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अनुत्तरित प्रश्न

  • क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की टीवी सम्पादकों से प्रेस-वार्ता अपने उद्देश्य में सफल रही?
  • भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी सरकार ने इस वार्ता के जरिए जनता के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की थी। क्या वह इसमें कामयाब रही?
  • एक के बाद एक खुलते घोटालों के बीच सरकार के प्रति उठते संदेहों और सवालों के जवाब लोगों को   मिल पाए?
प्रिय पाठकगण! प्रधानमंत्री की प्रेस-वार्ता पर अनेक पाठकों ने प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं जिनमें आप इन प्रश्नों के उत्तर पा सकते हैं।
उदयपुर से शैलेष राजवंशी ने लिखा- 'प्रधानमंत्री की इस प्रेस-वार्ता से मुझे बड़ी उम्मीद थी। लेकिन पूरी वार्ता सुनने के बाद भी मुझे पता नहीं चल पाया कि बड़े-बड़े घोटालों के लिए आखिर जिम्मेदार कौन था? ए राजा? डी.एम.के? प्रणव मुखर्जी या फिर खुद प्रधानमंत्री, जिन्होंने ए.राजा को काफी पहले ही हिदायत दे दी थी। इसके बावजूद राजा ने २ जी स्पैक्ट्रम आवंटन में गड़बडि़यां की, तो प्रधानमंत्री ने उसके खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की। इसी तरह एस. बैंड करार का कौन जिम्मेदार था? इसरो? देवास मल्टी-मीडिया? या फिर खुद केन्द्र सरकार? ये दोनों मामले देश के अब तक के सबसे बड़े घोटाले बन चुके हैं। और इन दोनों मामलों में तभी कार्रवाई हुई जब पूरी दुनिया इन घोटालों को जान चुकी थी।'
जबलपुर से ओ.पी. त्यागी ने लिखा- '२ जी स्पैक्ट्रम और एस. बैंड घोटालों में सरकार ने तब जाकर कार्रवाई की जब उसे मजबूर कर दिया गया। ठीक वैसे ही जैसे जनता ने चोर को ढूंढ निकाला तो पुलिस को उसे हथकड़ी लगानी ही पड़ी। इसमें पुलिस ने क्या कमाल कर दिखाया? प्रधानमंत्री ने ए. राजा को हटाने और गिरफ्तारी की जो सफाई पेश की वह ऐसी ही थी।'
जयपुर से राजकुमार पारीक ने लिखा- 'जिन घोटालों की वजह से देश का नाम दुनिया भर में बदनाम हुआ, जनता त्रस्त हुई, क्या उनका एकमात्र कारण गठबंधन सरकार की मजबूरी थी? अविश्वसनीय दलील थी यह। ए.राजा के मार्फत करुणानिधि के कुनबे और कई कार्पोरेट घरानों को देश का धन लूटने की छूट आखिर किसने दी।'
बीकानेर से ओम प्रकाश गुप्ता ने लिखा- 'प्रेस-वार्ता में दिग्गज टीवी पत्रकार थे लेकिन कोई भी प्रधानमंत्री को तीखे सवालों से घेरने में कामयाब नहीं रहा। एक-दो पत्रकारों ने कोशिश की तो सरकारी अफसर ने उन्हें टोक दिया। लिहाजा यह एकतरफा प्रेस-वार्ता बन कर रह गई। आपने उपयुक्त शीर्षक दिया- टीवी पर सरकारी ड्रामा (पत्रिका- १७ फरवरी)। प्रमुख घोटाले प्रिंट मीडिया ने उजागर किए और प्रिंट मीडिया को ही दूर रखकर सरकार ने संकीर्णता का परिचय दिया।'
भोपाल से सतीश सिंघल ने लिखा- 'जब प्रधानमंत्री ने कहा कि गठबंधन सरकार की कुछ मजबूरियां होती हैं तो पत्रकारों को पूछना चाहिए था कि इन मजबूरियों की कोई सीमा-रेखा है क्या? यह भी पूछा जाना चाहिए था कि २ जी स्पैक्ट्रम गठबंधन धर्म की मजबूरी थी, लेकिन एस.बैंड और कॉमनवेल्थ घोटाले किस राजनीतिक धर्म की मजबूरी थे? प्रेस-वार्ता के दो दिन बाद सरकार ने एस.बैंड करार को रद्द करने की घोषणा कर दी। संभवत: वह जेपीसी की जांच के लिए भी तैयार हो गई है। करुणानिधि की पुत्री कनिमोझी के टीवी चैनल कलैंजर टीवी के दफ्तर पर सीबीआई के छापे मारे गए हैं। ये सारी कार्रवाइयां जाहिर करती हैं कि केन्द्र सरकार कहीं न कहीं खुद को दोषी समझ रही है। लेकिन अफसोस यह कि वह इसे स्वीकार नहीं कर रही है।'
इंदौर से सुभाष चंदेरिया ने लिखा- 'प्रधानमंत्री ने प्रेस-वार्ता में कहा कि वह जेपीसी से डरते नहीं हैं और जांच कराने के लिए तैयार हैं। प्रश्न यह है कि भारत के प्रधानमंत्री से भी शक्तिशाली और कौन शख्स है जिसने उन्हें अभी तक जेपीसी की जांच से रोक रखा था। अगर प्रधानमंत्री तैयार थे तो सरकार ने संसद का पिछला शीतकालीन सत्र पूरा क्यों बरबाद कर दिया। सरकार विपक्ष की यह मांग स्वीकार कर लेती तो देश की जनता के पसीने की गाढ़ी कमाई का १७१ करोड़ रुपए फिजूल खर्च नहीं होते।'
कोटा से नरेन्द्र चतुर्वेदी ने लिखा- 'प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत छवि का मैं शुरू से ही कायल रहा हूं। शायद इसीलिए मेरे जैसे कई राष्ट्रवासियों ने उनसे यह उम्मीद लगा रखी है कि बड़े-बड़े घोटालों की अरबों रुपए की राशि भ्रष्टाचारियों की जेब से निकाल कर वह पुन: जनता के खजाने को सौपेंगे। देश के प्रधानमंत्री को जो शक्तियां हासिल हैं उनके चलते मनमोहन सिंह यह कार्य करके इतिहास में अपना नाम दर्ज करा सकते हैं।'
अजमेर से शौकत अली भाटी ने लिखा- 'मनमोहन सिंह अकेले राजनेता हैं जिन्हें राजनीति में खोना कुछ नहीं है। न उनके वंश में कोई राजनीति में हैं न उन्हें कोई राजनीतिक विरासत छोड़नी है। न ही उनमें अथाह धन इकट्ठा करने और शक्ति- केन्द्र बनने की कोई महत्त्वाकांक्षा नजर आती है। तो फिर वे देश-हित में कठोर निर्णय लेने से क्यों बच रहे हैं?'
होशंगाबाद से जयपाल शर्मा ने लिखा- 'मुझे लगता है कि इस प्रेस-वार्ता का उद्देश्य सोमवार से शुरू हो रहे संसद के बजट अधिवेशन की रिहर्सल थी। मुख्य पात्र की प्रस्तुति से यह साफ लग रहा है कि सरकार की मुश्किलें कम होने वाली नहीं हैं।'

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भूमिपुत्र का दर्द

जबलपुर से प्रशांत एस. सब्बरवाल ने लिखा- 'मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि किसान आत्महत्या जैसा कदम उठाने को क्यों मजबूर है? राज्य में पिछले डेढ़ माह में करीब डेढ़ दर्जन से अधिक किसानों ने जान दी है। (पत्रिका: 29 जनवरी) इस मामले में दायर जनहित याचिका पर कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब देने को कहा है। जाहिर है, कर्ज से पीडि़त किसानों की आत्महत्याओं के मामले में सरकार अब कठघरे में खड़ी है। मुख्यमंत्री की ओर से की गई मुआवजे की घोषणाएं थोथी निकलीं। किसानों को कोई राहत नहीं मिली। 'भूमिपुत्र' आज हाशिए पर हैं। उसका दर्द कोई नहीं समझ रहा। 1997 से लेकर आज तक देश में करीब सवा दो लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। दुख से जब सीना छलनी हो जाता है, तभी कोई ऐसा कदम उठाता है। उपाय सरकारों के पास हैं, लेकिन सरकारें निष्ठुर हैं। न्यायालय के नोटिस से शायद वे पिघलें।'
इंदौर से रवीन्द्र पुष्करणा ने लिखा- 'चर्वाक का कर्ज लेकर घी पीने का कथन अगर किसानों की मौत का कारण बनता तो कुछ और बात थी, किन्तु किसान तो कर्ज लेकर खेत खोदता है, अन्न उपजाने के लिए। अन्न, जो देश का पेट भरता है। इतना ज्यादा कि गोदामों में पड़ा सड़ता है। फिर भी वो आत्महत्या के लिए मजबूर है तो जरूर कोई संगीन बात है। तह में जाने की जरूरत है।'
प्रिय पाठकगण! किसानों की आत्महत्या की घटनाएं पिछले लंबे समय से सिलसिलेवार घटित हो रही हैं। खासकर महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्यों में किसानों ने भारी संख्या में कर्ज से पीडि़त होकर या फसल बर्बाद होने पर आत्महत्याएं की हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार 1997 से 2009 के बीच देश में 2,16,500 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। निश्चय ही ये आंकड़े भयावह हैं। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के ताजा नोटिस के परिप्रेक्ष्य में पाठकों की प्रतिक्रियाओं पर गौर करना चाहिए।
भोपाल से तनवीर अहमद ने लिखा- 'मध्यप्रदेश में कर्ज के बोझ तले दबे किसान पिछले लंबे समय से मौत को गले लगा रहे हैं, लेकिन किसी भी सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े इस बात का जीता-जागता प्रमाण हैं। ब्यूरो के मुताबिक 1997 में (मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़) 2390 किसानों ने आत्महत्या की वहीं 2008 में यह संख्या बढ़कर 3152 हो गई। इसके बाद भी मध्यप्रदेश में किसानों की आत्महत्या करने की प्रवृत्ति में इजाफा ही हुआ है। यह इसी से पता चलता है कि पिछले डेढ़ माह में ही मध्यप्रदेश में डेढ़ दर्जन से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं- सरकार यह अच्छी तरह से जानती है इसलिए अदालत में उसे सारे तथ्य सही तरीके से रखने चाहिए।'
उदयपुर से नवीन कुमार मित्तल ने लिखा- 'कमोबेश पूरे देश के किसानों की हालत एक जैसी है। राजस्थान के हालात भी कोई बहुत अच्छे नहीं हैं। राज्य में ग्रामीण क्षेत्रों में 83 प्रतिशत परिवार कर्ज में डूबे हुए हैं। दो साल पहले एक रिपोर्ट में बताया गया था कि राज्य के हर ग्रामीण परिवार पर औसतन ५५ हजार रुपए का कर्ज है। राज्य में 30 लाख ग्रामीण परिवार कर्जदार हैं। इनमें 34 प्रतिशत किसानों ने तो ऊंची ब्याज दरों पर निजी सूदखोरों से ऋण ले रखे हैं। ये आंकड़े राज्य में भी विदर्भ जैसे हालात उत्पन्न कर सकते हैं।'
जयपुर से डॉ. अशोक चक्रपाणि ने लिखा- 'भारत में किसानों की संख्या लगातार घट रही है, लेकिन आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या बढ़ रही है। इससे हमारी अर्थव्यवस्था में खेती की उपेक्षा का अंदाजा लगाया जा सकता है। भारत जैसे देश में कृषि क्षेत्र को समृद्ध बनाए बिना अर्थव्यवस्था में स्थायी मजबूती की कल्पना ही नहीं की जा सकती।'
कोटा से रामदेव आहूजा ने लिखा- 'किसानों की गरीबी का मुख्य कारण उन्हें अपनी फसलों की सही कीमत नहीं मिलना है। राष्ट्रीय किसान आयोग भी यह स्वीकार कर चुका है। आयोग की एक रिपोर्ट में कहा गया कि अधिकांश राज्यों में किसानों को धान और गेहूं का उत्पादन लागत से भी कम न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलता है। यही हाल दुग्ध व्यवसाय का है। भारत विश्व में एकमात्र देश है जहां दूध की कीमत किसी ब्रांडेड कम्पनी के पानी से भी कम है।'
बीकानेर से श्याम मनोहर शर्मा ने लिखा- 'सरकारें अक्सर लगान, फसली ऋण या ब्याज माफ करने की घोषणाएं करती हैं। कई तरह के अनुदान और छूटें देती है। कृषि विकास के लिए करोड़ों-अरबों रुपए की योजनाएं बनाती हैं। इस सबके बावजूद आज का किसान पिछड़ा हुआ और दुखी क्यों है? जबकि एक समय था जब राज्य का खजाना खेती-किसानी के राजस्व से ही भरता था। जिसके आधार पर शासकों ने ताजमहल जैसे अजूबे खड़े कर दिए। बड़े-बड़े सैनिक अभियान और युद्ध लड़े। आज हालत यह है कि जिस देश में 63 प्रतिशत लोग खेती पर आश्रित हैं, वहां सकल घरेलू उत्पाद में खेती का योगदान 55 प्रतिशत से गिरकर सिर्फ 17प्रतिशत रह गया है। क्या पूंजीवाद हमारी कृषि व्यवस्था को चौपट करता जा रहा है?'
अजमेर से कैलाश चौधरी तथा जोधपुर से प्रेमशंकर प्रजापत के पत्रों का सार है कि बाजार की शक्तियों से भ्रमित होकर आज का किसान कर्ज के दुष्चक्र में फंस रहा है। वह क्या बोएगा, यह स्थानीय परिस्थिति और जरूरत की बजाय बाजार तय कर रहा है। महंगी खाद और रासायनिक उर्वरक उसकी उपजाऊ जमीन को बंजर कर रहे हैं। इस दुष्चक्र से किसानों को निकालने की जरूरत है।

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जनता का धन


  •  यह मामला सिर्फ कर चोरी का नहीं है,  देश को लूट कर ले जाया गया है।
  •  देश को लूटने वाले लोगों के नाम बताए सरकार।
  • यह अपराध दिमाग को चकरा देने वाला है।

              ये टिप्पणियां सुप्रीम कोर्ट की हैं, जिसने विदेशी बैंकों में काले धन को लेकर जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान हाल ही (पत्रिका:20 जनवरी) में की हैं। क्या काले धन के मामले में सरकार को शर्मसार करने के लिए इससे भी सख्त टिप्पणी का इंतजार है?
         यह प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कोटा के रजनीकांत उपाध्याय ने आगे लिखा- 'लेकिन अफसोस! सरकार शर्मसार होने के बजाय अब भी बेतुकी दलीलें दिए जा रही है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने साफ कह दिया कि इन लोगों (देश को लूटने वालों) के नाम सार्वजनिक नहीं किए जा सकते, क्योंकि विदेशों से यही करार किया गया है। वाह! क्या अंदाज है, हमारी सरकार का। सुप्रीम कोर्ट जिन्हें देश को लूटने का अपराधी मानता है- सरकार उनके नाम न केवल गोपनीय रखना चाहती है, बल्कि कर चोरी की कोई छोटी-मोटी पैनल्टी लगाकर उन्हें गोपनीय ढंग से ही बरी कर देना चाहती है। सवाल है कि कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बावजूद सरकार इस 'दिमाग चकरा देने वाले अपराध' पर परदा क्यों डालना चाहती है? क्या, विदेशी करार की पुनर्समीक्षा नहीं हो सकती? या करार को महज आड़ की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है? सरकार अगर इन प्रश्नों का देश की जनता को जवाब नहीं देती तो यही माना जाएगा कि सरकार खुद देश को लूटने की जिम्मेदार है।'
        भोपाल से अनिरुद्ध सिंह चौहान ने लिखा- 'विकिलीक्स को स्विस बैंक खातों की जो दो सीडी हाथ लगी हैं, उसमें सैकड़ों गुप्त खातों के ब्योरे हैं। जैसा कि विकिलीक्स ने दावा किया है, वो जल्दी भंडाफोड़ करेगा। तब भारत सरकार क्या करेगी? जिन खातों का पूरा विवरण पूरी दुनिया जान चुकी होगी, क्या हमारी सरकार उन पर परदा डालने की नाकाम कोशिश करेगी? क्या यह बेहतर नहीं होगा कि विकिलीक्स नाम जाहिर करे उससे पहले सरकार खुद ही नाम सार्वजनिक करके ऐतिहासिक पहल करने का श्रेय हासिल करे?'
       प्रिय पाठकगण! विदेशों, खासकर स्विस बैंकों में जमा भारतीयों के काले धन को लेकर बहुत सारे तथ्य उजागर हो चुके हैं। अरबों-खरबों रुपए की यह राशि भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह राशि कैसे वापस भारत में लाई जाए इसे लेकर अनेक पाठकों की तार्किक प्रतिक्रिया प्राप्त हुई हैं। कई पाठकों की राय में खाताधारकों के नाम नहीं राशि महत्वपूर्ण हैं, तो अनेक पाठकों की राय में नाम सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। अगर काले धन के मालिकों के नाम सामने नहीं आएंगे तो काला धन भी देश को हासिल नहीं होगा, जिसकी असली मालिक भारत की जनता है।
      जयपुर से रमेशचंद्र जैमन ने लिखा- 'केन्द्र सरकार सरासर जनता को यह कहकर भ्रमित कर रही है कि विदेशी सरकारों से समझौते के तहत खाताधारकों के नाम सार्वजनिक नहीं किए जा सकते। जबकि स्विट्जरलैण्ड सरकार ने काफी पहले पेशकश की थी अगर भारत सरकार प्रस्ताव करे तो वह खाताधारियों की सूची सौंप सकती है।'
      बेंगलूरु से के.एम. मैथ्यू ने लिखा- 'भारत सरकार अमरीका की तरह पहल करे तो काला धन वापस लाया जा सकता है। अमरीका ने बाकायदा स्विस बैंकों में खाताधारी भ्रष्ट अमरीकियों की सूची सौंपी और कहा कि इन अमरीकियों ने कर चोरी की तथा विभिन्न कानूनों का उल्लंघन करते हुए अमरीकी धन स्विस बैंकों में स्थानान्तरित किया है। इस पर स्विस सरकार ने अपने बैंकों को धन वापसी के निर्देश दिए थे। मगर भारत ने महज एक खत लिखकर खानापूर्ति की जिसका स्विस बैंक पर कोई असर नहीं हुआ।'
      जोधपुर से दिनेश प्रजापति  के अनुसार- 'भारतीय अमीरों का विदेशी बैंकों में 700 खरब रुपए का काला धन जमा है। यह धनराशि अगर वापस लाई जाए तो देश के हर नागरिक की तकदीर चमक सकती है। इसलिए हमें फिजूल की बहस में पडऩे की जरूरत नहीं है। बहस खाताधारियों के नाम जानने की नहीं होनी चाहिए। बहस इस बात पर होनी चाहिए कि यह सारी धनराशि सरकारी खजाने में कैसे लाई जाए।'
      इंदौर के सत्यप्रकाश ने लिखा- 'चारों तरफ से पड़ रहे दबावों के चलते कई अमीर खाताधारी यह चाहेंगे कि अगर वे बिना किसी झंझट के बरी हो जाएं तो वे अपना काला धन सरकार को समर्पित करने को तैयार हो जाएंगे।'
      अलवर के अरविन्द यादव  ने लिखा- 'ये भ्रष्ट लोग आसानी से नहीं मानेंगे। ये लोग इतने शक्तिशाली हैं कि सरकार की इन पर हाथ डालने की कभी हिम्मत ही नहीं पड़ेगी। पिछले 25 सालों से काले धन की सिर्फ चर्चा ही चल रही है। कभी सरकार ने इन्हें नहीं घेरा? भले ही किसी भी पार्टी का शासन रहा हो।'
      जयपुर से डॉ. रविन्द्र जैन  ने लिखा- 'मनमोहन सिंह के नेतृत्व में चलने वाली यूपीए सरकार विदेशी बैंकों में काला धन जमा करने वालों के खिलाफ आखिर कैसे कार्रवाई कर सकती है, जबकि एस. गुरुमूर्ति           (पत्रिका: 9 जनवरी) के अनुसार यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी का खाता भी स्विस बैंकों में है, और उन्होंने इस सम्बंध में विदेशी और भारतीय मीडिया में प्रकाशित किसी भी रिपोर्ट का आज तक खण्डन नहीं किया है। यूपीए अध्यक्ष पर ही जब अंगुली उठी हुई हो तो यूपीए सरकार से कोई उम्मीद कैसे की जा सकती है।'
      उदयपुर के अजय मेहता ने लिखा- 'ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की भ्रष्ट देशों की सूची में और ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी की काले धन के राष्ट्रों की सूची में भारत का नाम ऊपर से शुरू होता है। यह हम देशवासियों को दुनिया भर में शर्मिन्दा करने के लिए काफी है। भारतीय अमीरों को, जिनका काला धन विदेशों में है, राष्ट्र को सौंपकर मिसाल पेश करनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद अब कोई गुंजाइश नहीं बची है। आम जनता भी यही चाहती है।

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      लालचौक में तिरंगा


      जयपुर से डॉ. विवेक रॉय ने लिखा- 'तिरंगे पर गरमाई राजनीति (पत्रिका: 6 जनवरी ) समाचार पढ़ा तो मन में कई सवाल कौंध गए-
      • क्या भारत के अलावा दुनिया में कोई ऐसा राष्ट्र है जहां देश के भीतर राष्ट्र-ध्वज फहराना अपराध माना जाता हो? वह भी प्रमुख राष्ट्रीय दिवस 26 जनवरी के अवसर पर?
      •  क्या श्रीनगर का लालचौक इस देश का हिस्सा नहीं है, जहां तिरंगा फहराना जुर्म है?
      - क्या अब तिरंगे को भी विभिन्न दलों के झंडों की तरह संकीर्ण राजनीति से जोड़कर देखा जाएगा?

         अगर इन सवालों का जवाब 'ना' है तो क्या सभी राजनीतिक दलों को मिलकर कश्मीरी अलगाववादियों को मुंहतोड़ जवाब नहीं देना चाहिए जिन्होंने श्रीनगर में तिरंगा फहराने पर हिंसा फैलाने की धमकी दी है?'

       प्रिय पाठकगण!  पिछले कुछ वर्षों से भारतीय जनता पार्टी की ओर से 26 जनवरी को श्रीनगर के लालचौक में तिरंगा फहराया जाता रहा है। इस बार भी गणतंत्र दिवस पर दल की युवा शाखा ने लालचौक में राष्ट्र-ध्वज फहराने की घोषणा की है। इस घोषणा का कश्मीरी अलगाववादियों ने तो विरोध किया ही है, बल्कि जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी नाराजगी जाहिर की है। कुछ लोगों का मानना है कि भाजपा की तिरंगा फहराने की कार्रवाई उग्रवादियों को भड़काएगी। कश्मीर में मुश्किल से शांति लौटी है, इसलिए भाजपा को लालचौक से दूर ही रहना चाहिए। दूसरी तरफ कइयों का मानना है कि भाजपा की यह कार्रवाई उचित है और राष्ट्रवाद से प्रेरित है। एक तीसरा मत यह भी है कि भाजपा ही क्यों- कश्मीर के सभी राजनीतिक दलों को मिलकर 26 जनवरी को पूरे कश्मीर में जगह-जगह तिरंगा फहराना चाहिए। इससे कश्मीर की आम जनता का हौसला बुलन्द होगा और अलगाववादियों को भी मुंहतोड़ जवाब मिल जाएगा।
      आइए देखें पाठक क्या कहते हैं।
      भोपाल से भानुप्रताप सिंह ने लिखा- 'जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक दल चाहे नेशनल कांफ्रेंस हो या पीडीपी, यहां तक कांग्रेस भी भाजपा के तिरंगा फहराने की कार्रवाई को राजनीतिक हथकंडा बताती है, लेकिन जेकेएलएफ जैसे उग्रवादी संगठन की धमकी पर सभी दल चुप्पी साधे रहते हैं। यह दोहरा चरित्र नहीं चलेगा। जेकेएलएफ के प्रमुख मोहम्मद यासीन मलिक ने खुलेआम चेतावनी दी है कि लालचौक में भाजपा तिरंगा फहराकर दिखाए। नहीं तो हम बताएंगे कि झंडा कैसे फहराया जाता है। ये लोग खुलेआम तिरंगे का अपमान करें। 15 अगस्त को काला झंडा फहराएं और एक दिन पहले 14 अगस्त को पाकिस्तान का झंडा फहराकर भारत विरोधी नारे लगाएं तो सारी पार्टियां मुंह बंद कर  लेती हैं। लेकिन अगर एक राजनीतिक दल भारतीय संविधान के तहत प्राप्त अधिकार से राष्ट्र-ध्वज फहराना चाहे तो यह राजनीतिक हथकंडा है!'
      अजमेर से रजनीकान्त शर्मा ने लिखा- 'यासीन मलिक को ऐसा बयान देने पर तत्काल गिरफ्तार कर लेना चाहिए और आपराधिक मुकदमा दायर करना चाहिए। इसके उलट मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला तो तिरंगा फहराने वालों को ही चेतावनियां दे रहे हैं। '
      कोटा से कौशल गुप्ता ने लिखा- 'तिरंगा फहराने से कश्मीर में आग सुलग सकती है- यह मेरी समझ से परे है। उमर अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर में सरकार के मुखिया हैं। यह उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वे राष्ट्र-ध्वज फहराने वालों की हौंसला अफजाई करें और आगे बढ़कर मदद करें।'
      इंदौर से सत्येन्द्र तोमर ने लिखा- 'अगर कश्मीर में तिरंगा फहराने से ही अशांति पैदा होती है तो राष्ट्रहित में भाजपा अपना यह कार्यक्रम छोड़ सकती है। लेकिन कोई इस बात की गारंटी देता है कि कश्मीर में शांति बनी रहेगी? कश्मीर में किसी राजनीतिक दल में यह ताकत नहीं कि वह ऐसी गारंटी दे सके। 1989 में कश्मीर में आतंकवाद और हिंसा चरम पर थी, तब तो भाजपा ने लालचौक में तिरंगा फहराने की शुरुआत भी नहीं की थी।'
      पाली से अंशुल परिहार ने लिखा- 'आखिर भाजपा को ऐसी क्या जरूरत आ पड़ी कि वह शांति के मौजूदा माहौल में चिंगारी भड़काने का काम करे। अगर यह राष्ट्रीय एकता का संदेश देना चाहती है तो उसे सभी दलों को साथ लेकर तिरंगा फहराना चाहिए। उसे अन्य दलों को विश्वास में लेकर ही लालचौक में तिरंगा फहराना चाहिए।'
      जोधपुर से भानुकुमार पारीक ने लिखा- 'अगर कश्मीर का वर्तमान माहौल किसी एक राजनीतिक दल के ध्वज फहराने से बिगड़ता है तो यह कार्रवाई रोकनी चाहिए।'
      अजमेर से सत्यप्रकाश आर्य ने लिखा- 'लालचौक में तिरंगा फहराना एक सांकेतिक कार्रवाई है, जिसका राष्ट्रीय महत्व है। लालचौक आतंककारियों की कार्रवाइयों का हमेशा से केंद्र रहा है। आतंकी यहां पाकिस्तान का झंडा फहरा चुके हैं, भारतीय ध्वज जला चुके हैं और अनेक हिंसक कार्रवाइयों को अंजाम दे चुके हैं। गत वर्ष जनवरी में पाक आतंकियों ने लालचौक पर 22 घंटे तक कब्जा जमाए रखा। अब भी वे चुनौती दे रहे हैं कि तिरंगा फहराकर तो देखो। यह समूचे भारतीय गणतंत्र का अपमान है। क्या इसका जवाब कायरतापूर्ण चुप्पी साधकर दिया जाए? अलगाववादियों की धमकी न केवल राजनीतिक दलों के लिए बल्कि हर भारतीय के लिए चुनौती है जो अपने देश से प्रेम करता है।'
      जबलपुर से श्याम महर्षि 'राही' ने लिखा- 'यह कैसा लोकतंत्र है जहां राष्ट्र-ध्वज संहिता की धज्जियां उड़ाने वालों की अनदेखी की जाती है और राष्ट्र-ध्वज फहराने वालों को चेतावनी दी जाती है।'
      उज्जैन से भानु पारीक ने लिखा- 'तिरंगे की शान के लिए हिन्दू हो या मुसलमान, भगतसिंह हो या अशफाक उल्ला खां- सबने कुर्बानियां दी है। तिरंगे की खातिर हमने फिरंगियों से लोहा लिया तो क्या अलगाववादियों से नहीं ले सकते?'

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      पेट्रोल के दाम

          राजस्थान विश्वविद्यालय के शोधार्थी आलोक शर्मा ने लिखा- 'कई बार सोचता हूं, हमारा देश आखिर इतने बड़े-बड़े घोटालों को कैसे झोल लेता है? किसी दूसरे देश में इतने घोटाले और भ्रष्टाचार होते तो उसकी अर्थव्यवस्था लुट गई होती। लेकिन जब हमारी लागत और मूल्य-प्रणाली पर गौर करता हूं तो बात समझ में आ जाती है। बीसियों तरह के करों और शुल्कों के नाम पर सरकार के पास ऐसी जादुई छड़ी है, जिसे वह विकास के नाम पर जनता के ऊपर फटकारती है, और भ्रष्टाचार के घाटे को पूरा करती है। विश्वास न हो तो राष्ट्रीय जीवन की धुरी बन चुके पेट्रोल की कीमतों को ही देख लीजिए। ताजा मूल्य वृद्धि के बाद जो पेट्रोल जनता को आज 60 रुपए लीटर मिल रहा है, उसकी लागत सिर्फ 27 रुपए है। बाकी राशि करों और शुल्कों के नाम पर जनता की जेब से निकाली जा रही है। यानी लागत से दुगनी! यह 'जनता के लिए जनता की सरकार' तो कतई नहीं, जो अपने भ्रष्ट कारनामों का बोझ भी जनता के कंधों पर डाल रही है।'
      जयपुर के डॉ. के.सी. गुप्ता के अनुसार- 'गोविन्द चतुर्वेदी (पत्रिका: 16 दिसम्बर, स्पॉट लाइट) का आकलन बिल्कुल सही है कि केन्द्र व राज्य सरकारें अपने घाटे और विभिन्न घोटालों का पूरा भार पेट्रोल की कीमतों के जरिए आम आदमी पर ही डालती है। अगर यह सच नहीं होता तो सरकार पिछले छह साल में 30 बार पेट्रोल के दाम नहीं बढ़ाती। वह भी झूठा प्रचार करके। तेल कंपनियों के घाटे का प्रचार करके। जबकि तीनों प्रमुख तेल कंपनियों की गत वर्ष की ही बैलेंसशीट देखिए- आई ओसी ने तो 10220.55 करोड़ रुपए का शुद्ध मुनाफा कमाया। दूसरी ओर बीपीसीएल ने1632.36 करोड़ तथा एचपीसीएल ने 1301.37 करोड़ रुपए का शुद्ध मुनाफा कमाया।'
      प्रिय पाठकगण! पेट्रोल की कीमतें आम लोगों को किस कदर प्रभावित करती हैं, यह पाठकों की प्रतिक्रियाओं से आप जान सकते हैं। इसी पखवाड़े पेट्रोल की कीमत 3.15 रुपए प्रति लीटर बढ़ाने पर आम आदमी खासा नाराज है। भारत में पेट्रोल का उत्पादन मांग से 80 प्रतिशत कम है और इसकी आपूर्ति अन्तरराष्ट्रीय बाजार से करनी पड़ती है, जिसकी बढ़ती कीमतों का असर भारत पर भी पड़ता है। इस सारी जानकारी के बावजूद आम जनता पेट्रोल के मौजूदा दामों से नाराज है तो आखिर क्यों? लोगों का मानना है कि सरकार की दोषपूर्ण पेट्रोलियम नीति और असंगत कर ढांचे के कारण पेट्रोल महंगा होता जा रहा है न कि अन्तरराष्ट्रीय बाजार के कारण। पाठकों ने तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर अपने तर्क रखे हैं।
      इंदौर से देशबंधु गुप्ता ने लिखा- 'छह माह पहले केन्द्र सरकार ने पेट्रोल की कीमत पर से नियंत्रण हटा लिया। उसके बाद तो पेट्रोलियम कंपनियों ने जनता को लूटना ही शुरू कर दिया। सिर्फ छह माह में ही पेट्रोल के दाम 20 फीसदी बढ़ा दिए गए। इतनी बढ़ोतरी किसी भी देश में नहीं हुई।'
      कोटा से रामस्वरूप राही ने लिखा- यूरोप के एक-दो विकसित देशों को छोड़ दें तो भारत अकेला ऐसा देश है, जहां पेट्रोल पर 50 प्रतिशत तक कर और शुल्क वसूले जाते हैं। जबकि अमरीका जैसा विकसित देश भी अपने नागरिकों से पेट्रोलियम पदार्थों पर 19 प्रतिशत से ज्यादा टैक्स नहीं लेता। हम तो पड़ोसी देशों से भी गए गुजरे हैं। पाकिस्तान में पेट्रोल पर 29 प्रतिशत, श्रीलंका में 39 प्रतिशत और नेपाल में 32 प्रतिशत कर ही पेट्रो पदार्थों पर लगाए जा रहे हैं।'
      भोपाल से रविन्द्र सिंह भदौरिया ने लिखा- 'लगता है सरकार सारा राजस्व पेट्रोल से ही वसूलने पर तुली हुई है। वित्त वर्ष 2009-10 में पेट्रो पदार्थों से अकेले केन्द्र सरकार ने 90 हजार करोड़ रुपए की राजस्व वसूली की। इस साल यह आंकड़ा सवा लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने की उम्मीद है। इसमें राज्य सरकारों द्वारा वसूले गए शुल्कों को भी जोड़ दें तो यह आंकड़ा कहां जाकर पहुंचेगा- कल्पना की जा सकती है। माना पेट्रो-राजस्व हमारी अर्थव्यवस्था की धुरी है, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि लोगों पर अंधाधुंध भार लाद दिया जाए।'
      जोधपुर से कल्पना सोलंकी ने लिखा- 'पेट्रोल के दाम पूरे महंगाई-चक्र को प्रभावित करते हैं, इसलिए इसके दामों में बढ़ोतरी बहुत सोच- समझ कर ही की जानी चाहिए। सुना है अब सरकार डीजल और रसोई गैस के दाम भी बढ़ाने पर सोच रही है। अगर ऐसा हुआ तो आम आदमी का जीना दुश्वार हो जाएगा।'
      अजमेर से हरिश्चन्द्र अजवानी ने लिखा- 'सरकार की नीति 'जबरा मारे, रोने भी न दे' जैसी है। एक तरफ तो देश में वाहनों की रिकार्ड बिक्री हो रही है, वाहन निर्माता बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां आ रही हैं। सस्ते वाहन ऋण उदारता से बांटे जा रहे हैं। पेट्रोल-डीजल जैसे सीमित प्राकृतिक संसाधनों के संयमपूर्ण उपभोग को प्रोत्साहित करने की कोई योजना भी कहीं नजर नहीं आ रही है। ऐसे में पेट्रोल के दामों में बढ़ोतरी आम आदमी के लिए 'कोढ़ में खाज' साबित हो रही है।''
      भरतपुर से छात्र गौरव शर्मा ने लिखा- 'कुछ नहीं तो राजस्थान सरकार प्रदेश के नागरिकों को पेट्रोल पर वैट घटाकर राहत दे ही सकती है। अभी राज्य में सर्वाधिक वैट है जो पंजाब, हरियाणा जैसे पड़ोसी राज्यों से अधिक है।'
      बीकानेर से सूरज परमार ने लिखा- 'सरकारों को पेट्रोल पर कर और शुल्क लगाते समय केवल अपनी आमदनी पर ही नजर नहीं रखनी चाहिए। जनहित सर्वोपरि है। सरकारों के पास कर वसूली के अनेक स्रोत हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि पेट्रोल पर एक तय सीमा में ही शुल्क व कर लगाए जाएं, जैसा कि अमरीका में है। यह आज की जरूरत है।'

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      राडिया के टेप

         इंदौर के युवा छात्र राजेश एस. निगम ने लिखा- 'जिस व्यक्ति (ए. राजा) ने संचार मंत्री के रूप में सरेआम राष्ट्र को लूट लिया, क्या उसकी समस्त कारगुजारियों को जानने का हक राष्ट्र को नहीं है?
      क्या हमें यह जानने का हक नहीं है कि खराब रिकार्ड व प्रधानमंत्री की नापसंदगी के बावजूद वह व्यक्ति दुबारा संचार मंत्रालय हासिल करने में कैसे सफल हुआ? किन लोगों ने परदे के पीछे रहकर उसकी मदद की? किसलिए की? मददगारों को मंत्री ने किस तरह फायदा पहुंचाया? और, सबसे बढ़कर यह सवाल कि आजाद भारत के अब तक के सबसे बड़े घोटाले की संरचना के घटक-सूत्र क्या हैं- यह जानना क्या हर देशवासी का हक नहीं? अगर हां, तो नीरा राडिया के समस्त टेप राष्ट्र के सामने आने चाहिए।'
      उदयपुर से डॉ. अभिमन्यु ने लिखा- 'नितान्त निजी बातचीत को छोड़कर मीडिया को वे सारे 5800 टेप उजागर करने चाहिए जिनका सम्बन्ध भ्रष्टाचार से जुड़े किसी भी मुद्दे से हो।'
      बेंगलूरु से उपेन्द्र माहेश्वरी ने लिखा- 'यह बिलकुल सही वक्त है, जब देश को खोखला कर देने वाले भ्रष्टाचार के दानव का सिर बेरहमी से कुचल दिया जाए।'
         प्रिय पाठकगण! नीरा राडिया के 'आउटलुक' और 'ओपन' पत्रिकाओं में प्रकाशित कुछ फोन टेपों ने न केवल 2 जी स्पैक्ट्रम घोटाले बल्कि भ्रष्टाचार के कई अन्य पहलुओं को भी उजागर किया है। पाठकों की राय में ये टेप सार्वजनिक दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं और अगर हम सचमुच भ्रष्टाचार का खात्मा चाहते हैं तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाना चाहिए।
      अजमेर से पंकज जैमन ने लिखा- '2 जी का काला सच (पत्रिका: 8 दिसम्बर) पढ़ा तो आंखें फटी रह गईं। किस तरह कुछ कम्पनियों को देश की सम्पदा लुटा दी गई- वरिष्ठ पत्रकार एस. गुरुमूर्ति के इस लेख से स्पष्ट है। यूनिटेक को 1658 करोड़ में लाइसेंस दिया गया जिसकी कीमत थी- 9100 करोड़ रुपए। स्वान को 1537 करोड़ रुपए में मिला जबकि कीमत थी-7192 करोड़ रुपए। एसटेल को 25 करोड़ में लाइसेंस मिला जबकि कीमत थी 4251 करोड़ रुपए! बिना निविदा के कम्पनियों को जो सरकारी बंदरबांट की गई, उससे देश को कैग के अनुसार 1 लाख 76 हजार करोड़ रुपए चपत लगी। संचार मंत्री को जब इस तरह देश को लुटाने का अधिकार मिला हो तो साफ समझ में आता है कि ए. राजा को मंत्रालय दिलाने में कुछ कम्पनियों ने क्यों एड़ी चोटी का जोर लगाया।'
        उज्जैन से देवज्ञ भट्ट ने लिखा- 'अगर राडिया के टेप सामने नहीं आते तो पता ही नहीं चलता कि कॉरपोरेट घरानों, राजनेताओं, पत्रकारों और बिचौलियों की मिलीभगत से ए. राजा को संचार मंत्री का पद मिला। यह टेपों से ही पता चला कि कॉरपोरेट कम्पनियों की लॉबिंग करने वाली नीरा राडिया ने 24मई, 2009 यानी एक दिन पहले ही राजा को फोन करके दूरसंचार मंत्री बनाने की सूचना दे दी थी।'
      अहमदाबाद से दीपक भाटी ने लिखा- 'राडिया के टेपों में कुछ पत्रकारों की बातचीत भी सामने आई है। बातचीत से साफ है कि नीरा राडिया के खेल में पत्रकार भी शामिल थे। यह सम्पूर्ण मीडिया-जगत के लिए चिंतन का विषय होना चाहिए। फिलहाल तो पत्रकार भी भ्रष्ट राजनीतिज्ञों, उद्योगपतियों, नौकरशाहों और बिचौलियों की तरह कठघरे में खड़े हैं।'
      जबलपुर से डॉ. रंजीत ने लिखा- 'पेड न्यूज के बाद यह दूसरा अवसर है जब मीडिया की साख को बट्टा लगा है। जिस तरह इन दिनों न्यायपालिका (संदर्भ: सुप्रीम कोर्ट की इलाहाबाद हाईकोर्ट पर टिप्पणी) अपने भीतर के भ्रष्टाचार को लेकर मुखर है, उसी तरह मीडिया संगठनों को भी अपने भीतर सफाई अभियान छेड़ देना चाहिए।'
      जोधपुर से जमनादास पुरोहित ने लिखा- 'देश में व्याप्त भ्रष्टाचार सिर चकराने वाला है। यह मेरी नहीं सुप्रीम कोर्ट (पत्रिका: 1 दिसम्बर) की टिप्पणी है। शीर्ष अदालत का दर्द समझ में आता है क्योंकि जब भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने वाला देश का मुख्य सतर्कता आयुक्त ही बेदाग न हो तो किससे उम्मीद करें।'
      भीलवाड़ा से जे.के. बंसल ने लिखा- 'इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ (पत्रिका: 4 दिसम्बर) ने उचित चेतावनी दी कि भ्रष्टाचार के कारण देश की एकता पर खतरा पैदा हो गया है और यह भी कहा कि अगर सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ कदम नहीं उठाए तो जनता कानून अपने हाथ में ले लेगी। मेरी राय में इन चेतावनियों पर गौर करने का यह उचित समय है।'
      भोपाल से चिन्मय गर्ग ने लिखा- 'भ्रष्टाचार के खात्मे का सबसे अचूक उपाय यह है कि हमारा शासन तंत्र और सार्वजनिक व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी हो। जब कुछ छुपाने के लिए होगा ही नहीं, तब भ्रष्टाचार भी नहीं होगा।'
      कोटा से बहादुर सिंह ने लिखा- 'ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट (पत्रिका: 10 दिसम्बर) हमें हर साल शर्मशार करती है लेकिन हम हैं कि सुधरते ही नहीं।'
      बीकानेर से पी.सी. सुथार ने लिखा- 'हमें निराश होने की आवश्यकता नहीं। देश में पहली बार एक शक्तिशाली पूर्व मुख्य सचिव नीरा यादव ने जेल की हवा खाई है। भ्रष्टाचार के खिलाफ न्यायपालिका की मौजूदा सक्रियता पर 'देर है अंधेर नहीं' (पत्रिका: 11 दिसम्बर) विशेष सम्पादकीय टिप्पणी में सटीक लिखा कि न्यायपालिका यदि इसी प्रकार दुर्गा बनकर मैदान में उतर जाती है तो विधायिका और कार्यपालिका को हर हाल में घुटने टेकने पड़ेंगे। मैं इसमें खबरपालिका (मीडिया) को भी जोड़ना चाहूंगा जो लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है और जो भ्रष्टाचार के खात्मे में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है।'

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      दाग ही दाग

        जयपुर से जयकुमार मंगल ने लिखा- 'दामन में दाग ही दाग' (पत्रिका, 26 नवम्बर) समाचार पढ़ा तो एक दिन पहले की सारी खुशियां काफूर हो गईं। समाचार था- नवनिर्वाचित बिहार विधानसभा में कुल 243 विधायकों में 141 विधायक दागी छवि के चुने गए।
      दस साल पहले मुझे रोजगार की तलाश में बिहार छोड़ना पड़ा था। बिहार की खराब छवि के चलते एक आम बिहारवासी को अन्य प्रांतों में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। नीतीश कुमार के शासन में बिहार की छवि बदली। इसलिए उनके फिर शासन में आने से अन्य प्रांतों में रहने वाले बिहारी भी बहुत खुश हैं। लेकिन उक्त समाचार से वे जरूर निराश हुए होंगे। कम-से-कम मुझे तो निराशा हुई। जिस 'दागी' छवि ने बिहार को गर्त में धकेल रखा है- उससे उबरने में अभी पता नहीं कितना समय लगेगा। नि:संदेह नीतीश कुमार पर अभी तक ऐसा कोई 'दाग' नहीं है। तभी तो बिहारवासियों ने उन्हें भारी मतों से जिताया है। उन पर भी भारी उत्तरदायित्व है कि वह 'दागियों' से अपने को दूर रखें। अच्छा तो यही होता कि वे दागियों को टिकट ही नहीं देते।'
         प्रिय पाठकगण! बिहार में विधानसभा चुनावों पर पूरे देश की नजर टिकी थी। विश्लेषक इन चुनावों को कई मायनों में भिन्न बता रहे थे। चुनाव परिणाम के बाद अलग-अलग विश्लेषण भी सामने आए। पाठकों का विश्लेषण क्या है, यह भी जान लीजिए।
      उदयपुर से प्रताप सिखवाल ने लिखा- 'बिहार में जद (यू)-भाजपा गठबंधन सरकार ने इस बार दो नए रिकार्ड कायम किए हैं। एक तो यह कि किसी गठबंधन सरकार को इतना भारी बहुमत पहले कभी नहीं मिला। दूसरा यह कि इतनी तादाद में 'दागी' उम्मीदवार पहले कभी नहीं जीते। यह बिहार विधानसभा का नया रिकार्ड है, जिसमें 141 'दागी' माननीय विधायकों में 85 माननीय वे हैं जिन पर हत्या और हत्या का प्रयास जैसे संगीन जुर्म के मामले चल रहे हैं। गुलाब कोठारी जी (काले हीरे, 27 नवम्बर) ने सही लिखा- 'बिल्ली को दूध की रखवाली का ठेका!' जिस विधानसभा में बहुमत दागी सदस्यों का हो, वह जनता का भला कर पाएगी- यह नीतीश कुमार के लिए सबसे बड़ी चुनौती का सबब होगा।'
      कोटा से अश्विनी श्रीवास्तव ने लिखा- 'राजनीतिक दलों में स्वच्छ छवि का उम्मीदवार चिराग लेकर ढूंढ़ने से भी नहीं मिलेगा, यह बात तो समझ में आती है। लेकिन गुंडा तत्वों को राजनीतिक दलों का टिकट कैसे मिल जाता है? यह सोचने की बात है। दिखने में ये सब उम्मीदवार चुनाव जीतकर आए हैं, इसलिए लोकतांत्रिक हैं। परन्तु हकीकत यह है कि जनता के सामने कोई विकल्प नहीं है। मैं 'काले हीरे' में व्यक्त किए गए इस विचार से पूर्णत: सहमत हूं कि चुनाव आयुक्त को ही आपराधिक छवि के लोगों पर चुनाव लड़ने से रोक लगा देनी चाहिए। राजनीति में सफाई अभियान तभी शुरू होगा। इस सम्बन्ध में मुझे राजनीतिक दलों से कोई उम्मीद नजर नहीं आती।'
      भोपाल से विवेक तोमर ने लिखा- 'राजनीतिक दलों की हालत चुनाव परिणाम के बाद प्रकाशित हुए तथ्यों से स्पष्ट है जिनमें जद (यू), भाजपा, राजद, लोजपा, कांग्रेस आदि सभी दल शामिल हैं। जो दल जितनी ज्यादा सीटें जीता उसके उतने ज्यादा प्रत्याशियों पर ही संगीन केस दर्ज हैं। जद (यू) के विजयी 115 विधायकों में आधे से ज्यादा (58) दागी और इनमें भी 43 वे हैं जिन पर हत्या और हत्या के प्रयास के मामले दर्ज हैं। एक सदस्य तो ऐसा है, जिस पर अकेले हत्या के दस और हत्या के प्रयास के आठ मामले समेत कुल 17 केस दर्ज हैं। आश्चर्य होता है, जब 'पार्टी विद् डिफरेंस' का नारा देने वाली भाजपा के विजयी 91 उम्मीदवारों में से 58 दागी सदस्य चुनकर आ गए। लालू की राजद और पासवान की लोजपा की बात छोड़ दें तो विजयी 4 कांग्रेसियों में से 3 दागी हैं।'
      उज्जैन से चन्द्रकान्त पाण्डे ने लिखा- 'बिहार में नीतीश कुमार का अब तक का शासन आश्चर्यजनक उपलब्धियों से भरा है। बिहार का मतलब कुछ साल पहले तक भ्रष्टाचार, अपराध, गरीबी और बेरोजगारी था, जिसे नीतीश के सुशासन ने एक नई पहचान दी। यह नीतीश के शासन में ही हुआ, जब चुनाव के दौरान कोई बूथ कैप्चरिंग नहीं हुई। कोई हत्या नहीं हुई। प्रदेश का विकास करने वाली राज्य सरकारों का पार्टी मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन होना चाहिए। चाहे वह नीतीश की सरकार हो या नरेन्द्र मोदी की या फिर नवीन पटनायक की। इन सभी मुख्यमंत्रियों ने अच्छा कार्य करके दिखाया है।'
      अहमदाबाद से सुषमा बिरवानी ने लिखा- 'लोग अब नतीजे देने वाली सरकारों को वोट देने लगे हैं- यह शुभ लोकतांत्रिक संकेत हैं। राष्ट्रव्यापी दुष्प्रचार के बावजूद नरेन्द्र मोदी को गुजरात की जनता ने भारी मतों से जिताया था। भाजपा के सहयोग के बगैर नवीन पटनायक उड़ीसा में बहुत अच्छी तरह से शासन कर रहे हैं। साफ है, जो काम करेगा, जनता उसी को चुनेगी।'
      जोधपुर से दीपेश प्रजापति ने लिखा- 'सुशासन देने वालों को जनता पसंद करती है, इसका मतलब यह नहीं है कि आपराधिक और भ्रष्ट छवि के लोगों को भी जनता पसंद करती है।'
      कोटा से कौशल गुप्ता ने लिखा- 'बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने अच्छा काम किया तो जनता ने उन्हें पुरस्कार भी दे दिया। लेकिन बिहार की राजनीति को अगर नीतीश साफ-सुथरा नहीं बना सके तो यह उनकी विफलता होगी। वे दागियों से दूरी रखें। उन्हें बिहार की सूरत के साथ-साथ बिहार की राजनीति की सीरत भी
      चमकानी होगी।'

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