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पत्रकार की लक्ष्मण रेखा

देश में पिछले दिनों हुईं न्यायिक कार्यवाहियां इस बात का प्रमाण है कि संविधान में प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अत्यन्त महत्वपूर्ण है। सरकारें और नौकरशाही अपने तुच्छ स्वार्थों के लिए जब-तब इस पर कुठाराघात करती रहती हैं। मीडिया पर प्रत्यक्ष या परोक्ष अंकुश लगा दिए जाते हैं। लेकिन न्यायपालिका की सजगता से अभिव्यक्ति की आजादी को बाधित करना आसान
नहीं है।


गत सप्ताह सर्वोच्च न्यायालय ने दो ऐसे फैसले सुनाए, जिससे मीडिया की स्वतंत्रता को मजबूती प्राप्त हुई। ग्यारह सितम्बर को न्यायालय ने अदालती कार्यवाही की मीडिया रिपोर्टिंग को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाया। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एस.एच. कपाडिय़ा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अदालती कार्यवाही की रिपोर्टिंग में पत्रकारों के लिए दिशा-निर्देश बनाने से इन्कार कर दिया। अलबत्ता पीठ ने मीडिया की स्वतंत्रता और निष्पक्ष सुनवाई के अभियुक्त के अधिकार में संतुलन के लिए कुछ समय तक रिपोर्टिंग स्थगित रखने का सिद्धान्त अवश्य दिया। संविधान पीठ के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय किसी मामले के आधार पर अदालती कार्यवाही के प्रकाशन व प्रसारण को स्थगित रखने का आदेश दे सकते हैं। फैसले में स्पष्ट किया गया कि ऐसा आदेश संक्षिप्त अवधि के लिए होगा। यह भी कहा कि आदेश ऐहतियाती कार्रवाई होगी, दंडात्मक नहीं।
साथ ही संविधान पीठ ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान में प्रदत्त कोई निरंकुश अधिकार नहीं है। पत्रकारों को लक्ष्मण रेखा जाननी चाहिए ताकि अवमानना की मर्यादा का उल्लंघन न हो। स्पष्ट है कि सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने अभियुक्त की निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार को संरक्षित किया, वहीं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी मजबूती प्रदान की। न्यायालय के फैसले से इस विचार को बल मिला, जिसमें मीडिया पर किसी बाहरी अंकुश की बजाय स्वयं मीडिया द्वारा आचार-संहिता पालन पर जोर दिया जाता है।
इसी तरह सेना की इकाइयों के मूवमेंट सम्बंधी समाचार देने से मीडिया को रोकने के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर 14 सितंबर को सर्वोच्च न्यायाय ने रोक लगाकर मीडिया की स्वतंत्रता को पुन: मजबूती प्रदान की। आपको याद होगा 'इंडियन एक्सप्रेस' में 4 अप्रेल को प्रकाशित एक समाचार ने हलचल मचा दी। शीर्षक था—The January night Raisina Hill was spooked: Two key army units moved towards Delhi without notifying govt. यह समाचार इस वर्ष 16 जनवरी को दो सैन्य इकाइयों के दिल्ली की ओर कूच करने से सम्बंधित था। इसके बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर फैसला देते हुए केन्द्र व राज्य सरकारों को यह पुख्ता करने के निर्देश दिए कि ऐसे समाचार मीडिया में न आएं। न्यायालय ने ऐसे समाचारों को देशहित के विपरीत बताया। आपको यह भी याद दिला दूं कि यह उस समय का मामला है, जब सेना प्रमुख वी.के. सिंह की उम्र को लेकर विवाद चरम पर था और वे सुर्खियों में बने हुए थे। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश के बाद सूचना व प्रसारण मंत्रालय ने एक एडवाइजरी जारी की, जिसमें मीडिया को इस आदेश का सख्ती से पालन करने का निर्देश था। सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय प्रेस परिषद और इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी की याचिका पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला गलत ठहराया और उसके आदेश को रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति एच.एल. दत्तू और सी.के. प्रसाद की बेंच ने कहा कि यह आदेश देकर उच्च न्यायालय ने गलती की है।सवाल है कि सैन्य इकाइयों की देश में मूवमेंट की खबर पर रोक की आखिर क्या तुक थी? ऐसी खबरें अखबारों में प्रकाशित होती रही हैं। हां, इन खबरों के प्रकाशन में संयम बरता जाए और अनावश्यक सनसनी से बचना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का यही सार निकाला जा सकता है। इधर कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी के मामले में मुम्बई उच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान पुलिस को जो फटकार लगाई, उससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक बार फिर मुहर लगी। कार्टूनिस्ट असीम को मुंबई पुलिस ने विवादित कार्टून के आधार पर राजद्रोह के मामले में गिरफ्तार किया था। बाद में असीम को जमानत पर छोड़ दिया था। उच्च न्यायालय ने कहा कि कार्टूनिस्ट की गिरफ्तारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है। न्यायालय ने पुलिस से पूछा, कार्टूनिस्ट पर राजद्रोह का मामला दर्ज करने से पहले अपना दिमाग क्यों नहीं लगाया? न्यायालय ने पुलिस और सरकार के रवैए को लेकर कई तीखे प्रश्न किए।
गत एक सप्ताह के दौरान देश में हुई ये न्यायिक कार्यवाहियां इस बात का प्रमाण है कि संविधान में प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अत्यन्त महत्वपूर्ण है। सरकारें और नौकरशाही अपने तुच्छ स्वार्थों के लिए जब-तब इस पर कुठाराघात करती रहती हैं। मीडिया पर प्रत्यक्ष या परोक्ष अंकुश लगा दिए जाते हैं। लेकिन न्यायपालिका की सजगता से अभिव्यक्ति की आजादी को बाधित करना आसान नहीं है।
अब 'वाशिंगटन पोस्ट' भी!
आपको याद होगा, कुछ समय पहले भारतीय मूल के जाने-माने अमरीकी लेखक व पत्रकार फरीद जकारिया पर साहित्यिक चोरी का आरोप लगा था। इस आरोप में टाइम पत्रिका और टीवी चैनल सी.एन.एन. ने उन्हें कुछ समय के लिए निलंबित कर दिया था। हालांकि फरीद जकारिया ने खेद व्यक्त कर दिया था, लेकिन इस घटना से मीडिया बिरादरी को बड़ी ठेस पहुंची। ऐसी ही ठेस पहुंचाने वाली घटना पिछले दिनों फिर घटित हुई।
अमरीकी अखबार 'द वाशिंगटन पोस्ट' ने भारतीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की— India’s silent prime minister becomes a tragic figure. यह रिपोर्ट दक्षिण एशिया में 'वाशिंगटन पोस्ट' के ब्यूरो चीफ साइमन डेनियर ने लिखी, जिस पर भारत में काफी बवाल मचा। इस रिपोर्ट में भारतीय पत्रिका 'कारवां' से कुछ अंश सीधे-सीधे उठा लिए गए थे, जो वर्ष 2011 में प्रकाशित एक लेख का हिस्सा थे। इस लेख में 'कारवां' के एसोसिएट एडिटर विनोद के जोस ने भारतीय इतिहासकार रामचन्द्र गुहा तथा डॉ. मनमोहन सिंह के पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू व अन्य कई लोगों से बातचीत की थी। 'वाशिंगटन पोस्ट' में साइमन डेनियर ने अपनी रिपोर्ट में रामचन्द्र गुहा तथा संजय बारू के बयानों को तो प्रमुखता से छापा, लेकिन 'कारवां' का कहीं उल्लेख नहीं किया। हालांकि बाद में 'वाशिंगटन पोस्ट' ने अपनी गलती सुधारते हुए 'कारवां' का उल्लेख किया, लेकिन विनोद के जोस ने बीबीसी को कहा— मुझ उम्मीद है वो औपचारिक रूप से माफी मांगेंगे। अगर वो (वाशिंगटन पोस्ट) ऐसा करते हैं तो ये पत्रकारिता के लिए अच्छा होगा।
पत्रकारिता में एक-दूसरे की टिप्पणियों और विवरणों का उल्लेख करना बुरी बात नहीं है। कई प्रतिष्ठित पत्रकार और लेखक ऐसा करते रहे हैं। लेकिन वे उन्हें श्रेय भी देते हैं, जिनकी बातों का उल्लेख करते हैं। यह एक नैतिक नियम है, जिसका पत्रकारिता में पालन करना जरूरी है। लेकिन अब प्रतिष्ठित पत्रकार और अखबार भी इसका उल्लंघन करने लगे हैं, यह शुभ संकेत नहीं है। हमें अपनी लक्ष्मण रेखा का ध्यान रखना होगा।

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बढ़ रही है अपनी हिन्दी

भारत में हिन्दी को लेकर भले ही अभी हम संतुष्ट न हों, लेकिन विदेशों में हिन्दी बढ़ रही है। इसका श्रेय एक ओर विदेशों में बसे प्रवासी भारतीयों को है, वहीं विभिन्न देशों के विश्वविद्यालयों, सरकारी व निजी संस्थाओं और संगठनों को भी है, जिनके निरन्तर प्रयास हिन्दी को आगे बढ़ा रहे हैं।  अमरीका में रहने वाले प्रवासी भारतीयों द्वारा स्थानीय टीवी पर 'चलो हिन्दी बोलें' नामक कार्यक्रम भी
चलता है।

हंगरी के छात्र पीटर का कहना है— 'हिन्दी भाषा से मुझो अगाध लगाव है। भारतीय राजनीति पर मैं शोध कर रहा हूं। विश्व की सभी भाषाओं में से स्पेनिश के साथ हिन्दी मेरी पसंदीदा भाषा है।'
रूस की छात्रा येव्गेनिया का कहना है— 'मुझो हिन्दी फिल्में देखना अच्छा लगता था। गाने भी पसंद आते थे। सो मैंने फैसला किया हिन्दी पढ़कर रहूंगी। और फिर मैं हिन्दी पढऩे लगी। हिन्दी जुबान ने मेरे दिल को छू लिया।'
इवान पैत्रोव का कहना है— 'स्कूल के बाद जब मुझो फैसला करना था कि मैं किस विषय को चुनूं, तभी मुझो पता चला कि मास्को विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग मौजूद है, तो मैंने वहीं दाखिला ले लिया। अब मैं भारतीय भाषाओं और इतिहास का अध्ययन कर रहा हूं।'
निकिता कुलकोव ने कहा— 'मुझो हिन्दी बोलने पर गर्व महसूस होता है।'
रूस, ब्रिटेन, हंगरी, रुमानिया आदि योरोपीय देशों के छात्र-छात्राएं गत १८ से २८ अगस्त के बीच भारत-भ्रमण पर आए हुए थे। ब्रिटेन की हिन्दी ज्ञान समिति पिछले १० वर्षों से यूरोप के प्रमुख देशों में हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिता का आयोजन करती है। इस प्रतियोगिता के आधार पर चयनित विद्यार्थियों को भारत और ब्रिटेन की सरकारी व गैर सरकारी संस्थाओं के सहयोग से भारत-भ्रमण कराया जाता है। भारत में इन हिन्दी प्रेमी विद्यार्थियों को कई शहरों की यात्राओं पर ले जाया जाता है। इसी के तहत मेरठ विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के साथ संवाद कार्यक्रम के दौरान ये विदेशी छात्र अपने अनुभव सुना रहे थे। इन विद्यार्थियों का मानना है कि भारतीय समाज को समझाना है तो हिन्दी को भी गहराई से समझाना होगा। भारतीय संस्कृति के प्रति आकर्षण ही इन्हें हिन्दी की तरफ खींच लाया।
किसी विदेशी को हिन्दी पढ़ते और बोलते देखकर हमें अच्छा ही लगता है। इन हिन्दी प्रेमी विदेशी विद्यार्थियों का भारत में खूब स्वागत हुआ। 28 अगस्त को ये विद्यार्थी भारत की स्मृतियां लेकर अपने देश लौट गए।
भारत में हिन्दी को लेकर भले ही अभी हम संतुष्ट न हों, लेकिन विदेशों में हिन्दी बढ़ रही है। इसका श्रेय एक ओर विदेशों में बसे प्रवासी भारतीयों को है, वहीं विभिन्न देशों के विश्वविद्यालयों, सरकारी व निजी संस्थाओं और संगठनों को भी है, जिनके निरन्तर प्रयास हिन्दी को आगे बढ़ा रहे हैं। न्यूयार्क सिटी के शिक्षा विभाग में नियुक्त सुषमा मल्होत्रा हिन्दी भाषा सिखाने के लिए 'स्टारटॉक' नामक कार्यक्रम का आयोजन करती हैं। इसके तहत प्रवासी भारतीयों के साथ-साथ अमरीकी युवक भी हिन्दी सीख रहे हैं। 'स्टारटॉक' सरकारी कोष से चलने वाला कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य अमरीकी युवाओं को विदेशी भाषाओं की जानकारी देना है। अमरीका में रहने वाले प्रवासी भारतीयों द्वारा स्थानीय टीवी पर 'चलो हिन्दी बोलें' नामक कार्यक्रम भी चलता है जो काफी लोकप्रिय है।
विख्यात येल विश्वविद्यालय प्रतिवर्ष छात्रों में विभिन्न विषयों पर हिन्दी में चर्चा आयोजित करता है, जो अब अमरीका में एक राष्ट्रीय आयोजन बन चुका है। इस वाद-विवाद आयोजन में हार्वर्ड, प्रिंस्टन, कोलम्बिया जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के छात्र भाग लेते हैं। कुछ माह पूर्व आयोजित चौथी येल हिन्दी चर्चा में पेंसिलवेनिया, कार्नेल, वेल्सली, कैलीफोर्निया, लॉस एंजीलिस और टेक्सास विश्वविद्यालय के विद्यार्थी भी शामिल हुए।
हालांकि आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों के साथ बुरे बर्ताव की घटनाएं बढ़ रही हैं, लेकिन यहां भी हिन्दी की लोकप्रियता कम नहीं है। आस्ट्रेलिया के विक्टोरिया प्रान्त की सरकार ने केन्द्र से हिन्दी को राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में शामिल करने का अनुरोध किया है। राज्य सरकार ने अपने पत्र में लिखा है, विक्टोरिया में हिन्दी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली दूसरी भाषा बन चुकी है।
पुर्तगाल में लिस्बन विश्वविद्यालय में हिन्दी पठन-पाठन की व्यवस्था है, तो जापान के ओसाका विश्वविद्यालय में भारत विद्या विभाग देश-विदेश के विद्यार्थियों को हिन्दी में अध्ययन की सुविधाएं प्रदान कर रहा है। चीन में न केवल बिजिंग विश्वविद्यालय बल्कि अन्य कई चीनी विश्वविद्यालयों में हिन्दी का अध्ययन कराया जाता है। चीन में हिन्दी के प्रसार के लिए जिनान विश्वविद्यालय, शेनझोन विश्वविद्यालय व युनान विश्वविद्यालयों में अध्ययन पीठ स्थापित की गई है। अब गुआंगझाग विश्वविद्यालय में भी हिन्दी के लिए पीठ कायम की जा रही है। जर्मनी और रूस का हिन्दी प्रेम सभी जानते हैं।
ऐसा नहीं है कि दुनिया के विश्वविद्यालयों में ही हिन्दी बढ़ रही है। इंटरनेट और सूचना प्रौद्योगिकी में भी हिन्दी को वर्चस्व मिल रहा है। कुछ अरसा पहले गूगल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एरिंक श्मिट की एक टिप्पणी ने हलचल मचा दी थी। उन्होंने कहा, कुछ साल में इंटरनेट पर जिन तीन भाषाओं का वर्चस्व होगा उनमें से एक हिन्दी होगी। कम्प्यूटर कंपनियों के लिए आज हिन्दी में साफ्टवेयर आधारित योजनाओं को लाना फायदे का सौदा साबित हो रहा है। याहू, गूगल, एमएसएन सब हिन्दी में आ रहे हैं। लिनक्स और मैकिन्टोश पर भी हिन्दी आ गई है। यूनिकोड ने हिन्दी को आम कम्प्यूटर उपभोक्ता के लिए सर्वसुलभ बना दिया है। यह सही है कि संचार के माध्यम के रूप में हिन्दी अभी कच्ची है। रोमन लिपि, यूनिकोड के प्रयोग व अनुवाद की भाषा को लेकर हमारे कई हिन्दी विद्वान भले ही आश्वस्त नहीं हों, लेकिन हिन्दी के प्रचलन को लगातार विस्तार मिल रहा है। उसकी लोकप्रियता का ग्राफ निरन्तर ऊंचा उठ रहा है। कोई भाषा तभी निखरती है, जब उसका प्रयोग करने वाले हों। हिन्दी को मिल रहा लगातार विस्तार उसे निखारने में मददगार ही साबित होगा।
हिन्दी चैनल और राज ठाकरे
विदेशों में हिन्दी बढ़ रही है, मगर हमारे देश में राज ठाकरे जैसे नेताओं का हिन्दी पर गुस्सा फूट रहा है। यह हिन्दी का ही असर है कि नफरत की राजनीति करने वाले नेताओं को हिन्दी से डर लगता है।
राज ठाकरे जब भी आग उगलते हैं या विवादास्पद बयान देते हैं तो उसे पूरा मीडिया कवर करता है। लेकिन राज ठाकरे हिन्दी समाचार चैनलों और अखबारों से डरे हुए हैं। कहते हैं डरा हुआ सांप ही फन उठाता है। सो राज ठाकरे ने इस बार हिन्दी समाचार चैनलों को निशाना बना डाला। बिहारियों के साथ उन्होंने महाराष्ट्र से हिन्दी चैनलों को भी खदेडऩे की धमकी दे डाली। ठाकरे कहते हैं, अगर हिन्दी समाचार चैनल उन्हें निशाना बनाना बंद नहीं करेंगे तो वे महाराष्ट्र में हिन्दी चैनल बंद करवा देंगे। ठाकरे साहब, महाराष्ट्र आपकी जागीर नहीं है। इस पर पूरे देश का हक है। जैसे मराठी चैनल और अखबार देश के किसी भी हिस्से में प्रसारित हो सकते हैं, वैसे ही हिन्दी चैनलों व अखबारों को भी महाराष्ट्र में प्रसारित होने से कोई नहीं रोक सकता। यह हक मीडिया को भारतीय संविधान ने दिया है।

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सोशल मीडिया का दुरुपयोग

सवाल है, क्या अब सोशल मीडिया अफवाहें व वैमनस्य फैलाने का माध्यम बन रहा है? क्या वह दो देशों के बीच दुश्मनी बढ़ाने के लिए इस्तेमाल हो रहा है? क्या सोशल मीडिया एक कठपुतली है, जिसे नचाने वाला जैसा चाहे नाचने को मजबूर कर सकता है? अगर ऐसा है तो सोशल मीडिया जितना ताकतवर है उतना ही कमजोर भी है। जितना उपयोगी है, उतना ही खतरनाक भी है।

पड़ोसी देश म्यांमार की घटना है यह। वहां गत दिनों भड़की जातीय हिंसा में कई लोग मारे गए। इसी को फेसबुक पर बयान करते हुए एक फोटो अपलोड की गई। फोटो में एक स्थान पर कई शव दिखाए गए थे। इन्हें म्यांमार में हिंसा में मारे गए एक समुदाय के लोगों की लाशें बताया गया था।
यह फोटो दरअसल, म्यांमार की न होकर इंडोनेशिया की थी और शव जातीय हिंसा में मारे गए लोगों के न होकर सुनामी नामक तूफान में मारे गए लोगों के थे। यह फोटो अन्तरराष्ट्रीय फोटो एजेन्सी एपी द्वारा वर्ष २००४ में जारी की गई थी, जो कई अखबारों में छपी थी। फोटो में तूफान से मारे गए लोगों के शव समुद्र किनारे बहकर आए एक ढेर के रूप में पड़े इस प्राकृतिक आपदा की विभीषिका को बयान कर रहे थे। इस फोटो को फेसबुक पर म्यांमार की हिंसा से जोड़कर प्रचारित किया गया, लेकिन असलियत छुप न सकी। अलबत्ता, इस फोटो के जरिए निहित स्वार्थी तत्व और कट्टरपंथी ताकतें अपने मकसद में कुछ हद तक जरूर कामयाब हो गईं।
असम में भड़की हिंसा तथा उत्तर-पूर्वी राज्यों के नागरिकों का देश के विभिन्न हिस्सों से पलायन की घटनाओं को भी इससे जोड़कर देखा जा सकता है। धीरे-धीरे साफ हो रहा है कि भारत में सोशल मीडिया के जरिए अफवाहें फैलाने की कुचेष्टा पाकिस्तान की तरफ से हुई। पाक खुफिया एजेन्सी आईएसआई की शह पर कट्टरपंथी ताकतों ने सोशल मीडिया का जमकर दुरुपयोग किया। गलत सूचनाओं व भ्रमित करने वाली फोटुओं को वेबसाइटों पर डाला गया। बल्क एसएमएस के जरिए दहशत भरे संदेश भेजे गए। भारत के गृह सचिव के अनुसार पाकिस्तान की 76 वेबसाइट्स की पहचान की गई है, जिनसे अफवाहें फैलाई गई और भारत में उत्तर-पूर्वी राज्यों के लोग पलायन को मजबूर हुए। सोशल मीडिया का ऐसा दुरुपयोग पहले कभी सामने नहीं आया। सवाल है, क्या अब सोशल मीडिया अफवाहें व वैमनस्य फैलाने का माध्यम बन रहा है? क्या वह दो देशों के बीच दुश्मनी बढ़ाने के लिए इस्तेमाल हो रहा है? क्या सोशल मीडिया एक कठपुतली है, जिसे नचाने वाला जैसा चाहे नाचने को मजबूर कर सकता है? अगर ऐसा है तो सोशल मीडिया जितना ताकतवर है उतना ही कमजोर भी है। जितना उपयोगी है, उतना ही खतरनाक भी है।
संभवत: इसीलिए उत्तर-पूर्व के राज्यों के पलायन पर संसद में 17 अगस्त को विशेष चर्चा के दौरान कुछ सांसदों ने सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाने की मांग तक कर डाली। जब-तब सरकारों द्वारा सोशल मीडिया पर अंकुश लगाने की बात कही जाती रही है। कुछ देशों में ऐसा किया भी गया है। लेकिन क्या यह समस्या का वास्तविक समाधान है? यहां हम रोग को खत्म करने की बजाय रोगी को ही खत्म करते नजर आते हैं। दरअसल, सोशल मीडिया एक दुधारी तलवार है, जो दोनों तरफ वार करती है। वार करने वाला चाहे तो दुश्मन से अपना बचाव कर सकता है। या फिर खुद अपना गला भी काट सकता है। लेकिन इसमें तलवार का क्या दोष? तलवार तो शत्रु को पराजित करने के लिए ही बनी है, न कि खुद का नाश करने के लिए। यही बात सोशल मीडिया पर लागू होती है।
सोशल मीडिया की उपयोगिता, महत्व और वास्तविक शक्ति को पहचाना जाना चाहिए। क्या हम भूल गए हाल के बरसों में कई देशों में तानाशाहों का खात्मा करने में इसकी क्या भूमिका रही? आक्यूपाई वाल स्ट्रीट आंदोलन को सोशल मीडिया ने ही परवान चढ़ाया। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आन्दोलन को इसी ने ताकत दी। गुवाहाटी में अकेली लड़की के साथ सरेआम खिलवाड़ करने वाले गुंडों को जेल के सींखचों में सोशल मीडिया ने ही पहुंचाया। शक्तिशाली सत्ता केन्द्रों के खिलाफ कमजोर और आम जन की आवाज बना है। सोशल मीडिया का इस्तेमाल अगर निहित स्वार्थी ताकतें अफवाहें फैलाकर शान्ति भंग करने के लिए करती हैं, तो अमन पसंद ताकतें इसका जोरदार जवाब भी सोशल मीडिया से दे सकती हैं, अमन व भाईचारा कायम रख सकती हैं। शत्रु को शत्रु के हथियार से ही परास्त करना चाहिए जैसे, सुनामी की जिस फोटो का दुरुपयोग किया गया था उसकी असलियत भी सोशल मीडिया ने ही उजागर की।
साहित्यिक चोरी और पत्रकार
पिछले दिनों मीडिया-जगत में एक शर्मसार करने वाली घटना हुई। भारतीय मूल के जाने-माने अमरीकी लेखक व स्तंभकार फरीद जकारिया पर साहित्यिक चोरी का इल्जाम लगा। इस इल्जाम में टीवी चैनल सीएनएन व टाइम पत्रिका ने उन्हें निलंबित कर दिया। जकारिया ने टाइम पत्रिका के 20 अगस्त अंक में अपने स्तंभ में हथियार नियंत्रण पर लेख लिखा था। यह लेख एक अन्य प्रसिद्ध अमरीकी लेखक प्रो. जिल लेपोर के लेख से काफी मिलता-जुलता था। यह लेख 'द न्यूयार्कर' के 23 अप्रेल के अंक में छपा था। हालांकि जकारिया पर जिल लेपोर के लेख के एक पैरेग्राफ की चोरी करने का इल्जाम था, लेकिन इससे उनकी प्रतिष्ठा को बहुत आघात लगा। 48 वर्षीय फरीद जकारिया का भारत के मीडिया जगत में भी बहुत मान-सम्मान है। उन्हें भारत सरकार ने पद्मभूषण से सम्मानित किया। स्वयं जकारिया इस साहित्यिक चोरी से लज्जित हैं। उन्होंने अपनी गलती स्वीकार करते हुए सी.एन.एन. के दर्शकों तथा टाइम के पाठकों से माफी मांगी। जकारिया ने तुरन्त अपनी गलती स्वीकार करके अच्छा ही किया। लेखन के अपने मापदंड और आचार-संहिता हैं, जिनका पालन हर हाल में किया जाना चाहिए। अन्यथा लेखन के जरिए हम जिस समाज को प्रभावित करना चाहते हैं वह हम पर अपना विश्वास खो देगा। यह लेखन की बहुत बड़ी हानि होगी। लेखक की तो होगी ही।
जूलियन असांजे बनाम अमरीका
दुनिया भर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रतीक बने 'विकीलीक्स' के खोजी पत्रकार जूलियन असांजे फिर चर्चा में हैं। लंदन स्थित इक्वेडोर के दूतावास में असांजे गत रविवार को अचानक प्रकट हुए। इक्वेडोर के राजनीतिक शरण में रह रहे असांजे ने दूतावास के भीतर से ही अपने समर्थकों को संबोधित किया। असांजे ने कहा, दुनिया में अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में है। पत्रकारों को चुप कराया जा रहा है ताकि लोग सच्चाई न जान सकें। अमरीका समेत दुनिया भर की सरकारें यही कर रही हैं। अपनी वेबसाइट विकीलीक्स के जरिए इराक, अफगानिस्तान के युद्धों सहित अमरीकी सरकार के कई महत्वपूर्ण राज उजागर करके उन्होंने पूरी दुनिया को चौंका दिया था। उनका आरोप है कि तभी से अमरीका उनके पीछे पड़ा है। ब्रिटेन सरकार असांजे को स्वीडन सरकार को सौंपना चाहती है। लेकिन इक्वेडोर के शरण देने की वजह से वे अभी तक बचे हुए हैं। असांजे स्वीडन जाने का विरोध कर रहे हैं। उनका आरोप है कि स्वीडन में उनके खिलाफ यौन शोषण का आपराधिक मुकदमा एक बहाना है। वहां की सरकार उन्हें अमरीका को सौंप देगी। अमरीका के हाथ पडऩे पर वे जीवित नहीं बचेंगे। इस आशंका के चलते वे दूतावास से बाहर नहीं निकल रहे हैं। अमरीका, स्वीडन और ब्रिटेन सहित दुनिया भर में असांजे के समर्थक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की उनकी लड़ाई में उनका समर्थन कर रहे हैं।

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समाज, बाजार और मीडिया

सच है कि समाज के अन्य अंगों की तरह मीडिया भी बाजारवाद से प्रभावित है। बल्कि उसके बहुत बड़े हिस्से पर बाजार की शक्तियां हावी हो गई हैं। 'मिशनरी' पत्रकारिता से 'व्यावसायिक' पत्रकारिता का सफर एक सच्चाई है। लेकिन 'व्यावसायिक' पत्रकारिता और मूल्यहीन पत्रकारिता में कोई अनिवार्य अन्तर्संबंध देखना भूल है।

हाल ही मुझे एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में शामिल होने का अवसर मिला। चर्चा का केन्द्र-बिन्दु लोकतंत्र के स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया—में आम आदमी के सरोकारों से जुड़ा था। मीडिया से सम्बंधित चर्चा के दौरान कुछ ऐसे सवाल उठाए गए, जो इधर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार उठाए जा रहे हैं। उल्लेखनीय बात यह है कि संगोष्ठी एक छोटे-से कस्बे में कन्या शिक्षा से सम्बंधित एक निजी संस्थान द्वारा आयोजित की गई थी। बीकानेर जिले के नोखा कस्बे में श्री जैन आदर्श सेवा संस्थान के विशाल परिसर में कन्या शिक्षा से जुड़ी विभिन्न शिक्षण संस्थाएं संचालित हैं। संस्थान के 25 वर्ष पूर्ण होने पर रजत जयंती समारोह की शृंखला में 28 जुलाई को आयोजित इस संगोष्ठी में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के आर्थिक सलाहकार और ख्यात अर्थशास्त्री प्रो. विजय शंकर व्यास मुख्य वक्ता थे। प्रो. व्यास ने आर्थिक नीतियों और आम आदमी के अन्तरसम्बंधों पर सारगर्भित व्याख्यान दिया। अन्य विषयों पर भी आम आदमी पर केन्द्रित सार्थक चर्चा हुई। यहां मैं मीडिया के दायित्व-बोध पर हुई चर्चा पर रोशनी डालना चाहूंगा।
मीडिया को लेकर विभिन्न मंचों पर जो बात लगातार कही जा रही है, वही संगोष्ठी में भी उभर कर आई। ...वर्तमान परिवेश ने मीडिया को 'मिशन' से 'व्यवसाय' बना दिया है। वह बाजार की कठपुतली बन गया है। मीडिया जैसा शक्तिशाली माध्यम का इस्तेमाल करने वाला बाजार न तो किसी आचरण संहिता को मानता है और न ही किसी नैतिक मर्यादा को। एडमंड बर्क ने लोकतंत्र में प्रेस के महत्व व उपयोगिता को अभिव्यंजित करने के उद्देश्य से उसे चौथा स्तंभ कहा, लेकिन आज मीडिया के बाजारवाद की प्राथमिकता ने लोकतंत्र के इस स्तंभ से मूल्यपरक पत्रकारिता को छूमंतर कर दिया। पूंजीवाद से पोषित अर्थव्यवस्था में पल-बढ़ रहे मीडिया ने आम आदमी को भुला दिया है। वह संवेदनहीन हो गया है और उसका सामाजिक दायित्व-बोध नष्ट हो चुका है।...
उपरोक्त भाव मैंने एक प्रतिभागी डॉ. प्रतिभा कोचर के व्याख्यान से उद्धृत किए हैं, जो मीडिया पर व्यक्त किए जा रहे विचारों व धारणाओं की प्रतिनिधि अभिव्यक्ति है।
सच है कि समाज के अन्य अंगों की तरह मीडिया भी बाजारवाद से प्रभावित है। बल्कि उसके बहुत बड़े हिस्से पर बाजार की शक्तियां हावी हो गई हैं। 'मिशनरी' पत्रकारिता से 'व्यावसायिक' पत्रकारिता का सफर एक सच्चाई है। लेकिन 'व्यावसायिक' पत्रकारिता और मूल्यहीन पत्रकारिता में कोई अनिवार्य अन्तर्संबंध देखना भूल है। व्यावसायिक होते हुए भी मूल्यपरक पत्रकारिता की जा सकती है जिसमें पाठक केन्द्र में रहता है। जबकि बाजार प्रेरित मीडिया के केन्द्र में पाठक या दर्शक या श्रोता उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना बाजार और उसकी जरूरतें महत्वपूर्ण है। हमें मीडिया का आकलन करते समय इनमें अन्तर करना होगा ताकि सभी मीडिया संस्थानों को एक ही लाठी से न हांका जाए।
इसलिए जब संगोष्ठी के संयोजक और कन्या महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. वेद शर्मा ने मुझो मीडिया की ओर से विचार रखने के लिए आमंत्रित किया तो मैंने 'राजस्थान पत्रिका' के एक समाचार अभियान के हवाले से अपना मंतव्य स्पष्ट किया। यह समाचार अभियान जयपुर शहर में मोबाइल टॉवरों से होने वाले रेडिएशन और लोगों पर पड़ रहे उसके दुष्प्रभावों को लेकर शुरू किया गया था, जो बाद में राज्य भर में फैला और अन्तत: एक राष्ट्रव्यापी बहस का मुद्दा बना। मोबाइल कंपनियों की ओर से गली-गली में अंधाधुंध ढंग से लगा दिए गए उच्च क्षमता के ये टॉवर लोगों के स्वास्थ्य के साथ किस तरह खिलवाड़ कर रहे हैं, इसकी असलियत उजागर की गई। अलग-अलग गली-मोहल्लों में रेडिएशन का स्तर क्या है? उसका जन स्वास्थ्य पर क्या दुष्प्रभाव पड़ रहा है? विशेषज्ञ क्या कहते हैं? आम लोगों की क्या प्रतिक्रिया है? मोबाइल कंपनियों के प्रतिनिधियों का क्या कहना है? ये सभी मुद्दे तथ्यात्मक आंकड़ों व सम्पूर्ण ब्योरों के साथ एक समाचार अभियान के रूप में लगातार प्रकाशित किए गए। अभियान का लोगों पर असर पड़ा। लोग अपने-अपने गली-मोहल्लों और कॉलोनियों में निकलने लगे। रेडिएशन से प्रभावित लोग मुखर होकर बोलने लगे। मोबाइल टॉवरों के खिलाफ प्रदर्शन करने लगे। न केवल कॉलोनियों में एक ही इमारत पर लगे कई टॉवरों का विरोध हुआ, बल्कि स्कूलों, अस्पतालों आदि संवेदनशील जगहों पर लगे मोबाइल टॉवरों को तत्काल हटाने की मांग जोर पकडऩे लगी। अपने घर में लगे टॉवर को कुछ मकान मालिकों ने स्वयं ही हटवाने का निर्णय किया। कैंसर जैसे जानलेवा रोग और रेडिएशन के अंतरसंबंधों पर विशेषज्ञों के विचार सामने आए। जन विरोध को देखते हुए राज्य सरकार ने जांच कमेटी बनाई। दूसरी ओर शिक्षा मंत्री ने शिक्षण संस्थानों पर लगे टॉवर हटाने की घोषणा की।
इधर राजस्थान उच्च न्यायालय के आदेश से भी जांच कमेटी बनाई गई। केन्द्रीय दूरसंचार मंत्रालय ने न्यायालय में बाकायदा शपथ पत्र पेश करके घोषणा की कि वह सितंबर 2012 से मोबाइल टॉवरों के मौजूदा 4500 मिलीवाट प्रति वर्ग मीटर रेडिएशन को 10 गुणा घटा देगा। जयपुर शहर के नागरिकों से प्रेरित होकर राज्य के कई शहरों में मोबाइल टॉवरों के खिलाफ धरने-प्रदर्शन हुए और जन स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का माहौल बना। राज्य की सीमा से निकलकर यह अभियान देश के अन्य शहरों में भी फैला। अब यह एक राष्ट्रव्यापी अभियान बन चुका है। जयपुर शहर में यह अभियान नवम्बर 2011 में शुरू हुआ था। इसके बाद से अब तक यानी गत आठ माह से कोई नया टॉवर नहीं लग पाया। केन्द्र सरकार मोबाइल टॉवर स्थापित करने की सर्वमान्य नीति पर विचार कर रही है। माना जाता है, मोबाइल कंपनियां टॉवर स्थापित करने के मामले में विकासशील और विकसित देशों में अलग-अलग मापदंड अपनाती हैं। विकसित देशों में कम फ्रिक्वेंसी के टॉवर लगाए जाते हैं, ताकि उनसे निकलने वाले रेडिएशन का स्तर कम हो। कई यूरोपीय देशों ने इन टॉवरों की क्षमता तय कर रखी है, जिससे अधिक क्षमता का टॉवर लगाने की अनुमति नहीं है। भारत जैसे विकासशील देश में ऐसे प्रतिबंध नहीं है। लिहाजा मोबाइल कंपनियों ने इसका फायदा उठाकर उच्च क्षमता के टॉवरों का देश भर में जाल फैला दिया है। यह लोगों के स्वास्थ्य के साथ कैसा खिलवाड़ है? पत्रिका के अभियान ने नीति-निर्माताओं को भी सोचने पर विवश किया। जाहिर है, मोबाइल कंपनियों की इस अभियान पर अनुकूल प्रतिक्रिया नहीं हुई है। उन्होंने टॉवरों से रेडिएशन को बेबुनियाद बताया और पत्रिका के समाचारों के विपरीत प्रचार अभियान चलाया, पर लोग भ्रमित नहीं हुए। आखिर रेडिएशन के दुष्परिणामों के वे भुक्तभोगी हैं। पत्रिका ने तथ्यों सहित सारी जानकारियां जुटाईं। यही कारण है कि इस मुद्दे से लाखों लोग जुड़े और यह राष्ट्रीय बहस का विषय बना। क्या बाजार की शक्तियों के हाथों की कठपुतली बनकर कोई मीडिया संस्थान ऐसा जनोन्मुखी कार्य कर सकता है? 'पत्रिका' ने सामाजिक सरोकार के ऐसे अनेक जनोन्मुखी कार्य किए हैं। बाजार के दबाव से ग्रस्त कोई मीडिया ऐसा शायद ही कर पाए।

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कार्टून, ज्यादती और मनमोहन सिंह


तीन साल पहले भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को लाखों लोगों की जिन्दगियां बदलने वाला शख्स बताने वाली 'टाइम' पत्रिका ने लिखा, अर्थव्यवस्था के उदारीकरण में वैश्विक प्रशंसा पाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अब सुधारों पर कड़े फैसले लेने के अनिच्छुक लगते हैं। 'टाइम' की यह स्टोरी भारतीय मीडिया में सुर्खियां बनी और लगभग सबने अपने-अपने ढंग से इसकी व्याख्या की।

इस बार हम पिछले दिनों मीडिया की सुर्खियों में रही कुछ घटनाओं पर चर्चा कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ में माओवादियों से मुठभेड़ के नाम पर बस्तर के 17 आदिवासियों की मौत की घटना से रमन सिंह सरकार कठघरे में है। 'पत्रिका' ने शुरू से घटनाक्रम को प्रमुखता से उठाया। विभिन्न जांच एजेंसियां इस घटना की परतें उधेड़ रही हैं। राज्य सरकार सवालों से घिरी है। उससे जवाब देते नहीं बन रहा है। केन्द्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम को अपना पूर्व बयान बदलकर खेद व्यक्त करना पड़ा।
एन.सी.ई.आर.टी. से जुड़ा कार्टून विवाद फिर सुर्खियां बना। इस बार विवाद का कारण इस मुद्दे पर बनी एस.के. थोराट कमेटी की वह सिफारिश थी, जिसमें पाठ्य-पुस्तकों से 21 कार्टून हटाने की बात कही गई। इस पर कई प्रमुख शिक्षाविदों ने आपत्तियां उठाईं। 'द हिन्दू' और 'इंडियन एक्सप्रेस' ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। परिणामत: एन.सी.ई.आर.टी. ने थोराट कमेटी की रिपोर्ट को दरकिनार करते हुए केवल दो कार्टून हटाने का निर्णय किया। अमरीका की प्रतिष्ठित पत्रिका 'टाइम' में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर प्रकाशित कवर स्टोरी 'अंडर अचीवर' मीडिया में न केवल खबर का विषय बनी, बल्कि इस पर अच्छी-खासी बहस भी चल पड़ी।
'माओवादियों' से मुठभेड़!
छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के कोरसागुड़ा गांव में 28-29 जून की रात को सुरक्षा बलों ने माओवादियों से मुठभेड़ के नाम पर 17 आदिवासियों की हत्या कर दी। प्रदेश में विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे सामूहिक नरसंहार बताया और आदिवासी विधायक कवासी लखमा के नेतृत्व में जांच दल गठित किया। बताया गया कि जमीन के किसी विवाद को सुलझाने के लिए ग्रामीण एकत्रित हुए थे। पुलिस ने उन्हें चारों तरफ से घेरकर उन पर फायरिंग की। कांग्रेस के जांच दल की रिपोर्ट के अनुसार मारे गए 17 ग्रामीणों में 9 नाबालिग हैं। इनमें 7 तो 13 से 15 साल की उम्र के स्कूली बच्चे हैं। मृतकों में 2 स्कूली छात्राएं भी शामिल हैं। विपक्षी दल की रिपोर्ट सामने आई तो केन्द्र सरकार ने इस पूरे घटनाक्रम पर केन्द्रीय रिजर्व सुरक्षा बल से रिपोर्ट मांगी। सुरक्षा बल अपनी रिपोर्ट देता, उससे पहले ही दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस करके केन्द्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम ने घोषणा कर दी, 'कोरसागुड़ा की मुठभेड़ में मारे गए सभी माओवादी थे।' यही नहीं, उन्होंने इस घटना को अंजाम देने वाले पुलिस बल की तारीफ भी की।
'पत्रिका' ने सवाल उठाया कि रिपोर्ट मिले बगैर सभी मृतकों को माओवादी कहना और सुरक्षाबलों की पीठ थपथपाना कहां तक जायज है? लेकिन राज्य सरकार की तरह केन्द्र की आंख पर भी पर्दा पड़ा रहा। दूसरी तरफ, मानवाधिकार आयोग ने स्वत: प्रसंज्ञान लेते हुए सरकार से सम्पूर्ण घटनाक्रम की रिपोर्ट मांगी। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी पूरे घटनाक्रम को गंभीर माना और केन्द्र सरकार से निष्पक्ष जांच कराने तथा मानवाधिकार हनन के दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। पीयूसीएल पीयूडीआर जैसे मानवाधिकार संगठनों ने अपने स्वतंत्र जांच दल गठित किए। अंतत: 4 जुलाई को चिदम्बरम ने इस घटना पर अफसोस जताया। दूसरी ओर, छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार अब भी दोषी पुलिसकर्मियों को बचाने और मामले पर पर्दा डालने की कोशिश में लगी है। निर्दोष ग्रामीणों और बच्चों की हत्याओं को आखिर सरकार कब तक छुपाकर रख पाएगी? बड़ा सवाल यह कि क्या ऐसी दुखद घटनाएं माओवाद को कुचल पाएंगी या उसे और जमीनी मजबूती देंगी?
थोराट कमेटी और कार्टून विवाद
अंबेडकर और नेहरू के कार्टून से उपजे विवाद के बाद सरकार की ओर से गठित एस.के. थोराट कमेटी ने एन.सी.ई.आर.टी. की नौवीं और ग्यारहवीं कक्षा की पाठ्य-पुस्तकों से 21 कार्टून हटाने की सिफारिश की। कमेटी की ओर से पाठ्य-पुस्तकों में प्रतिबंधित कार्टूनों में से कुछ कार्टून 'द हिन्दू' और 'इंडियन एक्सप्रेस' ने 4 जुलाई के अंक में प्रकाशित किए। एक्सप्रेस ने जहां पूरा पृष्ठ इस पर केन्द्रित किया, वहीं 'हिन्दू' ने प्रस्तावित प्रतिबंधित कार्टूनों के अलावा तीखा सम्पादकीय भी लिखा। एक बात स्पष्ट थी कि थोराट कमेटी की सिफारिश राजनेताओं को खुश करने के लिए है। इसका शैक्षणिक गुणवत्ता से कोई सम्बंध नहीं है। जिन कार्टूनों को पाठ्यपुस्तकों से हटाने की सिफारिश की गई, उनके बहुत ही लचर कारण बताए गए। जैसे, शेख अब्दुल्ला के जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बनने पर इंदिरा गांधी द्वारा उन्हें ताज पहनाना। इस कार्टून को हटाने की सिफारिश इसलिए की गई कि इससे प्रांतीय भावनाएं आहत होंगी। एक कार्टून में मतदान केन्द्र पर नेता मतदाता को हाथ जोड़कर कहता है—क्यों परेशान होते हो? जाओ तुम्हारा वोट तो हमने पड़वा दिया! यह कार्टून इसलिए हटाने की सिफारिश की कि इसमें राजनेताओं के विरुद्ध नकारात्मक संदेश है। इसी तरह के कारण गिनाते हुए कमेटी ने 21 कार्टून हटाने की सिफारिश कर दी।  विख्यात इतिहासज्ञ के.एन. पन्नीकर ने थोराट कमेटी की सिफारिशों को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए उसकी कड़ी आलोचना की। हैदराबाद विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर अरुण के. पटनायक ने कमेटी की रिपोर्ट को गलत माना। इसी तरह मृणाल मिरी, जी.बी. देशपांडे और प्रो. एस.एस. पांडियन जैसे ख्याति प्राप्त शिक्षाविद् भी कमेटी की रिपोर्ट से सहमत नहीं हैं। यहां तक कि एन.सी.ई.आर.टी. की निदेशक प्रवीण सिक्लेंर ने भी थोराट कमेटी की रिपोर्ट को अतार्किक बताया। और फिर अखबारों में खबरें छपीं कि एन.सी.ई.आर.टी. ने सिर्फ दो कार्टूनों को हटाने का निर्णय किया है। इनमें एक कार्टून अंबेडकर-नेहरू वाला है। दूसरा कार्टून हिन्दी विरोधी आन्दोलन से सम्बंधित है। निश्चय ही यह एक बेहतर निर्णय है। आखिर शैक्षणिक क्षेत्र में राजनीतिक हस्तक्षेप की जरूरत ही क्या है?
'टाइम' की कवर स्टोरी
'टाइम' पत्रिका ने अपने 8 जुलाई के अंक में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को 'अंडर अचीवर' बताते हुए लिखा कि भारतीय अर्थव्यवस्था की गति बहुत सुस्त चाल से चल रही है, लेकिन प्रधानमंत्री कोई फैसले नहीं ले पा रहे। भ्रष्टाचार और घोटालों पर भी वे सख्त कदम नहीं उठा पा रहे हैं। विकास दर स्थिर है और महंगाई पर नियंत्रण नहीं हो रहा। तीन साल पहले डॉ. मनमोहन सिंह को लाखों लोगों की जिन्दगियां बदलने वाला शख्स बताने वाली 'टाइम' पत्रिका ने लिखा, अर्थव्यवस्था के उदारीकरण में वैश्विक प्रशंसा पाने वाले मनमोहन सिंह अब सुधारों पर कड़े फैसले लेने के अनिच्छुक लगते हैं। 'टाइम' की यह स्टोरी मीडिया में सुर्खियां बनी और सबने अपने-अपने ढंग से इसकी व्याख्या की। समीक्षकों ने 'टाइम' के इस आकलन की आलोचना की और भारतीय मामलों में एक विदेशी पत्रिका का अनावश्यक दखल बताया। यह सही है कि मनमोहन सिंह पर कुछ टिप्पणियां की गईं। लेकिन यह भी सच है कि कोई नई बात नहीं कही गई। 'टाइम' ने प्रधानमंत्री के बारे में जो लिखा वह भारतीय मीडिया में लगातार छपता रहा है। ऐसे में, 'टाइम' की स्टोरी को अनावश्यक तूल देने की क्या जरूरत है?

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आमिर खान के टीवी 'शो' के बहाने

'सत्यमेव जयते' की कडिय़ों में अब तक जो मुद्दे उठाए गए, वे अलग-अलग मंचों पर कई बार उठाए जा चुके हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में भी इन पर कई-कई बार रोशनी डाली गई है। इसके बावजूद आमिर के शो में ताजगी है। दर्शक उसे पसंद कर रहे हैं।

अगर आप सामाजिक मुद्दों पर केन्द्रित आमिर खान का टीवी शो 'सत्यमेव जयते' देखते हैं तो आपने महसूस किया होगा, इसके एपिसोड दिल को छू जाते हैं और हमें सोचने को मजबूर कर देते हैं। आमिर अपने शो में जो मुद्दा उठाते हैं उसे दर्शकों का पूरा समर्थन मिलता है। एपिसोड में आमिर द्वारा प्रस्तुत किए गए वास्तविक पात्रों के साथ दर्शक तादात्म्य करते दिखाई पड़ते हैं। दर्शक इन पात्रों के साथ भावुक होते हैं, दुखी होते हैं और ठहाके मारकर हंसते भी हैं। अब तक जो विषय उठाए गए वे असरदार रहे। सोशल और मुख्यधारा के मीडिया में इन पर चर्चाएं हुईं। कन्या भ्रूण हत्या के मुद्दे को तो आश्चर्यजनक जन समर्थन मिला।
इसमें दो राय नहीं, 'सत्यमेव जयते' की कडिय़ों में अब तक जो मुद्दे उठाए गए, वे अलग-अलग मंचों पर कई बार उठाए जा चुके हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में भी इन पर कई-कई बार रोशनी डाली गई है। कन्या भ्रूण हत्या, बाल यौन शोषण, अन्तरजातीय विवाह, घरेलू हिंसा से लेकर बीते रविवार को उठाई गई युवाओं में शराबखोरी की लत जैसी सामाजिक समस्याएं पहली बार सामने नहीं लाई गईं। ब्रांडेड बनाम जेनेरिक दवाएं और जैविक खेती जैसे राष्ट्रीय मुद्दों पर भी मीडिया में निरन्तर बहसें प्रकाशित-प्रसारित होती रही हैं। इसके बावजूद आमिर के शो में ताजगी है। दर्शक उसे पसंद कर रहे हैं। सवाल यह है कि मीडिया में अनेक बार उठाए गए मुद्दों पर बना एक टीवी शो कैसे अपना असर छोडऩे में कामयाब है? अगर हम यह पड़ताल करें तो संभव है इसके निष्कर्ष युवा पत्रकारों के लिए फायदेमंद साबित हों। आइए, आमिर के इस शो के बहाने हम इस पर चर्चा करें।
कैसे शुरुआत करें?
किस विषय को कैसे उठाएं कि शुरुआत में ही स्पष्ट हो जाए कि समस्या क्या है। अखबार की भाषा में कहें तो यह इंट्रो है। आमिर फसलों में कीटनाशकों के घातक परिणाम बताना चाहते हैं। वे गृहणियों से पूछते हैं। आप जो ताजा फल और सब्जियां बाजार से खरीद कर लाई हैं, उनमें कीटनाशकों का जहर भी छुपा हो सकता है—क्या आप जानती हैं? इसी तरह युवाओं में शराब की लत को फोकस करने के लिए आमिर शुरुआत ही युवा दर्शकों से यह पूछकर करते हैं— क्या आप कभी-कभी या अक्सर शराब का सेवन करते हैं? युवाओं के हां कहने पर वे कारण पूछते हैं। कोई बताता है—मस्ती के लिए तो कोई और कारण बताता है। आमिर सभी को मिलाकर एक निष्कर्ष की तरफ बढ़ते हैं कि कैसे कभी-कभी शराब पीना एक लत बन जाती है, जो आखिर में एक बीमारी का रूप धारण कर लेती है। ताजा फल और सब्जियों का उदाहरण देकर आमिर न केवल कीटनाशकों के घातक दुष्परिणामों को सामने लाते हैं, बल्कि जैविक खेती की उपयोगिता और विशेषताओं को भी प्रभावी ढंग से उजागर करते हैं।
प्रमाणित करें
किसी भी मुद्दे को अगर प्रामाणिक ढंग से उठाया जाए तो उसका असर जरूर होता है—यह भी 'सत्यमेव जयते' से सीखा जा सकता है। आमिर केवल नैतिक उपदेश या भाषण नहीं देते—वे समस्याओं को प्रामाणिक ढंग से आपके सामने रखते हैं। हमारे देश में निशक्त जन की आबादी और उनकी समस्याओं को उन्होंने इसी तरह अपने शो में रखा। एक उदाहरण देखिए—'सरकार कहती है, हमारी जनसंख्या का 2 फीसदी हिस्सा निशक्त है। ज्यादातर विशेषज्ञ और गैर सरकारी संगठन इस आंकड़े को 6 फीसदी तक बताते हैं। मैं सोचता हूं कि देश के विभिन्न हिस्सों में निशक्त जनों का यह आंकड़ा 6 से 10 फीसदी के बीच हो सकता है। मान लेते हैं कि यह 8 फीसदी है। 1.20 अरब जनसंख्या का 8 फीसदी यानी 9.6 करोड़ लोग। यह जनसंख्या इंग्लैंड की जनसंख्या (5.1 करोड़), फ्रांस की जनसंख्या (6.5 करोड़) और जर्मनी की जनसंख्या (8 करोड़) से भी ज्यादा है।' आमिर सवाल उठाते हैं— 'क्या हम अपनी 9.6 करोड़ आबादी को अशिक्षित, बेरोजगार और अनुत्पादक बने रहना चाहते हैं?' निश्चय ही भारत में निशक्तजन की समस्याओं को आमिर न केवल प्रामाणिकता देते हैं, बल्कि आम जन को उनके प्रति सोचने को मजबूर भी करते हैं। आमिर अपने शो की विभिन्न कडिय़ों में यही तरीका अपनाते हैं। वे खेती में कीटनाशकों का निर्माण करने वाली कंपनियों के तर्कों को खारिज करते हैं। वे कीटनाशकों के व्यापार का खोखलापन उजागर करते हुए आंकड़ों का सहारा लेते हैं— 'कीटनाशक की 1 प्रतिशत मात्रा ही कीटों को मारने के काम आती है। शेष 99 प्रतिशत भोजन के जरिए हमारे शरीर में पहुंचते हैं।' बेशक आमिर आंकड़ों और तर्कों के लिए विशेषज्ञों का सहारा लेते हैं, परन्तु विषय को प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करने के सभी उपाय करते हैं।
संवेदनाओं को छूएं
आमिर में एक रूखे विषय को भी भावनाओं के स्पर्श से सरस बना देने की खूबी है। जब आप आंकड़ों और तथ्यों का जाल बुनते हैं तो दर्शक या पाठक उसमें उलझकर असली समस्या से दूर चला जा सकता है। आमिर अपने दर्शकों को मूल मुद्दे से तनिक भी भटकने नहीं देते। इसके लिए वे संवेदनाओं का सहारा लेते हैं। जेनेरिक और ब्रांडेड दवाओं के व्यापार की पोल वे विभिन्न दवाओं की कीमतों में तुलनात्मक अन्तर से बखूबी खोल देते हैं। (20 पैसे की एक गोली ब्रांडेड बनाकर साढ़े 12 रुपए में बेची जाती है।) पर वे एक भावनात्मक तथ्य पर लोगों का ध्यान खींचते हैं— 'किसी लाइलाज बीमारी से अपने बच्चे को लड़ते देखना और उसकी मृत्यु हो जाना एक दुखदायी और कटु सत्य है। खासकर जब हम एक लाइलाज बीमारी के सामने कुछ भी कर पाने में असमर्थ हों। पर, यदि किसी बीमारी का इलाज मौजूद हो और इलाज का खर्च वहन न कर पाने के कारण मेरा बच्चा मर जाए तो यह अकल्पनीय त्रासदी है।'
गहन अध्ययन करें
किसी मुद्दे की तह में जाने के लिए आपको उसके सारे पक्षों को खंगालना पड़ेगा। विषय के सभी अच्छी-बुरे पहलुओं को समझाना होगा। फिर उसे तर्क की कसौटी पर परखना होगा। तभी किसी मुद्दे पर संतुलित दृष्टिकोण रखा जा सकता है। आमिर जब प्रेम-विवाह और अपनी पसंद के जीवन-साथी का मुद्दा उठाते हैं तो युवाओं की पसंद को प्राथमिकता देते हैं। लेकिन वे माता-पिता की सीख और अनुभवों की भी अनदेखी नहीं करते। वे कहते हैं— 'मेरा मानना है कि बड़ों की सलाह में दम होता है और निश्चित रूप से युवाओं को उनकी सलाह का इस्तेमाल करना चाहिए।' इसी तरह महंगी दवाओं वाले एपिसोड में आमिर समस्या की तह में जाते हैं। आखिर दवाओं का यह महंगा व्यापार क्यों फल-फूल रहा है? जन स्वास्थ्य का विषय जन कल्याणकारी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता में होना चाहिए। लेकिन सरकार हमारी जीडीपी की मात्र 1.4 फीसदी राशि ही जन स्वास्थ्य सेवाओं के लिए आवंटित कर रही है। आमिर एक सेलेब्रिटी हैं। उनके पास किसी मुद्दे पर शोध के लिए एक टीम है। टीम सभी संसाधनों से परिपूर्ण है। इसलिए जो काम आमिर खान कर सकते हैं, वह एक सामान्य पत्रकार नहीं कर सकता। इसमें काफी हद तक सच्चाई भी है। इसके बावजूद उनका यह शो किसी मुद्दे को उठाने की खास शैली, उसके प्रति संतुलित दृष्टिकोण तथा पूरी तैयारी और सजगता को जाहिर करता है, जिससे हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। खासकर, तब जब हम एक्सक्लूसिव स्टोरी या विशेष रिपोर्ट तैयार करते हैं।

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फैसला शानदार, लागू हो पूरे देश में

टिप्पणी
 गेहूं की बर्बादी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जो सख्त रुख अपनाया है उसकी जितनी तारीफ की जाए, कम है। कोर्ट की लखनऊ बेंच का यह आदेश कि जिन अधिकारियों की वजह से अनाज सड़ता है, उनके वेतन से इस नुकसान की भरपाई की जानी चाहिए— पूरे देश के गैर-जिम्मेदार अधिकारियों के लिए एक नजीर है।
गेहूं की बर्बादी पर कोर्ट अनेक बार चिन्ता जाहिर कर चुका है। देश की सर्वोच्च अदालत तक कह चुकी है कि अनाज बर्बाद करने से अच्छा यह है कि उसे गरीबों में मुफ्त बांट दिया जाए। लेकिन न तो सरकार और न ही अधिकारियों ने न्यायालय के निर्देशों की परवाह की। उल्टे केन्द्र सरकार ने उपेक्षापूर्ण रुख अपनाया और बेशर्मीपूर्वक कह दिया कि नीतिगत रूप से यह सही नहीं होगा कि लोगों को मुफ्त में अनाज बांट दिया जाए। लगता है सरकार और उसके कारिन्दों की जनता के प्रति न तो कोई जवाबदेही है और न ही परवाह। उन्हें अपने वेतन-भत्तों और सुख-सुविधाओं के सिवा कुछ सूझता ही नहीं। इलाहाबाद न्यायालय ने यह आदेश एक जनहित याचिका पर दिया जिसमें कहा गया कि लखीमपुर खीरी में एक हजार बोरियों से ज्यादा गेहूं बारिश की वजह से सड़ गया। बारिश से गेहूं सड़ जाने के ऐसे समाचार राजस्थान हो या मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ हो या पश्चिम बंगाल देश के हर राज्य से मिलते हैं। और हर साल मिलते हैं। यानी लाखों टन गेहूं सिर्फ इसलिए बरबाद हो जाता है कि उसे रखने के लिए सरकार के पास जगह नहीं है। कृषि प्रधान देश में इससे बड़ी कोई विडम्बना नहीं हो सकती कि अच्छी मात्रा में पैदा हुए अन्न को रखने के लिए भंडारण की उचित व्यवस्था नहीं है।
कुछ समय पहले ही सरकार ने संसद में सदस्यों के चिन्ता जाहिर करने पर आश्वस्त किया था कि गेहूं के भंडारण की समुचित व्यवस्था की जाएगी। लेकिन सरकार का यह वादा खोखला साबित हुआ। इसका प्रमाण है कि मानसून पूर्व बारिश के दौरान ही जगह-जगह से गेहूं की बोरियां भीगकर सडऩे के समाचार मिलने लगे और अब तक हजारों टन अनाज सड़ चुका है। जिस देश में ३०-३५ करोड़ लोगों को दो वक्त की रोटी नसीब न हो, वहां ऐसे हालात दयनीय हैं। होना तो खुश चाहिए कि इस बार लक्ष्य से ज्यादा अनाज का उत्पादन हुआ, लेकिन दिल रोने को कर रहा है। क्योंकि हमारी आंखों के सामने अनाज बरबाद हो रहा है। दरअसल, भंडारण की व्यवस्था तो एक आड़ है जिसे देश की नाकारा नौकरशाही ने जानबूझाकर ओढ़ रखी है। सारी दिक्कत अधिकारियों के कुप्रबंधन की है। पिछले साल यूपी के भंडारागार निगम के ११ में से ६ गोदाम एक निजी कंपनी को किराए पर दे दिए गए थे, जिसमें उसने कोल्ड ड्रिंक, सिगरेट और शराब की बोतलें भंडारित कर रखी थीं। दूसरी तरफ गेहूं बाहर सड़ रहा था। कमोबेश ऐसे हालात सभी राज्यों में हैं। अधिकारियों की अन्न के प्रति यह बेकद्री इसलिए है कि उनके पेट भरे हुए हैं। अनाज सडऩे पर उनसे कोई सवाल नहीं पूछता। सरकार और उसके मंत्री सोए हुए हैं। उल्टे वे भ्रष्ट और लापरवाह अधिकारियों को प्रश्रय ही देते हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला उनकी नींद उड़ाने वाला साबित होगा। देश भर में यही हालात हैं, ऐसे में इलाहाबाद कोर्ट का यह फैसला देश के सभी राज्यों पर लागू होना चाहिए। नुकसान की भरपाई जब अधिकारियों के वेतन से होगी, तब आप देखिएगा कि कैसे अनाज की हिफाजत होती है और कैसे गेहूं की बोरियां सुरक्षित रहती हैं। सड़ा हुआ अनाज शराब बनाने के काम भी आता है, जो शराब कंपनियों को नीलामी में बेचा जाता है। कहीं यह सब भ्रष्ट अफसरों और शराब कंपनियों की मिलीभगत का खेल तो नहीं— इसकी तहकीकात की भी जरूरत है।

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