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दागी 'माननीयों' का बचाव

 







बड़ा सवाल यह है कि आखिर दागी नेताओं को बचाने की जरूरत क्या है? क्या इसलिए कि ऊपरी अदालत से निर्दोष साबित होने पर सांसदों-विधायकों को उनकी वंचित सदस्यता फिर से नहीं लौटाई जा सकती? सही है। जब तक ऊपरी अदालत का फैसला आएगा, उसकी पांच साल की सदस्यता अवधि खत्म हो चुकी होगी। पर यही अंत नहीं है। चुनाव में दुबारा जाने का अवसर थोड़े ही खत्म होगा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटकर दागी नेताओं को बचाने की जिद पर क्या सरकार अड़ी रहेगी या राहुल गांधी के बयान के बाद अध्यादेश को वापस लेगी? या फिर विपक्ष के आगे झाुकते हुए विधेयक का रास्ता अपनाएगी अथवा थक-हार कर सर्वोच्च अदालत का फैसला मान लेगी?
इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में मिल जाएंगे, लेकिन दागी सांसदों-विधायकों को बचाने की सरकार की जुगत देश को इतनी भारी पड़ेगी कि नतीजे लम्बे समय तक भुगतने पड़ेंगे।
आम जन दागी नेताओं से छुटकारा पाना चाहता है। वह सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले को एक बेहतरीन अवसर मानता है। राजनीति को साफ-सुथरी करने का सरकार को दुर्लभ मौका मिला था। अदालत के फैसले को पूरा देश सराह रहा था। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया पर लोगों की उम्मीदें परवान चढ़ी थी। लेकिन सरकार ने आंखों पर पट्टी बांध ली। सरकार ही क्यों, सारे राजनीतिक दल जनता की उम्मीदों पर पानी फेरने को तैयार थे। आखिरकार अदालत का फैसला पलट दिया गया। फैसला चाहे अध्यादेश से पलटे या विधेयक से- क्या फर्क पड़ता है। जनता की उम्मीदें तो दोनों से टूटेंगी।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला जस का तस मान लिया जाएगा, इसकी उम्मीद बिलकुल नहीं है। फैसला आने के बाद सरकार ने जो कवायदें की, वे गवाह हैं। सबसे पहले कानून की उन धाराओं को ही बदलने का निश्चय किया, जिनके तहत अदालत का फैसला आया। गौरतलब है, 10 जुलाई को अदालत ने दो फैसले किए थे। एक में कहा था कि जो जेल में बंद हैं, वे चुनाव नहीं लड़ सकते और न ही मतदान कर सकते हैं। दूसरे फैसले में कहा कि सांसद या विधायक को किसी आपराधिक मामले में दो साल से ज्यादा की सजा हो तो उसकी सदन से सदस्यता खत्म हो जाएग। जेल से चुनाव नहीं लडऩे की पाबंदी जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 की धारा 62(2) तथा सजायाफ्ता होने पर सदस्यता से वंचित करना धारा 8(4) से सम्बंधित हैं। राजनीतिक दलों को अदालत के ये दोनों फैसले मान्य नहीं थे। लिहाजा सरकार ने दोनों धाराओं को बदलकर लोकसभा में संशोधन विधेयक पेश कर दिया। इसमें सभी दलों की सहमति थी। विधेयक लोकसभा से पारित हो गया। लेकिन राज्यसभा में भाजपा और बीजद की कुछ आपत्तियों के चलते अटक गया। 'माननीयों' का बचाव करने में सरकार इतनी जल्दी में थी कि तुरत-फुरत अध्यादेश लेकर आ गई। इस बीच उसने एक कोशिश और की और अदालत में पुनर्विचार याचिका का दांव आजमाया। सर्वोच्च अदालत ने यह याचिका भी खारिज कर दी। विधेयक अब भी राज्यसभा के पटल पर है। एक बार पटल पर रखे जाने के बाद वह सदन की सम्पत्ति बन जाता है। इसके बावजूद सरकार ने न्यायपालिका के बाद विधायिका की भी सर्वोपरिता की अनदेखी करते हुए कार्यपालिका का आसरा लिया और अध्यादेश पेश कर दिया। यह अध्यादेश राष्ट्रपति की मुहर के बाद कानून बन जाएगा। फिलहाल तो राष्ट्रपति ने इस पर सवाल-जवाब करके सरकार को मुश्किल में डाल दिया। रही-सही कसर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पूरी कर दी। सरकार की हालत सांप-छछूंदर जैसी है। न उगलते बन रहा है, न निगलते। हो सकता है वह कोई बेहतर फैसला ले, लेकिन इस पूरी कवायद में उसकी भारी किरकिरी हो चुकी है।
बड़ा सवाल यह है कि आखिर दागी नेताओं को बचाने की जरूरत क्या है? क्या इसलिए कि ऊपरी अदालत से निर्दोष साबित होने पर सांसदों-विधायकों को उनकी वंचित सदस्यता फिर से नहीं लौटाई जा सकती? सही है। जब तक ऊपरी अदालत का फैसला आएगा, उसकी पांच साल की सदस्यता अवधि खत्म हो चुकी होगी। पर यही अंत नहीं है। चुनाव में दुबारा जाने का अवसर थोड़े ही खत्म होगा। बल्कि बेदाग होकर दुबारा चुने जाने के अवसर ज्यादा मजबूत होंगे—ज्यादा जन-समर्थन के साथ। अदालतों के दो फैसलों के परिणाम भिन्न हो सकते हैं। वे अभियुक्त के अनुकूल भी जा सकते हैं और प्रतिकूल भी। न्यायिक प्रक्रिया की यह स्वाभाविक प्रकृति है, जो देश के प्रत्येक नागरिक पर लागू होती है। तो फिर माननीय सांसदों-विधायकों पर क्यों नहीं? यही वो सवाल है जिसका जवाब आम जन राजनीतिक दलों से जानना चाहता है। जो चुनकर भेजता है वही जब कानून के समक्ष समान है तो जो चुनकर जाता है उसे खास दर्जा क्यों? वह भी आपराधिक मामलों में? दागी नेताओं को बचाने की एक आड़ और ली जाती है। वह यह कि नेताओं को राजनीतिक कारणों से झाूठे मामलों में फंसा लिया जाता है। इसलिए उनके लिए कानूनी सुरक्षा-कवच जरूरी है। कौन फंसाता है नेताओं को? पुलिस? अफसर? आम आदमी? अक्सर नेताओं पर मामले उनके प्रतिद्वंद्वी ही प्रत्यक्ष या परोक्षत: दर्ज कराते देखे गए हैं। यह राजनीति की भीतरी बुराई है। इसका दोष दूसरों पर क्यों मढ़ा जाए? अगर दागियों को बचाने की कोशिशें यूं ही चलती रही, तो राजनीति कभी साफ-सुथरी नहीं हो सकती। बगैर साफ-सुथरी राजनीति के लोकतंत्र मजबूत नहीं रह सकता। जिसकी आतंकवाद, नक्सलवाद, भ्रष्टाचार, गरीबी जैसी बुराइयों से उबरने के लिए सख्त जरूरत है।
'इमोशनल' बनाम 'आइडियोलॉजिकल'
लालू यादव को चारा घोटाले में जेल भेजा गया है, लेकिन लगता है राजनेता कोई सबक नहीं सीख रहे हैं। राजद के एक नेता लालू की गिरफ्तारी के तुरन्त बाद टीवी पर बयान दे रहे थे, 'लालू और मजबूत होंगे, फिर चुनाव जीतेंगे। बिहार में उनके लाखों 'इमोशनल सपोर्टर्स' हैं। वे कोई 'आइडियोलॉजिकल सपोर्टर्स' नहीं हैं कि जेल जाने पर लालू का समर्थन बंद कर देंगे, बल्कि जेल जाने पर लालू के साथ उनकी सहानुभूति पैदा होगी और वे लालू का साथ ज्यादा मजबूती से देंगे। देख लेना।'
राजनेता गण जन भावनाओं को समझाने में गलती कर रहे हैं या जमीनी हकीकत बयान कर रहे हैं, इसका फैसला पाठक ही बेहतर कर सकते हैं।
मीडिया को ऐतराज
दिल्ली की रैली में नरेन्द्र मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री को 'देहाती औरत' बताने पर नवाज शरीफ के साथ ही उस भारतीय पत्रकार को भी घसीट लिया, जो वार्ता में शामिल थी। हालांकि उस पत्रकार ने प्रधानमंत्री को अपमानित करने के वाकिये का खंडन किया, लेकिन मोदी की टिप्पणी को 'ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन' ने आपत्तिजनक माना है। पत्रकार पर मोदी के बयान को मीडिया के खिलाफ बताया और कहा कि ऐसे बयानों का उद्देश्य भारतीय मीडिया को बदनाम करना है, जो लोकतंत्र की एक मुख्य संस्था है। बी.इ.ए. ने कहा, भारतीय मीडिया अपनी जिम्मेदारी और आचरण को बखूबी समझता है। मोदी ने पूरे तथ्य जाने बगैर ही पत्रकार पर टिप्पणी कर दी।

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असली और नकली वीडियो

किसी पुराने वीडियो या फोटो को नई घटना से जोड़कर अपलोड कर देना और फोटो तकनीक के जरिए फर्जी दृश्य गढ़ देना, ये तरीके भ्रम पैदा करते हैं। यह बहुत खतरनाक है। इससे बचने के उपाय जरूरी है। कानूनी उपाय पर्याप्त नहीं हैं। तकनीकी और वैज्ञानिक तरीकों की ज्यादा जरूरत है। हमें ऐसे तरीके खोजने होंगे जो आम जन को आगाह कर सके।

जैसे-जैसे सोशल मीडिया ताकतवर बनता जा रहा है, इसके दुरुपयोग की घटनाएं भी बढ़ती जा रही हैं। इसमें शब्द और चित्र दोनों रूप शामिल हैं। चूंकि चित्र ज्यादा असरकारी हैं, इसलिए ज्यादा दुरुपयोग भी चित्रों का ही किया जा रहा है। यह दो तरह से देखने में आता है। पहला, किसी पुराने वीडियो या फोटो को नई घटना से जोड़कर अपलोड कर देना और दूसरा, फोटो तकनीक के जरिए फर्जी दृश्य गढ़ देना। ये दोनों तरीके भ्रम पैदा करते हैं। शरारती व असामाजिक तत्त्व मौका देखकर इनका दुरुपयोग कर डालते हैं।
गत दिनों मुजफ्फरनगर के दंगों को भड़काने में एक ऐसे ही फर्जी वीडियो की अहम भूमिका मानी जा रही है। वीडियो में दो लड़कों की कुछ लोग हत्या करते हुए दिखाए गए थे। कट्टरपंथी तत्त्वों ने इस वीडियो को मुजफ्फरनगर के कंवल गांव की उस घटना से जोड़कर यू-ट्यूब पर अपलोड कर दिया, जहां झागड़े की शुरुआत हुई थी। जाहिर है, यह वीडियो एक समुदाय के लोगों को भड़काने के उद्देश्य से अपलोड किया गया था। बाद में पूरे जिले में हिंसा फैल गई, लोग मारे गए। वहां हिंसा के और भी कारण रहे होंगे, लेकिन जातीय तनाव और परस्पर नफरत पैदा करने में इस वीडियो की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता। हकीकत यह थी कि यह वीडियो कंवल गांव का था ही नहीं। यह वीडियो तो दो वर्ष पहले पाकिस्तान में बनाया गया था, जिसमें आतंकियों द्वारा दो लड़कों को नृशंसतापूर्वक मारा जा रहा था। कंवल गांव की घटना शरारती तत्त्वों के लिए एक अवसर बन गई, जिन्होंने इस वीडियो का जमकर दुरुपयोग किया। तकनीकी तौर पर वीडियो असली था, लेकिन संदर्भ बदलकर प्रचारित करने से यह फर्जी ही कहा जाएगा।
इसी दौरान फेसबुक पर उप्र के एक लोकप्रिय हिन्दी अखबार की चार कॉलम में प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित खबर अपलोड की गई। खबर का शीर्षक था— 'दंगाइयों को गोली मारने के आदेश'। लेकिन शरारती तत्त्वों ने फोटोशॉप की मदद से शीर्षक बदलकर उसे अत्यन्त भड़काऊ बना दिया। कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने नफरत फैलाने वाली इस फर्जी खबर की पोल खोली और अखबार की असली कटिंग चस्पां की।
इसी तरह एक फर्जी फोटो का इस्तेमाल असम में भड़की हिंसा तथा उत्तर-पूर्वी राज्यों के लोगों का देश के विभिन्न हिस्सों से पलायन के दौरान किया गया था। शुरुआत पड़ोसी देश म्यांमार में भड़की जातीय हिंसा से हुई, जिसमें अनेक लोग मारे गए थे। इसे फेसबुक पर बयान करते हुए एक फोटो अपलोड की गई। फोटो में एक स्थान पर कई शव दिखाए गए थे। इन्हें म्यांमार में हिंसा में मारे गए एक समुदाय के लोगों के शव बताया गया था। जबकि यह फोटो म्यांमार की न होकर इंडोनेशिया की थी। फोटो में जो शव जातीय हिंसा में मारे गए लोगों के बताए गए थे, दरअसल वे समुद्री तूफान 'सुनामी' में मारे गए लोगों के थे। यह फोटो अंतरराष्ट्रीय फोटो एजेन्सी एपी द्वारा सन् २००४ में जारी की गई थी, जो कई अखबारों में छपी थी। फोटो में मारे गए लोगों के शव समुद्र किनारे बहकर आए एक ढेर के रूप में पड़े थे, जो इस प्राकृतिक आपदा की विभीषिका को बयान कर रहे थे। कट्टरपंथियों ने इसे म्यांमार की हिंसा से जोड़ कर प्रचारित किया। फोटो असली थी, लेकिन इस्तेमाल 'नकली' था।
अभी उत्तर प्रदेश के एक हिन्दी अखबार की खबर की चर्चा की गई। शीर्षक बदलकर उसका दुरुपयोग किया गया। ठीक ऐसे ही गत दिनों कुछ फोटो और वीडियो फुटेज का इस्तेमाल करके फिल्म स्टार अमिताभ बच्चन का फेक वीडियो 'यू-ट्यूब' पर डाल दिया गया। अमिताभ वीडियो में नरेन्द्र मोदी की प्रधानमंत्री के तौर पर पैरवी करते हुए बताए गए थे। खुद अमिताभ के तीखे विरोध के बाद राजकोट का एक व्यक्ति सामने आया और उसने अभिनेता से माफी मांगी। इस व्यक्ति का कहना था कि उसने यह वीडियो सिर्फ अपलोड किया था, बनाया नहीं। जाहिर है, तकनीक का इस्तेमाल करते हुए किसी ने तो यह वीडियो बनाया ही था। 'फेक वीडियो' के शिकार तो रूस के प्रधानमंत्री ब्लादीमिर पुतिन भी हो चुके। वर्ष 2010 में उन्हें 'यू ट्यूब' पर अपलोड की गई एक वीडियो फिल्म में सलाखों के पीछे बंदी के रूप में दिखाया गया था। जबकि हकीकत में यह वीडियो रूस के एक बड़े तेल व्यापारी मिखाइल खोदोर्कोवस्की के मुकदमे की सुनवाई का था। वीडियो में सलाखों के पीछे खड़े खोदोर्कोवस्की को हटाकर पुतिन के वीडियो फुटेज इस तरह से चस्पां कर दिए थे कि असली जैसे दिखें। इस वीडियो को रूस में सिर्फ ३ दिन में ही तीस लाख लोगों ने देखा।
जाहिर है, भ्रमित करने, अफवाहें फैलाने, परस्पर नफरत पैदा करने, हिंसा भड़काने के लिए कट्टरपंथी ताकतें और असामाजिक तत्त्व सोशल मीडिया का दुरुपयोग कर रहे हैं। यह बहुत खतरनाक है। इससे बचने के उपाय जरूरी है। कानूनी उपाय पर्याप्त नहीं हैं। तकनीकी और वैज्ञानिक तरीकों की ज्यादा जरूरत है। हमें ऐसे तरीके खोजने होंगे जो आम जन को आगाह कर सके ताकि वे असली और नकली का भेद समझा सकें।
दामिनी दुष्कर्म के दंश
आज के हिंसा और तनाव के दौर में मीडिया से हर कोई यही अपेक्षा करेगा कि उसकी रिपोर्टिंग राहत प्रदान करे। इसके विपरीत दामिनी दुष्कर्म कांड पर न्यायालय के फैसले के बाद मीडिया रिपोर्टिंग ने निराश ही किया। खासकर, अंग्रेजी अखबारों ने मुकदमे की जो विस्तृत रिपोर्टिंग की उसने एक बार फिर 16 दिसम्बर की उस क्रूर घटना के घाव हरे कर दिए। पीडि़ता के मृत्यु पूर्व बयान, चिकित्सकों की रिपोर्ट, वकीलों के तर्क-वितर्क और फैसले में माननीय न्यायाधीश की टिप्पणियों को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया। इन खबरों में बताया गया कि बस के भीतर किस तरह युवती से नृशंसतापूर्वक दुष्कर्म किया गया। कैसे वहशी होकर अभियुक्त युवती पर टूट पड़े थे। कैसे लोहे की छड़ उसके अंगों में घुसेड़ी गई। कैसे उसे जगह-जगह से दांतों से काटा गया और कैसे संवेदनशील अंगों को निकाल बाहर किया गया। यह सारा विवरण न केवल जुगुप्सा (घृणा) पैदा करता है, बल्कि पाठक को तनावग्रस्त भी कर देता है। अंग्रेजी के लगभग सभी प्रमुख अखबारों ने यह किया। क्या ऐसा 'विस्तृत वर्णन' जरूरी था?
भूल सुधार
प्रिंट हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया गलती सभी से होती है। गलती सुधार ली जाए, यही उचित है। खासकर जब गलती तथ्यात्मक हो, लेकिन पिछले दिनों बी.बी.सी. ने भूल करके भी नहीं सुधारी। 10 सितंबर को उसने एक बिजनेस रिपोर्ट दिखाई। इसमें एक महिला उद्यमी की सफलता की कहानी थी कि कैसे उसने अपने देश में ऑटो रिपेयरिंग क्षेत्र में पुरुषों के एकाधिकार को तोड़ा। एंकर ने उस उद्यमी को बांग्लादेशी बताते हुए पूरा बखान कर डाला, जबकि वह अफ्रीकी देश सेनेगल की थी।

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पत्रकारों पर बढ़ते हमले


मौजूदा दौर में पत्रकारिता-कर्म दिनोंदिन मुश्किल बनता जा रहा है।  पत्रकारों पर हमले की घटनाएं बढ़ रही हैं। दरअसल, मीडिया और पत्रकारों पर हमला वही करते हैं या फिर करवाते हैं जो बुराइयों में डूबे हुए हैं। ऐसे लोग दोहरा चरित्र जीते हैं। ऊपर से सफेदपोश और भीतर से काले-कलुषित। किसी भी घटना से कोई सबक सीखा गया हो, देखने में नहीं आया।
राष्ट्रीय न्यूज चैनल का संवाददाता घायल अवस्था में आप बीती बता रहा था। उस पर आसाराम के समर्थकों ने हमला बोल दिया था। शरीर पर जगह-जगह चोटों के निशान थे। हमलावरों ने कैमरामैन व उसके साथी को भी घायल कर दिया था। कैमरामैन खून से लथपथ था। सिर पर गहरा घाव हुआ था। न्यूज चैनल टीम सदस्यों पर हमला तब हुआ, जब वे जोधपुर के पाल गांव में आसाराम के आश्रम के बाहर रिपोर्टिंग कर रहे थे। आई.बी.एन.-7 के संवाददाता भवानी सिंह एबीपी न्यूज को बता रहे थे—अचानक आश्रम के भीतर से कुछ लोग आए और उन्होंने हम पर हमला बोल दिया। हमें लातों, घूंसों, डंडों से पीटा गया। वे बहुत उग्र थे। यह तो शुक्र था कि आसपास रहने वाले ग्रामीणों ने हमें बचा लिया, वरना हमारी जान भी जा सकती थी। भवानी सिंह ने ग्रामीणों का शुक्रिया करते हुए उनमें से कुछ को कैमरे के सामने भी पेश किया। कैमरे के सामने ही घायल मीडिया कर्मियों को जिसने भी देखा, उसने इस पेशे के मुश्किल हालात पर जरूर सोचा होगा। एक दिन पहले ही भोपाल में भी आसाराम के समर्थकों ने हमला किया था। उन्हें पत्रकारों पर हमला करके मोटर साइकिल से भागते हुए देखा गया था।
मौजूदा दौर में पत्रकारिता-कर्म दिनोंदिन मुश्किल बनता जा रहा है। जैसे-जैसे समाज में पाखंड, अत्याचार, भ्रष्टाचार, दुराचार और अपराध बढ़ रहा है, पत्रकारों पर हमले की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। दरअसल, मीडिया और पत्रकारों पर हमला वही करते हैं या फिर करवाते हैं जो इन बुराइयों में डूबे हुए हैं। ऐसे लोग दोहरा चरित्र जीते हैं। ऊपर से सफेदपोश और भीतर से काले-कलुषित। इनके धन-बल, सत्ता-बल और कथित सफल-जीवन से आम जनता चकित रहती है। वह इन्हें सिर-माथे पर बिठा लेती है। लेकिन मीडिया जब इनकी पोल खोलने लगता है तो ये बौखला जाते हैं और उन पर हमले करवाते हैं। पुलिस और शासन-तंत्र इन्हीं का साथ देते हैं। बल्कि कई बार तो मिले हुए भी नजर आते हैं। दिखावे के तौर पर जरूर मामले दर्ज कर लिये जाते हैं, लेकिन होता-हवाता कुछ नहीं। पिछले कई दिनों से आसाराम को लेकर खबरें चल रही थीं। उन पर नाबालिग लड़की के यौन शोषण के गंभीर आरोप लगे थे। इसलिए मीडिया वाले उनके इर्द-गिर्द मंडरा रहे थे। इधर उनके समर्थक लगातार उग्र होते जा रहे थे। भोपाल और इंदौर में वे मीडिया कर्मियों पर हमला कर चुके थे। आसाराम गिरफ्तार कर जोधपुर लाये जाने वाले थे। उनके आश्रम में सैकड़ों समर्थक इक_े होते जा रहे थे। ऐसे में जोधपुर पुलिस ने सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त क्यों नहीं किए? जिस वक्त मीडिया कर्मियों पर हमला हुआ, पुलिस का कोई अधिकारी वहां क्यों नहीं था? क्यों घटना के तीन घंटे बाद पुलिस हरकत में आई? ऐसे कई सवाल मीडिया कर्मियों पर हर हमलों के बाद उठते रहे हैं। लेकिन किसी भी घटना से कोई सबक सीखा गया हो, देखने में नहीं आया। साफ है पत्रकारों पर हमलों के लिए सिर्फ हमलावर ही नहीं, शासन-तंत्र भी कम जिम्मेदार नहीं है।
ये हालात चिन्ताजनक हैं। खासकर, इसलिए कि पत्रकारों की सुरक्षा के मामले में भारत विश्व के देशों में निरंतर पिछड़ता जा रहा है। दुनिया में मीडिया और पत्रकारों की सुरक्षा पर नजर रखने वाली ब्रिटेन की संस्था आई.एन.एस.आई. (इंटरनेशनल न्यूज सैफ्टी इंस्टीट्यूट) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार सूची में सबसे खराब पांच देशों में भारत पत्रकारों के लिए 'दूसरा सबसे खतरनाक' देश है। पहले नंबर पर सीरिया है। इस संस्था ने  इस वर्ष की प्रथम छमाही आंकड़े जारी किए थे। इसके अनुसार भारत में जनवरी से जून माह तक 6 पत्रकार मारे गए। सीरिया में इस दौरान 8, पाकिस्तान में 5, सोमालिया में 4 और ब्राजील में 3 पत्रकारों की हमलों में मौत हो चुकी है। गौरतलब है कि ये दो माह पुराने आंकड़े हैं। अगर इसमें उत्तर प्रदेश में पिछले दो माह में हुई ४ पत्रकारों की हत्याओं को भी जोड़ दें तो संभवत: भारत सीरिया से भी आगे निकल जाएगा। इटावा जिले में राकेश शर्मा और बुलंदशहर जिले में जकाउल्ला तथा पिछले माह बांदा जिले में शशांक शुक्ला और लखनऊ जिले में लेखराम भारती— ये चार पत्रकार मारे जा चुके हैं। पुलिस अभी तक किसी भी हमलावर को गिरफ्तार नहीं कर पाई है।
स्पष्ट है, पिछले आठ माह में ही देश में 10 पत्रकार विभिन्न हमलों में मारे जा चुके हैं। पिछले वर्ष मध्यप्रदेश के पत्रकार चन्द्रिका रॉय की परिवार सहित हत्या कर दी गई थी। पत्नी सहित उनके दो मासूम बच्चों को मौत की नींद में सुला दिया गया था। मुम्बई के खोजी पत्रकार ज्योतिर्मय डे (जेडी) की हत्या को भी भूला नहीं जा सकता, जो महाराष्ट्र के अंडरवल्र्ड सरगनाओं की सच्चाइयों को उजागर कर रहे थे। मारपीट और कैमरा तोडऩे की तो सैकड़ों घटनाएं हैं। गत वर्ष जोधपुर में ही भंवरी देवी अपहरण कांड के दौरान महिपाल मदेरणा के समर्थकों ने पत्रकारों पर हमला बोल दिया था। छत्तीसगढ़ में पत्रिका के रायगढ़ ब्यूरो प्रमुख प्रवीण त्रिपाठी पर भी पार्षद के लोगों ने जानलेवा हमला किया था। पत्रकारों से मारपीट, अपहरण और हत्याओं की पृष्ठभूमि का एक मात्र सबब यही है कि मीडिया की आवाज को दबाया जाए। निश्चय ही पत्रकार मुश्किल हालात में काम कर रहे हैं। शासन-तंत्र पत्रकारों की सुरक्षा करने में नाकाम रहा है।
फिर संवेदनहीनता!
पत्रकारों में हेकड़ी और संवेदनहीनता की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। टीवी पत्रकारों में यह खासतौर पर देखी जा रही हैं। उत्तराखंड में बाढ़ के दौरान कई घटनाएं सामने आई थीं। एक टीवी संवाददाता तो भरे पानी में बाढ़ पीडि़त एक कमजोर ग्रामीण के कंधे पर बैठकर रिपोर्टिंग करते देखा गया था। ताजा घटना दीपिका कुमारी से जुड़ी है। दीपिका ने तीरन्दाजी में भारत का नाम रोशन किया है। वे गत दिनों पोलैण्ड में सम्पन्न हुए विश्व-कप में स्वर्ण पदक जीतकर स्वदेश लौटी थीं। दीपिका से इंटरव्यू करने के लिए सारे चैनल वाले उन पर मानो टूट पड़े थे। दीपिका ने उनसे गुजारिश की कि सब एक साथ उनसे इंटरव्यू कर लें। क्योंकि वे लगातार अभ्यास, यात्रा की थकान और सो न सकने के कारण सबको अलग-अलग इंटरव्यू देने में असमर्थ हैं। लेकिन संवाददाता अड़ गए। कुछेक तो बाकायदा दीपिका पर तंज कसने लगे, जिसका सार यह था कि स्वर्ण पदक जीतते ही दीपिका आसमान में उडऩे लगी है। संवाददाताओं के कठोर बोल और तानों से आहत दीपिका कुमारी सबके सामने ही रो पड़ीं। लेकिन खबर के भूखे संवाददाताओं पर कोई असर नहीं था। क्या देश का गौरव बढ़ाने वाली एक खिलाड़ी का हम मीडिया वाले इस तरह से स्वागत करते हैं! 30 अगस्त के अंक में 'हिन्दू' ने इस पूरी घटना का विवरण प्रकाशित किया और बिलखती हुई दीपिका कुमारी का फोटो भी, जो पीटीआई ने जारी किया था। इस विवरण को पढ़कर हर कोई यही कहेगा—संवेदनहीन मीडिया!!

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जो आलोचना करेगा...

कँवल भारती की  फेसबुक पर प्रतिक्रियाएं यूपी सरकार को बुरी तरह खटक रही थी। उन्हें गिरफ्तार कर थाने में बिठा दिया गया। हमारी चुनी हुई सरकारें किस तरह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंट रही हैं ये हम महाराष्ट्र में अशोक राव चव्हाण और प. बंगाल में ममता बनर्जी की सरकारों में भी देख चुके हैं। यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे बढ़ती ही
जा रही है। 

फेसबुक पर मंत्री की आलोचना करके गिरफ्तारी झोल चुके दलित लेखक कँवल भारती पर अब उत्तर प्रदेश सरकार ने सूचना तकनीक कानून की धारा ६६-ए के तहत भी मुकदमा दर्ज किया है। फेसबुक पर टिप्पणी के बाद लेखक पर दो मुकदमे पहले ही दर्ज किए जा चुके थे। इस घटना की सोशल मीडिया में कड़ी निन्दा हो रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी राज्य सरकार को नोटिस देकर चार सप्ताह में जवाब देने को कहा है। लेखक संगठन भी भारती की गिरफ्तारी और
उन पर जबरन दर्ज मुकदमों की भत्र्सना कर रहे थे। इन सबके बीच उम्मीद तो यह थी कि राज्य सरकार शर्मिन्दा होगी और मुकदमे वापस ले लेगी। लेकिन सरकार ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलते हुए बेशर्मीपूर्वक भारती पर एक और मुकदमा जड़ दिया। मानो सरकार सबकी अनसुनी करते हुए लेखकों को यह सबक सिखाने पर आमादा हो— 'सावधान! जो हमारे मंत्रियों की आलोचना करेगा, उसके साथ यही सलूक होगा।' सत्ता के नशे में चूर सरकार से और उम्मीद ही क्या की जा सकती है। दलितों, अल्पसंख्यकों और पिछड़ों के नाम पर शासन में आई अखिलेश यादव की सरकार का एक दलित लेखक के साथ यह सलूक उसके तानाशाही चेहरे की बखिया उधेडऩे के लिए काफी है।
कँवल भारती एक प्रतिष्ठित लेखक हैं। उन्होंने कई पुस्तकें लिखी हैं। उत्तर प्रदेश सहित देश के कई विश्वविद्यालयों में उनकी पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं। हां, यह जरूर है कि वे उत्तर प्रदेश की मौजूदा सरकार के आलोचक हैं। अपनी बात को वे अपने लेखों और फेसबुक पर प्रतिक्रिया व्यक्त करके दर्ज कराते रहे हैं। इस बार जब उन्होंने दुर्गाशक्ति नागपाल के मामले में अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की तो सरकार की भृकुटी तन गई। आप जानते हैं देश-भर में व्यापक प्रतिरोध के बावजूद दुर्गाशक्ति के मामले में राज्य सरकार टस से मस नहीं हुई। यह बात भी जग-जाहिर है कि दुर्गाशक्ति उत्तर प्रदेश में शक्तिशाली रेत माफिया की आंखों में खटक रही थी और राज्य सरकार ने साम्प्रदायिक सौहार्द बिगडऩे की आड़ लेकर उसे अपने रास्ते से हटा दिया था। कमोवेश यही कहानी लेखक कँवल भारती के मामले में दोहराई गई। कँवल भारती ने फेसबुक पर दुर्गाशक्ति के निलम्बन की आलोचना करते हुए रामपुर में हुई ऐसी ही एक कथित घटना से तुलना की थी।
भारती की प्रतिक्रिया थी कि रामपुर में भी प्रशासन ने एक प्राचीन मदरसा गिरा दिया, लेकिन सरकार ने किसी अधिकारी को निलम्बित नहीं किया। क्योंकि यहां (रामपुर में) आजम खान का राज है और उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। कँवल भारती की प्रतिक्रिया का यही वास्तविक आशय है। भारती ने यह भी लिखा—अखिलेश यादव की सरकार उत्तर प्रदेश में दुर्गाशक्ति नागपाल और आरक्षण के मामले में पूरी तरह नाकाम रही है। उत्तर प्रदेश में दरअसल चार मुख्यमंत्री हैं—अखिलेश यादव, शिवपाल सिंह यादव, आजम खान और मुलायम सिंह। राज्य में अपराधियों का बोलबाला है। जनता सरकार को कोस रही है, लेकिन ये लोग सत्ता के नशे में चूर हैं।
भारती की ये प्रतिक्रियाएं सरकार को बुरी तरह खटक रही थी। लिहाजा आड़ ली गई, वही साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाडऩे की। आनन-फानन में भारती को गिरफ्तार कर थाने में बिठा दिया गया। उन पर धारा 153-ए तथा 295-ए के तहत मुकदमे ठोंक दिए गए। भारती को संकीर्ण राजनीति के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। उन्होंने 'कांशीराम के दो चेहरे' पुस्तक तब लिखी थी, जब उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार थी। वे दलित अतिवाद का भी विरोध करते रहे हैं। भारती की गिरफ्तारी और उन पर मुकदमों की चौतरफा निन्दा हुई। अभी अखिलेश सरकार को सुप्रीम कोर्ट के नोटिस का जवाब भी देना है। लेकिन हठधर्मिता देखिए। एक कदम आगे जाकर सरकार ने भारती पर हाल ही आई.टी. एक्ट के तहत भी एक मुकदमा और जड़ दिया।
 सारी कार्रवाई का उद्देश्य स्पष्ट है— लेखक को इस हद तक प्रताडि़त करना कि वह सरकार की आईन्दा आलोचना करना भूल जाए। तो यह है एक चुनी हुई सरकार का असली चेहरा, जिसका नेतृत्व एक युवा मुख्यमंत्री के हाथ में है। क्या अखिलेश यादव प्रतिरोध की हर आवाज को कुचल डालना चाहते हैं? दुर्गाशक्ति के मामले में साफ है कि कहीं कोई साम्प्रदायिक तनाव नहीं हुआ था।। हालात स्पष्ट थे कि न ही कोई ऐसी आशंका थी। दुर्गाशक्ति उन राजनेताओं की आंखों में भी खटक रही थी, जिनके हित रेत-माफियाओं से जुड़े थे।
कँवल भारती का मामला भी दीगर नहीं है। वे सरकार के कड़े आलोचक हैं। अपनी अभिव्यक्ति वे लिखकर व्यक्त करते हैं। उनका यह अधिकार संविधान-प्रदत्त है। लेकिन सरकार ने उनके इस अधिकार को साम्प्रदायिक रंग देकर कुचल दिया। यह तो दुर्गाशक्ति के मामले से भी जघन्य है। भारती के इस अधिकार को कुचलना यानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को कुचलना है। इसकी इजाजत किसी चुनी हुई सरकार को नहीं दी जा सकती। लेकिन हमारी चुनी हुई सरकारें किस तरह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंट रही हैं ये हम महाराष्ट्र में अशोक राव चव्हाण और प. बंगाल में ममता बनर्जी की सरकारों में भी देख चुके हैं। यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है। तमिलनाडु और छत्तीसगढ़ में भी हम इसकी बानगियां देख चुके हैं। सरकारें असहमति के स्वरों को बेदर्दी से कुचलती जा रही है। न केवल सोशल मीडिया बल्कि संपूर्ण मीडिया-जगत और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में भरोसा रखने वालों के लिए यह चिन्ताजनक है।
कैदी बनेंगे पत्रकार
एक तरफ सरकारें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात कर रही हैं। दूसरी ओर तिहाड़ जेल के कैदियों की रचनाधर्मिता और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए उन्हें पत्रकार बनाने की तैयारी की जा रही है। तिहाड़ जेल के कैदी जल्दी ही एक मासिक समाचार पत्रिका का संपादन करेंगे, जो जेल प्रशासन की ओर से निकाला जाएगा। इस पत्रिका के लिए रिपोर्टिंग, प्रूफ रीडिंग और ग्राफिक्स डिजायनिंग आदि सारे कार्य कैदी ही करेंगे। तिहाड़ जेल की महानिदेशक विमला मेहरा के अनुसार इस समाचार पत्रिका का प्रकाशन अगले माह शुरू कर दिया जाएगा। पहले एडिटोरियल बोर्ड का गठन होगा, जिसमें पढ़े-लिखे कैदियों को शामिल किया जाएगा। ये बुद्धिजीवी कैदी ही सम्पादकीय टीम का गठन करेंगे। पत्रिका के प्रकाशन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। कहा जा रहा है कि अब तिहाड़ जेल के कैदी न केवल अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति को स्वर देंगे, बल्कि अपनी पीड़ा को पत्रकारिता के माध्यम से जेल अधिकारियों तक बेबाकी से पहुंचाएंगे भी। चलो, कहीं तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की चिन्ता की गई।

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मीडिया से क्यों नाराज

यह शोचनीय स्थिति है—मीडिया के लिए भी और नेताओं के लिए भी, जो बिना सोचे-समझो कुछ भी बोल देते हैं। राजनेता बयान तो दे देते हैं, लेकिन जब विरोध होता है तो पलट जाते हैं या यह कहते हैं 'मेरा यह मतलब नहीं था।' इसलिए कहा जाता है, सोच-समझाकर बोलिए। सार्वजनिक जीवन में रहने वालों पर यह बात ज्यादा शिद्दत से लागू होती है।

वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह मीडिया से खफा हैं। क्योंकि सांसद मीनाक्षी नटराजन के बारे में उनके बयान को मीडिया ने गलत परिभाषित किया। दिग्विजय सिंह ही क्यों, कांग्रेस प्रवक्ता राज बब्बर, सांसद रशीद मसूद, केन्द्रीय मंत्री फारुख अब्दुल्ला आदि राजनेता भी मीडिया से खफा होंगे, जिसने उनके सस्ते भोजन सम्बंधी बयानों को गलत परिभाषित किया। भले इन नेताओं ने दिग्विजय सिंह की तरह मीडिया पर प्रत्यक्षत: कोई दोष नहीं मंढा, मगर यह हकीकत है कि मीडिया के व्यापक विश्लेषण के चलते इन नेताओं को अपने बयानों पर खेद जताना पड़ा। रशीद मसूद अड़े रहे। इसके बावजूद कि वे दिल्ली में 5 रु. में खाना उपलब्ध होने का अपना दावा साबित नहीं कर सके। अलबत्ता, मीडिया ने पूरी दिल्ली में घूम-घूमकर यह जरूर साबित कर दिया कि भरपेट भोजन का भाव क्या है। दिग्विजय सिंह की जबान फिसल गई, लेकिन वे मानने को तैयार नहीं कि उनसे गलती हो गई। उल्टे मीडिया को ही शब्दों और मुहावरों का पाठ पढ़ा रहे हैं। दिग्विजय सिंह ने कहा, 'मीडिया टीआरपी की अंधी दौड़ में भाग रहा है। किसी व्यक्ति की प्रशंसा में इस्तेमाल किए गए एक प्रचलित मुहावरे पर भी मीडिया ने सेक्स का लेबल चस्पां कर दिया। यह बहुत शोचनीय है।'
सचमुच यह शोचनीय स्थिति है—मीडिया के लिए भी और नेताओं के लिए भी, जो बिना सोचे-समझो कुछ भी बोल देते हैं। दो राय नहीं कि मीडिया अंधी दौड़ में भाग रहा है और उसने दिग्विजय सिंह के 'सौ टंच माल' के बयान को जिस तरह लपक कर लिया इससे उसकी नीयत का खुलासा हुआ। लेकिन दिग्विजय सिंह जी! आपने भी क्या कह दिया। माना आपने बुरी नीयत से नहीं कहा। जिसके लिए कहा उसने (सांसद) भी बुरा नहीं माना। लेकिन क्या सचमुच आपने एक प्रचलित मुहावरे का इस्तेमाल किया? 'सौ टंच माल!' क्या आप जैसे वरिष्ठ राजनेता को यह जानकारी नहीं कि असली मुहावरा 'सौ टंच खरा' है न कि 'सौ टंच माल।' आप वाले 'मुहावरे' का एक स्त्री के संदर्भ में इस्तेमाल करने के क्या मायने हैं। ऐसा तो बम्बइया फिल्में करती हैं, जिसे बोलचाल में 'टपोरी' भाषा कहते हैं। आप 'सौ टंच खरा सोना' कहना चाहते होंगे। बाद में आपके बयानों से भी यह स्पष्ट हुआ। तो आप यही बोलते। जो शब्द आप बोलते हैं, उसके मायने भी वही निकाले जाएंगे, जो वास्तव में हैं। अगर आप कहते हैं पांच रु. में भरपेट भोजन। तो लोग आपसे 5 रु. में भरपेट भोजन मांगेंगे। आप गरीबों का मजाक नहीं उड़ा सकते। राजनेता बयान तो दे देते हैं, लेकिन जब विरोध होता है तो पलट जाते हैं या यह कहते हैं 'मेरा यह मतलब नहीं था।' राजबब्बर और फारुख अब्दुल्ला ने यही किया। भाजपा सांसद चंदन मित्रा ने भी अमत्र्य सेन के बारे दिए बयान के बाद यही किया। इसलिए कहा जाता है, सोच-समझकर बोलिए। सार्वजनिक जीवन में रहने वालों पर यह बात ज्यादा शिद्दत से लागू होती है।
फिर वही घोड़े, वही मैदान
हम मीडिया वालों को यह शिकायत रहती है कि जब तक कोई मामला मीडिया की सुर्खियों में रहता है, उस पर
कार्यवाही का नाटक चलता है। जांच कमेटी बिठाई जाती है। बयान होते हैं। मामला जैसे ही ठंडा पड़ा, गाड़ी पुराने ढर्रे पर लौट आती है। दोषी अफसर या नेता अपनी कुर्सी फिर संभाल लेता है।
मीडिया में भी अपवाद नहीं। हाल ही में उस न्यूज चैनल ने अपने उस रिपोर्टर को चुपचाप वापस काम पर ले लिया, जिसे गुवाहाटी यौन उत्पीडऩ की घटना के बाद हटा दिया गया था। आपको याद होगा, गत वर्ष गुवाहाटी में एक किशोरी अपने दोस्तों के साथ जन्मदिन की पार्टी के बाद रेस्तरां से लौट रही थी। कुछ लोगों ने अचानक उन्हें घेर लिया। इन लोगों ने युवाओं से बर्बरता की। किशोरी के कपड़े फाड़ डाले। स्थानीय न्यूज चैनल ने इस घटना की रिकार्डिंग प्रसारित की। बाद में राष्ट्रीय चैनलों ने भी दिखाया। देशभर में यह घटना यू-ट्यूब के माध्यम से चर्चा का विषय बनी। खूब निन्दा हुई। इस घटना में चैनल न्यूज लाइव के एक रिपोर्टर का नाम सामने आया। सामाजिक कार्यकर्ता अखिल गोगोई ने आरोप लगाया था कि इस रिपोर्टर ने एक्सक्लूसिव वीडियो शूट करने के लिए भीड़ को उकसाया, जिसके परिणामस्वरूप लड़की को बेइज्जत किया गया। हालांकि ऐसी घटनाओं में रिपोर्टर से ज्यादा चैनल दोषी होते हैं, जो टी.आर.पी. के लिए रिपोर्टरों पर दबाव बनाते हैं। लेकिन उस वक्त चौतरफा निन्दा के चलते चैनल ने रिपोर्टर को हटा दिया और ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बी.इ.ए.) ने भी मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की। साल भर बाद मामला ठंडा पड़ गया और चैनल ने आरोपी रिपोर्टर को फिर काम पर रख लिया। मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के अनुसार- 'बी.इ.ए. ने अपना नाम चमकाने और न्यूज चैनल को लोगों के गुस्से से दूर रखने के अलावा किसी दूसरे उद्देश्य से इस कमेटी का गठन नहीं किया था। यह बात अब लगभग साल भर बाद स्पष्ट हो गई है।'
फेसबुक बनाम रिपलन
ट्विटर और फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग का इस्तेमाल दुनिया में करोड़ों लोग करते हैं। लोकप्रियता के मामले में आज इनके सामने कोई दूसरी नेटवर्किंग साइट नहीं है। लेकिन 'रिपलन' का दावा है कि वह शीघ्र ही फेसबुक व ट्विटर जैसी साइट्स को पछाडऩे वाली है।
'रिपलन' की लांचिंग अमरीका के लॉस वेगास में 4 अगस्त को होने जा रही है। इंटरनेट मीडिया तकनीक के विशेषज्ञ क्रिस थॉमस के अनुसार इस साइट की खासियत यह है कि यह एक ओर फेसबुक की सभी सुविधाएं उपलब्ध कराएगी, वहीं 'एमेजोन' की तरह यूजर्स को सभी ब्रांडेड कंपनियों से भी जोड़े रखेगी। इस साइट की मदद से ऑनलाइन बिलों का भुगतान भी हो सकेगा। कंपनी का दावा तो यहां तक है कि इसके लांच होते ही विश्व के मीडिया का स्वरूप ही बदल जाएगा। 'रिपलन' ही नहीं, हरेक कंपनी लांचिंग से पहले बड़े-बड़े दावे करती ही है, उन्हें पूरा कितना कर पाती है, यह बाद में ही पता चलता है।

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साइबर, सिनेमा और मीडिया

साइबर अश्लील साहित्य पर रोक लगाने को लेकर सुझाव मांगे गए हैं। बच्चों के लिए तो ऐसा तंत्र बनाना ही होगा, जो उन्हें ऐसे अश्लील साहित्य से रोक सके। कुछ देश ऐसा कर भी रहे हैं। लेकिन महत्त्वपूर्ण यह है कि इस समस्या का समग्र समाधान होना चाहिए। केवल साइबर साहित्य पर रोक लगाकर बच्चों व युवाओं को 'पथभ्रष्ट' होने से नहीं रोका जा सकता।

देश के प्रमुख अखबारों में राज्य सभा सचिवालय की ओर से एक विज्ञापन छपा है। इसमें साइबर अश्लील साहित्य पर रोक लगाने सम्बन्धी एक याचिका पर लोगों के लिखित सुझाव व टिप्पणियां आदि आमंत्रित की गई हैं। राज्य सभा सांसद भगत सिंह कोश्यारी की अध्यक्षता में गठित समिति इस याचिका पर विचार कर रही है।
जैनाचार्य विजयरत्नासुन्दर सुरिजी और राज्य सभा सांसद विजय दर्डा की याचिका में कहा गया है कि भारत की दो-तिहाई जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु वाले व्यक्तियों की है। हमारी जनसंख्या का यह बड़ा हिस्सा, जो हमारे राष्ट्र की भविष्य की आशा है, वह साइबर अश्लील साहित्य के माध्यम से पथभ्रष्ट, विकृत और भ्रमित हो रहा है। याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि साइबर अश्लील साहित्य से किशोरों यहां तक कि वयस्कों पर भी अत्यन्त दुष्प्रभाव पड़ रहा है, जिससे मानसिक-शारीरिक प्रकृति की कई प्रकार की समस्याएं, यौन रोग, लैंगिक विकृतियां इत्यादि उत्पन्न हो रही हैं। इससे बच्चों के यौन शोषण के मामलों में भी वृद्धि हो रही है। आजकल कम्प्यूटर और टेलीविजन के अतिरिक्त मोबाइल फोन भी किशोरों के लिए इस प्रकार की अश्लील साइट्स देखने का एक आसान जरिया बन गए हैं। लिहाजा इन पर रोक लगाने के कदम उठाए जाएं।
याचिका में आई.टी. यानी सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम-2000 में संशोधन करने का आग्रह किया है ताकि कम्प्यूटर/मोबाइल पर अश्लील साहित्य को देखना एक ऐसा अपराध बनाया जा सके जिसके लिए ऐसी साइट्स के निर्माताओं, वितरकों और उसे देखने वालों के लिए कड़ी सजा का उपबंध हो।
इस याचिका का आशय स्पष्ट है, परन्तु निहित उद्देश्य अस्पष्ट है। इसमें साइबर साहित्य से बच्चों व युवाओं पर पडऩे वाले कुप्रभावों पर जो चिन्ता जाहिर की गई है वह एकांगी और अपूर्ण है। इसलिए बड़ा सवाल यह है कि याचिका से क्या हासिल होगा। मान लें राज्य सभा की याचिका समिति ने साइबर अश्लील साहित्य पर रोक लगाने की अनुशंसा कर दी तो क्या केन्द्र सरकार रोक लगा पाएगी? और मान लें कि केन्द्र सरकार ने रोक लगा दी तो क्या अकेले साइबर साहित्य पर रोक पर्याप्त होगी? अगर अश्लील साहित्य देश में किसी भी माध्यम से सुलभ है तो कोई उससे कैसे बच सकता है। सिनेमा, टीवी और मीडिया भी मौजूदा दौर में अश्लीलता के लिए काफी हद तक जिम्मेदार ठहराए जा रहे हैं। इसमें दो राय नहीं कि इनकी पोर्न साइट्स से तुलना नहीं की जा सकती। लेकिन बच्चों और किशोरों के कच्चे मन पर कई बार इनके कुप्रभाव भी सामने आए हैं। देश में इनकी पहुंच साइबर संसार से ज्यादा व्यापक है। ये माध्यम अलग-अलग कानून और आचार-संहिताओं के दायरे में आते हैं। ऐसे में अकेले सूचना प्रौद्योगिकी कानून-2000 में संशोधन से क्या होगा।
हाल ही में12 जुलाई को केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पोर्न साइट्स को लेकर जो दलील दी है उससे तो साफ है कि वह इन पर रोक लगाने में सक्षम ही नहीं है। इससे पहले सरकार ने 13 जून को जिन 39 वेबसाइट्स को प्रतिबंधित किया था वे ही नहीं रोकी जा सकी तो ऐसी सैकड़ों साइट्स को सरकार कैसे रोक पाएगी। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बाकायदा शपथ-पत्र पेश कर कहा कि सभी विदेशी पोर्न साइट्स पर रोक लगाना संभव नहीं है, क्योंकि इन पर सरकार का नियंत्रण नहीं है। ये ज्यादातर अमरीका या अन्य देशों से संचालित होती हैं। अमरीकी साइट्स 18 यूएससी 2257 के तहत संचालित है। इसका मतलब यह नहीं कि अश्लील साइट्स पर रोक नहीं लगानी चाहिए। खासकर, बच्चों के लिए तो ऐसा तंत्र बनाना ही होगा, जो उन्हें रोक सके। कुछ देश ऐसा कर भी रहे हैं। लेकिन महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि इस समस्या का समग्र समाधान होना चाहिए। केवल साइबर साहित्य पर रोक लगाकर बच्चों व युवाओं को 'पथभ्रष्ट' होने से नहीं रोका जा सकता।
बर्दाश्त नहीं आलोचना
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं—मीडिया की तो कतई नहीं। आपको याद होगा कार्टून मसले पर दो प्रोफेसरों की गिरफ्तारी की जब देश भर के मीडिया में आलोचना हुई तो उन्होंने धमकी दे डाली कि पश्चिम बंगाल में वे सरकारी टीवी चैनल चालू करेंगी। फिर उन्होंने अखबारों पर गुस्सा निकाला। उन्होंने प. बंगाल के सभी सरकारी तथा सरकार की मदद से चलने वाले पुस्तकालयों में उन अखबारों पर रोक लगा दी, जो उनकी आलोचना करते थे। इन पुस्तकालयों को सिर्फ वे अखबार ही खरीदने की छूट है, जिनके नाम सरकार ने तय कर रखे हैं। इनमें हिन्दी का एक भी अखबार नहीं है। तेरह अखबारों की सरकारी सूची में ज्यादातर उन अल्पज्ञात अखबारों के नाम हैं जो 'दीदी' के गुणगान के लिए जाने जाते हैं।
पिछले साल जब सरकार का यह फैसला आया तो अधिवक्ता वासवी रायचौधरी ने हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर सरकार के फैसले को अनैतिक और द्वेषपूर्ण बताया। उन्होंने इस फैसले को खारिज करने की मांग की, जिस पर गत दिनों सुनवाई करते हुए कोलकाता हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के आदेश को संशोधित करने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि लोकप्रिय और बहु-प्रसारित अखबारों को पुस्तकालयों में रखने की निषेधाज्ञा को तुरन्त खत्म कर दिया जाए। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को 17 जुलाई तक का समय दिया है। और साथ ही चेताया भी है कि अगर सरकार ऐसा स्वयं नहीं करती तो हाईकोर्ट की ओर से समुचित व्यवस्था की जाएगी।
अब देखना है कि सरकार अपना अडिय़ल रवैया छोड़कर बाकी अखबारों के पढऩे के पाठकों के अधिकार की बहाली करती है कि नहीं।
विज्ञापन बनाम खबर
विज्ञापन के बदले खबर छापने या प्रसारित करने के आरोप मीडिया पर अक्सर लगाए जाते हैं। यह उदाहरण रंगे हाथ पकड़े जाने का है। लखनऊ के एक हिन्दी दैनिक ने चार कॉलम में खबर छापी— 'डीएवी कैंट एरिया के छात्रों ने लहराया परचम'। कई छात्रों के फोटो भी थे। खबर के बीच में रंगीन बॉक्स में लिखा— 'डीएवी स्कूल अपना विज्ञापनदाता है। इस कारण कृपया इस खबर को रंगीन पेज पर सभी फोटो के साथ जगह देने की कोशिश करें...' दरअसल, ये पंक्तियां किसी सीनियर द्वारा दिया गया ऐहतियाती निर्देश था, जो कंपोज होकर हूबहू अखबार में छपा गया और पाठकों के हाथ में भी पहुंच गया।

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संवेदनहीन मीडिया!

उत्तराखंड में विभीषिका के दौरान टीवी चैनलों की रिपोर्टिंग के दृश्य एक तटस्थ दर्शक के मन में करुणा कम खीझ ज्यादा पैदा करते थे। पर यह तो कहना ही होगा कि मीडिया की रिपोर्टिंग ने सोई हुई सरकार को जगाया।  वरना पीडि़तों के लिए जितना-कुछ हुआ, वह भी शायद नहीं हो पाता। लापता लोगों की खोज-में मीडिया की भूमिका सरकार से ज्यादा नजर आती है।


उत्तराखंड में बाढ़ की विभीषिका के दौरान मीडिया कवरेज, खासकर टीवी चैनलों की रिपोर्टिंग को लेकर काफी आलोचनाएं हुईं। जिस वक्त सबसे ज्यादा आवश्यकता पीडि़तों की जान बचाना थी, उस वक्त टीवी रिपोर्टर कैमरामैन के साथ उन हेलीकॉप्टरों से जा पहुंचे, जो पीडि़तों की मदद के लिए गए थे। हेलीकॉप्टर बहुत कम थे और पीडि़त बहुत ज्यादा। हेलीकॉप्टर की एक-एक सीट बेशकीमती थी। इतनी जितना कि जीवन। मानव जीवन से ज्यादा तरजीह मीडिया रिपोर्टिंग को नहीं दी जा सकती। लेकिन रिपोर्टरों की संवेदनहीनता देखिए, रुंआसे, बदहवास लोगों से हेलीकॉप्टर में ही 'इंटरव्यू' किये जा रहे थे। हेलीकॉप्टर से बाहर भी उनका रवैया यही था। जान के लाले पड़े थे और रिपोर्टर माइक लेकर पीडि़तों के सामने सवालों की झाड़ी लगा रहे थे। अपनी रिपोर्टिंग को ज्यादा से ज्यादा भावनात्मक 'टच' देने की जुगत में वे एक-दूसरे को पछाडऩे में जुटे थे। मीलों पैदल चल कर आ रहे और दर्द से कराहते बुजुर्ग हों या रोती-बिलखती महिलाएं, यहां तक कि मासूम बच्चे भी—सभी के सामने रिपोर्टर का माइक अचानक प्रलय की तरह प्रकट हो जाता था। ऐसे दृश्य एक तटस्थ दर्शक के मन में करुणा कम खीझा ज्यादा पैदा करते थे।
राष्ट्रीय कहे जाने वाले चैनलों का यह हाल था, तो दूसरे चैनल कहां पीछे रहते! वे भी 'सबसे पहले' की होड़ में लगे थे। शिकार हुआ एक सामान्य रिपोर्टर। बेचारे नारायण वरगाही को बड़ी आलोचना झोलनी पड़ी। न्यूज एक्सप्रेस चैनल का यह संवाददाता एक बाढ़ पीडि़त ग्रामीण के कंधे पर ही जा चढ़ा और बाढ़ में डूबे गांव का आंखों देखा हाल बयान करने लगा। किसी ने इसकी रिकॉर्डिंग तुरंत फेसबुक पर डाल दी। सोशल मीडिया में रिपोर्टर व चैनल की जबरदस्त निन्दा हुई। चैनल ने रिकॉर्डिंग प्रसारित तो नहीं की, लेकिन रिपोर्टर की नौकरी जरूर छीन ली। वरगाही और उन बड़े चैनलों के रिपोर्टरों में कोई खास फर्क नहीं था, जिन्होंने पीडि़तों का हक मारकर हेलीकॉप्टरों में यात्राएं कीं।
मीडिया विशेषज्ञों का मानना है कि दरअसल, मीडिया के पास ऐसी भीषण आपदाओं की कवरेज के लिए कोई मानक कार्य-प्रणाली नहीं थी, जिसके चलते शुरू में उत्तराखंड की रिपोर्टिंग में अफरा-तफरी दिखाई दी। भविष्य में ऐसी गलतियां न दोहराई जाएं, इसके लिए न्यूज चैनलों के संपादकों की संस्था बी.ई.ए. (ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन) ने पांच सदस्यों की एक समिति गठित की है। यह समिति इस तरह की घटनाओं की कवरेज के लिए एक एस.ओ.पी. (स्टैण्डर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) तैयार करेगी, जो न सिर्फ रिपोर्टरों के लिए, बल्कि डेस्क पर काम करने वालों के लिए भी दिशा-निर्देश का काम करेगी। एस.ओ.पी. में यह बताया जाएगा कि पीडि़तों को देखते ही उन पर टूट न पड़ें और न ही पीडि़तों की नुमाइश लगाई जाए। जरूरत पडऩे पर उनकी मदद भी की जाए।
बी.ई.ए. ने यह समिति वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी की अध्यक्षता में गठित की है। इस समिति में 'टाइम्स नाउ' के मुख्य संपादक अर्णब गोस्वामी, इंडिया टीवी के प्रबंध संपादक विनोद कापड़ी, 'सी.एन.एन.-आई.बी.एन' के प्रबंधक संपादक विनय तिवारी तथा 'आज तक' की प्रबंध संपादक सुप्रिया प्रसाद शामिल किए गए हैं। जिस उद्देश्य को लेकर यह एस.ओ.पी. तैयार की जा रही है, उसमें शायद ही किसी को संदेह हो, लेकिन सवाल यह है कि इसका पालन कौन करेगा। एक-दूसरे को पछाडऩे की टीवी चैनलों की अंधी होड़ में बी.ई.ए. के दिशा-निर्देश कितने टिक पाएंगे इसमें संदेह है। बी.ई.ए. के दिशा-निर्देशों का अक्सर न्यूज चैनल उल्लंघन करते रहे हैं। लेकिन कुछ नहीं होता। सवाल यह भी है कि मीडिया-कर्मियों से जिस संवेदनशीलता की उम्मीद आचरण और व्यवहार में की जाती हो, उसके लिए एस.ओ.पी. की क्या जरूरत है। यह तो अलिखित और स्वत: स्फूर्त होनी चाहिए। अगर इसके लिए भी समिति की जरूरत पड़े तो पत्रकारिता-कर्म पर ही सवाल उठ खड़े होंगे। बहरहाल, यह कहना ही होगा कि मीडिया की दिन-रात की रिपोर्टिंग ने सोई हुई सरकार को जगाया। वरना पीडि़तों के लिए 15 दिन गुजरने के बाद भी जितना-कुछ हुआ, वह शायद नहीं हो पाता। बिछुड़े हुए पीडि़तों को परिजनों से मिलवाने और लापता लोगों की खोज-खबर में आज भी सरकार से ज्यादा मीडिया की भूमिका नजर आती है।
न खंडन न मंडन
उत्तराखंड में फंसे 15 हजार गुजरातियों को नरेन्द्र मोदी द्वारा बचा कर घर भेजने की खबर पर काफी बवेला मचा था। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने अनभिज्ञता जाहिर की कि यह खबर मीडिया में आई कहां से। यानी उन्होंने इसे मीडिया की गढ़ी हुई खबर बताकर ठंडे पानी के छींटे डालने की कोशिश की। लेकिन मीडिया ने उनकी यह कोशिश कामयाब नहीं होने दी। 'हिन्दू' ने अपने पहले पन्ने पर स्टोरी प्रकाशित की जिसमें उसने 'टाइम्स ऑफ इंडिया' के पत्रकार आनंद सूंडास का इंटरव्यू लिया था। आनंद सूंडास ने दावा किया कि 15 हजार गुजरातियों को बचाने का समाचार हल्दवानी में भाजपा प्रवक्ता अनिल बलूनी ने किया था। जिस वक्त भाजपा प्रवक्ता से बातचीत की गई उस दौरान उत्तराखंड भाजपा के अध्यक्ष तीरथसिंह रावत भी मौजूद थे। यह खबर सबसे पहले 23 जून को 'टाइम्स ऑफ इंडिया' में प्रकाशित हुई। बाद में यह खबर सभी प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने प्रकाशित व प्रसारित की। दो दिन में 15 हजार लोगों को बचाकर उन्हें घर पहुंचाने का समाचार जिसने भी सुना उसे विश्वास नहीं हुआ। क्योंकि जिन परिस्थितियों में लोग फंसे थे, उन्हें केवल हेलीकॉप्टर से ही लाया जा सकता था। और मोदी अपने साथ सिर्फ 4 हेलीकॉप्टर लेकर गए थे। 'हिन्दू' की खबर का पार्टी ने अभी तक न तो खंडन किया है और न ही समर्थन।
मनमानी तो नहीं!
हाल ही में जांच के दौरान मानकों पर खरे नहीं पाए जाने पर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने 61 टीवी चैनलों के लाइसेंस रद्द कर दिए। ये कौन से टीवी चैनल हैं तथा इन चैनलों ने किन मानकों का उल्लंघन किया, यह स्पष्ट नहीं किया गया है। चैनलों की जिस तरह बाढ़ आई हुई है, उसमें मानकों का उल्लंघन आश्चर्यजनक नहीं। लेकिन जांच के नाम पर सरकारी अफसरों की मनमानी भी नहीं चलनी चाहिए।
सरकार को यह देखने की जरूरत है कि जिन चैनलों के लाइसेंस रद्द किए गए उनमें क्या खामियां थीं। छोटी-मोटी कमियां बताकर उन्हें फिजूल तंग तो नहीं किया जा रहा था। आखिरकार यह अभिव्यक्ति का क्षेत्र है, कोई फैक्ट्री-कारखाना नहीं। गौरतलब है, 61 टीवी चैनलों के लाइसेंस रद्द होने के बाद अब भी 816 चैनल काम कर रहे हैं, इनमें से 398 समाचार चैनल हैं।

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