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सितारे को सजा या माफी!

क्या कानून और संविधान की गरिमा नहीं रखी जाए? क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना हो? क्या न्याय का सिद्धान्त भंग हो? इसमें कोई शक नहीं कि राज्यपाल को माफी का अधिकार संविधान प्रदत्त है, लेकिन इस अधिकार का उपयोग करते हुए हमें नहीं भूलना चाहिए कि इन्साफ कहीं से भी आहत न हो। क्या संजय दत्त की माफी की मांग करते हुए इसका ध्यान रखा गया है?




फिल्म अभिनेता संजय दत्त को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार सजा हो या फिर राज्यपाल उनकी सजा माफ कर दें? इस बहस में जहां प्रिन्ट मीडिया की संतुलित भूमिका रही, वहीं न्यूज चैनलों की भूमिका पर अंगुलियां उठ रही हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तत्काल बाद ही ज्यादातर न्यूज चैनल संजय दत्त के पक्ष में भावपूर्ण माहौल बनाने में जुट गए। वे संजय दत्त को इस तरह से पेश कर रहे थे मानो एक सितारे के साथ बहुत बड़ा अन्याय हो गया हो। संजय दत्त की फिल्मों के चुन-चुन कर दृश्य दिखाए जाने लगे। उनकी गांधीगिरी वाली फिल्मी भूमिका को बार-बार उभारा गया। उनके जुड़वां बच्चों, पत्नी मान्यता, सांसद बहन प्रिया दत्त और माता-पिता सुनील दत्त व नरगिस को लेकर भावुक कहानियां बताई जाने लगीं। बॉलीवुड सितारों के एक-एक करके इंटरव्यू लिए गए। सबने एक स्वर में कहा- संजू बाबा बहुत नेक इन्सान हैं। रही-सही कसर प्रेस परिषद अध्यक्ष जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने पूरी कर दी। उन्होंने कहा, संजय दत्त को माफी मिलनी चाहिए। जस्टिस काटजू ने महाराष्ट्र के राज्यपाल को पत्र लिखा कि संजय दत्त संविधान के अनुच्छेद १६१ के तहत माफी के हकदार हैं। वे पहले ही १८ माह जेल भुगत चुके हैं, इसलिए राज्यपाल महोदय को उनकी बाकी सजा माफ कर देनी चाहिए। इसके बाद तो राजनीतिक दलों के नेताओं में भी संजय दत्त को बचाने की होड़-सी लग गई। कांग्रेस, सपा, एनसीपी आदि दल जहां संजय दत्त के पक्ष में हैं, तो भाजपा, शिव सेना विरोध में उतर पड़ी हैं। दरअसल, सवाल पक्ष या विरोध का नहीं है। सवाल इससे कहीं ऊपर उठकर है। क्या कानून और संविधान की गरिमा नहीं रखी जाए? क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना हो? क्या न्याय का सिद्धान्त भंग हो? इसमें कोई शक नहीं कि राज्यपाल को माफी का अधिकार संविधान प्रदत्त है, लेकिन इस अधिकार का उपयोग करते हुए हमें नहीं भूलना चाहिए कि इन्साफ कहीं से भी आहत न हो। न्याय के प्रति पीडि़तों व आम जन की भावनाओं को ठेस न पहुंचे। क्या राज्यपाल से संजय दत्त की माफी की मांग करते हुए इसका ध्यान रखा गया? टीआरपी की होड़ में न्यूज चैनलों ने भी सब कुछ भुला दिया। संजय का अतीत दरकिनार कर दिया गया, जिसकी सोशल मीडिया में खूब आलोचना हो रही है। यहां तक कहा जा रहा है कि एक अपराधी को कानूनसम्मत सजा दिलाने में मीडिया को अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए। लोगों की इस धारणा के पीछे निश्चय ही १९९३ का स्याह अतीत है, जिसे याद कर आज भी रूह कांप उठती है।
मुम्बई में १२ मार्च १९९३ को दोपहर डेढ़ बजे से बम धमाके शुरू हुए। सवा दो घंटे तक जगह-जगह धमाके होते रहे। चीख-पुकार के बीच २५७ निर्दोष लोगों की मौत हो गई। ७१३ घायल हो गए। पूरी मुंबई दहल गई। ये धमाके भारत के पहले सुनियोजित शृंखलाबद्ध धमाके थे। आतंक का एक नया और भयावह चेहरा सामने आया। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा, विस्फोट की घटनाओं में पाकिस्तान का पूरा हाथ था। मुंबई की अलग-अलग जगहों पर विस्फोटक रखने के लिए जिन १९ अपराधियों को चुना गया, उनमें १७ को पाकिस्तान में ट्रेनिंग दी गई। पाकिस्तान से लौटकर इन लोगों ने विस्फोटों को अंजाम दिया। हथियार और विस्फोटक भी तस्करी करके लाए गए। इनके सरगना दाउद इब्राहिम, टाइगर मेमन व कई गुर्गे भागकर पाकिस्तान चले गए और आज वहां शान से रह रहे हैं। यह पहला अवसर है, जब सुप्रीम कोर्ट ने भारत में भारतीयों द्वारा की गई आतंकी घटना के लिए पाकिस्तान को सीधे दोषी ठहराया है।
खैर... विस्फोटों में संजय दत्त का कोई हाथ नहीं था। टाडा कोर्ट ने पहले ही उन्हें आपराधिक साजिश से बरी कर दिया था और उन्हें छह साल की सजा सुना दी थी। ध्यान रहे यह सजा उन्हें ए.के. ५६ रायफल और एक पिस्तौल अवैध रूप से रखने पर सुनाई गई थी। आतंकी इसी रायफल का इस्तेमाल करते हैं। धमाकों के लिए भारत में तस्करी से लाए गए हथियारों में से एक संजय दत्त के पास भी पहुंची। आखिर कैसे? संजय दत्त तब ३३ वर्ष के दुस्साहसी और एक लापरवाह नौजवान थे। लापरवाही का खमियाजा भुगतना ही पड़ता है। संजय दत्त ने भी भुगता। सबक भी सीखे होंगे, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि संजय दत्त का मामला एक सामान्य लापरवाही तक सीमित नहीं है। यह एक ऐसी घटना से जुड़ा हुआ है, जो शायद ही कभी भुलाई जाएगी। लाखों-करोड़ों लोगों की भावनाएं भी इससे जुड़ी हैं। पीडि़तों और मृतकों के परिजनों की तो है ही। इसलिए कानूनसम्मत जो भी सजा हो, वह उन्हें भुगतनी होगी। जाने-माने कानूनविद् जस्टिस आर.एस. सोढ़ी के अनुसार, 'संजय दत्त बहुत सस्ते में छूट गए। उन्हें सिर्फ पांच वर्ष की सजा मिली है, जो उनके अपराध के हिसाब से बहुत कम है। इससे उन्हें संतुष्ट हो जाना चाहिए।' सही है, एक बार टाडा कानून में मुकदमा दर्ज हो जाने के बाद हटाया नहीं जाता। टाडा में बंद जब्बुनिशा काजी से पूछिए, जिसकी दलील है कि उसका गुनाह तो संजय दत्त से भी कम था। सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील कमलेश जैन का कहना है- 'बेशक उस वक्त (बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद) मुंबई के हालात भयावह थे और पुलिस से संजय दत्त और उनके परिवार को सुरक्षा नहीं मिल रही थी। इसलिए उन्होंने भय व अपने बचाव में गैर-कानूनी तरीके से हथियार रखे, लेकिन अपने आप में यह दलील नाकाफी है। आखिर बहुत सारे लोग मुम्बई में उसी हालात में रह रहे थे और अगर वे भी यही कदम उठाते, तो क्या होता?'
जैसा कि पहले कहा, एके-५६ रायफल आतंकी रखते हैं। बेशक संजय दत्त ने इसका इस्तेमाल नहीं किया। आतंकियों से उनका परिचय भी नहीं होगा, परन्तु हथियारों की तस्करी करने और उनकी अवैध खरीद-बिक्री करने वाले असामाजिक तत्वों के सम्पर्कों में तो वे आए ही थे। कानून के जानकार कहते हैं कि मुम्बई में इतना बड़ा आतंकी मनसूबा कामयाब नहीं होता, अगर जिम्मेदार तंत्र के साथ ही स्थानीय लोगों ने भी लापरवाही न बरती होती। संजय दत्त तो एक नामी परिवार से ताल्लुक रखते थे। उन्हें तो खास सावधानी बरतनी चाहिए थी। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक इन्सान की जिम्मेदारी तय करता है। सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीशों जस्टिस पी. सदाशिवम व जस्टिस बी.एस. चौहान ने फैसला सुनाते हुए कहा कि दत्त परिवार के रुतबे के बावजूद यह नहीं माना जा सकता कि संजय दत्त अवैध ढंग से हथियार रखें। उन्हें सजा पूरी करनी ही होगी। संजय दत्त को माफी की मांग करना सुप्रीम कोर्ट की मंशा की अवमानना ही मानी जाएगी। संजय दत्त को माफ किया जाता है, तो यह संदेश जाएगा कि बड़े और रुतबे वाले लोग अपराध करके बच निकलते हैं या फिर रियायत पा लेते हैं भले ही शीर्ष अदालत उन्हें दोषी माने। आम जनता के इन मनोभावों को मीडिया को भी अनदेखा नहीं करना चाहिए।

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राजनीति के 'सेफ्टी वॉल्व!

आगामी चुनावों को देखते हुए टीवी चैनल के लाइसेंस के लिए सरकार के पास 152 आवेदन आए हैं। आधे से ज्यादा (80) आवेदन न्यूज चैनल के लिए हैं।  ज्यादातर न्यूज चैनल घाटे में हैं, तो नए चैनल के लिए कतार क्यों लगी हुई है? न्यूज चैनल भले घाटे में हों, उसके मालिक का दूसरा धंधा खूब चमक रहा है। दरअसल, वह मीडिया के कारोबार में आया ही इसलिए कि उसके दूसरे धंधे को कवच मिल सके।

हाल ही खबर थी कि आगामी चुनावों को देखते हुए कई नए न्यूज चैनल शीघ्र लांच हो सकते हैं। टीवी चैनल के लाइसेंस के लिए सरकार के पास 152 आवेदन पत्र आए हुए हैं। इनमें आधे से ज्यादा (80) आवेदन न्यूज चैनल के लिए हैं। ज्यादातर आवेदन रीजनल चैनल के लिए हैं। बताया जाता है इस समय देश में करीब 800 टीवी चैनल हैं, जिनमें न्यूज चैनलों की संख्या करीब 400 है।
पहले न्यूज चैनल शुरू करने के लिए लाइसेंस शुल्क 3 करोड़ रुपए था। इसे वर्ष 2011 में बढ़ाकर 20 करोड़ रुपए कर दिया गया। न्यूज चैनल शुरू करने के लिए करीब सौ सवा सौ करोड़ रुपए की न्यूनतम पूंजी की जरूरत पड़ती है।
 ध्यान देने की बात यह भी है कि ज्यादातर न्यूज चैनल घाटे में चल रहे हैं। अब सवाल यह है कि इसके बावजूद नए न्यूज चैनल के लिए आवेदनकर्ताओं की कतार क्यों लगी हुई है? न्यूज चैनल भले ही घाटे में चल रहा हो, उसके मालिक का दूसरा धंधा खूब चमक रहा है। दरअसल, वह मीडिया के कारोबार में आया ही इसलिए कि उसके दूसरे धंधे को कवच मिल सके। विशुद्ध मीडिया का कारोबार करने वाले गिने-चुने ही हैं। कोई रियल स्टेट के धंधे में तो कोई चिटफंड कंपनी चला रहा है। कोई निर्माण उद्योग में है, तो कोई राजनीति में हाथ आजमा रहा है। चुनाव से बात शुरू की थी, सो फिलहाल यहां राजनीति की ही चर्चा कर रहा हूं। धंधे की तरह ही राजनीति को चमकाने के लिए भी न्यूज चैनलों का इस्तेमाल किया जा रहा है। बीते वर्षों में राजनेताओं ने इस पर तेजी से काम किया है। वे सीधे मीडिया के मालिक बन रहे हैं। हालांकि दक्षिण भारत में यह मीडिया-राजनीति काफी समय से है, पर अब यह पूरे देश में फैल रही है। हर दल के नेता इस पर कब्जा जमा रहे हैं। इंडिया न्यूज चैनल हरियाणा के कांग्रेसी नेता विनोद शर्मा का है। इनके बेटे मनु शर्मा को मीडिया की सक्रियता के कारण ही जेसिका लाल की हत्या के आरोप में पकड़ा गया और अब वह आजीवन कारावास की सजा भुगत रहा है। पिता आज तीन-तीन न्यूज चैनलों के मालिक हैं। मीडिया समीक्षकों का कहना है कि यह कारोबार गलत लोगों के लिए 'सेफ्टी वॉल्व' की तरह काम करता है। हरियाणा के पूर्व गृह राज्य मंत्री गोपाल कांडा के पास पांच टीवी चैनलों के लाइसेंस हैं। ये वही गोपाल कांडा हैं, जो एयर होस्टेस गीतिका शर्मा की आत्महत्या के मुख्य आरोपी हैं। इनका न्यूज चैनल हरियाणा न्यूज उस वक्त गोपाल कांडा को समाज सेवी के रूप में प्रस्तुत कर रहा था, जब मीडिया कांडा को अपराधी और तिकड़मी राजनेता के तौर पर दर्शा रहा था। कांडा के और भी धंधे हैं।
पंजाब में शिरोमणि अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल केवल अपनी पार्टी में ही मालिकाना हक नहीं रखते, बल्कि पंजाब के लोकप्रिय टीवी चैनल पीटीसी और पीटीसी न्यूज के भी मालिक हैं। पिछले साल पंजाब विधानसभा चुनावों के दौरान राहुल गांधी ने बादल पर यह आरोप लगाया था कि उन्होंने अपने चैनल को पार्टी के प्रचार का मंच बना रखा है। पंजाब के इतिहास में पहली बार हुआ, जब एक ही पार्टी ने दुबारा सत्ता हासिल की। अकाली दल फिर सत्ता में आ गया। निश्चय ही इसमें पीटीसी न्यूज का भी योगदान रहा होगा। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी तृणमूल की ओर से पश्चिम बंग टीवी की घोषणा कर चुकी हैं, तो माकपा के अवीक दत्ता आकाश बांगला और 24 घंटा टीवी चैनलों के मालिक हैं। आंध्रप्रदेश में वाई.एस. राजशेखर रेड्डी की छवि के बाद उनके पुत्र जगन मोहन रेड्डी के पास राजनीतिक तौर पर ताकतवर बनने के लिए जो सबसे मुफीद हथियार है वह है उनका साक्षी टीवी। साक्षी मीडिया समूह को स्थापित करने के दौरान की गई वित्तीय अनियमितताओं के आरोप में उन्हें गत वर्ष सीबीआई ने गिरफ्तार किया था। तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष के. चन्द्रशेखर राव टी-न्यूज चैनल के मालिक है। तमिलनाडु में एआईडीएमके की जयललिता और डीएमके के कलानिधि मारन जया टीवी और सन टीवी के जरिए न केवल राजनीति चमका चुके हैं, बल्कि अच्छा-खासा धन भी कमा रहे हैं। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एच.डी. कुमार स्वामी की पत्नी अनिता कुमार स्वामी कन्नड़ टीवी चैनल कस्तूरी टीवी चला रही है। कांग्रेस के राजीव शुक्ला पत्नी अनुराधा प्रसाद के साथ न्यूज-24 चैनल के मालिक हैं, तो महाराष्ट्र में विजय दर्डा आईबीएन-लोकमत मराठी न्यूज चैनल के मालिक हैं। असम में मतंग सिंह एन.ई. टीवी तथा फोकस टीवी के मालिक हैं। उनके राजनीतिक पुनस्र्थापन में उनके न्यूज चैनलों की बड़ी भूमिका रही है। बीजू जनता दल के सांसद बैजयन्त जय पांडा की पत्नी जग्गी मंगल पांडा उड़ीसा में ओटीवी की मालकिन हैं। पांडा के लिए चैनल एक प्रभावी हथियार भी है।
राजनीतिक वर्चस्व के लिए इसका इस्तेमाल हो रहा है। विरोधी को हड़काने और खुद को स्थापित करने के लिए इस माध्यम का दुरुपयोग किया जा रहा है। हालांकि इन चैनलों पर खबरों की शुचिता, विश्वसनीयता के भी सवाल खड़े हैं, पर फिलहाल ये गौण हैं। न्यूज चैनल के जरिए जब दूसरे कई लाभ हों तो यह घाटे का सौदा नहीं। लाइसेंस के लिए जो आवेदन लंबित हैं, उनमें कितने राजनेताओं के हैं, यह स्पष्ट नहीं, लेकिन यह स्पष्ट है कि 400 से भी अधिक न्यूज चैनलों के बावजूद क्यों नए लाइसेंस पाने की कतार लगी है।
पकड़े गए रंगे हाथ!!
न्यूज चैनलों पर राजनीतिक पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं। इनमें रीजनल ही नहीं राष्ट्रीय और बड़े कहे जाने वाले चैनल भी शामिल हैं। ताजा मामला एनडी टीवी का है। पटल पर राजनीतिक बहस चल रही थी। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के संदर्भ में प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद बयान दे रहे थे। बयान में रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस-भाजपा की तुलना की। इसी दौरान पीछे से किसी ने एंकर को निर्देश दिया— 'कांग्रेस को डिफेंड कर देना'। यह वाक्य लाइव प्रसारण के दौरान सबको सुनाई दे गया। संभवत: यह निर्देश प्रोग्राम कंट्रोलर ने दिया होगा। एंकरिंग निधि कुलपति कर रही थी। चोरी पकड़ी गई। वाक्य रिकॉर्ड हो गया, जिसे एक दर्शक ने बाकायदा यू-ट्यूब पर डाल दिया। फेसबुक पर एक यूजर ने लिखा— 'तकनीक बड़ी मायावी होती है। आपको छिपा भी सकती है और आपका पर्दाफाश भी कर सकती है। तकनीक सचमुच दुधारी तलवार है। गत दिनों राज्य सभा की कार्यवाही के लाइव प्रसारण के दौरान ही राजीव शुक्ला का यह वाक्य— 'सदन स्थगित कर दीजिए' भी खूब चर्चित हुआ था। उन्होंने यह बात चुपके से उप सभापति पी.जे. कुरियन को कही थी, लेकिन रिकॉर्ड हो गई और भेद खुल गया

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प्रेस परिषद का दोहरा रवैया

भारतीय प्रेस परिषद की रिपोर्ट को जहां एक ओर सराहा गया है, वहीं आलोचना भी की गई है।  जो मुद्दे उठाए गए हैं, उस पर व्यापक चर्चा की जरूरत है। सरकारी विज्ञापन ही नहीं, कॉरपोरेट विज्ञापनों को लेकर भी एक स्पष्ट नीति की जरूरत है जिसके तहत प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा की जा सके। क्या प्रेस की स्वतंत्रता का मसला एक राज्य तक सीमित है? प्रेस परिषद के सीमित अधिकार हैं, लेकिन जो है उनके इस्तेमाल में भेदभाव की कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए। 

  बिहार में अखबारों की स्थिति को लेकर भारतीय प्रेस परिषद की रिपोर्ट पर मीडिया जगत में दो तरह की परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। एक तबका मानता है कि यह रिपोर्ट पूर्वाग्रह से ग्रसित है। रिपोर्ट में जो कहा गया है वह कमोबेश सभी राज्यों पर लागू होता है फिर अकेला बिहार ही क्यों? दूसरे तबके की राय में प्रेस परिषद ने ज्वलंत मुद्दा उठाया है। बिहार में अखबारों के हालात सचमुच दयनीय है।
प्रेस परिषद की तीन सदस्यीय समिति ने बिहार में ११ माह पड़ताल करके एक रिपोर्ट तैयार की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बिहार में प्रेस पर सेंसरशिप है और वहां आपातकाल जैसे हालात हंै। नीतिश सरकार ने अखबारों की स्वतंत्रता का गला घोंट रखा है। सरकारी विज्ञापन चहेते अखबारों को ही दिये जाते हैं। चूंकि सरकारी विज्ञापन अखबारों की आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, इसलिए इनका इस्तेमाल अखबारों पर अंकुश लगाने के लिए किया जा रहा है। अखबार सरकार के दबाव में हैं इसलिए बिहार में भ्रष्टाचार और दूसरे महत्त्वपूर्ण मुद्दों की उपेक्षा की जा रही है। सरकारी उपलब्धियों और तारीफों की ही एक तरफा तस्वीर पेश की जा रही है। अत: प्रेस परिषद की मांग है कि बिहार में सरकारी विज्ञापनों के लिए एक स्वतंत्र एजेंसी बनाई जाए जो तय मापदंडों के अनुसार अखबारों को विज्ञापन जारी करे।
जैसाकि पहले कहा, इस रिपोर्ट को जहां एक ओर सराहा गया है, वहीं आलोचना भी की गई है। 'आउटलुक' गु्रप के अध्यक्ष विनोद मेहता, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अध्यक्ष टी.एन. नैनन, इंडिया टुडे के आशीष बग्गा, आईबीएन के राजदीप सरदेसाई, पॉयोनियर के संपादक चंदन मित्रा आदि मीडिया विशेषज्ञों के अनुसार प्रेस परिषद ने महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है जिस पर व्यापक चर्चा की जरूरत है। सरकारी विज्ञापन ही नहीं, कॉरपोरेट विज्ञापनों को लेकर भी एक स्पष्ट नीति की जरूरत है जिसके तहत प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा की जा सके। सरकारें आम तौर पर विज्ञापनों के बहाने अखबारों की बाहें मरोडऩे का काम करती हंै, जो प्रेस की स्वतंत्रता के लिए खतरा है।
दूसरी ओर एक वर्ग ऐसा है जो यह तो मानता है कि बिहार में सरकारी विज्ञापनों का दुरुपयोग किया जा रहा है, मगर प्रेस सेंसरशिप और आपातकाल जैसे हालात बताना अतिरंजित है। कुछ हद तक रिपोर्ट पूर्वाग्रह से भी ग्रसित है। प्रेस परिषद की समिति ने बिहार में ११ माह तक तहकीकात करके जो निष्कर्ष निकाला है वह तो प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू एक साल पहले ही निकाल चुके। पत्रकार विनीत कुमार के अनुसार एक साल पहले इसी फरवरी में जस्टिस काटजू ने जब पटना का दौरा किया तो बताया कि बिहार में मीडिया के हाथ बंधे हुए हैं। उल्लेखनीय है कि गत वर्ष २५ फरवरी को पटना विश्वविद्यालय के एक सेमिनार से जस्टिस काटजू ने कहा था कि बिहार में मीडिया पर सेंसर है। जबकि लालू राज के दौरान मीडिया को आजादी थी। उन्होंने यह घोषणा भी कि कि परिषद के तीन सदस्य बिहार आकर पड़ताल करेंगे। यह सवाल उठाया गया है कि परिषद अध्यक्ष निष्कर्ष पर पहले ही पहुंच चुके तो समिति गठित करने की क्या जरूरत थी। दरअसल प्रेस परिषद की रिपोर्ट पूर्वाग्रह से ग्रसित बताने के पीछे तर्क है कि दूसरे प्रदेशों की सरकारें भी वही कर रही हैं जो बिहार सरकार कर रही है। विज्ञापनों के जरिए मीडिया को 'मैनेज' करने की सरकारों की प्रवृत्ति पुरानी है। इसलिए केवल बिहार ही निशाने पर क्यों? पत्रकार मुकेश भारतीय ने लिखा 'काटजू जी बिहार के चारों ओर भी झाांकिये' पिछले वर्ष झाारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा सत्ता से जाते-जाते मीडिया के लिए सरकारी विज्ञापन मद की राशि चार गुणा कर दी। आदित्य नारायण उपाध्याय के अनुसार मध्यप्रदेश में भी प्रेस और पत्रकारों पर अघोषित सेंसरशिप है। यहां का जनसम्पर्क विभाग पहचान- पहचान कर विज्ञापन दे रहा है और ऐसे अखबारों को निपटा रहा है जो सरकार की विरुदावली नहीं गाते। मध्यप्रदेश, छतीसगढ़, झाारखंड, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, कर्नाटक, पंजाब, हिमाचल प्रदेश आदि कई राज्यों की सूची है, जहां सरकारी विज्ञापनों की आड़ में प्रेस की बाहें मरोड़ी जाती है। प्रेस परिषद को इसकी जानकारी नहीं होगी, यह संभव नहीं। बल्कि कुछ शिकायतों की तो परिषद ने बाकायदा अनदेखी की अथवा औपचारिकता भर निभाई। कुछ समय पूर्व 'इंडियन एक्सप्रेस' ने विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की थी कि छत्तीसगढ़ में रमन सिंह सरकार किस तरह मीडिया से खबरों के पैकेज खरीद रही है। प्रेस परिषद मौन रही। यह सही है कि रिपोर्ट मुख्यत: टीवी चैनलों से संबंधित थी, लेकिन यही हालात कई अखबारों के भी है जो किसी से छिपा नहीं हंै।
इसमें दो राय नहीं कि प्रेस परिषद के सीमित अधिकार हैं, लेकिन जो हैं उनके इस्तेमाल में भेदभाव की कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए। प्रेस परिषद, केन्द्र व समस्त राज्य सरकारों की विज्ञापन नीति को लेकर कोई दिशा निर्देश देती है तो बेहतर होता। बिहार ही क्यों, अन्य राज्यों में भी सरकारी विज्ञापनों के लिए स्वतंत्र एजेंसी क्यों नहीं होनी चाहिए? क्या प्रेस की स्वतंत्रता का मसला एक राज्य तक सीमित है?
पत्रकार, सच्चाई और जोखिम
किसी पत्रकार को सच्चाई उजागर करने पर पुरस्कार की बजाय जेल की सजा मिले तो इसे आप क्या कहेंगे? पुलिस की ज्यादती? सरकार की संवेदनहीनता? या कानून की विसंगति? आप चाहे कुछ भी कहें, लेकिन कन्नड़ के एक टीवी पत्रकार नवीन सूरिंजे पिछले तीन माह से भी अधिक समय से जेल की सजा भुगत रहे हैं। नवीन सूरिंजे ने मंगलूर से एक होटल में बर्थ-डे पार्टी मना रहे युवक-युवतियों के एक समूह पर हमला करने तथा युवाओं को अपमानित करने वालों की टीवी चैनल पर पोल खोली थी। हिन्दू जागरण वेदिके नामक संगठन के करीब ४३ तथाकथित कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी को नवीन ने टीवी कैमरे में कैद कर लिया था। टीवी पर इन कथित कार्यकर्ताओं की कारगुजारी उजागर होने के बाद लोगों ने पुलिस को जमकर कोसा। लिहाजा पुलिस ने सभी ४३ जनों को गिरफ्तार कर लिया। नवीन सूरिंजे को भी पुलिस ने ४४वां अभियुक्त बनाकर जेल में डाल दिया। नवीन सूरिंजे पर यह आरोप लगाया गया कि वह भी इस साजिश में शामिल थे। क्योंकि पूर्व जानकारी के बावजूद नवीन सूरिंजे ने पुलिस को इसकी जानकारी नहीं दी। अदालत ने भी सूरिंजे को जमानत देने से इनकार कर दिया कि उन्होंने पूर्व जानकारी के बावजूद पुलिस को इसकी सूचना क्यों नहीं दी? बचाव में सूरिंजे का कहना है कि उन्हें घटना की सूचना पहले से नहीं थी।  एक स्थानीय व्यक्ति से जब उन्हें सूचना मिली तो उन्होंने मंगलूर के पुलिस कमिश्नर को फोन किया था, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। टीवी पत्रकार का तर्क था कि उसने पत्रकारिता धर्म का निर्वाह किया।
सवाल है, सूरिंजे को सजा मिलनी चाहिए या इनाम? पत्रकारिता के प्राध्यापक आनन्द प्रधान ने सही लिखा 'अपराधियों को सामने लाने और दोषियों की पहचान करने में मदद करने वाले सूरिंजे जैसे पत्रकारों को ही फंसाने की कोशिश की जाएगी तो कितने पत्रकार यह जोखिम उठाएंगे?' सचमुच पत्रकारिता से अगर 'जोखिम' हट गया तो समझिाए पत्रकारिता भी मिट गई। क्या नहीं?

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असरदार 'लाइव' प्रसारण

संसद पर आतंकी हमले से लेकर अफजल गुरु के फांसी के घटनाक्रम के विभिन्न पहलुओं को टीवी चैनलो द्वारा खंगाला गया। कुल मिलाकर नेताओं की करनी और कथनी का भेद उन्हीं के सामने खुल चुका था जिसे लाखों दर्शकों ने देखा। इस बात का अहसास नेताओं को हो गया
था। उनकी हालत देखने लायक थी।

अफजल गुरु को फांसी हुई, उस पूरे दिन टीवी चैनलों ने घटना से जुड़े कई कार्यक्रम दिखाए। संसद पर आतंकी हमले से लेकर फांसी के घटनाक्रम के विभिन्न पहलुओं को खंगाला गया। राजनेताओं की प्रतिक्रियाएं, साक्षात्कार और परिचर्चाओं के बीच एक कार्यक्रम ने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा। टीवी स्टूडियो में उन सुरक्षाकर्मियों के परिजन भी मौजूद थे, जो १३ दिसम्बर २००१ को सांसदों-मंत्रियों की सुरक्षा करते हुए शहीद हो गए थे। चर्चा में भाग लेने वाले अन्य लोगों के साथ दो-एक राजनेता भी थे, जो उस दिन हमले के दौरान संसद में मौजूद थे। संसद भवन में उस वक्त दिल्ली पुलिस, सीआरपीएफ और संसदीय वाच एंड वार्ड के अनेक जवान तैनात थे। आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान उनमें 8 सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए थे।
चर्चा में दोनों प्रमुख दलों—कांग्रेस व भाजपा के प्रवक्ता भी शामिल थे। इस कार्यक्रम में पंजाब में आतंकवाद का निडरता से सामना कर चुके मनिन्दरजीत सिंह बिट्टा, पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी, कांग्रेस के राशिद अल्वी, भाजपा के रविशंकर प्रसाद आदि मौजूद थे। दोनों दलों के नेताओं ने आतंकवाद की निन्दा की। संसद पर हमला करने वालों को कोसा। अफजल गुरु की फांसी को उचित ठहराया। फांसी में देरी क्यों हुई, इस पर दोनों में तीखे मतभेद थे। लेकिन एक बात पर दोनों नेता एकराय थे। दोनों ने संसद में तैनात सुरक्षाकर्मियों के साहस और वीरता की भरपूर तारीफ की। उन्होंने कृतज्ञ भाव से माना कि उस दिन सुरक्षाकर्मियों की बदौलत ही सांसद और मंत्रीगण बच पाए थे। दोनों ने श्रद्धापूर्वक शहीद सुरक्षाकर्मियों के प्रति संवेदना व्यक्त की और उनके परिजनों के प्रति सहानुभूति दर्शाई। शायद चर्चाकारों को यह जानकारी नहीं होगी कि स्टूडियो में दर्शकों के बीच शहीदों के परिजन भी मौजूद हैं। या जानकारी होगी तो यह आभास नहीं होगा कि वे क्या कहने वाले हैं। इसलिए जब एक नेता ने शहीदों के परिजनों की शान में गदगद होकर कशीदे पढऩे शुरू किए तो एंकर पूण्य प्रसून वाजपेयी ने हस्तक्षेप किया। वाजपेयी ने पहले शहीदों के परिजनों की प्रतिक्रिया जान लेनी चाही। परिजनों से पूछा—क्या कोई राजनेता, किसी दल का प्रतिनिधि या सरकारी अधिकारी इस बीच उनसे कभी मिलने आया? परिजनों ने एक-एक करके जवाब दिया कि कोई नहीं आया। परिजनों के स्वर में व्यथा थी। उनका कहना था कि पिछले बारह वर्षों में किसी नेता ने उनके हालचाल जानने की कोशिश नहीं की। शहीद के एक बुजुर्ग पिता तो नेताओं पर फट पड़े— 'सब कोरी बातें करते हैं। यहां टीवी पर बखान करते हैं, लेकिन करते-धरते कुछ नहीं। हमने ये बारह बरस किस तरह तिल-तिल करके काटे हैं, यह हम ही जानते हैं। कोई एक बार भी हमसे मिलने नहीं आया।' सन्नाटा छा गया था।
परिचर्चाकार हतप्रभ थे। जो थोड़ी देर पहले शहीदों के लिए डींग हांक रहे थे, वे बगलें झाक रहे थे। अलबत्ता, सभी परिजनों ने मनिन्दरजीत सिंह बिट्टा की खुलकर तारीफ की। उन्होंने बताया कि एक बिट्टा ही थे, जो उनसे समय-समय पर मिलते रहते थे। शहीदों के परिजनों की पीड़ा बाद में मीडिया में और कई जगहों पर व्यक्त हुई। सीकर जिले के शहीद जे.पी. यादव के परिजनों की शिकायत थी कि घोषणा के बावजूद सरकार ने उन्हें अभी तक जमीन नहीं दी। राजनीतिक दलों और नेताओं की कलई मीडिया के जरिए सरेआम खुल चुकी थी। किसी के पास कोई जवाब नहीं था। दोनों प्रमुख दलों के नेताओं को तो कुछ कहते नहीं बन रहा था। काफी देर बाद रविशंकर प्रसाद बोल पाए कि अगर शहीदों के इन परिजनों के साथ कुछ नाइंसाफी हुई है तो वे उनका साथ देंगे। राशिद अल्वी भी अचकचाए हुए थे। बोले, उन्हें मालूम नहीं कि संसद के शहीदों के परिजनों के साथ इस दौरान क्या हुआ। वे मालूमात करेंगे। जो संभव होगा करेंगे।
कुल मिलाकर नेताओं की करनी और कथनी का भेद उन्हीं के सामने खुल चुका था जिसे लाखों दर्शकों ने देखा। इस बात का अहसास नेताओं को हो गया था। उनकी हालत देखने लायक थी। कर्तव्य के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने वाले शहीदों के प्रति हम बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन स्वयं अपना कर्तव्य नहीं निभाते। शहीदों की मूर्तियों का अनावरण करते हैं। उन्हें मरणोपरांत अलंकरणों से सुशोभित करते हैं। उनके परिजनों को एक दिन समारोह में बुलाकर सम्मानित करते हैं। और फिर हमेशा के लिए उन्हें भूल जाते हैं। कम से कम राजनीतिक दलों और नेताओं का तो यही हाल है जिसे टीवी कार्यक्रम ने बहुत शिद्दत से जाहिर कर दिया। मीडिया, खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया का 'लाइव' कैमरा किसी को नहीं बख्शता। शायद इसीलिए आजकल ज्यादातर राजनेता मीडिया से बचने की कोशिश करते हैं।
कहां है मीडिया की स्वतंत्रता
यों तो भारत सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। परन्तु दुनिया भर में हम मीडिया की स्वतंत्रता के मामले में कितने लोकतांत्रिक हैं, इसकी जानकारी 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' की हाल ही जारी रिपोर्ट में दी गई है। इसमें अन्तरराष्ट्रीय रैकिंग में भारत का स्थान 140वें नंबर पर आंका गया है। उल्लेखनीय बात यह है कि पिछले साल भारत का स्थान 131वें नंबर पर था। यानी मीडिया की स्वतंत्रता के मामले में हम दिनोंदिन पिछड़ते जा रहे हैं। इस गिरावट का कारण खासकर सोशल मीडिया पर रोक के सरकारी प्रयासों को माना जा रहा है। कभी कार्टून के नाम पर तो कभी 'बड़े' राजनेताओं या उनके परिजनों के खिलाफ टिप्पणी को लेकर सरकार का जो रवैया रहा है, उसी का परिणाम है कि हम 9 पायदान और पिछड़ गए हैं। सूची में पहले नंबर पर फिनलैंड है।
और इधर चीन को देखो
चीन इस सूची में 173 नंबर पर है। यानी सबसे फिसड्डी। अपने घर में मीडिया की स्वतंत्रता के मामले में तो चीन बदनाम है ही, अब दूसरे देशों के मीडिया पर भी चीन की नजरें गड़ी है। पिछले दिनों चीन के हैकरों ने 'न्यूयार्क टाइम्स' और 'वाल स्ट्रीट जर्नल' जैसे अखबारों पर साइबर हमले किए। न्यूयार्क टाइम्स के अनुसार चीनी हैकर्स पिछले चार माह से अखबार के रिपोर्टरों के कम्प्यूटरों पर साइबर हमले कर रहे हैं। उन रिपोर्टरों के कम्प्यूटरों पर ज्यादा हमले किए गए हैं, जो चीन के नेताओं पर कोई रिपोर्ट तैयार कर रहे थे। 'द वाल स्ट्रीट जर्नल' के साथ भी यही दोहराया गया।

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छपे हुए शब्दों का असर

चिंतक लुई बोर्खेज के अनुसार-मनुष्य के ढेर सारे आविष्कारों में किताबें सर्वाधिक विस्मयकारी आविष्कार है। दूसरे आविष्कारों से हमारे शरीर का विस्तार होता है। सिर्फ किताबें ही हैं, जो हमारी कल्पनाओं और स्मृतियों को विस्तार देती हैं। बोर्खेज के कथन को किताबों तक सीमित रखने की बजाय हम इसे प्रिंट मीडिया पर भी लागू कर सकते हैं।


यह सही है कि युवा पीढ़ी डिजीटल प्रेमी है। लेकिन साहित्य के मामले में वह अब भी छपे हुए शब्दों पर ज्यादा भरोसा करती है। कम-से-कम जयपुर साहित्य उत्सव से तो यही लगा। पांच दिवसीय इस उत्सव में युवाओं की भागीदारी बड़ी तादाद में थी। लेखकों को सुनने और उनसे संवाद करने में युवा सबसे आगे रहे।
अक्सर यह कहा जाता है कि नई पीढ़ी किताबों से दूर होती जा रही है। उसका पढऩा-लिखना डिजीटल दुनिया में सिमट कर रह गया है। साहित्य उत्सव में आए अमरीकी लेखक गैरी शेंटनहार्ट ने तो एक सत्र के दौरान ही कहा—अमरीका में लेखक ज्यादा और पाठक कम हैं। क्योंकि युवा किताबें बिल्कुल नहीं पढ़ते। उन्होंने बाकायदा आंकड़ा देकर चौंकाया— अमरीका में 17 मिलियन रायटर हैं जबकि पाठक हैं महज 60 हजार। संभव है शेंटनहार्ट के बयान में अतिशयोक्ति हो। उनके कथन का एक आशय यह भी हो कि अमरीकी युवा पीढ़ी लेखकों को पढ़ती तो है, लेकिन किताबों की बजाय डिजीटल माध्यमों से। शायद यही वजह है कि अमरीका में किताबों और पत्र-पत्रिकाओं के डिजीटल संस्करण खासे लोकप्रिय हैं। पिछले दिनों 80 साल पुरानी साप्ताहिक पत्रिका 'न्यूजवीक' का प्रिंट संस्करण बंद हो गया। यह पत्रिका अब सिर्फ ऑनलाइन उपलब्ध है। अमरीका में मानो कोई फर्क नहीं पड़ा। लेकिन भारत में अभी यह स्थिति नहीं आई है। आप आश्वस्त हो सकते हैं, युवा पीढ़ी किताबों और छपे माध्यमों से इतनी दूर नहीं गई है। वह किताबों या कहें साहित्य को गंभीरता से जांच-परख रही है। स्वयं भी लिख-पढ़ रही है। अनेक विधाओं में सृजन कर रही है। छपे हुए शब्दों का असर कायम है। यहां प्रिंट माध्यमों का भविष्य फिलहाल सुरक्षित है। इसलिए प्रकाशन व्यवसाय की चमक बढ़ी है। भारत देशी-विदेशी भाषाओं की पुस्तकों के प्रकाशन और बिक्री के लिहाज से एक बड़ा और प्रभावशाली बाजार है।
दरअसल यह छपे हुए शब्दों का असर है। हमारे दौर के प्रभावी चिन्तकों में शुमार लुई बोर्खेज के अनुसार—मनुष्य के ढेर सारे आविष्कारों में किताबें सर्वाधिक विस्मयकारी आविष्कार है। दूसरे आविष्कारों से हमारे शरीर का विस्तार होता है। सिर्फ किताबें ही हैं, जो हमारी कल्पनाओं और स्मृतियों को विस्तार देती हैं। बोर्खेज के कथन को किताबों तक सीमित रखने की बजाय हम इसे प्रिंट मीडिया पर भी लागू कर सकते हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विस्तार के साथ ही प्रिंट मीडिया का भी विस्तार हुआ। चौबीस घंटे दिखाए जाने वाले समाचार चैनलों के बावजूद अखबारों की प्रसार संख्या बढ़ी। भारत ही नहीं, दुनिया भर में। बोलती तस्वीरें लुभाती तो हैं, लेकिन चेतना का विस्तार नहीं करती। एक समय बाद फिर शब्दों की तरफ लौटने का मन करता है। साहित्य उत्सव में लेखकों की तरह पत्रकारों की भी अच्छी-खासी उपस्थिति साहित्य और पत्रकारिता के रिश्तों को दर्शाती है। वे लोग भी कम न थे, जो मीडिया में कॉलम लिखते हैं, चर्चाओं में बराबर भाग लेते हैं या किसी न किसी रूप में जुड़े हैं। शोभा डे, गुरु चरणदास, फेहमिदा रियाज एडवर्ड गिराडेंट, परंजय गुहा ठाकुरता से लेकर तरुण तेजपाल, शोमा चौधरी, पीटर ब्रूक, रवीश कुमार, ओम थानवी, आशुतोष आदि मीडिया कर्मियों की भागीदारी से यह अहसास पुख्ता होता है कि लेखन की सामाजिक स्वीकार्यता और प्रतिष्ठा कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसीलिए लेखक और पाठक के अन्तर्संबंध गहराई तक जुड़े होते हैं। लेखन और पठन दोनों ही सृजनात्मक क्रिया है और सृजनात्मक प्रक्रिया का उत्कर्ष रूप कागज, कैनवास, कूंची, कलम आदि माध्यमों में बेहतर संभव है।
थोड़े से लोगों का बोलबाला
मीडिया के विभिन्न माध्यमों में होने वाली चर्चाओं और बहसों में अक्सर चुनीन्दा लोग ही भाग लेते रहते हैं। इसलिए अभिव्यक्ति में वैचारिक विविधता की कमी नजर आती है। भारत जैसे वैविध्य वाले देश में कुछ खास तरह के विचारों को स्थापित करने का माध्यम बन कर रह गया है, भारतीय मीडिया। यह निष्कर्ष मीडिया स्टडीज ग्रुप का है, जिसने अपने सर्वेक्षण में पाया कि मीडिया में थोड़े से लोग ही सभी मुद्दों पर बहस करते नजर आते हैं। इसलिए घूम-फिरकर एक-से विचार बार-बार दोहराये जाते हैं। इस स्थिति का सरकार और वर्चस्वशाली लोग फायदा उाठते हैं। ग्रुप ने तीन अलग-अलग सर्वे किए। एक सर्वे दूरदर्शन, दूसरा आकाशवाणी और तीसरा विभिन्न निजी चैनलों से सम्बंधित था। दूरदर्शन सर्वे में यह पाया कि आपातकाल के समय सरकार ने अपनी नीतियों के प्रचार-प्रसार के लिए कुछ थोड़े से पत्रकारों का इस्तेमाल किया था। यही बात आकाशवाणी पर भी लागू होती है। निजी चैनलों के सर्वे में भी ग्रुप ने पाया कि यहां भी थोड़े से लोग ही किसी मुद्दे पर बहस करते दिखाई दिए। कुछ लोग तो ऐसे भी थे जो एक समय किसी और चैनल पर दिख रहे थे तो थोड़ी देर बाद दूसरे चैनल पर भी वही मौजूद थे। सरकारी लोकसभा चैनल पर आने वाले वक्ताओं के बारे में सर्वेक्षण का आकलन है कि 6 माह में कुल 989 लोगों को वक्ता के तौर पर बुलाया गया। जबकि बुलाए जाने की जरूरत 2000 लोगों की थी। इनमें भी कुछ लोगों को तो 17-18 बार बुलाया गया। केन्द्रीय आकाशवाणी में 10 लोगों को 179 बार अलग-अलग कार्यक्रमों में बुलाया गया। इस सर्वे में उत्तर-पूर्व के राज्यों का कोई वक्ता किसी समाचार या बहस के हिस्से के रूप में नहीं दिखा। ज्यादातर दिल्ली और आसपास के लोग नजर आए। सर्वे में आकाशवाणी जैसे माध्यम पर वर्ष भर प्रसारित कार्यक्रमों के विषय का विश्लेषण किया गया, तो यह तथ्य सामने आया कि ग्रामीण इलाके, दलित, अल्पसंख्यक युवाओं पर एक फीसदी से कम और आदिवासी के मुद्दे पर एक भी कार्यक्रम प्रसारित नहीं किया गया।
 इस स्थिति पर जाने-माने विश्लेषक विजय प्रताप का आकलन है कि पहले केवल एक चैनल दूरदर्शन हुआ करता था जिस पर सरकारी प्रवक्ता होने का आरोप आम था। अब ढेर सारे निजी चैनलों के बावजूद थोड़े से लोग ही सरकारी और निजी चैनलों में बार-बार दिख रहे हैं। इससे उदारीकरण के दौर में भी विचारों और अभिव्यक्ति में विविधता की दरिद्रता साफ देखी जा सकती है। समाज में हाशिये पर बैठे लोगों के बारे में चिन्तन बहुत कम नजर आता है।

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2040 में गांधी परिवार

कल्पनालोक
आज मक्खनलाल बहुत चिन्तामग्न है। क्या होगा, क्या नहीं होगा। राजन गांधी पार्टी की कमान संभालने के लिए राजी होंगे कि नहीं। अरे, हम पार्टी वर्करों की भावनाओं का ख्याल भी है कि नहीं राजन बाबा को? पूरे दस साल हो गए हैं गुहार लगाते-लगाते। हम ही क्या, देश की सारी युवा-शक्ति उनकी  मुरीद है। उनकी तरफ आशा भरी नजरों से देख रही है। लेकिन राजन बाबा है कि टस से मस नहीं हो रहे। बड़े शर्मीले हैं। अपने डैडी पर गए हैं। उनकी ट्रू कॉपी है। देखा नहीं, 27 बरस पहले आदरणीय राहुल गांधी जी को किस तरह मनाया था कांग्रेसजनों ने मिलकर?
मेरे पापाजी बताते हैं कि जयपुर चिन्तन शिविर में हम सब बिड़ला ऑडिटोरियम के मुख्य द्वार पर धरना देकर बैठ गए थे। राहुल जी तैयार ही नहीं हो रहे थे पार्टी की कमान संभालने को। इतने शर्मीले कि पूज्य सोनिया जी के कहने पर भी मान नहीं रहे थे। सोनिया जी ने कहा, बेटे राहुल, अब मान भी जाओ। जरा देखो इन देशभक्तों की तरफ। कितने घंटों से ये इस भरी सर्दी में बैठे हैं। ऊपर से मौसम खराब। बारिश होने वाली है। किसी को निमोनिया हो गया तो? फिर मेरा भी तो ख्याल करो। उम्रदराज हो गई हूं मैं। तबीयत भी ठीक नहीं रहती। मान जाओ बेटा। 14  साल से भार संभाले हूं। एक-एक करके कई प्रदेश हाथ से निकल गए। अगर दिल्ली भी निकल गई तो? पिताजी बताते हैं कि तब आदरणीय राहुल जी पिघल गए थे।
हम सब कांग्रेसजन ने खूब खुशियां मनाईं। जोरदार आतिशबाजी की। नारे लगे। जयकारे हुए। देश का नेता कैसा हो, राहुल गांधी जैसा हो। नारे इतने गूंजे कि बिड़ला ऑडिटोरियम की गूंज नाहरगढ़ तक सुनाई दी। लेकिन लाल किले तक नहीं पहुंची।
राहुल जी तब प्रधानमंत्री नहीं बन पाए थे। कार्यकर्ताओं के लंबे इंतजार के बाद, वे पिता बनने की तैयारी कर रहे थे। फिर राजन बाबा की 10, जनपथ पर किलकारियां गूंजी। बुआ आदरणीय प्रियंका गांधी वाड्रा ने शिशु की बलैया ली। बोली, मॉम पर गया है। लंबी पारी खेलेगा। फूफाजी रॉबर्ट वाड्रा सोने का पालना 'गिफ्ट' लेकर आए। बोले, दादी मॉम पर गया है। सबकी बोलती बंद कर देगा। बहन मिराया और भैया रेहन बोले-बिल्कुल नाना पर गया है। हवाई जहाज उड़ाएगा। उन्हीं दिनों मुझे पिताजी ने सीख दी, बेटा मक्खन, तुम्हीं मांग कर डालो। वरना कोई और बाजी मार ले जाएगा। राजन बाबा कान्वेन्ट में भर्ती करा दिए गए थे।
मैंने अधिवेशन में मांग कर डाली, पार्टी की कमान हमारे युवराज (राजन बाबा) के कंधों पर डाली जाए। राजन गांधी है तो पार्टी है। पार्टी है तो देश है। देश है तो मक्खन है। एक नहीं सैकड़ों मक्खन लालों की आवाज गूंज उठी। सब बेचैन हो उठे। यह कैसे आगे निकल गया। हम कौन से मक्खन लाल से कम हैं। फिर तो चारों ओर से आवाजें आने लगीं। देश का नेता कैसा हो- राजन गांधी जैसा हो। देश की युवा आंधी! राजन गांधी! राजन गांधी!!
भीड़ में कोई चिल्लाया, 'अरे सपूतों, राजन बाबा के अभी दूध के दांत भी नहीं टूटे। जरा सब्र करो। मक्खन लालों की और तेज आवाज गूंजी—और नहीं बस और नहीं, गम के बादल और नहीं। तभी मक्खन लाल ने माइक थाम लिया— साथियों, हमें फिर चुनौती दी जा रही है, जिसे चाहे वह प्रदर्शन कर रहा है। कोई जन्तर-मन्तर पर, कोई इंडिया गेट पर। कोई टोपी लगाकर। कोई झंडा उठाकर। साथियों, हम पार्टी का संविधान बदलेंगे। अगर राजन बाबा जवान हो गए तो फिर आदरणीय राहुल जी की तरह शरमाने लगेंगे। ना-ना करेंगे। अब यह देश और इन्तजार नहीं कर सकता। वर्ना हम एक बार फिर धरना देकर बैठ जाएंगे। फिर चाहे हमें बुखार हो या निमोनिया। भीड़ में नारे गूंज उठे—
देश का नेता कैसा हो—
राजन बाबा जैसा हो..
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कैमरा झूठ नहीं बोलता!

मीडिया में कैमरे की कितनी अहम भूमिका है, इसकी अहमियत तब सामने आई, जब दिल्ली पुलिस के एक सिपाही सुभाष तोमर की हत्या का मामला दर्ज हुआ। एक टीवी चैनल ने उस दिन की घटना की वह फुटेज दिखा दी, जिसमें सुभाष तोमर दिखाई दे रहे थे।  दो युवा उन्हें होश में लाने की कोशिश कर रहे थे। इनमें एक युवक था और दूसरी युवती।

कैमरा झूठ नहीं बोलता। कैमरा चाहे सी.सी. टीवी का हो या फिर न्यूज टीवी का। सच्चाई को कैद कर ही लेता है। मीडिया में कैमरे की कितनी अहम भूमिका है, इसका उदाहरण दिल्ली में सामूहिक बलात्कार की घटना के विरोध में हुए एक प्रदर्शन में देखने को मिला। यह प्रदर्शन भी देश भर में हुए अनेक प्रदर्शनों की तरह टीवी चैनलों ने कवर किया था और भुला दिया गया था। लेकिन इसकी अहमियत तब सामने आई, जब दिल्ली पुलिस के एक सिपाही सुभाष तोमर की हत्या का मामला दर्ज हुआ। सुभाष तोमर उस दिन प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए अपनी ड्यूटी पर तैनात थे। दिल्ली पुलिस का आरोप था कि निषेधाज्ञा के दौरान हिंसा पर उतारू भीड़ ने पुलिस पर पथराव किया। इससे सुभाष तोमर गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें गंभीरावस्था में राममनोहर लोहिया अस्पताल में भरती कराया गया, जहां दो दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई। पुलिस ने निषेधाज्ञा भंग करने सहित, सिपाही पर हमले और हत्या के प्रयास आदि विभिन्न धाराओं में 8 प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया था, जिनमें कुछ छात्र भी थे। बाद में हत्या की धारा भी जोड़ दी गई।
कई लोगों को यह बात गले नहीं उतर रही थी। ज्यादती तो पुलिस ने की थी। निहत्थे छात्र-छात्राओं, युवाओं और बुजुर्गों तक पर पुलिस ने बेरहमी से लाठियां बरसाई थीं। टीवी चैनलों पर लोगों ने यह सब देखा भी। अखबारों में फोटुएं भी छपीं। प्रदर्शनकारी आम नागरिक थे। हमलावर नहीं। वे देश की राजधानी में एक छात्रा के साथ दिल दहला देने वाला दुष्कर्म करने वाले दरिन्दों और दिल्ली की लचर पुलिस व्यवस्था से बेहद खफा थे और अपना गुस्सा प्रकट कर रहे थे। जिन आठ प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने पकड़ा उनमें एक को छोड़कर कोई भी किसी राजनीतिक दल या संगठन से संबद्ध नहीं था। क्या ये लोग हमलावर हो सकते थे? यह सवाल कौंध रहा था। इसी बीच एक टीवी चैनल ने उस दिन की घटना की वह फुटेज दिखा दी, जिसमें सुभाष तोमर दिखाई दे रहे थे। सिपाही की वर्दी में सुभाष तोमर जमीन पर पड़े थे। दो युवा उन्हें होश में लाने की कोशिश कर रहे थे। इनमें एक युवक था और दूसरी युवती। युवती सिपाही का सिर सहला रही थी। युवक सिपाही की एडिय़ों पर मालिश कर रहा था। दोनों मिलकर बेहोश सिपाही की मदद कर रहे थे। दृश्य इतना स्पष्ट था कि न केवल सिपाही सुभाष तोमर, बल्कि आस-पास का परिवेश भी साफ नजर आ रहा था। न तो सड़क पर पत्थर दिखाई दे रहे थे, न ही खून का एक कतरा। सिपाही के बदन पर कोई घाव नजर नहीं आ रहा था। सुभाष तोमर की उम्र ४६ वर्ष थी। ऐसा लग रहा था वे थककर गिर पड़े हों। लेकिन यह सब अनुमान था। सिपाही कैसे बेहोश हुआ? क्या उस पर किसी ने हमला किया? टीवी फुटेज से तो कुछ पता नहीं चल रहा था। शायद पहले की घटना कैमरे में रिकार्ड नहीं हुई होगी। लेकिन यह साफ था कि सिपाही सुभाष तोमर के कोई बाहरी चोट या जख्म नहीं था। न आसपास पथराव का कोई सबूत था। यानी पथराव से सिपाही के गंभीर रूप से घायल होने की दिल्ली पुलिस की कहानी की पोल खुल गई थी। चैनल ने कई बार यह फुटेज दिखाए। अपनी फुटेज देखकर टीवी पर वह युवक स्वयं प्रकट हो गया, जो सिपाही की मदद कर रहा था। योगेन्द्र नामक यह युवक दिल्ली में पत्रकारिता का विद्यार्थी है। उसने चैनल पर उस दिन का घटनाक्रम विस्तार से बता दिया।
उसने बताया कि प्रदर्शनकारियों के पीछे कुछ सिपाही दौड़ रहे थे। तभी एक सिपाही रुका और जमीन पर गिर पड़ा। उसके साथ के अन्य सिपाही आगे निकल गए। योगेन्द्र व उसकी दोस्त पाओली दौड़कर सिपाही के पास पहुंचे। योगेन्द्र ने न केवल सिपाही को होश में लाने की कोशिश की, बल्कि राममनोहर लोहिया अस्पताल पहुंचाने में भी मदद की। योगेन्द्र अस्पताल में काफी देर तक रुका। उसने एक पुलिस इन्सपेक्टर को अपना नाम, पता और मोबाइल नं. दर्ज कराया और घर चला गया। योगेन्द्र ने जब टीवी पर फुटेज देखी तो उसे माजरा समझा में आया कि वह सिपाही सुभाष तोमर थे। बाद में पाओली ने भी टीवी पर आकर योगेन्द्र की बातों की पुष्टि की। बाकी कहानी कैमरे ने बयान कर ही दी थी। सिपाही सुभाष तोमर पर किन लोगों ने हमला किया? हमला किया भी या नहीं? या फिर वे थककर स्वयं ही गिर पड़े? ये जांच के विषय हैं। लेकिन दिल्ली पुलिस के आला अफसरों ने एक सिपाही की आड़ लेकर जो कहानी गढ़ी, उसकी कैमरे ने पोल खोल दी। यह एक मिसाल है, जो पूरे देश में पुलिस के कामकाज और रवैये को दर्शाती है। दिल्ली पुलिस की चौतरफा निन्दा हो रही थी। शायद इसीलिए पुलिस प्रदर्शनकारियों को हिंसक ठहराकर निर्दोष लोगों पर किए गए लाठी चार्ज के अपने गुनाह पर परदा डालना चाहती थी। लेकिन वह कामयाब नहीं हो सकी। पुलिस ने जिन आठ प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया, उनमें दो छात्रों के बारे में पुलिस की पोल सी.सी. टीवी के कैमरों ने खोल दी। ये दोनों छात्र घटना स्थल से काफी दूर उस वक्त मैट्रो में सफर कर रहे थे। ट्रेन में और मैट्रो स्टेशन पर लगे सी.सी. टीवी कैमरों ने हकीकत बयां कर दी।
तो ये हैं कैमरे की करामात। दूध का दूध और पानी का पानी। निर्दोष को बचाने और दोषी पर शिकंजा कसने में इस कैमरे की बड़ी भूमिका है।
मीडिया पर पाबंदी
स्वतंत्र मीडिया से कौन डरता है? इसका जवाब है, या तो वह जो अत्याचार करता है, या वह जो जनता से कुछ छिपाना चाहता है। चीन की सरकार यही कर रही है। चीन में मीडिया पर कई तरह की पाबंदियां हैं। ये पाबंदियां चीन में सरकार चला रही कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से लगाई हुई है। पार्टी का चीन के मीडिया पर पूरी तरह नियंत्रण है। इसका विरोध करने की किसी में हिम्मत नहीं। लेकिन गत 7 जनवरी को 'सदर्न वीकेंड' नामक एक साप्ताहिक चीनी अखबार के पत्रकारों ने इसके खिलाफ आवाज बुलंद की। कम्युनिस्ट पार्टी के स्थानीय कार्यालय के बाहर अखबार के सैकड़ों पत्रकार इकट्ठे   हुए और नारे लगाए। यही नहीं, अखबार ने कम्युनिस्ट पार्टी के प्रांतीय नेता तुओ झोन को हटाने के लिए सरकार को एक खुला खत भी लिखा, जो अखबार ने प्रकाशित किया। जानकारों का कहना है कि यह चीन में मीडिया पर नियंत्रण के विरोध में उठी आवाज की शुरुआत है। चीन में आखिर एक अखबार ने मीडिया पर पाबंदी को चुनौती देने का साहस तो किया!

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