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जनता से छल!

भिलाई से गौतम श्रीवास्तव ने लिखा-
'मैं यूनिवर्सिटी टॉपर रहा हूं। लेकिन कोई मुझ से पूछे कि बताओ साल भर में पेट्रोल की कीमतें कितनी बार बढ़ीं, तो मैं फेल हो जाऊंगा। सचमुच मुझे याद नहीं। देश में एक मात्र यही ऐसी चीज है जो असंख्य बार महंगी होती है। अपनी कार में पेट्रोल भरवाते हुए मैं कभी जान नहीं पाता, आज कितना पेट्रोल मिलेगा। कितने रुपए में कितना पेट्रोल? कुछ पता नहीं। पम्प के मीटर पर डिसप्ले होती संख्याएं बेमानी महसूस होती हैं। कल जो दाम था, आज नहीं। आज जो दाम है, कल भी कायम रहेंगे, कोई गारंटी नहीं। मेरे जैसे कई और लोग भी 'कंफ्यूज' रहते होंगे। कहीं ये तेल कंपनियों का षड़्यंत्र तो नहीं कि ग्राहक पेट्रोल की वास्तविक कीमत कभी याद ही न रख पाए। पेट्रोल पम्प वाले उन्हें मनमाफिक ढंग से लूटते रहें!'
कोलकाता से आशीष डागा ने लिखा- 'इस बात का रंज नहीं है कि पेट्रोल की कीमत फिर बढ़ा दी। इस बात का अफसोस है कि हमने जिन लोगों को चुना, उन्होंने ही हमें धोखा दिया। सिर्फ 24 घंटे! इतना भी सब्र नहीं रखा। उधर पांच राज्यों के चुनाव परिणाम घोषित हुए और इधर पेट्रोल के दाम बढ़ा दिए। यह जनता का सरासर अपमान है।'
प्रिय पाठकगण! पिछले पखवाड़े पेट्रोल की कीमतें 5 रुपए प्रति लीटर बढ़ाई गईं। यह अब तक की सर्वाधिक बढ़ोतरी है। शायद इसीलिए इस विषय पर पाठकों की सर्वाधिक प्रतिक्रियाएं भी प्राप्त हुई हैं। क्या पेट्रोल की इतनी मूल्य वृद्धि उचित है? क्या भारत सरकार अंतरराष्ट्रीय मूल्य वृद्धि के बावजूद नागरिकों को राहत पहुंचाने में सक्षम है? क्या पेट्रोल कंपनियों की दलीलों पर लोगों को भरोसा है? क्या सरकार का पेट्रोल के दामों पर सचमुच कोई नियंत्रण नहीं? पाठकों की प्रतिक्रियाओं में इन सवालों के जवाब समाहित हैं।
इंदौर से दीनबंधु आर्य  के अनुसार- 'वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी जनता को मूर्ख समझते हैं। पेट्रोल के दाम बढ़ाने पर उन्होंने जो तर्क दिया जरा उस पर गौर करें। मुखर्जी ने कहा- पेट्रोल की कीमतों पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं। सरकार ने जून 2010  के बाद पेट्रोल को नियंत्रण मुक्त कर दिया। यानी मुखर्जी साहब जनता की नाराजगी को भांपकर उसे फुसलाने की कोशिश कर रहे हैं। कौन यकीन करेगा? हर कोई जानता है कि पेट्रोल के अन्तरराष्ट्रीय दाम जनवरी 2011 में ही बढ़ गए थे। तभी से तेल कंपनियां पेट्रोल महंगा करना चाहती थी, लेकिन सरकार ने उन्हें पांच राज्यों के चुनावों के कारण ऐसा करने की इजाजत नहीं दी। जैसे ही चुनाव परिणाम आए, सरकार ने तेल कंपनियों को हरी झडी दिखा दी।'
कोटा से रामसिंह तंवर ने लिखा-'तेल कंपनियां पिछले 4 माह से घाटा क्यों उठा रही थीं? अगर वे सरकार के नियंत्रण से मुक्त थीं तो उन्हें खुलासा करना चाहिए कि दाम बढ़ाने से उन्हें किसने रोक रखा था?'
जोधपुर से विक्रम परिहार ने लिखा- 'यह सही है कि किरीट पारिख समिति की सिफारिशों के अनुसार पेट्रोल के दाम तेल कंपनियां खुद तय करती हैं, लेकिन इसी समिति की यह भी सिफारिश थी कि दाम बढ़ाने से पूर्व सरकार की अनुमति प्राप्त करना आवश्यक है। इसलिए यह साफ है कि सरकार ने जनवरी 2011 से 13 मई 2011 तक कंपनियों को अपने राजनीतिक स्वार्थ की खातिर रोके रखा। जैसे ही स्वार्थ पूरा हुआ, कंपनियों को लूट की इजाजत दे दी। यह राजनीति का घिनौना पक्ष है।'
ग्वालियर से मगन सिंह 'ज्वाला' के अनुसार 'तेल कंपनियां और सरकार दोनों मिलकर जनता को लूट रहे हैं। क्या तेल कंपनियां जनता को यह बताएगी कि उनकी बैलेंस शीट कब घाटे में रही? गत वर्ष देश की तीनों प्रमुख कंपनियों ने करोड़ों रुपए का शुद्ध मुनाफा कमाया। दूसरी तरफ सरकार पेट्रोल पर अंधाधुंध टैक्स लगाकर जनता की जेब काट रही है। दुनिया के विकसित और पिछड़े दोनों तरह के कई देशों से भारत सरकार पेट्रोल पर ज्यादा टैक्स वसूली करती है।'
होशंगाबाद से हेमन्त शर्मा ने लिखा- 'अगर केन्द्र व राज्य सरकारें दोनों मिलकर अपने-अपने हिस्से के टैक्स में कुछ कटौती कर दें तो वह अंतरराष्ट्रीय बाजार के उतार-चढ़ावों से जनता को मुक्त रख सकती हैं। आखिर क्या जरूरत है पेट्रोल पर सौ प्रतिशत टैक्स वसूली की?'
जयपुर से सुभाष हल्दिया ने लिखा- 'पेट्रोल आज आम जनता की जरूरत बन गया है। ऐसे में सरकारों को जनता के हित में फैसले करने चाहिए। इसके विपरीत राजस्थान में तो सरकार जनता से वादा करके भूल गई और उसने आज तक पेट्रोल पर न तो वेट की दर कम की न ही रोड सैस घटाया।' जबकि बाड़मेर में तेल उत्पादन के बाद राज्य सरकार ने रॉयल्टी के तौर पर गत वर्ष 1700 करोड़ रुपए कमाए।'
उज्जैन से पीताम्बर शुक्ला ने लिखा- 'हर बार पेट्रोल महंगा करने का कारण अंतरराष्ट्रीय मूल्य वृद्धि बताया जाता है, लेकिन इसका सारा बोझ जनता पर डालना उचित नहीं। सरकार अपनी टैक्स दरें घटाए और कंपनियां अपना मुनाफा।'
चेन्नई से अच्युत श्रीनिवासन ने लिखा- 'पेट्रोल पर आयात शुल्क खत्म करना चाहिए। कच्चे तेल पर कस्टम ड्यूटी कम करनी चाहिए। इसी तरह पेट्रोल पर अनाप-शनाप लगाया जाने वाला उत्पाद शुल्क भी कम करना चाहिए। साथ ही, सभी पेट्रो पदार्थों पर सब्सिडी बढ़ाई जानी चाहिए।'
भोपाल से सैयद मुमताज अली ने लिखा- 'पेट्रोल के बढ़ते दामों ने मानो आग लगा दी है। अभी कुछ वर्षों पहले तक मैं अपनी कार में ढाई हजार रुपए का पेट्रोल प्रति माह डलवाता था। अब सात हजार रुपए भी कम पड़ने लगे हैं। यह पेट्रोल तो हमें शायद कहीं का नहीं छोड़ेगा।'

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बेखबर पाकिस्तान!


ग्वालियर से मिथुन मोघे ने लिखा-
1. 'क्या ओसामा-बिन-लादेन के खात्मे की अमरीकी कार्रवाई 'ऑपरेशन एल्विस' की जानकारी पाकिस्तान को पहले से थी?
2. या फिर पाकिस्तान की राजधानी व उसकी सैन्य अकादमी के नाक तले छुपे ओसामा को अमरीकी सैनिकों ने खोज निकाला, गोलियों से भूना, लाश को साथ लेकर हेलीकॉप्टरों से उड़ गए और बेचारे पाकिस्तान को कोई खबर तक नहीं हुई?
  इन दोनों सवालों के जवाब चाहे वे हां में हो या ना में-पाकिस्तान के गले की हड्डी बन गए हैं जो न उगलते बन रही है न निगलते। आज पाकिस्तान एक ऐतिहासिक राष्ट्रीय शर्म के दौर से गुजर रहा है। उसे पूरी दुनिया धिक्कार रही है। इन हालात के लिए कोई और नहीं पाकिस्तान खुद जिम्मेदार है।'
उदयपुर से नरेन्द्र चतुर्वेदी ने लिखा- 'पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के चीफ शुजा पाशा और पाक सेना प्रमुख जनरल अशफाक परवेज कियानी को अमरीकी ऑपरेशन की जानकारी नहीं थी- यह कोई नहीं मान सकता। ये दोनों ही पाकिस्तान के सर्वेसर्वा हैं। दोनों को मालूम था ओसामा कहां छुपा है। और यह भी साफ है दोनों को पहले से मालूम था कि अमरीका ऐबटाबाद में क्या करने जा रहा है? सवाल है ये दोनों सर्वशक्तिमान माने-जाने वाले पाक के 'भाग्य विधाता' आखिर खामोश क्यों रहे? क्यों उन्होंने 'ऑपरेशन एल्विस' का जरा सा भी प्रतिवाद नहीं किया? क्या किसी दूसरे राष्ट्र के  दस-बीस सैनिक लड़ाकू हेलीकॉप्टरों से आकर इतनी आसानी से सुरक्षित लौट सकते थे?'
प्रिय पाठकगण! ओसामा के खात्मे की अमरीकी कार्रवाई को लेकर भारतीय नागरिकों की क्या प्रतिक्रिया है? कहने को पाकिस्तान में लोकतंत्र है, लेकिन पाठक वहां राज सेना का ही मानते हैं। सवाल है, क्या कट्टरवादी पाक सेना पस्त हो चुकी है या फिर आईएसआई अपनी तयशुदा लाइन से पीछे हट गई है? क्या पाक की चुनी हुई सरकार बिलकुल नकारा है? क्या पाकिस्तान पूरी तरह से एक लुंजपुंज राष्ट्र बन चुका है? पाठकों की प्रतिक्रियाओं में इन सवालों के जवाब तथा भारतीय जनमानस की झलक भी देख सकते हैं।
इंदौर से प्रो. राजेन्द्र मोहन ने लिखा- 'जिस ऐबटाबाद में अमरीकी सैनिक हेलीकॉप्टर से उतरे वह पाकिस्तानी सेना का महत्वपूर्ण क्षेत्र है। वहां आने वाले हर व्यक्ति पर सेना की कड़ी निगरानी रहती है। आश्चर्य है अमरीकी सैनिक आए और ओसामा को मारकर चले गए। क्या पाक सेना सो रही थी?'
रायपुर से राजशेखर ने लिखा-'अमरीका ने ओसामा को ढूंढ निकाला और मार गिराया। यह अन्तरराष्ट्रीय आतंकवाद को एक बहुत बड़ा झटका है। आतंककारियों को इसी तरह ढूंढ-ढूंढ कर मारना चाहिए। पाकिस्तान पर मुझे तरस आता है। वह अब भी झूठ बोल रहा है कि उसे ओसामा की कोई जानकारी नहीं थी।'
जयपुर से सुभाष चन्द्रा ने लिखा- 'पाकिस्तान के हुक्मरानों के पास और कोई चारा भी नहीं था। उन्हें पाकिस्तानी जनता के सामने अपनी खाल बचाने के लिए झूठ बोलना ही पड़ेगा।'
जबलपुर से देवेन्द्र सरीन ने लिखा- 'पाकिस्तान की जनता पाकिस्तानी शासकों को दोनों तरफ से बख्शने वाली नहीं है। चाहे उन्हें अमरीकी कार्रवाई की जानकारी थी तो भी, नहीं थी तो भी।'
बीकानेर से पी.सी. सुथार ने लिखा- 'अमरीका आतंकवाद से लड़ने के लिए पाकिस्तान को प्रतिवर्ष जो 15 हजार करोड़ रुपए देता था, सेना व गुप्तचर एजेंसियों के लोग उसे ऐय्याशियों में उड़ा देते थे। वे आतंककारियों से कभी नहीं लड़े। उल्टे उन्हें मदद करते रहे और मनमाफिक देश को लूटते रहे। आज पाकिस्तान की हालत इतनी खराब है कि अगर अमरीका कर्ज न दे तो पाक जनता को राशन पानी भी नसीब न हो।'
अजमेर से डॉ. सतीश ने लिखा- 'हो सकता है पाकिस्तान को अमरीकी कार्रवाई की बिलकुल भनक न पड़ी हो। पाकिस्तान में कुछ भी हो सकता है।'
भोपाल से प्रियांशु जैन ने लिखा- 'भारत को भी इसी तरह की कार्रवाई करनी चाहिए। पाकिस्तान में भारत के अपराधी ओसामा जैसे एक नहीं कई आतंककारी छिपे बैठे हैं। इनमें कई तो वहां खुलेआम देखे जाते हैं। भारत को मुम्बई बमकांड का सरगना दाउद इब्राहिम और भारतीय संसद पर हमले का दोषी मौलाना मसूद अजहर के साथ वही करना चाहिए जो अमरीका ने ओसामा के साथ किया।'
कोटा से रामसिंह तंवर ने लिखा- 'पाक अधिकृत कश्मीर में भारत के खिलाफ सक्रिय आतंककारियों के 42 शिविर हैं। शिविरों को हमें हमला करके नष्ट कर देना चाहिए।'
जोधपुर से करणसिंह भूणी ने लिखा- 'संपादकीय 'हम क्यों खामोश' (पत्रिका: 4 मई) पढ़कर प्रत्येक स्वाभिमानी भारतीय का मस्तक शर्म से झुका होगा, परन्तु सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेताओं को स्वाभिमान की जरा-सी भी परवाह नहीं है। भारत की कमजोर सरकार अब तक संसद पर हुए हमले के मुख्य आरोपी अफजल गुरु को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद मृत्युदंड देने में हिचकिचा रही है। उससे क्या उम्मीद करें।'
पाली से दीपक मेहता ने लिखा- 'मैं कलीम बहादुर के लेख 'अब तो सुधरे पाकिस्तान' (पत्रिका: 3 मई) से सहमत हूं। हमें पाकिस्तान पर दबाव बनाना चाहिए। सीधा हमला ठीक नहीं होगा।'
बेंगलूरु से सोमेन्द्र मैसी ने लिखा- 'ओसामा को खत्म करने के बाद अमरीका के राष्ट्रपति ओबामा ने कहा- हम जो ठानते हैं कर दिखाते हैं। क्या भारत के प्रधानमंत्री भी पाक में छिपे आतंककारियों के लिए ऐसा कहेंगे?'

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कोख में कत्ल




जयपुर से कुमारी सुष्मिता ने लिखा- 'जनगणना- 2011 के आंकड़ों ने मुझे शर्मसार कर दिया। इन आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में छह साल उम्र की बालिकाएं घट गई हैं। यानी बाल लिंगानुपात लड़कों के मुकाबले और ज्यादा गिर गया है। शिक्षा के प्रसार और कन्या-भ्रूण हत्या के खिलाफ लगातार सामाजिक-सरकारी अभियानों के बावजूद यह क्या हो रहा है? क्या हम पढ़े-लिखे सभ्य समाज कहलाने के हकदार हैं? जो आंकड़े प्रकाशित हुए हैं (पत्रिका: 1 व 5 अप्रेल) उनसे साफ जाहिर है कि लड़कियों की संख्या घटने का एकमात्र कारण कोख में ही उनका कत्ल कर देना है। पहले हम रूढि़यों, अंधविश्वास और अशिक्षा को दोषी मानकर खासकर, ग्रामीण समाज को कोसते थे, लेकिन अब? पढ़ा-लिखा शहरी समाज गर्भ में लिंग का पता लगा कन्याओं का खात्मा कर रहा है। मुझे बहुत ही मानसिक कष्ट हुआ जब एक तरफ पत्रिका में लिंगानुपात के आंकड़े प्रकाशित थे तो बगल में यह खबर भी छपी थी जिसमें उसी दिन जयपुर में दो नवजात कन्याओं की हत्या की गई थी। एक स्थान पर कोई नवजात कन्या का शव फेंक गया था तो दूसरी जगह नाले में कन्या-भ्रूण पॉलिथिन बैग में लिपटा मिला। क्या यह सब हमारे सभ्य-समाज के मुंह पर कालिख नहीं है?'
डी.के. शर्मा (कोटा) ने लिखा- '...तो ढूंढे नहीं मिलेगी दुल्हन' शीर्षक समाचार का निष्कर्ष चेतावनी की घंटी है। अगर अनसुनी की तो लड़के आने वाले वर्षों में दुल्हनों के लिए तरस जाएंगे। आबादी का संतुलन गड़बड़ाने से सब कुछ गड़बड़ा जाएगा। हमारे परिवारिक और सामाजिक रिश्तों का ताना-बाना बिखर जाएगा।'
प्रिय पाठकगण! जनगणना- 2011 के आंकड़ों में एक हजार पुरुषों की आबादी पर महिलाओं की संख्या में थोड़ी बढ़ोतरी को जहां कई पाठकों ने अच्छा संकेत माना है, वहीं बाल लिंगानुपात घटने पर गहरी चिन्ता प्रकट की है। शायद आपको यह विरोधाभास लगे कि वर्तमान में कन्या-भ्रूण हत्याओं के लिए पढ़े-लिखे शहरी समाज को ज्यादा दोषी माना जा रहा है, वहीं शहरी समाज से ही इस बुराई के खिलाफ आवाज भी उठ रही है। पाठकों की ये प्रतिक्रियाएं इसकी बानगी भर हैं।
ग्वालियर से दिग्विजय सिंह ने लिखा- 'पूरे देश में कन्या-भ्रूण हत्या के आंकड़े भयावह हैं। अनुमान लगाया गया है कि पिछले 50 वर्षों में भारत में 1.50 करोड़ नवजात कन्याओं की हत्या की जा चुकी है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के भारतीय प्रतिनिधि के अनुसार 2001 से 2007 के बीच लिंग परीक्षण के कारण प्रसव पूर्व ही 6 लाख लड़कियां प्रतिवर्ष नहीं जन्मी। यानी रोजाना 1600 लड़कियों की गर्भ में ही हत्या कर दी गई। वर्ष में औसतन 28  से 30  लाख भ्रूण परीक्षण होते हैं। सरकारी एजेंसियां सोई हुई हैं। पुलिस और चिकित्सा महकमों की हालत का पता इसी से चलता है कि मार्च-2011 तक देश के विभिन्न राज्यों में जन्म से पूर्व लिंग परीक्षण करने वालों के खिलाफ सिर्फ 805 मामले दर्ज हुए और इनमें भी मात्र 55 मामलों में कार्रवाई हुई। मध्य प्रदेश में दर्ज 70 मामलों में तो एक पर भी कार्रवाई नहीं हुई।'
ज्योति शर्मा (धौलपुर) ने लिखा- 'कन्या-भ्रूण हत्या रुके भी तो कैसे? सरकारी मशीनरी का इस बुराई को रोकने में कोई रोल ही नजर नहीं आता। प्रदेश में पीसीपीएनडीटी एक्ट-1994 के तहत कन्या-भ्रूण हत्या रोकने के उद्देश्य से एक विशेष टीम गठित की गई थी जिसका मुखिया डिप्टी एसपी स्तर का अधिकारी था, लेकिन इस विशेष टीम ने आज तक कुछ नहीं किया सिवाय कागजी कार्रवाई के। उल्टे लिंग परीक्षण करने वाले दोषी डॉक्टरों और सोनोग्राफी सेन्टरों को खुली छूट मिल गई।'
अहमदाबाद से अलका जोशी ने लिखा-'देश के 17  राज्यों में लिंगानुपात घटने पर केन्द्र सरकार केवल घडि़याली आंसू बहा रही है। (पत्रिका: 22 अप्रेल) हाल ही उन सभी राज्यों के स्वास्थ अधिकारियों के साथ केन्द्रीय सचिव की बैठक में निर्णय तो लंबे-चौड़े किए गए हैं, लेकिन ऐसे निर्णय बाद में ठंडे बस्ते में चले जाते हैं। अगर सरकार सचमुच गंभीर है तो कन्या-भ्रूण हत्या में दोषियों के लिए मौत की सजा का प्रावधान करना चाहिए।'
भोपाल से ओमप्रकाश सिंघल ने लिखा- 'समझ में नहीं आता एक मां अपनी पुत्री की हत्या के लिए कैसे तैयार हो जाती है? अगर मां चाहे तो कोई ताकत कन्या-भ्रूण या नवजात कन्या की हत्या नहीं कर सकती।'
इंदौर से सुभाष अग्निहोत्री ने लिखा- 'गर्भवती महिला को लिंग परीक्षण के लिए परिवार के लोग ही बाध्य करते हैं। यदि उसकी इच्छा पूछी जाए तो एक मां कभी भी अपने जिगर के टुकड़े को खत्म नहीं करेगी।'
बैंगलूरुसे नरेन्द्र भंसाली ने लिखा- 'कन्या-भ्रूण हत्या पर हम जितना शोर मचाते हैं उतना ही अगर नारी अत्याचार पर मचाएं तो कन्या-भ्रूण हत्या की नौबत ही नहीं आएगी।'
अजमेर से लालचंद 'भारती' ने लिखा- 'आज देश की राष्ट्रपति नारी है। लोकसभा अध्यक्ष नारी है। देश के मुख्य सत्ताधारी दल की मुखिया भी नारी है। ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जिसमें स्त्री-शक्ति ने मौजूदगी दर्ज नहीं कराई हो। मीडिया ने कन्या-भ्रूण हत्या के खिलाफ वातावरण बनाने में काफी मदद की है 'पत्रिका' की 'एकल पुत्री जयते' और 'अपनी पुत्री जयते' जैसे अभियान ने अनुकूल वातावरण बनाया है। कई सामाजिक संस्थाएं इस क्षेत्र में अनूठा कार्य कर रही हैं। हमें उम्मीद करनी चाहिए लोग बेटियों की कद्र करना सीखेंगे।'

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जनता का लोकपाल


(१)  'मैं 24 वर्षीय नवयुवक हूं। मुझे घोर आश्चर्य हुआ, जब मैंने पढ़ा कि लोकपाल विधेयक पिछले ४२ वर्षों से लोकसभा में अटका पड़ा है। देश में भ्रष्टाचार रोकने के लिए यह विधेयक पेश किया गया था। डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा था- जिन्दा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं कर सकती। धन्य हैं हम। 42 साल से चुप बैठे थे। ये तो अन्ना हजारे ने हमें झिझोंड़ दिया वरना न जाने और कितने वर्षों तक चुप रहते। हमारी खामोशी ने हमारा कितना अहित किया। हमारी गिनती भ्रष्ट राष्ट्रों में होती है। 20 लाख करोड़ रुपए तो हमने सिर्फ रिश्वतखोरी में गंवा दिए। 70 लाख करोड़ रुपए का काला धन विदेशी बैंकों में चला गया। इस सारी राशि से करोड़ों गरीबों की किस्मत चमक सकती थी। बहरहाल, देर आयद, दुरस्त आयद। भ्रष्टाचार के खिलाफ चेते हैं तो हमारी जिम्मेदारी बढ़ गई है।' 
दिव्यांशु डोभाल, जबलपुर

(२)  'भ्रष्टाचार इतना बड़ा मुद्दा था। पानी सिर से गुजर चुका था। सरकारें नाकारा हो चुकी थीं। हमें सूझ नहीं रहा था, क्या करें! न्यायपालिका, मीडिया और सामाजिक कार्यकर्ता समय-समय पर दिशा दे रहे थे। जन-जागरण बढ़ा था, लेकिन 'एक्शन' के लिए किसी पथ-प्रदर्शक की जरूरत थी। वह हमें अन्ना हजारे के रूप में मिला।'
 रवीन्द्र कालरा, बीकानेर

  प्रिय पाठकगण! इन पत्रों के साथ ही अनेक पाठकों की प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुई हैं। सभी का एक ही स्वर, भारत से भ्रष्टाचार भगाओ। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पाठक इस स्तंभ में बहुत मुखर होकर राय व्यक्त करते रहे हैं। इसलिए भ्रष्टाचार के खिलाफ चले अन्ना हजारे के अनशन पर पाठकों की प्रतिक्रियाओं का उफान स्वाभाविक है।
जोधपुर से माणिक्य पुरोहित ने लिखा- 'अन्ना हजारे के चार दिन के अनशन के दौरान सरकार ने मांगें मंजूर करने के लिए बहुत पैंतरेबाजी की, लेकिन अन्ना के दृढ़ इरादों ने सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया।'
भोपाल से आरिफ अहमद के अनुसार- 'भ्रष्टाचार के खिलाफ अभी लम्बी जंग लड़नी है। सबसे पहले तो लोकपाल विधेयक का सही मसौदा तैयार हो, फिर यह उसी रूप में संसद से पारित हो। यह कार्य एक निश्चित समय-सीमा में हो। नेता और अफसरों का शक्तिशाली गठजोड़ इसमें कदम-कदम पर अड़ंगे लगाएगा।'
अलवर से सिद्धार्थ गुप्ता ने लिखा- 'सरकार को अन्ना हजारे की टीम ने जो जन लोकपाल विधेयक तैयार किया है, उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। सरकार ने जो विधेयक 1968 में लोकसभा में पेश किया था वह कमजोर है। इसमें लोकपाल को कोई शक्तियां ही नहीं दी गईं।'
उदयपुर से कीर्ति श्रीमाली ने लिखा- 'अगर राज्य सरकारें इरादा कर लें तो सख्त कानून बनाने से कोई नहीं रोक सकता। बिहार का उदाहरण सामने है। वह एक मात्र राज्य है जहां भ्रष्टाचारी की सम्पत्ति जब्त करने का कानून है, जिसे नीतीश कुमार की सरकार ने बनाया। अब मध्य प्रदेश ने भी यही पैटर्न अपनाया है।'
ग्वालियर से प्रदीप चौहान ने लिखा- 'जन लोकपाल बिल के तहत प्रधानमंत्री के खिलाफ लोकपाल कार्रवाई कर सकता है। यह संस्था यूरोप के कई देशों के 'ओम्बुड्समैन' जैसी शक्तिशाली होनी चाहिए।'
बैंगलूरु से यशराज मेहता ने लिखा- 'यह विधेयक जन लोकपाल को 'सुपर सरकार' बना देगा। प्रधानमंत्री और कई संवैधानिक प्रमुखों को लोकपाल की दया पर निर्भर होना पड़ेगा। इससे लोकतंत्र कमजोर होगा।'
सूरत से प्रेमशंकर 'उदासी' ने लिखा- 'लोकतंत्र की चिन्ता करने वालों को इस बात का जवाब देना चाहिए कि अब तक 8 बार सरकारी तथा 6 बार गैर सरकारी विधेयक के तौर पर पेश हो चुके लोकपाल बिल को लोकसभा ने आज तक पारित क्यों नहीं किया। स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह 2004 में विधेयक को पारित करने का वादा कर भूल क्यों गए?'
इंदौर से सज्जन सिंह ने लिखा- 'भ्रष्टाचारियों, सावधान हो जाओ। जनता का लोकपाल आने वाला है। अब उसे कोई नहीं रोक सकता। दिल्ली के जंतर-मंतर से जो हुंकार उठी है वह मिस्र के तहरीर चौक जैसी है।'
उज्जैन से देशबंधु शर्मा ने लिखा- 'इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत गांधीवादी तरीका था, जो पूरी तरह अहिंसक रहा। इससे साबित हुआ कि इस देश में कोई बड़ा आंदोलन तभी सफल हो सकता है, जब वह हिंसा से दूर हो। क्या नक्सलवादी इस आंदोलन से कोई सबक सीखेंगे?'
क्रिकेट कूटनीति
आशीब काबरा (जयपुर) ने लिखा- 'मुझे खुशी है, जब पूरा मीडिया भारत-पाकिस्तान मैच के मौके पर क्रिकेटमय हो चला था- लोगों में जुनून और भावनाओं का ज्वार पैदा किया जा रहा था, तब पत्रिका ने सिक्के के दूसरे पहलू की तरफ भी ध्यान खींचा। संपादकीय में 'क्रिकेट के अलावा' (30 मार्च) और पत्रिका व्यू में 'खेल के नाम पर साजिश' (2 अप्रेल) में जिन मुद्दों को उठाया गया था, वे हमारे वर्ल्ड -कप जीतने के बाद भी फीके नहीं पड़े हैं। खासतौर पर यह कि क्या भारत सरकार को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को मैच देखने के लिए आमंत्रित करना चाहिए था? मेरा मानना है कि मुम्बई हमलों (26/11) के बाद हमारी सरकार ने जो संकल्प किया था उसे तोड़ दिया। सरकार ने ऐलान किया था कि जब तक पाकिस्तान मुम्बई हमलों के दोषियों को सजा नहीं देगा, हमारी उससे कोई बातचीत नहीं होगी। अफसोस! क्रिकेट कूटनीति के नाम पर हमारी सरकार ने घुटने टेक दिए। टीम इंडिया ने हमारा सिर ऊंचा किया, सरकार ने नीचा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मुम्बई में मारे गए निर्दोष नागरिकों और पाकिस्तानी आतंकियों से मुकाबला करते शहीद हुए जवानों की आत्माएं हमसे सवाल पूछ रही होंगी। इधर हम क्रिकेट कूटनीति कर रहे हैं और उधर पाकिस्तान चीन के साथ मिलकर 778 किमी लंबी नियंत्रण रेखा के पास हमारी जड़ें खोद रहा है।'

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परमाणु ऊर्जा पर प्रश्र चिन्ह





भोपाल से डॉ. सूर्यकान्त जायसवाल ने लिखा- 'जिस परमाणु ऊर्जा के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी सरकार को दांव पर लगा दिया था। जिस परमाणु ऊर्जा के लिए उन्हें अपनी सरकार बचाने के लिए 'नोट के बदले वोट' का आरोप झेलना पड़ा जो आज भी संप्रग सरकार का पीछा नहीं छोड़ रहा। वह परमाणु ऊर्जा आज इस कदर सवालों से घिरी हुई है कि किसी को जवाब देते नहीं सूझ रहा है।'
  बेंगलूरु से प्रसून माहेश्वरी ने लिखा- 'फुकुशिमा की घटना के बाद परमाणु बिजलीघर लगाने की होड़ में दौड़ रहे सभी राष्ट्र आज तो सहमे हुए हैं। लेकिन सवाल यह है कि कहीं यह 'श्मशानिया वैराग्य' तो नहीं? विंडस्केल से लेकर थ्री माइल्स आइलैण्ड, चेर्नोबिल, तोकाइमूरा और फुकुशिमा तक हुई परमाणु बिजलीघरों की त्रासदियों ने विश्व को झकझोर दिया था। लेकिन हर बार इन दुर्घटनाओं को भुला दिया गया। परमाणु संयंत्रों का विस्तार चालू रहा।'
 प्रिय पाठकगण! जापान की फुकुशिमा घटना के बाद विश्व में परमाणु ऊर्जा के खिलाफ बन रहे माहौल के बीच पाठकों ने कुछ सवाल उठाएं हैं।

  •  क्या परमाणु बिजलीघरों को बंद कर दिया जाना चाहिए?
  •  क्या परमाणु संयंत्रों के विस्तार का कार्यक्रम पूरी दुनिया में रोक दिया जाना चाहिए?
  •  परमाणु शक्ति के घातक विनाश से मानवता को कैसे बचाया जा सकता है?

पाठकों ने प्रतिक्रियाओं में इन प्रश्नों पर अपनी राय प्रकट की है। कई पाठकों ने परमाणु ऊर्जा की उपयोगिता और विकास में भूमिका पर भी तार्किक मत प्रकट किए हैं।
इंदौर से यशवंत भिड़े ने लिखा- 'अमरीका में पिछले 30 सालों से परमाणु ऊर्जा का विस्तार बंद था। लेकिन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने परमाणु बिजलीघरों के निर्माण को प्रोत्साहन देने की नई नीति शुरू कर दी। उन्हें लगता है कि परमाणु ऊर्जा की वजह से अमरीका अपने विकास कार्यक्रमों में कटौती किए बिना ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम कर सकता है। ओबामा की इस नीति का विरोध अब अमरीका में उनकी अपनी डेमोक्रेटिक पार्टी में भी होने लगा है।'
जया कुलश्रेष्ठ (जयपुर) ने लिखा- 'परमाणु ऊर्जा समर्थकों की दलील है कि इससे प्रदूषण नहीं फैलता। लेकिन रेडिएशन का खतरा प्रदूषण से हजार गुना घातक है। दुष्परिणाम पीढि़यों तक भुगतना पड़ता है।'
कोलकाता से यामिनी नायर ने लिखा- 'आखिर परमाणु बिजलीघर बंद क्यों नहीं कर दिए जाएं? इन बिजलीघरों से हमें मिल क्या रहा है! दुनिया की सिर्फ 14 प्रतिशत बिजली! 30 देशों के 443 परमाणु रिएक्टरों से सिर्फ 14 प्रतिशत बिजली और वह भी भारी-भरकम खर्च और जोखिम उठाकर। भारत को तो 2.5 फीसदी बिजली भी नहीं मिल रही है।'
इसके विपरीत वड़ोदरा से सुभाष शाह ने लिखा- 'भारत में ऊर्जा की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। भारत को विशाल पैमाने पर ऊर्जा की जरूरत है। पानी और कोयला सीमित मात्रा में है। विकास का सारा ढांचा ऊर्जा पर निर्भर है। परमाणु ऊर्जा के सिवाय हमारे पास विकल्प ही क्या है। परमाणु ऊर्जा विस्तार कार्यक्रम को रोकने का मतलब विकास को ठप करना है।'
जबलपुर से निर्मल शुक्ला ने लिखा- 'परमाणु संयंत्रों में आबादी के लिहाज से छोटे देशों जैसे फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया से भारत बहुत पीछे है। परमाणु संयंत्र 10 शीर्ष राष्ट्रों में भारत का सातवां नम्बर है। जबकि भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की दूसरी तेज रफ्तार वाली अर्थव्यवस्था है। भारत को अगर तेज रफ्तार से आगे बढ़ना है तो परमाणु संयंत्रों का विस्तार करना ही होगा।'
कोटा से गौतम रॉय ने लिखा- 'जो लोग सीमित ऊर्जा स्रोतों की दलील देकर भारत में परमाणु ऊर्जा की वकालत कर रहे हैं उन्हें भारत की सौर और पवन ऊर्जा की शक्ति का एहसास नहीं है। भारत की भौगोलिक स्थिति के मद्देनजर 4500 ट्रिलियन किलोवाट शुद्ध सौर ऊर्जा प्राप्त हो सकती है। यहां औसतन सालाना 300 स्वच्छ सूर्य-दिवस  (Clear Sunny days) आते हैं। 1500 से 2000 'सनशाइन अवर्स' कुछ हिस्से को छोड़कर भारत के पूरे क्षेत्र को उपलब्ध है। पवन-ऊर्जा में भारत को विश्व में लीडर माना जाता है।'
बीकानेर से डॉ. विजय भार्गव ने लिखा- 'परमाणु बिजलीघरों को बंद करने से कुछ हासिल नहीं होगा। जरूरत सुरक्षा उपायों को मजबूत करने की है।'
अहमदाबाद से देवेश कात्याल ने लिखा- 'फुकुशिमा के बाद चीन, जर्मनी, फ्रांस, रूस आदि देशों ने अपने परमाणु संयंत्रों को लेकर जो घोषणाएं की हैं, वे दिखावटी हैं। ये देश परमाणु बिजलीघर लगाने का अपना कोई कार्यक्रम रद्द नहीं करेंगे।'
जोधपुर से पी.सी. जोशी ने लिखा- 'अगर सभी परमाणु देश गंभीर हैं तो वे नए सिरे से एक संयुक्त समझोता करें कि वे अपने-अपने देशों में नए लगने वाले सभी संयंत्रों पर रोक लगा देंगे। इस समझोते की 20 वर्ष से पूर्व किसी भी तरह की समीक्षा पर पाबंदी होनी चाहिए।'
कपिल गौतम (उदयपुर) ने लिखा- 'पृथ्वी पर जीवन किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा से समूल नष्ट हो सकता है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में भी 'प्रलय' की परिकल्पना है।
परन्तु प्रलय को जब इंसान स्वयं आमंत्रित करे तो महाविनाश को कौन रोक सकता है। चाहे परमाणु
हथियार हों या फिर संयंत्र। यही समय है जब हम विकास और विनाश की अवधारणाओं को बारीकी से समझे।



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बेदाग हो छवि


इंदौर से श्याम नारायण निगम ने लिखा- 'सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मेरा अनुमान पुख्ता यकीन में बदलता जा रहा है। मेरे जेहन में यह सवाल था कि आखिर सरकार ने एक दागी व्यक्ति को देश का केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) बनाया ही क्यों था? जरूर इनमें से कोई एक वजह रही होगी-
  1.  सरकार पी.जे. थॉमस को उपकृत करना चाहती थी?
  2.  या उसकी कोई राजनीतिक मजबूरी थी?
  3. या फिर सरकार की सोची-समझी रणनीति थी?
थॉमस पर सरकार की मेहरबानी की मुझे कोई खास वजह नजर नहीं आती। वह पामोलिन घोटाले में फंसे थे। विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज भी उनकी नियुक्ति के विरोध में थीं। गठबंधन राजनीति की कोई मजबूरी भी सामने नहीं आई। न ही थॉमस की नियुक्ति में करुणानिधि का कोई दबाव नजर आया। फिर क्यों एक शक्तिशाली पद पर ऐसे व्यक्ति को बिठा दिया जो सरकार की फजीहत का सबसे बड़ा कारण बन गया। सरकार की दलीलें और मीडिया में उजागर हुए तथ्यों से यह साफ लगता है कि पी.जे. थॉमस की सीवीसी पद पर नियुक्ति सरकार की एक सोची-समझी रणनीति थी। घोटालों से घिरती सरकार के लिए शायद थॉमस सबसे उपयुक्त व्यक्ति थे। आखिर एक दागी व्यक्ति ही दूसरे दागी को बचा सकता है। लेकिन हाय! सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के सारे मंसूबों पर पानी फेर दिया! अब कुछ नहीं हो सकता। काठ की हांडी दुबारा आंच पर नहीं चढ़ सकती।'
  प्रिय पाठकगण! आप जानते हैं, देश में भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने के लिए केंद्रीय सतर्कता आयोग गठित है। पूर्व में आयोग ने भ्रष्टाचार के कई मामले उजागर किए हैं। लेकिन पी.जे. थॉमस की नियुक्ति के बाद इस संवैधानिक संस्था पर अंगुलियां  उठीं और मामला सर्वोच्च अदालत में गया। अदालत ने पिछले दिनों अपने फैसले में थॉमस की नियुक्ति को अवैध ठहराया। इससे पहले सरकार थॉमस की नियुक्ति को उचित बताते हुए लगातार उनका बचाव कर रही थी। बल्कि न्यायपालिका को प्रशासनिक कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करने की सलाह भी दे रही थी। इस सारे प्रकरण पर पाठकों की क्या प्रतिक्रिया है, आइए जानते हैं।
जयपुर से हिमांशु थपलियाल ने लिखा- 'भ्रष्टाचार के मामलों को सामने लाने में पूर्व मुख्य सतर्कता आयुक्तों ने शानदार भूमिका निबाही थी। एन. विट्ठल ने चार हजार से अधिक भ्रष्ट आईएएस, आईपीएस अफसरों तथा कई बड़े राजनेताओं के नाम आयोग की वेबसाइट पर डालकर भूचाल ला दिया था। उनके बाद आए मुख्य सतर्कता आयुक्त प्रत्यूष सिन्हा ने कॉमनवैल्थ खेलों में घोटालों की परतें उधेड़ कर रख दी थीं। लेकिन पी.जे. थॉमस की नियुक्ति के बाद आयोग का रुतबा फीका पड़ गया।'
कोटा से मीता श्रीवास्तव ने लिखा- 'सामाजिक संस्था सेंटर फॉर लिटीगेशन' जिसमें पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम. लिंगदोह सहित देश की नामी शख्सियतें शामिल हैं, ने अगर थॉमस की नियुक्ति को अदालत में चुनौती नहीं दी होती तो वे शायद आयोग में मजे से बैठकर भ्रष्टाचारियों को क्लीन चिट दे रहे होते।'
जबलपुर से गौतम रस्तौगी ने लिखा- 'अफसोस कि सरकार ने उस व्यक्ति को भ्रष्टाचारियों पर निगरानी रखने के लिए नियुक्त किया जो खुद भ्रष्टाचार के आरोप से घिरा था। इससे भी ज्यादा अफसोस इस बात का है कि उसकी नियुक्ति ऐसे प्रधानमंत्री के हाथों से हुई जो अपनी बेदाग और स्वच्छ छवि के लिए जाने जाते हैं।'
बेंगलुरू से रमेश एस. राजपुरोहित ने लिखा- 'थॉमस प्रकरण में प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत छवि भी धूमिल हुई है। वे यही कहते रहे कि थॉमस पर आरोप की उन्हें जानकारी नहीं थी। लेकिन मीडिया में हाल ही जिन तीन आधिकारिक पत्रों की खबरें छपी हैं, वे सच्चाई बयान करने के लिए काफी है। इनमें एक पत्र कार्मिक विभाग द्वारा 2008 में तथा दो पत्र केरल सरकार ने 2006 व 2008 में केंद्र को भेजे थे। इनमें थॉमस के खिलाफ मामले की जानकारी दी गई थी। केरल के मुख्यमंत्री वी.एस. अच्युतानंद ने भी यही बात कही है।'
भोपाल से सौम्य देवसिंह ने लिखा- 'शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में यही कहा कि मुख्य सतर्कता आयुक्त की छवि बेदाग होनी चाहिए। सीवीसी की नियुक्ति के लिए बने कानून में भी यही बात लिखी है। इसलिए सरकार यह मानते हुए भी कि थॉमस ने पामोलिन घोटाला नहीं किया, उन्हें सीवीसी नहीं बना सकती थी। क्योंकि उन पर आरोप था और वे दोषमुक्त नहीं किए गए थे।'
बीकानेर से कैलाश भटनागर ने लिखा- 'पी.जे. थॉमस पर केवल पामोलिन ऑयल घोटाले का मुकदमा ही नहीं चल रहा बल्कि उन पर टेलीकॉम सचिव के तौर पर २ जी स्पैक्ट्रम घोटाले में ए.राजा की मदद करने का आरोप भी है। इस घोटाले की पोल अब काफी हद तक खुल चुकी है।'
जोधपुर से श्रीगोपाल सोनी ने लिखा- 'जाने-माने पत्रकार राम बहादुर राय ने सही लिखा (पत्रिका: ४ मार्च) कि अदालत ने थॉमस की हेकड़ी निकाल दी। शीर्ष अदालत की तीखी टिप्पणियों के बावजूद थॉमस अड़े रहे। उन्हें नियुक्त करने वाली सरकार की किरकिरी होती रही, लेकिन उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया। वे संवैधानिक पद पर बैठे एक सर्वशक्तिमान हस्ती बनकर इठला रहे थे। इस्तीफा अभी भी उन्होंने नहीं दिया। लेकिन उन्हें अब जाना ही होगा- बे-आबरु होकर।'
अजमेर से दयालचंद्र मीरचंदानी ने लिखा- 'लोकतंत्र में पद, सत्ता और ताकत का नहीं, उत्तरदायित्व का प्रतीक है। लेकिन कई लोग सत्ता के नशे में होश खो बैठते हैं। सुखद बात है कि उन्हें होश में लाने के लिए हमारे पास न्यायपालिका और मीडिया जैसा तंत्र मौजूद है।'

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अनुत्तरित प्रश्न

  • क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की टीवी सम्पादकों से प्रेस-वार्ता अपने उद्देश्य में सफल रही?
  • भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी सरकार ने इस वार्ता के जरिए जनता के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की थी। क्या वह इसमें कामयाब रही?
  • एक के बाद एक खुलते घोटालों के बीच सरकार के प्रति उठते संदेहों और सवालों के जवाब लोगों को   मिल पाए?
प्रिय पाठकगण! प्रधानमंत्री की प्रेस-वार्ता पर अनेक पाठकों ने प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं जिनमें आप इन प्रश्नों के उत्तर पा सकते हैं।
उदयपुर से शैलेष राजवंशी ने लिखा- 'प्रधानमंत्री की इस प्रेस-वार्ता से मुझे बड़ी उम्मीद थी। लेकिन पूरी वार्ता सुनने के बाद भी मुझे पता नहीं चल पाया कि बड़े-बड़े घोटालों के लिए आखिर जिम्मेदार कौन था? ए राजा? डी.एम.के? प्रणव मुखर्जी या फिर खुद प्रधानमंत्री, जिन्होंने ए.राजा को काफी पहले ही हिदायत दे दी थी। इसके बावजूद राजा ने २ जी स्पैक्ट्रम आवंटन में गड़बडि़यां की, तो प्रधानमंत्री ने उसके खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की। इसी तरह एस. बैंड करार का कौन जिम्मेदार था? इसरो? देवास मल्टी-मीडिया? या फिर खुद केन्द्र सरकार? ये दोनों मामले देश के अब तक के सबसे बड़े घोटाले बन चुके हैं। और इन दोनों मामलों में तभी कार्रवाई हुई जब पूरी दुनिया इन घोटालों को जान चुकी थी।'
जबलपुर से ओ.पी. त्यागी ने लिखा- '२ जी स्पैक्ट्रम और एस. बैंड घोटालों में सरकार ने तब जाकर कार्रवाई की जब उसे मजबूर कर दिया गया। ठीक वैसे ही जैसे जनता ने चोर को ढूंढ निकाला तो पुलिस को उसे हथकड़ी लगानी ही पड़ी। इसमें पुलिस ने क्या कमाल कर दिखाया? प्रधानमंत्री ने ए. राजा को हटाने और गिरफ्तारी की जो सफाई पेश की वह ऐसी ही थी।'
जयपुर से राजकुमार पारीक ने लिखा- 'जिन घोटालों की वजह से देश का नाम दुनिया भर में बदनाम हुआ, जनता त्रस्त हुई, क्या उनका एकमात्र कारण गठबंधन सरकार की मजबूरी थी? अविश्वसनीय दलील थी यह। ए.राजा के मार्फत करुणानिधि के कुनबे और कई कार्पोरेट घरानों को देश का धन लूटने की छूट आखिर किसने दी।'
बीकानेर से ओम प्रकाश गुप्ता ने लिखा- 'प्रेस-वार्ता में दिग्गज टीवी पत्रकार थे लेकिन कोई भी प्रधानमंत्री को तीखे सवालों से घेरने में कामयाब नहीं रहा। एक-दो पत्रकारों ने कोशिश की तो सरकारी अफसर ने उन्हें टोक दिया। लिहाजा यह एकतरफा प्रेस-वार्ता बन कर रह गई। आपने उपयुक्त शीर्षक दिया- टीवी पर सरकारी ड्रामा (पत्रिका- १७ फरवरी)। प्रमुख घोटाले प्रिंट मीडिया ने उजागर किए और प्रिंट मीडिया को ही दूर रखकर सरकार ने संकीर्णता का परिचय दिया।'
भोपाल से सतीश सिंघल ने लिखा- 'जब प्रधानमंत्री ने कहा कि गठबंधन सरकार की कुछ मजबूरियां होती हैं तो पत्रकारों को पूछना चाहिए था कि इन मजबूरियों की कोई सीमा-रेखा है क्या? यह भी पूछा जाना चाहिए था कि २ जी स्पैक्ट्रम गठबंधन धर्म की मजबूरी थी, लेकिन एस.बैंड और कॉमनवेल्थ घोटाले किस राजनीतिक धर्म की मजबूरी थे? प्रेस-वार्ता के दो दिन बाद सरकार ने एस.बैंड करार को रद्द करने की घोषणा कर दी। संभवत: वह जेपीसी की जांच के लिए भी तैयार हो गई है। करुणानिधि की पुत्री कनिमोझी के टीवी चैनल कलैंजर टीवी के दफ्तर पर सीबीआई के छापे मारे गए हैं। ये सारी कार्रवाइयां जाहिर करती हैं कि केन्द्र सरकार कहीं न कहीं खुद को दोषी समझ रही है। लेकिन अफसोस यह कि वह इसे स्वीकार नहीं कर रही है।'
इंदौर से सुभाष चंदेरिया ने लिखा- 'प्रधानमंत्री ने प्रेस-वार्ता में कहा कि वह जेपीसी से डरते नहीं हैं और जांच कराने के लिए तैयार हैं। प्रश्न यह है कि भारत के प्रधानमंत्री से भी शक्तिशाली और कौन शख्स है जिसने उन्हें अभी तक जेपीसी की जांच से रोक रखा था। अगर प्रधानमंत्री तैयार थे तो सरकार ने संसद का पिछला शीतकालीन सत्र पूरा क्यों बरबाद कर दिया। सरकार विपक्ष की यह मांग स्वीकार कर लेती तो देश की जनता के पसीने की गाढ़ी कमाई का १७१ करोड़ रुपए फिजूल खर्च नहीं होते।'
कोटा से नरेन्द्र चतुर्वेदी ने लिखा- 'प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत छवि का मैं शुरू से ही कायल रहा हूं। शायद इसीलिए मेरे जैसे कई राष्ट्रवासियों ने उनसे यह उम्मीद लगा रखी है कि बड़े-बड़े घोटालों की अरबों रुपए की राशि भ्रष्टाचारियों की जेब से निकाल कर वह पुन: जनता के खजाने को सौपेंगे। देश के प्रधानमंत्री को जो शक्तियां हासिल हैं उनके चलते मनमोहन सिंह यह कार्य करके इतिहास में अपना नाम दर्ज करा सकते हैं।'
अजमेर से शौकत अली भाटी ने लिखा- 'मनमोहन सिंह अकेले राजनेता हैं जिन्हें राजनीति में खोना कुछ नहीं है। न उनके वंश में कोई राजनीति में हैं न उन्हें कोई राजनीतिक विरासत छोड़नी है। न ही उनमें अथाह धन इकट्ठा करने और शक्ति- केन्द्र बनने की कोई महत्त्वाकांक्षा नजर आती है। तो फिर वे देश-हित में कठोर निर्णय लेने से क्यों बच रहे हैं?'
होशंगाबाद से जयपाल शर्मा ने लिखा- 'मुझे लगता है कि इस प्रेस-वार्ता का उद्देश्य सोमवार से शुरू हो रहे संसद के बजट अधिवेशन की रिहर्सल थी। मुख्य पात्र की प्रस्तुति से यह साफ लग रहा है कि सरकार की मुश्किलें कम होने वाली नहीं हैं।'

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