनों के लिए एक स्वतंत्र एजेंसी बनाई जाए जो तय मापदंडों के अनुसार अखबारों को विज्ञापन जारी करे।
जैसाकि पहले कहा, इस रिपोर्ट को जहां एक ओर सराहा गया है, वहीं आलोचना भी की गई है। 'आउटलुक' गु्रप के अध्यक्ष विनोद मेहता, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अध्यक्ष टी.एन. नैनन, इंडिया टुडे के आशीष बग्गा, आईबीएन के राजदीप सरदेसाई, पॉयोनियर के संपादक चंदन मित्रा आदि मीडिया विशेषज्ञों के अनुसार प्रेस परिषद ने महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है जिस पर व्यापक चर्चा की जरूरत है। सरकारी विज्ञापन ही नहीं, कॉरपोरेट विज्ञापनों को लेकर भी एक स्पष्ट नीति की जरूरत है जिसके तहत प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा की जा सके। सरकारें आम तौर पर विज्ञापनों के बहाने अखबारों की बाहें मरोडऩे का काम करती हंै, जो प्रेस की स्वतंत्रता के लिए खतरा है।
दूसरी ओर एक वर्ग ऐसा है जो यह तो मानता है कि बिहार में सरकारी विज्ञापनों का दुरुपयोग किया जा रहा है, मगर प्रेस सेंसरशिप और आपातकाल जैसे हालात बताना अतिरंजित है। कुछ हद तक रिपोर्ट पूर्वाग्रह से भी ग्रसित है। प्रेस परिषद की समिति ने बिहार में ११ माह तक तहकीकात करके जो निष्कर्ष निकाला है वह तो प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू एक साल पहले ही निकाल चुके। पत्रकार विनीत कुमार के अनुसार एक साल पहले इसी फरवरी में जस्टिस काटजू ने जब पटना का दौरा किया तो बताया कि बिहार में मीडिया के हाथ बंधे हुए हैं। उल्लेखनीय है कि गत वर्ष २५ फरवरी को पटना विश्वविद्यालय के एक सेमिनार से जस्टिस काटजू ने कहा था कि बिहार में मीडिया पर सेंसर है। जबकि लालू राज के दौरान मीडिया को आजादी थी। उन्होंने यह घोषणा भी कि कि परिषद के तीन सदस्य बिहार आकर पड़ताल करेंगे। यह सवाल उठाया गया है कि परिषद अध्यक्ष निष्कर्ष पर पहले ही पहुंच चुके तो समिति गठित करने की क्या जरूरत थी। दरअसल प्रेस परिषद की रिपोर्ट पूर्वाग्रह से ग्रसित बताने के पीछे तर्क है कि दूसरे प्रदेशों की सरकारें भी वही कर रही हैं जो बिहार सरकार कर रही है। विज्ञापनों के जरिए मीडिया को 'मैनेज' करने की सरकारों की प्रवृत्ति पुरानी है। इसलिए केवल बिहार ही निशाने पर क्यों? पत्रकार मुकेश भारतीय ने लिखा 'काटजू जी बिहार के चारों ओर भी झाांकिये' पिछले वर्ष झाारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा सत्ता से जाते-जाते मीडिया के लिए सरकारी विज्ञापन मद की राशि चार गुणा कर दी। आदित्य नारायण उपाध्याय के अनुसार मध्यप्रदेश में भी प्रेस और पत्रकारों पर अघोषित सेंसरशिप है। यहां का जनसम्पर्क विभाग पहचान- पहचान कर विज्ञापन दे रहा है और ऐसे अखबारों को निपटा रहा है जो सरकार की विरुदावली नहीं गाते। मध्यप्रदेश, छतीसगढ़, झाारखंड, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, कर्नाटक, पंजाब, हिमाचल प्रदेश आदि कई राज्यों की सूची है, जहां सरकारी विज्ञापनों की आड़ में प्रेस की बाहें मरोड़ी जाती है। प्रेस परिषद को इसकी जानकारी नहीं होगी, यह संभव नहीं। बल्कि कुछ शिकायतों की तो परिषद ने बाकायदा अनदेखी की अथवा औपचारिकता भर निभाई। कुछ समय पूर्व 'इंडियन एक्सप्रेस' ने विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की थी कि छत्तीसगढ़ में रमन सिंह सरकार किस तरह मीडिया से खबरों के पैकेज खरीद रही है। प्रेस परिषद मौन रही। यह सही है कि रिपोर्ट मुख्यत: टीवी चैनलों से संबंधित थी, लेकिन यही हालात कई अखबारों के भी है जो किसी से छिपा नहीं हंै।
इसमें दो राय नहीं कि प्रेस परिषद के सीमित अधिकार हैं, लेकिन जो हैं उनके इस्तेमाल में भेदभाव की कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए। प्रेस परिषद, केन्द्र व समस्त राज्य सरकारों की विज्ञापन नीति को लेकर कोई दिशा निर्देश देती है तो बेहतर होता। बिहार ही क्यों, अन्य राज्यों में भी सरकारी विज्ञापनों के लिए स्वतंत्र एजेंसी क्यों नहीं होनी चाहिए? क्या प्रेस की स्वतंत्रता का मसला एक राज्य तक सीमित है?
पत्रकार, सच्चाई और जोखिम
किसी पत्रकार को सच्चाई उजागर करने पर पुरस्कार की बजाय जेल की सजा मिले तो इसे आप क्या कहेंगे? पुलिस की ज्यादती? सरकार की संवेदनहीनता? या कानून की विसंगति? आप चाहे कुछ भी कहें, लेकिन कन्नड़ के एक टीवी पत्रकार नवीन सूरिंजे पिछले तीन माह से भी अधिक समय से जेल की सजा भुगत रहे हैं। नवीन सूरिंजे ने मंगलूर से एक होटल में बर्थ-डे पार्टी मना रहे युवक-युवतियों के एक समूह पर हमला करने तथा युवाओं को अपमानित करने वालों की टीवी चैनल पर पोल खोली थी। हिन्दू जागरण वेदिके नामक संगठन के करीब ४३ तथाकथित कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी को नवीन ने टीवी कैमरे में कैद कर लिया था। टीवी पर इन कथित कार्यकर्ताओं की कारगुजारी उजागर होने के बाद लोगों ने पुलिस को जमकर कोसा। लिहाजा पुलिस ने सभी ४३ जनों को गिरफ्तार कर लिया। नवीन सूरिंजे को भी पुलिस ने ४४वां अभियुक्त बनाकर जेल में डाल दिया। नवीन सूरिंजे पर यह आरोप लगाया गया कि वह भी इस साजिश में शामिल थे। क्योंकि पूर्व जानकारी के बावजूद नवीन सूरिंजे ने पुलिस को इसकी जानकारी नहीं दी। अदालत ने भी सूरिंजे को जमानत देने से इनकार कर दिया कि उन्होंने पूर्व जानकारी के बावजूद पुलिस को इसकी सूचना क्यों नहीं दी? बचाव में सूरिंजे का कहना है कि उन्हें घटना की सूचना पहले से नहीं थी।  एक स्थानीय व्यक्ति से जब उन्हें सूचना मिली तो उन्होंने मंगलूर के पुलिस कमिश्नर को फोन किया था, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। टीवी पत्रकार का तर्क था कि उसने पत्रकारिता धर्म का निर्वाह किया।
सवाल है, सूरिंजे को सजा मिलनी चाहिए या इनाम? पत्रकारिता के प्राध्यापक आनन्द प्रधान ने सही लिखा 'अपराधियों को सामने लाने और दोषियों की पहचान करने में मदद करने वाले सूरिंजे जैसे पत्रकारों को ही फंसाने की कोशिश की जाएगी तो कितने पत्रकार यह जोखिम उठाएंगे?' सचमुच पत्रकारिता से अगर 'जोखिम' हट गया तो समझिाए पत्रकारिता भी मिट गई। क्या नहीं?

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