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मीडिया से क्यों नाराज

यह शोचनीय स्थिति है—मीडिया के लिए भी और नेताओं के लिए भी, जो बिना सोचे-समझो कुछ भी बोल देते हैं। राजनेता बयान तो दे देते हैं, लेकिन जब विरोध होता है तो पलट जाते हैं या यह कहते हैं 'मेरा यह मतलब नहीं था।' इसलिए कहा जाता है, सोच-समझाकर बोलिए। सार्वजनिक जीवन में रहने वालों पर यह बात ज्यादा शिद्दत से लागू होती है।

वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह मीडिया से खफा हैं। क्योंकि सांसद मीनाक्षी नटराजन के बारे में उनके बयान को मीडिया ने गलत परिभाषित किया। दिग्विजय सिंह ही क्यों, कांग्रेस प्रवक्ता राज बब्बर, सांसद रशीद मसूद, केन्द्रीय मंत्री फारुख अब्दुल्ला आदि राजनेता भी मीडिया से खफा होंगे, जिसने उनके सस्ते भोजन सम्बंधी बयानों को गलत परिभाषित किया। भले इन नेताओं ने दिग्विजय सिंह की तरह मीडिया पर प्रत्यक्षत: कोई दोष नहीं मंढा, मगर यह हकीकत है कि मीडिया के व्यापक विश्लेषण के चलते इन नेताओं को अपने बयानों पर खेद जताना पड़ा। रशीद मसूद अड़े रहे। इसके बावजूद कि वे दिल्ली में 5 रु. में खाना उपलब्ध होने का अपना दावा साबित नहीं कर सके। अलबत्ता, मीडिया ने पूरी दिल्ली में घूम-घूमकर यह जरूर साबित कर दिया कि भरपेट भोजन का भाव क्या है। दिग्विजय सिंह की जबान फिसल गई, लेकिन वे मानने को तैयार नहीं कि उनसे गलती हो गई। उल्टे मीडिया को ही शब्दों और मुहावरों का पाठ पढ़ा रहे हैं। दिग्विजय सिंह ने कहा, 'मीडिया टीआरपी की अंधी दौड़ में भाग रहा है। किसी व्यक्ति की प्रशंसा में इस्तेमाल किए गए एक प्रचलित मुहावरे पर भी मीडिया ने सेक्स का लेबल चस्पां कर दिया। यह बहुत शोचनीय है।'
सचमुच यह शोचनीय स्थिति है—मीडिया के लिए भी और नेताओं के लिए भी, जो बिना सोचे-समझो कुछ भी बोल देते हैं। दो राय नहीं कि मीडिया अंधी दौड़ में भाग रहा है और उसने दिग्विजय सिंह के 'सौ टंच माल' के बयान को जिस तरह लपक कर लिया इससे उसकी नीयत का खुलासा हुआ। लेकिन दिग्विजय सिंह जी! आपने भी क्या कह दिया। माना आपने बुरी नीयत से नहीं कहा। जिसके लिए कहा उसने (सांसद) भी बुरा नहीं माना। लेकिन क्या सचमुच आपने एक प्रचलित मुहावरे का इस्तेमाल किया? 'सौ टंच माल!' क्या आप जैसे वरिष्ठ राजनेता को यह जानकारी नहीं कि असली मुहावरा 'सौ टंच खरा' है न कि 'सौ टंच माल।' आप वाले 'मुहावरे' का एक स्त्री के संदर्भ में इस्तेमाल करने के क्या मायने हैं। ऐसा तो बम्बइया फिल्में करती हैं, जिसे बोलचाल में 'टपोरी' भाषा कहते हैं। आप 'सौ टंच खरा सोना' कहना चाहते होंगे। बाद में आपके बयानों से भी यह स्पष्ट हुआ। तो आप यही बोलते। जो शब्द आप बोलते हैं, उसके मायने भी वही निकाले जाएंगे, जो वास्तव में हैं। अगर आप कहते हैं पांच रु. में भरपेट भोजन। तो लोग आपसे 5 रु. में भरपेट भोजन मांगेंगे। आप गरीबों का मजाक नहीं उड़ा सकते। राजनेता बयान तो दे देते हैं, लेकिन जब विरोध होता है तो पलट जाते हैं या यह कहते हैं 'मेरा यह मतलब नहीं था।' राजबब्बर और फारुख अब्दुल्ला ने यही किया। भाजपा सांसद चंदन मित्रा ने भी अमत्र्य सेन के बारे दिए बयान के बाद यही किया। इसलिए कहा जाता है, सोच-समझकर बोलिए। सार्वजनिक जीवन में रहने वालों पर यह बात ज्यादा शिद्दत से लागू होती है।
फिर वही घोड़े, वही मैदान
हम मीडिया वालों को यह शिकायत रहती है कि जब तक कोई मामला मीडिया की सुर्खियों में रहता है, उस पर
कार्यवाही का नाटक चलता है। जांच कमेटी बिठाई जाती है। बयान होते हैं। मामला जैसे ही ठंडा पड़ा, गाड़ी पुराने ढर्रे पर लौट आती है। दोषी अफसर या नेता अपनी कुर्सी फिर संभाल लेता है।
मीडिया में भी अपवाद नहीं। हाल ही में उस न्यूज चैनल ने अपने उस रिपोर्टर को चुपचाप वापस काम पर ले लिया, जिसे गुवाहाटी यौन उत्पीडऩ की घटना के बाद हटा दिया गया था। आपको याद होगा, गत वर्ष गुवाहाटी में एक किशोरी अपने दोस्तों के साथ जन्मदिन की पार्टी के बाद रेस्तरां से लौट रही थी। कुछ लोगों ने अचानक उन्हें घेर लिया। इन लोगों ने युवाओं से बर्बरता की। किशोरी के कपड़े फाड़ डाले। स्थानीय न्यूज चैनल ने इस घटना की रिकार्डिंग प्रसारित की। बाद में राष्ट्रीय चैनलों ने भी दिखाया। देशभर में यह घटना यू-ट्यूब के माध्यम से चर्चा का विषय बनी। खूब निन्दा हुई। इस घटना में चैनल न्यूज लाइव के एक रिपोर्टर का नाम सामने आया। सामाजिक कार्यकर्ता अखिल गोगोई ने आरोप लगाया था कि इस रिपोर्टर ने एक्सक्लूसिव वीडियो शूट करने के लिए भीड़ को उकसाया, जिसके परिणामस्वरूप लड़की को बेइज्जत किया गया। हालांकि ऐसी घटनाओं में रिपोर्टर से ज्यादा चैनल दोषी होते हैं, जो टी.आर.पी. के लिए रिपोर्टरों पर दबाव बनाते हैं। लेकिन उस वक्त चौतरफा निन्दा के चलते चैनल ने रिपोर्टर को हटा दिया और ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बी.इ.ए.) ने भी मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की। साल भर बाद मामला ठंडा पड़ गया और चैनल ने आरोपी रिपोर्टर को फिर काम पर रख लिया। मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के अनुसार- 'बी.इ.ए. ने अपना नाम चमकाने और न्यूज चैनल को लोगों के गुस्से से दूर रखने के अलावा किसी दूसरे उद्देश्य से इस कमेटी का गठन नहीं किया था। यह बात अब लगभग साल भर बाद स्पष्ट हो गई है।'
फेसबुक बनाम रिपलन
ट्विटर और फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग का इस्तेमाल दुनिया में करोड़ों लोग करते हैं। लोकप्रियता के मामले में आज इनके सामने कोई दूसरी नेटवर्किंग साइट नहीं है। लेकिन 'रिपलन' का दावा है कि वह शीघ्र ही फेसबुक व ट्विटर जैसी साइट्स को पछाडऩे वाली है।
'रिपलन' की लांचिंग अमरीका के लॉस वेगास में 4 अगस्त को होने जा रही है। इंटरनेट मीडिया तकनीक के विशेषज्ञ क्रिस थॉमस के अनुसार इस साइट की खासियत यह है कि यह एक ओर फेसबुक की सभी सुविधाएं उपलब्ध कराएगी, वहीं 'एमेजोन' की तरह यूजर्स को सभी ब्रांडेड कंपनियों से भी जोड़े रखेगी। इस साइट की मदद से ऑनलाइन बिलों का भुगतान भी हो सकेगा। कंपनी का दावा तो यहां तक है कि इसके लांच होते ही विश्व के मीडिया का स्वरूप ही बदल जाएगा। 'रिपलन' ही नहीं, हरेक कंपनी लांचिंग से पहले बड़े-बड़े दावे करती ही है, उन्हें पूरा कितना कर पाती है, यह बाद में ही पता चलता है।

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साइबर, सिनेमा और मीडिया

साइबर अश्लील साहित्य पर रोक लगाने को लेकर सुझाव मांगे गए हैं। बच्चों के लिए तो ऐसा तंत्र बनाना ही होगा, जो उन्हें ऐसे अश्लील साहित्य से रोक सके। कुछ देश ऐसा कर भी रहे हैं। लेकिन महत्त्वपूर्ण यह है कि इस समस्या का समग्र समाधान होना चाहिए। केवल साइबर साहित्य पर रोक लगाकर बच्चों व युवाओं को 'पथभ्रष्ट' होने से नहीं रोका जा सकता।

देश के प्रमुख अखबारों में राज्य सभा सचिवालय की ओर से एक विज्ञापन छपा है। इसमें साइबर अश्लील साहित्य पर रोक लगाने सम्बन्धी एक याचिका पर लोगों के लिखित सुझाव व टिप्पणियां आदि आमंत्रित की गई हैं। राज्य सभा सांसद भगत सिंह कोश्यारी की अध्यक्षता में गठित समिति इस याचिका पर विचार कर रही है।
जैनाचार्य विजयरत्नासुन्दर सुरिजी और राज्य सभा सांसद विजय दर्डा की याचिका में कहा गया है कि भारत की दो-तिहाई जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु वाले व्यक्तियों की है। हमारी जनसंख्या का यह बड़ा हिस्सा, जो हमारे राष्ट्र की भविष्य की आशा है, वह साइबर अश्लील साहित्य के माध्यम से पथभ्रष्ट, विकृत और भ्रमित हो रहा है। याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि साइबर अश्लील साहित्य से किशोरों यहां तक कि वयस्कों पर भी अत्यन्त दुष्प्रभाव पड़ रहा है, जिससे मानसिक-शारीरिक प्रकृति की कई प्रकार की समस्याएं, यौन रोग, लैंगिक विकृतियां इत्यादि उत्पन्न हो रही हैं। इससे बच्चों के यौन शोषण के मामलों में भी वृद्धि हो रही है। आजकल कम्प्यूटर और टेलीविजन के अतिरिक्त मोबाइल फोन भी किशोरों के लिए इस प्रकार की अश्लील साइट्स देखने का एक आसान जरिया बन गए हैं। लिहाजा इन पर रोक लगाने के कदम उठाए जाएं।
याचिका में आई.टी. यानी सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम-2000 में संशोधन करने का आग्रह किया है ताकि कम्प्यूटर/मोबाइल पर अश्लील साहित्य को देखना एक ऐसा अपराध बनाया जा सके जिसके लिए ऐसी साइट्स के निर्माताओं, वितरकों और उसे देखने वालों के लिए कड़ी सजा का उपबंध हो।
इस याचिका का आशय स्पष्ट है, परन्तु निहित उद्देश्य अस्पष्ट है। इसमें साइबर साहित्य से बच्चों व युवाओं पर पडऩे वाले कुप्रभावों पर जो चिन्ता जाहिर की गई है वह एकांगी और अपूर्ण है। इसलिए बड़ा सवाल यह है कि याचिका से क्या हासिल होगा। मान लें राज्य सभा की याचिका समिति ने साइबर अश्लील साहित्य पर रोक लगाने की अनुशंसा कर दी तो क्या केन्द्र सरकार रोक लगा पाएगी? और मान लें कि केन्द्र सरकार ने रोक लगा दी तो क्या अकेले साइबर साहित्य पर रोक पर्याप्त होगी? अगर अश्लील साहित्य देश में किसी भी माध्यम से सुलभ है तो कोई उससे कैसे बच सकता है। सिनेमा, टीवी और मीडिया भी मौजूदा दौर में अश्लीलता के लिए काफी हद तक जिम्मेदार ठहराए जा रहे हैं। इसमें दो राय नहीं कि इनकी पोर्न साइट्स से तुलना नहीं की जा सकती। लेकिन बच्चों और किशोरों के कच्चे मन पर कई बार इनके कुप्रभाव भी सामने आए हैं। देश में इनकी पहुंच साइबर संसार से ज्यादा व्यापक है। ये माध्यम अलग-अलग कानून और आचार-संहिताओं के दायरे में आते हैं। ऐसे में अकेले सूचना प्रौद्योगिकी कानून-2000 में संशोधन से क्या होगा।
हाल ही में12 जुलाई को केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पोर्न साइट्स को लेकर जो दलील दी है उससे तो साफ है कि वह इन पर रोक लगाने में सक्षम ही नहीं है। इससे पहले सरकार ने 13 जून को जिन 39 वेबसाइट्स को प्रतिबंधित किया था वे ही नहीं रोकी जा सकी तो ऐसी सैकड़ों साइट्स को सरकार कैसे रोक पाएगी। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बाकायदा शपथ-पत्र पेश कर कहा कि सभी विदेशी पोर्न साइट्स पर रोक लगाना संभव नहीं है, क्योंकि इन पर सरकार का नियंत्रण नहीं है। ये ज्यादातर अमरीका या अन्य देशों से संचालित होती हैं। अमरीकी साइट्स 18 यूएससी 2257 के तहत संचालित है। इसका मतलब यह नहीं कि अश्लील साइट्स पर रोक नहीं लगानी चाहिए। खासकर, बच्चों के लिए तो ऐसा तंत्र बनाना ही होगा, जो उन्हें रोक सके। कुछ देश ऐसा कर भी रहे हैं। लेकिन महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि इस समस्या का समग्र समाधान होना चाहिए। केवल साइबर साहित्य पर रोक लगाकर बच्चों व युवाओं को 'पथभ्रष्ट' होने से नहीं रोका जा सकता।
बर्दाश्त नहीं आलोचना
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं—मीडिया की तो कतई नहीं। आपको याद होगा कार्टून मसले पर दो प्रोफेसरों की गिरफ्तारी की जब देश भर के मीडिया में आलोचना हुई तो उन्होंने धमकी दे डाली कि पश्चिम बंगाल में वे सरकारी टीवी चैनल चालू करेंगी। फिर उन्होंने अखबारों पर गुस्सा निकाला। उन्होंने प. बंगाल के सभी सरकारी तथा सरकार की मदद से चलने वाले पुस्तकालयों में उन अखबारों पर रोक लगा दी, जो उनकी आलोचना करते थे। इन पुस्तकालयों को सिर्फ वे अखबार ही खरीदने की छूट है, जिनके नाम सरकार ने तय कर रखे हैं। इनमें हिन्दी का एक भी अखबार नहीं है। तेरह अखबारों की सरकारी सूची में ज्यादातर उन अल्पज्ञात अखबारों के नाम हैं जो 'दीदी' के गुणगान के लिए जाने जाते हैं।
पिछले साल जब सरकार का यह फैसला आया तो अधिवक्ता वासवी रायचौधरी ने हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर सरकार के फैसले को अनैतिक और द्वेषपूर्ण बताया। उन्होंने इस फैसले को खारिज करने की मांग की, जिस पर गत दिनों सुनवाई करते हुए कोलकाता हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के आदेश को संशोधित करने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि लोकप्रिय और बहु-प्रसारित अखबारों को पुस्तकालयों में रखने की निषेधाज्ञा को तुरन्त खत्म कर दिया जाए। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को 17 जुलाई तक का समय दिया है। और साथ ही चेताया भी है कि अगर सरकार ऐसा स्वयं नहीं करती तो हाईकोर्ट की ओर से समुचित व्यवस्था की जाएगी।
अब देखना है कि सरकार अपना अडिय़ल रवैया छोड़कर बाकी अखबारों के पढऩे के पाठकों के अधिकार की बहाली करती है कि नहीं।
विज्ञापन बनाम खबर
विज्ञापन के बदले खबर छापने या प्रसारित करने के आरोप मीडिया पर अक्सर लगाए जाते हैं। यह उदाहरण रंगे हाथ पकड़े जाने का है। लखनऊ के एक हिन्दी दैनिक ने चार कॉलम में खबर छापी— 'डीएवी कैंट एरिया के छात्रों ने लहराया परचम'। कई छात्रों के फोटो भी थे। खबर के बीच में रंगीन बॉक्स में लिखा— 'डीएवी स्कूल अपना विज्ञापनदाता है। इस कारण कृपया इस खबर को रंगीन पेज पर सभी फोटो के साथ जगह देने की कोशिश करें...' दरअसल, ये पंक्तियां किसी सीनियर द्वारा दिया गया ऐहतियाती निर्देश था, जो कंपोज होकर हूबहू अखबार में छपा गया और पाठकों के हाथ में भी पहुंच गया।

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संवेदनहीन मीडिया!

उत्तराखंड में विभीषिका के दौरान टीवी चैनलों की रिपोर्टिंग के दृश्य एक तटस्थ दर्शक के मन में करुणा कम खीझ ज्यादा पैदा करते थे। पर यह तो कहना ही होगा कि मीडिया की रिपोर्टिंग ने सोई हुई सरकार को जगाया।  वरना पीडि़तों के लिए जितना-कुछ हुआ, वह भी शायद नहीं हो पाता। लापता लोगों की खोज-में मीडिया की भूमिका सरकार से ज्यादा नजर आती है।


उत्तराखंड में बाढ़ की विभीषिका के दौरान मीडिया कवरेज, खासकर टीवी चैनलों की रिपोर्टिंग को लेकर काफी आलोचनाएं हुईं। जिस वक्त सबसे ज्यादा आवश्यकता पीडि़तों की जान बचाना थी, उस वक्त टीवी रिपोर्टर कैमरामैन के साथ उन हेलीकॉप्टरों से जा पहुंचे, जो पीडि़तों की मदद के लिए गए थे। हेलीकॉप्टर बहुत कम थे और पीडि़त बहुत ज्यादा। हेलीकॉप्टर की एक-एक सीट बेशकीमती थी। इतनी जितना कि जीवन। मानव जीवन से ज्यादा तरजीह मीडिया रिपोर्टिंग को नहीं दी जा सकती। लेकिन रिपोर्टरों की संवेदनहीनता देखिए, रुंआसे, बदहवास लोगों से हेलीकॉप्टर में ही 'इंटरव्यू' किये जा रहे थे। हेलीकॉप्टर से बाहर भी उनका रवैया यही था। जान के लाले पड़े थे और रिपोर्टर माइक लेकर पीडि़तों के सामने सवालों की झाड़ी लगा रहे थे। अपनी रिपोर्टिंग को ज्यादा से ज्यादा भावनात्मक 'टच' देने की जुगत में वे एक-दूसरे को पछाडऩे में जुटे थे। मीलों पैदल चल कर आ रहे और दर्द से कराहते बुजुर्ग हों या रोती-बिलखती महिलाएं, यहां तक कि मासूम बच्चे भी—सभी के सामने रिपोर्टर का माइक अचानक प्रलय की तरह प्रकट हो जाता था। ऐसे दृश्य एक तटस्थ दर्शक के मन में करुणा कम खीझा ज्यादा पैदा करते थे।
राष्ट्रीय कहे जाने वाले चैनलों का यह हाल था, तो दूसरे चैनल कहां पीछे रहते! वे भी 'सबसे पहले' की होड़ में लगे थे। शिकार हुआ एक सामान्य रिपोर्टर। बेचारे नारायण वरगाही को बड़ी आलोचना झोलनी पड़ी। न्यूज एक्सप्रेस चैनल का यह संवाददाता एक बाढ़ पीडि़त ग्रामीण के कंधे पर ही जा चढ़ा और बाढ़ में डूबे गांव का आंखों देखा हाल बयान करने लगा। किसी ने इसकी रिकॉर्डिंग तुरंत फेसबुक पर डाल दी। सोशल मीडिया में रिपोर्टर व चैनल की जबरदस्त निन्दा हुई। चैनल ने रिकॉर्डिंग प्रसारित तो नहीं की, लेकिन रिपोर्टर की नौकरी जरूर छीन ली। वरगाही और उन बड़े चैनलों के रिपोर्टरों में कोई खास फर्क नहीं था, जिन्होंने पीडि़तों का हक मारकर हेलीकॉप्टरों में यात्राएं कीं।
मीडिया विशेषज्ञों का मानना है कि दरअसल, मीडिया के पास ऐसी भीषण आपदाओं की कवरेज के लिए कोई मानक कार्य-प्रणाली नहीं थी, जिसके चलते शुरू में उत्तराखंड की रिपोर्टिंग में अफरा-तफरी दिखाई दी। भविष्य में ऐसी गलतियां न दोहराई जाएं, इसके लिए न्यूज चैनलों के संपादकों की संस्था बी.ई.ए. (ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन) ने पांच सदस्यों की एक समिति गठित की है। यह समिति इस तरह की घटनाओं की कवरेज के लिए एक एस.ओ.पी. (स्टैण्डर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) तैयार करेगी, जो न सिर्फ रिपोर्टरों के लिए, बल्कि डेस्क पर काम करने वालों के लिए भी दिशा-निर्देश का काम करेगी। एस.ओ.पी. में यह बताया जाएगा कि पीडि़तों को देखते ही उन पर टूट न पड़ें और न ही पीडि़तों की नुमाइश लगाई जाए। जरूरत पडऩे पर उनकी मदद भी की जाए।
बी.ई.ए. ने यह समिति वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी की अध्यक्षता में गठित की है। इस समिति में 'टाइम्स नाउ' के मुख्य संपादक अर्णब गोस्वामी, इंडिया टीवी के प्रबंध संपादक विनोद कापड़ी, 'सी.एन.एन.-आई.बी.एन' के प्रबंधक संपादक विनय तिवारी तथा 'आज तक' की प्रबंध संपादक सुप्रिया प्रसाद शामिल किए गए हैं। जिस उद्देश्य को लेकर यह एस.ओ.पी. तैयार की जा रही है, उसमें शायद ही किसी को संदेह हो, लेकिन सवाल यह है कि इसका पालन कौन करेगा। एक-दूसरे को पछाडऩे की टीवी चैनलों की अंधी होड़ में बी.ई.ए. के दिशा-निर्देश कितने टिक पाएंगे इसमें संदेह है। बी.ई.ए. के दिशा-निर्देशों का अक्सर न्यूज चैनल उल्लंघन करते रहे हैं। लेकिन कुछ नहीं होता। सवाल यह भी है कि मीडिया-कर्मियों से जिस संवेदनशीलता की उम्मीद आचरण और व्यवहार में की जाती हो, उसके लिए एस.ओ.पी. की क्या जरूरत है। यह तो अलिखित और स्वत: स्फूर्त होनी चाहिए। अगर इसके लिए भी समिति की जरूरत पड़े तो पत्रकारिता-कर्म पर ही सवाल उठ खड़े होंगे। बहरहाल, यह कहना ही होगा कि मीडिया की दिन-रात की रिपोर्टिंग ने सोई हुई सरकार को जगाया। वरना पीडि़तों के लिए 15 दिन गुजरने के बाद भी जितना-कुछ हुआ, वह शायद नहीं हो पाता। बिछुड़े हुए पीडि़तों को परिजनों से मिलवाने और लापता लोगों की खोज-खबर में आज भी सरकार से ज्यादा मीडिया की भूमिका नजर आती है।
न खंडन न मंडन
उत्तराखंड में फंसे 15 हजार गुजरातियों को नरेन्द्र मोदी द्वारा बचा कर घर भेजने की खबर पर काफी बवेला मचा था। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने अनभिज्ञता जाहिर की कि यह खबर मीडिया में आई कहां से। यानी उन्होंने इसे मीडिया की गढ़ी हुई खबर बताकर ठंडे पानी के छींटे डालने की कोशिश की। लेकिन मीडिया ने उनकी यह कोशिश कामयाब नहीं होने दी। 'हिन्दू' ने अपने पहले पन्ने पर स्टोरी प्रकाशित की जिसमें उसने 'टाइम्स ऑफ इंडिया' के पत्रकार आनंद सूंडास का इंटरव्यू लिया था। आनंद सूंडास ने दावा किया कि 15 हजार गुजरातियों को बचाने का समाचार हल्दवानी में भाजपा प्रवक्ता अनिल बलूनी ने किया था। जिस वक्त भाजपा प्रवक्ता से बातचीत की गई उस दौरान उत्तराखंड भाजपा के अध्यक्ष तीरथसिंह रावत भी मौजूद थे। यह खबर सबसे पहले 23 जून को 'टाइम्स ऑफ इंडिया' में प्रकाशित हुई। बाद में यह खबर सभी प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने प्रकाशित व प्रसारित की। दो दिन में 15 हजार लोगों को बचाकर उन्हें घर पहुंचाने का समाचार जिसने भी सुना उसे विश्वास नहीं हुआ। क्योंकि जिन परिस्थितियों में लोग फंसे थे, उन्हें केवल हेलीकॉप्टर से ही लाया जा सकता था। और मोदी अपने साथ सिर्फ 4 हेलीकॉप्टर लेकर गए थे। 'हिन्दू' की खबर का पार्टी ने अभी तक न तो खंडन किया है और न ही समर्थन।
मनमानी तो नहीं!
हाल ही में जांच के दौरान मानकों पर खरे नहीं पाए जाने पर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने 61 टीवी चैनलों के लाइसेंस रद्द कर दिए। ये कौन से टीवी चैनल हैं तथा इन चैनलों ने किन मानकों का उल्लंघन किया, यह स्पष्ट नहीं किया गया है। चैनलों की जिस तरह बाढ़ आई हुई है, उसमें मानकों का उल्लंघन आश्चर्यजनक नहीं। लेकिन जांच के नाम पर सरकारी अफसरों की मनमानी भी नहीं चलनी चाहिए।
सरकार को यह देखने की जरूरत है कि जिन चैनलों के लाइसेंस रद्द किए गए उनमें क्या खामियां थीं। छोटी-मोटी कमियां बताकर उन्हें फिजूल तंग तो नहीं किया जा रहा था। आखिरकार यह अभिव्यक्ति का क्षेत्र है, कोई फैक्ट्री-कारखाना नहीं। गौरतलब है, 61 टीवी चैनलों के लाइसेंस रद्द होने के बाद अब भी 816 चैनल काम कर रहे हैं, इनमें से 398 समाचार चैनल हैं।

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आर.टी.आई से डर क्यों?

 दूसरों से पारदर्शिता की अपेक्षा करने वाले हमारे राजनीतिक दल खुद पारदर्शी नहीं होना चाहते। यही वजह है कि केन्द्रीय सूचना आयोग के फैसले के बाद राजनीतिक दलों में खलबली मची हुई है। जिस संसद ने देश को सूचना का अधिकार दिया, उसी संसद में बैठने वाले और उनके दल सारे मतभेद भुलाकर एक राय हैं कि राजनीतिक दल इस कानून के दायरे में नहीं आते।

अगर आप अपनी आमदनी और खर्च लोगों से छिपाते हैं तो तय मानिए आप कुछ न कुछ गड़बड़ी कर रहे हैं। खासकर, तब जब आप सार्वजनिक जीवन में कार्य कर रहे हों। यही बात राजनीतिक दलों पर भी लागू होती है। बल्कि उन पर तो सबसे पहले लागू होती हैं—क्योंकि वे देश चला रहे हैं। लेकिन विसंगति देखिए, दूसरों से पारदर्शिता की अपेक्षा करने वाले हमारे राजनीतिक दल खुद पारदर्शी नहीं होना चाहते। यही वजह है कि केन्द्रीय सूचना आयोग के फैसले के बाद राजनीतिक दलों में खलबली मची हुई है। जिस संसद ने देश को सूचना का अधिकार दिया, उसी संसद में बैठने वाले और उनके दल सारे मतभेद भुलाकर एक राय हैं कि राजनीतिक दल इस कानून के दायरे में नहीं आते।
देश के दो सबसे बड़े राजनीतिक दलों—कांग्रेस और भाजपा—से पार्टी फंड में मिले चंदे और खर्च की जानकारी मांगी गई थी। एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्म के अनिल वैरवाल व आर.टी.आई. कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल ने सूचना के अधिकार कानून के तहत इन दलों से जानकारियां चाही थीं। लेकिन दोनों दलों ने इनकार कर दिया। मामला सूचना आयोग के पास गया और आखिरकार इस माह आयोग ने ऐतिहासिक फैसला दिया कि छह सप्ताह के भीतर राजनीतिक दल याचिकाकर्ताओं को चंदे से लेकर खर्च तक सारी जानकारियां दें। आयोग ने इन दलों का यह तर्क स्वीकार नहीं किया कि वे आर.टी.आई. कानून के दायरे में नहीं आते। आयोग के अनुसार राजनीतिक दल सरकार से सहयोग लेते हैं। प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष उन्हें कई तरह की छूट मिलती है, जो एक तरह से फंड लेने जैसा कार्य है। जैसे आय पर करों की छूट, पॉश इलाकों में सरकारी बंगले, रियायती दरों में भूखंड आवंटन आदि। लिहाजा राजनीतिक दल आर.टी.आई. की धारा २ (एच) के तहत आते हैं। आयोग ने छह राष्ट्रीय दलों—कांग्रेस, भाजपा, माकपा, भाकपा, राकांपा और बसपा—को तय समय-सीमा में सारी जानकारियां देने का आदेश दिया है।
इस आदेश के बाद राजनीतिक दल बौखलाए हुए हैं। यह उनकी प्रतिक्रियाओं से जाहिर है। विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा— 'आर.टी.आई. सूचना प्राप्त करने के लिए है। इसके जरिए किसी को उत्पात मचाने नहीं दिया जाएगा।' जनता दल (यू) की प्रतिक्रिया आई— 'राजनीतिक दल कोई परचूनी की दुकान नहीं। हम इस फैसले का विरोध करते हैं।' भाजपा के प्रकाश जावडेकर— 'जब चुनाव आयोग पार्टियों के खातों की जांच कर सकता है, तो अब सूचना आयोग क्या नया जोडऩा चाहता है।' लगभग सभी पार्टियों के सुर एक से हैं। किसी ने इस फैसले का स्वागत नहीं किया। केवल 'आप' को छोड़कर। लेकिन 'आप' अभी चुनाव मैदान में उतरे नहीं हैं। इसलिए उसकी प्रतिबद्धता का परीक्षण बाकी है। सवाल यह है कि राजनीतिक दल आर.टी.आई. से क्यों डरते हैं। अगर वे यह मानते हैं कि वे अपनी आमदनी और खर्च का पूरा ब्यौरा चुनाव आयोग और आयकर विभाग को देते रहे हैं, तो आर.टी.आई. के तहत भी देने में क्या हर्ज है? पारदर्शिता की खातिर एक तीसरी संस्था और सही। सवाल यह भी कि क्या राजनीतिक दल चंदे से मिली राशि का सम्पूर्ण ब्यौरा चुनाव आयोग को देते हैं? आंकड़ों से ही सिद्ध है कि दल केवल २० फीसदी राशि का ही ब्यौरा देते हैं। ८० फीसदी राशि किस स्रोत से आई, इस पर सारे राजनीतिक दल मौन हैं। नियमानुसार २० हजार रु. से अधिक चंदा देने वालों का नाम बताना जरूरी है। क्या कोई भरोसा करेगा कि करोड़ों रुपए की चंदा वसूली में २० हजार रु. से अधिक देने वालों का योगदान सिर्फ २० फीसदी है? आंकड़ों की बात बाद में। पहले राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाओं को देखें। सूचना के अधिकार के तहत देश में अब तक लाखों सूचनाएं दी गई हैं, क्या एक भी उदाहरण ऐसा है जिससे 'उत्पात' मच गया हो? विदेश मंत्री किस उत्पात की बात कर रहे हैं। जिस जनता ने आपको चुना, उसे ही जानकारी देने से उत्पात मचेगा या जानकारी छिपाने से? और फिर ऐसी क्या जानकारियां हैं जो लोगों से आप छिपाना चाहते हैं? जाहिर न करने वाली जानकारियां और सूचनाओं को तो आर.टी.आई. कानून के तहत पहले ही परिभाषित कर दिया गया है।
इसी तरह देश में अब तक सैकड़ों सरकारी विभागों ने आर.टी.आई. कानून के तहत पारदर्शिता और जनहित में लोगों को सूचनाएं उपलब्ध कराई हैं, क्या वे सब परचूनी की दुकान हैं? संसद में पारित एक कानून के प्रति किसी राष्ट्रीय दल की ऐसी अवमाननापूर्ण प्रतिक्रिया सचमुच शर्मनाक है।
राजधानी दिल्ली के पॉश इलाके की प्रमुख प्रॉपर्टियों में बड़े राजनीतिक दलों के विशाल दफ्तर हैं। चुनाव आयोग को दी गई सूचनाओं के अनुसार इन बड़े और भव्य बंगलों का मासिक किराया देखिए—२४ अकबर रोड पर कांग्रेस का दफ्तर, किराया ४२ हजार रु.। कांग्रेस के पास तीन दफ्तर और हैं। २६ अकबर रोड का किराया ३ हजार रु.। ५ रायसेना रोड का किराया ३४ हजार रु.। चाणक्यपुरी का किराया सिर्फ ८ हजार रु. प्रतिमाह। अशोक रोड पर भाजपा के विशाल दफ्तर का किराया ६६ हजार रु. मासिक। भाजपा के ही पंत मार्ग के दफ्तर का किराया सिर्फ १५ हजार रु.। एन.सी.पी. का डॉ. बी.डी. मार्ग के दफ्तर का किराया सिर्फ १३०० रु.। बसपा का जी.आर.जी. रोड के दफ्तर का किराया सिर्फ १३०० रु.। तीन मूर्तिलेन में माकपा दफ्तर का किराया सिर्फ १५०० रु.। कहने की जरूरत नहीं, इन बंगलों का मौजूदा किराया लाखों रु. मासिक बैठता है। इसी तरह दिल्ली में कांग्रेस को सरकार की ओर से दो भूखंड दिए गए हैं जिनका बाजार मूल्य इस समय करीब १ हजार करोड़ रु. तथा भाजपा को दिए गए दो भूखंडों का बाजार मूल्य करीब ५५० करोड़ रु. है। सरकार से आयकर छूट के वर्ष २००६-२००९ के आंकड़े देखें कांग्रेस, ३००.९२ करोड़। भाजपा, १४१.२५ करोड़। बसपा, ३९.८४ करोड़ रु.। हिसार के एक आर.टी.आई. कार्यकर्ता रमेश वर्मा के आवेदन पर मिली जानकारी के अनुसार २००७ से २०१२ के दौरान देश की दस प्रमुख पार्टियों की करमुक्त आय २,४९० करोड़ रु. थी। इसमें कांग्रेस की १,३८५.३६ करोड़ तथा भाजपा की ६८२ करोड़ रु. आय शामिल है।
इन आंकड़ों के तथ्य और सत्य हमें बहुत कुछ कह देते हैं। इन सूचनाओं से कभी कोई 'उत्पात' नहीं मचा। न ही ये सूचनाएं किसी 'परचूनी की दुकान' से आई थी। राजनीतिक दलों को यह अच्छी तरह समझा लेना चाहिए कि अगर वे सार्वजनिक जीवन में 'साफ-सफाई', 'शुचिता-स्वच्छता' के प्रति सचमुच कटिबद्ध हैं, तो उन्हें पारदर्शी होना ही पड़ेगा। 'पारदर्शिता' कोई रोग नहीं है, बल्कि रोग की दवाई है। अगर यह कड़वी भी है, तो रोगमुक्त होने के लिए पीनी पड़ेगी। राजनीतिक दलों को खुद आगे बढ़कर पहल करनी चाहिए। राजनीतिक दल ही क्यों, वे सभी संस्थान, इकाइयां, एनजीओ ट्रेड यूनियन जो सरकार से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष चंदा प्राप्त करती हैं उन्हें आर.टी.आई. के दायरे में आना चाहिए। अभी देखना यह है कि सूचना आयोग के फैसले के खिलाफ राजनीतिक दल हाईकोर्ट में जाते हैं या नहीं।

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और अब 'स्लो न्यूज!'

तेज खबर पहुंचाने की दौड़ में हर चैनल नंबर वन रहने को आमादा है। कई चैनल इन शब्दों को ब्रह्म वाक्य की तरह इस्तेमाल करते हैं— 'सबसे आगे', 'सबसे पहले' या 'सबसे तेज।' इस 'तेजस्विता' के चलते खबर की गुणवत्ता खतरे में है। ऐसे में मीडिया विशेषज्ञों की चिन्ता स्वाभाविक है। 'स्लो न्यूज' की अवधारणा संभवत: इन्हीं परिस्थितियों की उपज है।


खबरों की दुनिया में एक नया विचार सामने आया है, वह है— 'स्लो न्यूज।' 'स्लो न्यूज' का शाब्दिक अर्थ तो आप जानते होंगे, लेकिन वास्तविक अर्थ केवल 'धीमा समाचार' नहीं है। जैसे 'फास्ट फूड' के विरोध में 'स्लो फूड' आन्दोलन उभरा, वैसे ही 'फास्ट न्यूज' से हो रहे दूरगामी नुकसान की प्रतिक्रिया में 'स्लो न्यूज' के विचार ने जन्म लिया है। इसके प्रणेता टोरेन्टो विश्वविद्यालय के पत्रकारिता कार्यक्रम के निदेशक जेफ्रे ड्वोरकिन हैं।
आप जानते हैं, अखबार हों या न्यूज चैनल—खबरों को लेकर एक-दूसरे को पीछे छोडऩे की होड़ सदा मची रहती है। न्यूज चैनलों के बीच तो गलाकाट प्रतिस्पर्धा चलती है। कौन सबसे तेज यानी सबसे पहले 'ब्रेकिंग न्यूज' की पट्टी चलाता है, मानो यही सर्वोपरि है। किसी चैनल ने कोई बड़ी घटना की खबर सबसे पहले 'ब्रेक' कर दी तो वह दिन भर ढोल पीटता है— 'सबसे पहले हमने दी दर्शकों को जानकारी।' सबसे तेज खबर पहुंचाने की दौड़ में हर चैनल नंबर वन रहने को आमादा है। शायद इसीलिए कई चैनल इन शब्दों को ब्रह्म वाक्य की तरह इस्तेमाल करते हैं— 'सबसे आगे', 'सबसे पहले' या 'सबसे तेज।' सबसे तेज की यह अंधी होड़ आप दुनिया भर के मीडिया संगठनों में देख सकते हैं। इस 'तेजस्विता' के चलते खबर की गुणवत्ता खतरे में है। हड़बड़ी में कई बार तथ्यहीन, असत्य या अपरिपक्व खबरें परोस दी जाती हैं। संभव है, बाद में उस खबर का परिमार्जन या संशोधन भी हो जाए, लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है। जो नुकसान होना था, वह हो चुका होता है। प्रिंट मीडिया की स्थिति थोड़ी बेहतर है, लेकिन खबरों की हड़बड़ी वहां पर भी कम नहीं है।
ऐसे में दुनिया भर में खबर की गुणवत्ता को लेकर मीडिया विशेषज्ञों की चिन्ता स्वाभाविक है। 'स्लो न्यूज' की अवधारणा संभवत: इन्हीं परिस्थितियों की उपज है।
गत दिनों 'आर्गेनाइजेशन ऑफ न्यूज ओम्बुड्समैन' (ओ.एन.ओ.) के लॉस एंजीलिस में हुए सम्मेलन में खबरों से जुड़े कई पहलुओं पर विचार किया गया। सम्मेलन में दुनिया भर में खबरों की गुणवत्ता को लेकर पेश आ रही गंभीर चुनौतियों पर चर्चा हुई। सम्मेलन में जेफ्रे ड्वोरकिन भी शामिल थे। जेफ्रे ड्वोरकिन का विचार है कि मीडिया संगठनों को 'स्लो न्यूज' की अवधारणा पर ध्यान देना चाहिए और इसे एक आन्दोलन का रूप दिया जाना चाहिए। क्योंकि आज हमें इसकी बहुत जरूरत है। वे कहते हैं कि मीडिया संगठनों को यह समझना जरूरी है कि उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता खबरों और सूचनाओं की लालसा रखने वाली जनता है। जेफ्रे मानते हैं कि मीडिया में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बुरी नहीं है, लेकिन मीडिया संगठनों की आपसी अंधी होड़ नुकसानदायक है। वे एक-दूसरे को यहां तक कि सोशल मीडिया को भी पीछे छोडऩे की दौड़ में फंसे हुए हैं। इस प्रतिस्पर्धा ने खबर की 'शुद्धता' के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को कुंद कर दिया है। हम मिलावटी खबरें परोसने लगे हैं। संवाददाताओं के पास आधुनिकतम उपकरण हैं, लेकिन हमारी रिपोर्टिंग महज तकनीक में तब्दील होकर रह गई है। हम खबर के साथ न्याय नहीं कर पा रहे हैं। बोस्टन और सैन्डी हुक के उदाहरण हमारे सामने हैं। जनता जान गई है कि विशुद्ध खबर तक कैसे पहुंचा जाए। जनता के पास सोशल मीडिया का विकल्प भी है। हम (मीडिया) जनता तक वे ही खबरें पहुंचाएं, जो वह चाहती हैं और जिसकी उसे जरूरत है। वे कहते हैं, 'स्लो न्यूज' का विचार अपनाएं। यह हमारे लिए बहुत मददगार तरीका है। हड़बड़ी में न रहें। सुव्यवस्थित और विशुद्ध खबर ही जनता को दें। उसकी आवश्यकताओं को समझों।
जेफ्रे ड्वोरकिन अंत में सवाल उठाते हैं— 'क्या मीडिया संगठन ऐसा करने को इच्छुक हैं?'
निश्चय ही जेफ्रे ड्वोरकिन ने महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है। खासकर, उस समय जब मीडिया संगठनों में एक-दूसरे को पछाडऩे की दौड़ चरम पर है। दबाव और तनाव के बीच कई बार परस्पर विरोधी और तथ्यहीन सूचनाएं प्रसारित हो जाती हैं। पाठक या दर्शक विभ्रम में फंस जाता है। यह स्थिति दीर्घकालिक तौर पर ठीक नहीं। क्योंकि इससे खबरों की विश्वसनीयता घटती चली जाएगी और अन्ततोगत्वा समाचार मीडिया का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।
बेशकीमती जिन्दगी
हमारे एक पाठक को 'पत्रिका' सहित कुछ मीडिया संगठनों के छत्तीसगढ़ में 25 मई की घटना को 'देश का सबसे बड़ा माओवादी हमला' लिखने पर ऐतराज है। भिलाई के सत्यप्रकाश दुबे के अनुसार जिसमें सबसे ज्यादा निर्दोष लोग मारे गए वही सबसे बड़ा माओवादी हमला कहा जाए। राजनीतिक आधार पर भेदभाव करना उचित नहीं। दुबे के अनुसार 28 मई, 2010 में प. बंगाल में मिदनापुर के झाारग्राम के पास माओवादियों ने रेलवे ट्रैक उड़ा दिया था, जिसमें 140 निर्दोष लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा था। घटना में रेल बोगी उड़ गई थी और लाशों के चिथड़े-चिथड़े बिखर गए थे। इस घटना से कोई 15 दिन पूर्व छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में माओवादियों ने एक यात्री बस को बारूदी सुरंग से उड़ा दिया था, जिसमें 40 निर्दोष लोग मारे गए। सीआरपीएफ के जवानों को नक्सली अपना दुश्मन मानते हैं। लेकिन संख्या का आंकड़ा देखें तो 6 अप्रेल, 2010में दंतेवाड़ा में ही माओवादियों ने जवानों पर सबसे बड़ा हमला बोलते हुए एक साथ 76 जवानों को भून डाला था। क्या ये घटनाएं हाल की नक्सली हमले से छोटी थी, जिसमें कुछ राजनेताओं सहित 28 लोग मारे गए। जीवन हर व्यक्ति का बेशकीमती है, जिसे छीनने का किसी दूसरे को हक नहीं। इसलिए इन्सानी जिन्दगी में विभेद उचित नहीं। हां, राजनेताओं पर हमला होने से पूरा तंत्र जरूर हिल गया है, जो अब तक निश्चेतप्राय: था।
खोजी पत्रकार चाहिए
वाशिंगटन स्थित इंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑफ इन्वेस्टीगेशन जर्नलिस्ट्स (आईसीआईजे) को दो खोजी पत्रकारों की जरूरत है जो अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर डाटा का विश्लेषण-अन्वेषण कर सके। इनमें एक सीनियर रिपोर्टर और दूसरे को कम-से-कम तीन वर्ष का पत्रकारीय अनुभव होना चाहिए। आईसीआईजे 60 से अधिक देशों के 160 खोजी पत्रकारों का अन्तरराष्ट्रीय समूह है। यह वही संगठन है जिसने पिछले दिनों काला धन विदेशों में छिपाने वाले देशों और लोगों के बारे में सनसनीखेज जानकारियां उजागर की थी। समूह का दावा है कि उसके पास जूलियन असांजे से भी कई गुणा ज्यादा गोपनीय दस्तावेज हैं तथा 170 देशों की सूची उसके पास है, जिन्होंने विदेशों में कंपनियों और ट्रस्टों के जरिए करोड़ों-अरबों रुपयों का निवेश और गोपनीय लेन-देन किया है।

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अभिव्यक्ति पर अंकुश की धारा

सोशल साइट्स पर आपत्तिजनक टिप्पणी मामले में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की इजाजत के बगैर किसी को गिरफ्तार न करने का मुद्दा चर्चा में है। दो राय नहीं, धारा 66-ए विवादित धारा है। समय की मांग है कि सूचना तकनीक कानून व्यावहारिक बने।  सुनिश्चित किया जाए कि संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को इस कानून से ठेस नहीं पहुंचे।

सुप्रीम कोर्ट ने 16 मई को एक फैसले में व्यवस्था दी कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की इजाजत के बगैर किसी को गिरफ्तार न किया जाए। जनभावनाओं के मद्देनजर केन्द्र सरकार ने गत 9 जनवरी को सूचना तकनीक कानून की विवादित धारा 66-ए को लेकर राज्यों को दिशा-निर्देश जारी किए थे। सुप्रीम कोर्ट ने एक तरह से उस पर मुहर ही लगाई है। इस कानून का कई राज्यों में दुरुपयोग हो चुका है। फेसबुक, ट्विटर आदि सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सामान्य असहमति दर्ज करने वाले कई नागरिकों को पुलिस पकड़कर जेल में डाल चुकी है। इसका सबसे शर्मनाक उदाहरण गत वर्ष नवम्बर में महाराष्ट्र के ठाणे शहर के पालघर पुलिस थाने में सामने आया।
आपको याद होगा, गत वर्ष 18 नवम्बर को शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के निधन पर बंद के खिलाफ फेसबुक पर टिप्पणी करने और उसे पसंद (लाइक) करने पर ठाणे की दो लड़कियों को गिरफ्तार किया गया था। शिव सैनिकों ने इन लड़कियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। उसके बाद आनन-फानन में रातोंरात सम्बंधित थाने का इन्सपेक्टर लड़कियों को गिरफ्तार कर थाने ले आया। पुलिस ने यह गिरफ्तारी सूचना तकनीक कानून की धारा 66-ए के तहत की थी। इस धारा के खिलाफ देश भर में आवाजें उठीं। अदालत में जमानत के बाद तीसरे दिन ये लड़कियां जेल से छूट पाईं। भारी आलोचना के बाद महाराष्ट्र सरकार की नींद खुली। लड़कियों के खिलाफ मामला बंद करना पड़ा। दो पुलिस अफसर निलंबित हुए। इस घटना के बाद ही केन्द्र सरकार ने राज्यों को दिशा-निर्देश जारी किए जिसके तहत कहा गया कि केवल पुलिस महानिरीक्षक और पुलिस अधीक्षक स्तर के अधिकारी ही इस धारा के तहत किसी की गिरफ्तारी के लिए अधिकृत होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने इसी की पुष्टि की है।
ध्यान देने की बात यह है कि शीर्ष अदालत ने अभी इस धारा की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर अपना कोई फैसला नहीं सुनाया है। यह मामला अभी लंबित है। धारा 66-ए का भविष्य इसी फैसले पर निर्भर है। ठाणे प्रकरण के बाद इस धारा को अदालत में चुनौती दी गई थी। दिल्ली विश्वविद्यालय में कानून की छात्रा श्रेया सिंघल की जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 30 नवम्बर 2012 को केन्द्र सरकार सहित महाराष्ट्र, प. बंगाल, दिल्ली और पुड्डुचेरी की सरकारों को नोटिस जारी किए थे। इन राज्यों में धारा 66-ए के दुरुपयोग की घटनाएं प्रकाश में आई थीं। ठाणे की घटना के कुछ अरसा पूर्व पुड्डुचेरी के रवि श्रीनिवासन को भी पुलिस घर से पकड़कर ले गई थी। रवि ने ट्विटर पर वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम के बेटे कार्ति चिदम्बरम और सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा के बारे में अपनी राय व्यक्त की थी। प. बंगाल में जाधवपुर विश्वविद्यालय के दो प्रोफेसरों को भी जेल की हवा खानी पड़ी, क्योंकि इनमें से एक ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर कार्टून बनाया था और दूसरे प्रोफेसर ने कार्टून अन्य लोगों को ई-मेल से भेजा था। मुम्बई में कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की गिरफ्तारी पर बवाल मचा। सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर व्यक्त अभिव्यक्तियों को जिस तरह दबाने की कोशिशें की गईं, उससे लोगों को लगा कि सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने पर तुली है। प्रिन्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी सरकार की इन कार्रवाइयों का कड़ा विरोध हुआ। परिणामस्वरूप आज केन्द्र सरकार भी स्वीकार कर रही है कि धारा 66-ए के तहत मिले अधिकारों का पुलिस व शासन ने दुरुपयोग ही किया है।
सुप्रीम कोर्ट की ताजा व्यवस्था इसी दृष्टिकोण को मजबूती देती है। पालघर थाने के निचले दर्जे के पुलिस कर्मचारी जिस तरह लड़कियों को पकड़कर थाने में ले आए, वह कतई उचित नहीं था। न्यायमूर्ति वी.एस. चौहान व न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की पीठ की इस व्यवस्था के बाद सबकी निगाहें मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर व जस्टिस जे. चेलमेश्वर की पीठ पर टिकी हैं, जो मुख्य मामले की सुनवाई कर रही है। श्रेया सिंघल ने जनहित याचिका में धारा 66-ए को निरस्त करने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि इस धारा से नागरिकों को मिले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का हनन हो रहा है। यह धारा संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन है। याचिका में शीर्ष अदालत से मांग की गई है कि पुलिस को दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 41 व156(1) में मिले गिरफ्तारी के अधिकार को अनुच्छेद 19 (1) यानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अनुकूल बनाया जाए।
धारा 66-ए की कई विसंगतियों और विरोधाभासों को लेकर कानूनविद् अपनी राय प्रकट कर चुके हैं। इसमें दो राय नहीं कि यह एक विवादित धारा है। सूचना तकनीक कानून वर्ष 2000 में बनाया गया था और 2008 में इसे संशोधित करते हुए धारा 66-ए जोड़ी गई थी। समय की मांग है सूचना तकनीक कानून को व्यावहारिक बनाया जाए। विवादित बिन्दुओं पर गौर किया जाए। कम-से-कम यह सुनिश्चित किया जाए कि संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को इस कानून से कोई ठेस नहीं पहुंचे।
'टैम' का पलटवार
टीवी के दर्शकों की संख्या का हिसाब-किताब रखने वाली एजेन्सी 'टैम' (टेलीविजन ऑडियंस मैजरमेंट) पर विवादों के बावजूद टीवी प्रसारण उद्योग आज भी इसी एजेन्सी पर निर्भर है। टैम मीडिया रिसर्च प्रा.लि. की मीडिया रेटिंग को लेकर जब-तब विवाद छिड़ते रहे हैं। एन.डी. टीवी और प्रसार भारती 'टैम' पर गलत आंकड़े देने का आरोप लगा चुके हैं। अब बारी 'टैम' की है। 'टैम' ने अपने द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों को गलत ढंग से पेश करने तथा स्वयं को नम्बर वन टीवी चैनल घोषित करने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने का मुद्दा उठाया है। 'टैम' के अनुसार खास अवसरों पर चैनलों की यह प्रवृत्ति अकसर सामने आती है। चुनावों के दौरान सारे चैनल स्वयं को नंबर वन बताने लगते हैं। 'टैम' ने इस प्रवृत्ति पर अंकुश के लिए एक स्टैंडर्ड मीडिया गाइड लाइन जारी की है। इसमें कहा गया है कि 'टैम' डाटा भारतीय टीवी दर्शकों के व्यवहार को अच्छी तरह समझता है। 'टैम' ने डाटा और आंकड़े जुटाने के तरीकों में काफी बदलाव किया है। अत: जब भी कोई चैनल अपनी पोजिशन का दावा करे तो वह साफ तौर पर समय, दिन और बाजार का भी उल्लेख करे ताकि लोगों को सही तथ्यों की जानकारी मिल सके। इतना ही नहीं 'टैम' ने अपनी टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग पाइन्ट्स) व्यवस्था में पारदर्शिता के लिए छह सदस्यीय पैनल का गठन भी किया है। 'टैम' की यह कवायद उसकी विवादित छवि को धोने में कितनी मददगार होगी, यह आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन अपने ऊपर होते टीवी चैनलों के हमलों का उसने माकूल जवाब देने की 'जुगत' जरूर कर ली है।

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कभी अति, कभी अनदेखी

दर्शकों-श्रोताओं से दूर जाकर कोई चैनल अपना अस्तित्व कायम नहीं रख सकता, लेकिन क्या यह सचमुच टीआरपी की अंधी दौड़ है या कुछ और भी? समाचार चैनलों का मौजूदा बर्ताव (या भटकाव!) कई सवाल खड़े करता है, लेकिन मीडिया को सबसे ऊपर उठकर देखने की जरूरत है खासकर, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को।

कई बार मीडिया समान महत्व के मुद्दों में से किसी एक को उछालकर बाकी मुद्दों से आंख फेर लेता है। मान लेता है कि अपना दायित्व पूरा हुआ। कई बार मीडिया कमतर मुद्दों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है, लेकिन जरूरी मुद्दों की अनदेखी कर जाता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में तो भेड़चाल साफ दिखाई पड़ती है। नरेन्द्र मोदी के भाषणों की सजीव प्रसारण की होड़ शुरू हुई, तो कोई चैनल पीछे रहना नहीं चाहता। जो चैनल मोदी को पानी पी-पी कर कोसते थे, वे भी इस होड़ में शामिल हो गए। टीआरपी के लिए सब जायज है। ठीक है, दर्शकों-श्रोताओं से दूर जाकर कोई चैनल अपना अस्तित्व कायम नहीं रख सकता, लेकिन क्या यह सचमुच टीआरपी की अंधी दौड़ है या कुछ और भी? समाचार चैनलों का मौजूदा बर्ताव (या भटकाव!) कई सवाल खड़े करता है। चुनाव नजदीक आ रहे हैं। राजनीतिक दलों के लिए उन मुद्दों को उछालना कोई नई बात नहीं है, जो उनके सियासी हितों को पूरे करते हों। जिन मुद्दों से सियासी हित नहीं सधते, ऐसे मुद्दे उनके लिए कोई मायने नहीं रखते हैं। लेकिन मीडिया को इससे ऊपर उठकर देखने की जरूरत है, खासकर, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को।
सरबजीत सिंह का ही मामला लें। ऐसा नहीं है कि अफजल गुरु को फांसी के बाद ही सरबजीत का मुद्दा उठा। समाचार चैनल काफी पहले से ही यह मुद्दा उठाते रहे हैं। सरबजीत की बहन दलजीत कौर के विस्तृत बयान, इंटरव्यू, परिजनों की प्रतिक्रियाएं आदि को लेकर चैनल भावुक कहानियां दिखाते रहे हैं। कई बार ऐसा भी देखा गया कि किसी एक चैनल ने बिना किसी संदर्भ या प्रसंग के सरबजीत के परिजनों से बातचीत कर ली, तो दूसरे चैनल भी शुरू हो गए। यह सही है कि सरबजीत का मामला हटकर है, लेकिन चैनलों में इस मुद्दे को लेकर जिस तरह विवेकहीन प्रतिस्पर्धा रही, उससे सरबजीत मानों दो देशों के बीच सम्बंधों के प्रतीक बन गए। इसीलिए सरबजीत की हत्या पर भारत में जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई। राजनेताओं ने इसी का फायदा उठाकर खूब बयान दिए। अपनी-अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश हुई। हर कोई मीडिया में बयान देकर मानो अपने को दर्ज करा देना चाहता हो। मीडिया के जरिए जो भावनात्मक उफान पैदा किया गया, उसका लाभ उठाने में कोई पीछे नहीं छूटा। पंजाब की अकाली सरकार ने तुरत-फुरत सरबजीत को शहीद का दर्जा दे डाला। ऊपर से तीन दिन का राजकीय शोक! राहुल गांधी का कभी कोई बयान नहीं आया था, वे भी सरबजीत के परिजनों को ढांढस बंधाने जा पहुंचे। अंत्येष्टि में शामिल होने के लिए भिखीविंड में होड़ मच गई। मीडिया के कैमरे इतने कि आंखें चौंधिया जाएं। हर कोई शवयात्रा को 'लाइव' बनाने में जुट गया।
पाकिस्तान में पहले भी ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं। थोड़े दिन पहले ही लाहौर की उसी कोट लखपत जेल में चमेल सिंह को कैदियों ने मार डाला, जहां सरबजीत पर हमला किया गया था। लेकिन चमेल सिंह के लिए किसी ने दो आंसू भी नहीं बहाये। कम-से-कम ऐसा ज्वार तो बिल्कुल नहीं उठा, जो सरबजीत के मामले में हुआ। क्या इसलिए कि मीडिया ने चमेल सिंह के मुद्दे को उछाला नहीं? या फिर इसलिए कि चमेल सिंह का मामला किसी राजनीतिक दल का हित नहीं साधता था? भारत के कितने कैदियों के साथ पाकिस्तान में क्या बर्ताव हो रहा है, किसी चैनल ने जानने की कोशिश नहीं की। कोट लखपत जेल में ही बंद 20 भारतीय कैदी तो ऐसे हैं, जो मानसिक रूप से बीमार हो चुके हैं। पकड़े जाते वक्त ये लोग बिल्कुल स्वस्थ थे। लेकिन जेल में इनके साथ हुए बर्ताव ने इन्हें लगभग पागल होने की कगार पर पहुंचा दिया। इनके साथ क्या बदसलूकी और उत्पीडऩ हुआ होगा, इसका अंदाजा ही लगाया जा सकता है। सारे मानवाधिकारी मौन हैं।
दोनों देशों के बंदियों के लिए बनी भारत-पाकिस्तान न्यायिक समिति ने हाल ही पाकिस्तान दौरे में पाया कि कराची, रावलपिंडी और लाहौर में बंद 535 कैदियों में से 469 को तो नियमानुसार भारतीय दूतावास के अधिकारियों से मिलने तक नहीं दिया गया। गौरतलब है कि इनमें 483 गरीब मछुआरे हैं, जो मछली पकड़ते वक्त अनजाने में सीमा पार कर गए। समुद्र में सीमा का भ्रम हो ही जाता है। रोजी-रोटी की तलाश में गए अक्सर दोनों देशों के मछुआरे पकड़े जाते हैं। उन्हें छोड़ा भी जाता है। लेकिन पाकिस्तानी जेलों का जो हाल है, उसमें थोड़े समय में ही बंदी के साथ जो बर्ताव होता है, वह असहनीय है। भारत सरकार के विदेश मामलों के मंत्रालय के अनुसार पाकिस्तान की जेलों में 1,184 भारतीय बंदी हैं। इन्हें मुक्त कराने में केन्द्र सरकार क्या कर रही है तथा इन बंदियों का पाकिस्तान में क्या हाल है, यह जानना भी जरूरी है। लेकिन इनके परिजनों की व्यथा मीडिया में अक्सर स्थानीय विवरणों में गुम होकर रह जाती है।
इतना ही नहीं, सबसे दुखद मुद्दा तो उन 53 सैन्य कर्मियों का है, जो 1965 व १1971 के युद्ध में सीमा की रक्षा करते हुए पाक सैनिकों के हत्थे चढ़ गए। इनका आज तक कोई पता नहीं चल पाया है कि ये जिन्दा हैं या मर गए। पाकिस्तान इनके बारे में खामोश है। इनके दुखी परिजन अपनी पीड़ा व्यक्त करते रहे हैं। मेजर एस.सी. गुलेरी के परिजन पिछले 42 साल से उनके घर लौटने का इंतजार कर रहे हैं। मेजर का वाकिया कम दर्दनाक नहीं। दो दिन पहले उनकी शादी हुई थी। 1971 का युद्ध छिड़ गया। अचानक सेना से बुलावा आया और वे सरहद पर चले गए। लेकिन वापस कभी नहीं लौटे। कैप्टन जे.सी. शर्मा के परिजन भी लंबे अरसे से उनके घर लौटने का इंतजार कर रहे हैं। ये लोग वे थे, जो हमारी रक्षा करने के लिए सीमा पर गए थे। समय-समय पर इन 53 युद्ध बंदियों के परिजन भारत सरकार से मांग करते रहे हैं, लेकिन सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंगती। इन्हें लेकर केन्द्र सरकार क्यों इतनी लाचार है? इस दौरान विभिन्न राजनीतिक दल केन्द्र की सत्ता में रहे। किसी ने भी भारत के युद्ध बंदियों को लेकर गंभीर प्रयास नहीं किए। क्यों? मीडिया के लिए यह मुद्दा कभी इतना महत्वपूर्ण नहीं रहा, जितना हाल में सरबजीत का रहा। सरबजीत का मुद्दा उठाना, गलत नहीं। गलत दूसरे मुद्दों की अनदेखी है। सरबजीत की प्रतिक्रिया भारत में सनाउल्लाह के रूप में सामने आई। अगर यह सिलसिला चल पड़े तो कितना खतरनाक होगा? इन दोनों मामलों को लेकर जो सियासी नफा-नुकसान भारत के राजनीतिक दलों से जुड़ा है, वही पाकिस्तान में भी है। 10 मई को पाकिस्तान में चुनाव है। सियासी पार्टियां अपनी-अपनी चालें चल रही हैं। वे दोनों मामलों को अपने ढंग से भुनाने की कोशिश कर रही हैं। वे मीडिया को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करना चाहती हैं। मीडिया इस दिशा में अधिक सजग नहीं दिखता। वह किस मामले में अति करेगा, तथा किस मामले की अनदेखी; कुछ भी कहना आसान नहीं।

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