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महंगाई से हैं सब परेशान

सरकार में बैठे लोगों का मानना है कि आम आदमी की क्रय शक्ति बढ़ी है इसलिए वह महंगाई से इतना त्रस्त नहीं है, जितना मीडिया में बताया जा रहा है। तेल कंपनियों की सोच भी यही है कि लोग बढ़े हुए दाम चुकाने में सक्षम हैं। जिन पर महंगाई को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी है, वे अजीबो-गरीब तर्क देते हैं। वे कहते हैं खाद्य वस्तुओं के दाम बढऩा अर्थव्यवस्था
के विकास का प्रतीक है।

'मौत की ओर ले जा रही महंगाई'  (पत्रिका: 5 नवम्बर) समाचार पढ़ा तो लगा केरल हाईकोर्ट ने मुझ जैसे करोड़ों भारतवासियों के दिल की बात कह दी। यह प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जयपुर से श्याम सिंह आढ़ा ने लिखा— 'महंगाई ने पहले से ही मार रखा है। उस पर महीने-दो महीने से बढ़ती पेट्रोल की कीमतें मरे हुए पर लात मारने जैसी लगती है। आम आदमी महंगाई से कराह रहा है, लेकिन यूपीए सरकार कुंभकर्ण की तरह बेसुध होकर सोई हुई है।'
प्रिय पाठकगण! पिछले दिनों महंगाई बढऩे के समाचार मीडिया में लगातार सुर्खियां बने हुए थे। इसी बीच तेल कंपनियों ने भी फिर पेट्रोल की कीमतें बढ़ाने की घोषणा कर दी। सरकार में बैठे लोगों का मानना है कि आम आदमी की क्रय शक्ति बढ़ी है इसलिए वह महंगाई से इतना त्रस्त नहीं है, जितना मीडिया में बताया जा रहा है। तेल कंपनियों की सोच भी यही है कि लोग बढ़े हुए दाम चुकाने में सक्षम हैं। जिन पर महंगाई को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी है, वे अजीबो-गरीब तर्क देते हैं। वे कहते हैं खाद्य वस्तुओं के दाम बढऩा अर्थव्यवस्था के विकास का प्रतीक है।
क्या वाकई ऐसा है? क्या सचमुच महंगाई से लोग परेशान नहीं है? एक नमूना आपने ऊपर देखा। आइए देखते हैं, क्या कहते हैं आम नागरिक।
रायपुर से उमा धरेन्द्रा ने लिखा— 'हम पति-पत्नी दोनों नौकरी करते हैं। दो बच्चे और सास-ससुर हैं। कुल छह सदस्यों का परिवार चलाना हम दोनों के लिए दिनोंदिन मुश्किल होता जा रहा है। ग्रोसरी, दूध व सब्जियों पर ही आधा वेतन खर्च हो जाता है। रही-सही कसर पेट्रोल निकाल देता है। बच्चों की स्कूल फीस कमर तोड़ देती है। बीमार सास के लिए बहुत महंगी दवाएं खरीदनी पड़ती है। ऊपर से कार की किस्त! हम दोनों अब कार बेचने की सोच रहे हैं। लेकिन बच्चे रोक रहे हैं। उन्हें कैसे समझाएं।'
इंदौर से कृष्णदास 'कौशल' ने लिखा— 'हमारे देश जैसा शायद ही कहीं विचित्र आर्थिक-तंत्र होगा। महंगाई रोकने के लिए रिजर्व बैंक बार-बार ब्याज दरें बढ़ाता है। पेट्रोल कंपनियां बार-बार दाम बढ़ाकर पानी फेर देती हैं।'
उदयपुर से प्रवीण भनोत ने लिखा— 'केन्द्र सरकार झूठी है। वह कहती है पेट्रोल की कीमतों पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। जबकि उसका पूरा नियंत्रण है। पिछली बार कुछ राज्यों में चुनाव होने वाले थे। घाटा उठाकर भी तेल कंपनियां दाम बढ़ा नहीं पा रही थीं। क्यों? चुनाव हो गए तो ये कंपनियां एक दिन भी नहीं रुकी। इन्हें चुनाव होने तक कौन रोक रहा था, क्या जनता नहीं जानती?'
कोटा से इंद्र मोहन थपलियाल ने लिखा— 'तेल कंपनियों से सरकार की साठगांठ साफ समझ में आती है। पेट्रोल के दाम कंपनियों को बढ़ाने है, लेकिन लोगों को मानसिक रूप से तैयार करने का काम सरकार करती है। कुछ दिनों पहले से ही मंत्रियों के बयान छपने लगते हैं। इस बार भी कंपनियों ने पेट्रोल के दाम ३ नवम्बर को बढ़ाए थे लेकिन पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी का बयान २२ अक्टूबर को ही अखबारों में प्रकाशित हो गया।'
भोपाल से संदीप राठोड़ ने लिखा— 'पेट्रोल की कीमतों को सरकार क्यों रोकेगी? उसकी तो चांदी ही चांदी है। एक ही झाटके में करोड़ों रु. का कर सरकारी खजाने को भर देता है। पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने सही कहा— अगर सरकार पेट्रोल पर करों का मोह छोड़ दे, तो आज जनता को २३.३७ रु. लीटर पेट्रोल मिल सकता है।'
जोधपुर से के.एल. पंवार ने लिखा— 'पेट्रोल की कीमतों को अन्तरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों से जोडऩा एक सही तर्क तभी होगा, जब अन्य पेट्रो उत्पादों के दाम भी बढ़े। केरोसिन के दाम इसलिए नहीं बढ़ते, क्योंकि वह गरीबों के लिए है। डीजल इसलिए महंगा नहीं कर सकते, क्योंकि ट्रक मालिकों की लॉबी बहुत मजबूत है। पेट्रोल के उपभोक्ता असंगठित हैं। सबसे ज्यादा मार इसी वर्ग पर पड़ रही है।'
ग्वालियर से असीम गुप्ता ने लिखा— 'तेल कंपनियां पेट्रोल के दाम बढ़ाने से पहले हर बार घाटे का तर्क देती है। कोई इनकी बैलेंस शीट तो देखें। करोड़ों का मुनाफा कमा रही है।'
उदयपुर से शरद माथुर ने लिखा— 'चीन ने महंगाई को कैसे काबू में किया, इससे भारत को सीखना चाहिए। चीन ने मुक्त बाजार के दौर में भी मूल्य नियंत्रण की नीति अपनाई। कंपनियों को दो टूक आदेश दिया कि किसी भी सूरत में 5 फीसदी से ज्यादा कीमतें नहीं बढ़ाई जाएंगी।'
अलवर से सुरेश यादव के अनुसार— 'अच्छे मानसून और गोदाम भरे होने के बावजूद महंगाई बढ़ी। साफ है कि जमाखोरों, कालाबाजारियों और बिचौलियों पर हमारी सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है।'
जबलपुर से शीतल मिश्र ने लिखा— 'इजरायलवासियों की तरह हमें भी महंगाई के विरोध में सड़कों पर उतरना चाहिए। केरल हाईकोर्ट ने सही टिप्पणी की—लोगों को राजनीतिक दलों से महंगाई से राहत का इंतजार नहीं करना चाहिए। खुद आगे आकर विरोध करना चाहिए। (पत्रिका: 5 नवम्बर)'
प्रिय पाठकगण! बेलगाम कीमतों और अनियंत्रित महंगाई पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी से न तो केन्द्र और न ही राज्य सरकारें बच सकती हैं। चुनाव के दौरान हर राजनीतिक दल महंगाई कम करने का राग अलापता है। जनता से वादे करता है और सत्ता हाथ में आते ही सब कुछ भूल जाता है। सौ दिन में महंगाई कम करने का वादा जनता भूली नहीं है। सरकार भूल गई है तो उसे याद दिलाने के लिए केरल हाईकोर्ट की टिप्पणी पर जनता को गौर करना चाहिए।

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चीन को जवाब

प्रिय पाठकगण! भारत के खिलाफ चीन की हरकतें लगातार बढ़ती जा रही हैं। हाल ही हमारे सेना प्रमुख जनरल वी.के. सिंह ने स्वीकार किया कि पाक-अधिकृत कश्मीर में करीब 4 हजार चीनी सैनिकों ने डेरा जमा रखा है। ऐसे में यह सवाल मजबूती से उठाया जा रहा है कि हमारे लिए चीन से सुरक्षा ज्यादा महत्वपूर्ण है या व्यापार। क्या हमें चीन की करतूत की अनदेखी करनी चाहिए? आखिर चीन से हमें कैसा बर्ताव करना चाहिए ताकि हमारी सम्प्रभुता को कोई चुनौती न दे सके। आइए देखें, पाठक क्या कहते हैं।

इंदौर
अरविन्द खरे ने लिखा—'न्यूयार्क टाइम्स ने खबर दी थी कि पीओके में करीब 11 हजार चीन के सैनिक मौजूद हैं। इसके बाद हमारे सेनाध्यक्ष की स्वीकारोक्ति आई (पत्रिका: 6 अक्टूबर) कि वहां 4 हजार चीनी सैनिक हैं। इसी दिन यह खबर भी छपी कि हमारे विदेश मंत्रालय ने चीन और भारत की राजधानियों में उच्चस्तरीय कूटनीतिक सैन्य मुख्यालयों की घोषणा की है। दोनों देशों की सहमति से ही यह घोषणा हुई होगी, लेकिन हमारी सीमा पर सैनिकों का जमावड़ा कर चीन ने बदनीयत जाहिर कर दी। हमें भी मुंहतोड़ जवाब देना चाहिए। विदेश मंत्रालय को तुरंत विरोध स्वरूप सैन्य मुख्यालयों की घोषणा को एकतरफा रद्द कर देना चाहिए।'
जयपुर
हरीश शुक्ल ने लिखा—'हम आतंकवाद, नक्सलवाद, महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों में इतने उलझे  हुए हैं कि हमें चीन की कारगुजारियों की तरफ ध्यान देने की फुरसत ही नहीं है। हम अक्सर पाकिस्तान की करतूत तक ही सिमट जाते हैं, जबकि चीन एक चालाक दुश्मन की तरह भारत के चारों तरफ जाल बुनता जा रहा है। दरअसल, हमें पाकिस्तान से ज्यादा चीन से खतरा है। यह बात हमारा रक्षा मंत्रालय अपनी एक रिपोर्ट में कह चुका है।'
जबलपुर
प्रमोद कुमार वाजपेयी के अनुसार—'पिछले दिनों चीन ने अरुणाचल प्रदेश में सीमा पर हमारी ओर से खड़ी की गई दीवार को गिरा दिया। यह चीन की अब तक की सबसे गंभीर हरकत थी, लेकिन भारत सरकार बयानों तक सीमित रही। अगर भारत चीनी सीमा में ऐसी कोई हरकत करता तो चीन जमीन-आसमान एक कर देता। हम कभी भी ऐसे मुद्दों को अन्तरराष्ट्रीय रूप नहीं दे पाते।'
कोटा
प्रसून गर्ग ने लिखा—'हमारी नरमी के कारण ही चीन का हौसला बढ़ता गया। हमने जब कभी थोड़ी सी भी आंख दिखाई, चीन लाइन पर आ गया। हाल ही चीन ने भारत को वियतनाम की ओर से प्रस्तावित चीन सागर में तेल की खोज से दूर रहने की चेतावनी दी। भारत ने चीन की आपत्ति सिरे से खारिज कर दी, तो चीन ने भी चुप्पी साध ली। वरना वह अपना तेवर दिखाए बिना बाज नहीं आता।'
भोपाल
शैलेन्द्र चुघ ने लिखा—'चीन की पाकिस्तान में बढ़ती गतिविधियां भारत के लिए खतरनाक हैं। आर्थिक रूप से कंगाल पाक अमरीका की धमकी के बाद चीन की गोद में पूरी तरह से बैठ गया है। हमारे आसपास तिब्बत, भूटान, नेपाल, बांग्लादेश के जरिए चीन हमें चारों ओर से घेरने की कोशिश कर रहा है। इस खतरे को हमने अब भी नहीं भांपा तो हमें पश्चाताप के सिवा कुछ हासिल नहीं होगा।'
जोधपुर
यमुना प्रसाद पुरोहित ने लिखा—'मुझे घोर आश्चर्य है कि चीन की करतूत से आंखें मूंद कर हमारे हुक्मरान चीन के रिश्तों की थोथी दुहाई देते हैं। प्रधानमंत्री चीन को हमारा सबसे बड़ा व्यापारिक साझोदार बताते हैं, तो रक्षा मंत्री चीन के साथ करीबी रिश्तों की दुहाई देते हैं। क्या कोई करीबी रिश्तेदार हमारी महत्वपूर्ण नदी ब्रह्मपुत्र पर दुनिया का सबसे बड़ा बांध बनाकर नदी के प्रवाह को रोकने की तैयारी कर सकता है?'
रायपुर
दीपचन्द कौशिक ने लिखा—'हमें चीन से व्यापारिक रिश्तों से कोई परहेज नहीं है, लेकिन उसे हमारी सम्प्रभुता का पूरा ख्याल रखना पड़ेगा। चीन ने भारतीय सीमा में घुसपैठ के सारे रिकार्ड तोड़ दिए। एक ही वर्ष में उसने 270 बार भारत में घुसपैठ की।'
अहमदाबाद
डॉ. सरयू भोजानी ने लिखा—'भारत हर तरह से चीन की चुनौती से मुकाबला करने में सक्षम है, लेकिन सरकारी तौर पर हमें ढुलमुल रवैया छोडऩा होगा। एक सक्षम प्रतिद्वन्द्वी की तरह हमें चीन से पेश आना होगा।'
ग्वालियर
अनूप सिंह ने लिखा—'भारत को आक्रामक कूटनीति अपनानी पड़ेगी। चीन की तरह भारत भी चीन के आसपास के देशों से घनिष्ठता बढ़ाए। लाओस, कंबोडिया, सिंगापुर, मलेशिया, वियतनाम, थाईलैण्ड आदि देशों से आर्थिक-सामरिक रिश्ते मजबूत करे। उत्तरी कोरिया, जापान जैसे विकसित देशों से सम्बन्ध गहरे करे। चीन को चीन की भाषा में ही जवाब देने की रणनीति अपनाए।'
भिलाई
देशराज गुप्त के अनुसार—'यह सही है कि हमें आर्थिक विकास पर ध्यान केन्द्रित करने की जरूरत है परन्तु दुश्मनों की कारगुजारियों की अनदेखी की कीमत पर नहीं। चीन ने साइबर हमला कर हमारा महत्वपूर्ण डाटा चुरा लिया। हमें क्यों पीछे रहना चाहिए।'
उदयपुर
डी.सी. चंदेल ने लिखा—'अगर देश ही नहीं बचेगा तो व्यापार क्या खाक करेंगे? हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता देश की सम्प्रभुता होनी चाहिए।'

  प्रिय पाठकगण! यह सही है कि पड़ोसी देशों से परस्पर तनाव और झागड़े हमारी प्राथमिकता में नहीं है, लेकिन कोई अगर राष्ट्र की सम्प्रभुता को चुनौती पेश करे तो वह हमें कतई स्वीकार नहीं होनी चाहिए। किसी भी कीमत पर नहीं। चीन या भारत के प्रति दुश्मनी रखने वाले देश को यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि भारत एक कमजोर देश है, जिसे कभी भी आंख दिखाई जा सकती है। भारत की तरफ तिरछी नजर करने से पहले उसे सौ बार सोचने की जरूरत पड़े।

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जख्मों पर नमक

प्रिय पाठकगण! 
पेट्रोल के दाम बढ़ने से हर कोई नाराज है। पाठकों का तर्क है कि जब अन्तरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रो-उत्पाद के दाम नहीं बढ़े, तो भारतीय तेल कंपनियों ने क्यों बढ़ाए? पाठकों की राय में तेल कंपनियां जनता को लूट रही हैं। सरकार से इनकी मिलीभगत है। सरकार जनता को राहत की बजाय विभिन्न वस्तुओं के दाम बढ़ाकर और ज्यादा भार डाल रही है। यह जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है।
आइए देखें, पाठक क्या कहते हैं- 
जयपुर
'मुझे उस दिन अखबार (पत्रिका: 16 सितम्बर) पढ़कर लगा जैसे सरकार ने आम आदमी को पेट्रोल से बुरी तरह झुलसा डाला और ऊपर से घावों पर नमक भी छिड़क दिया।'
इन शब्दों में अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए के.सी. गुप्ता ने लिखा- 'फ्रंट पेज पर ही दोनों खबरें छपी थीं। पहली खबर पेट्रोल के दाम फिर बढ़ाने को लेकर थी तो दूसरी खबर रसोई गैस सिलैण्डर पर सब्सिडी हटाने के प्रस्ताव के बारे में थी। एक तीसरी खबर भी नश्तर की तरह चुभ रही थी- किस मंत्री की सम्पत्ति कितनी बढ़ी जिसमें कुछ केन्द्रीय मंत्रियों की बेशुमार बढ़ती दौलत को ग्राफिक में दर्शाया गया था। लगा कि सरकार हम गरीबों पर एक साथ प्रहार करने को आमादा है।'
अजमेर
हरिश्चन्द्र अटलानी ने लिखा- 'पेट्रोल के दाम बढ़ने से कुछ दिन पहले ही राजस्थान में बिजली की दरें बढ़ाई गई थीं। पेट्रोल के दाम बढ़े तो अगले दिन रिजर्व बैंक ने ब्याज दर भी बढ़ा दी। इसके तत्काल बाद राज्य सरकार ने रोडवेज का किराया बढ़ा दिया। फिर सरस घी महंगा किया। अगले दिन सरस दूध के दाम भी बढ़ा दिए। निर्यात पर रोक हटाने से प्याज और ज्यादा महंगा मिलने लगा। क्या राज्य, क्या केन्द्र की सरकार, जिसे मौका मिलता है, वही आम आदमी पर महंगाई रूपी गाज गिरा रही है। क्या ये जन कल्याणकारी सरकारें हैं?'
रतलाम
मुन्नालाल गर्ग के अनुसार- 'भारत में पेट्रोल कंपनियों ने हद कर दी। चारों बड़ी कंपनियों की बेलेंस शीट करोड़ों का मुनाफा बता रही हैं। फिर भी पेट्रोल के दाम मनमर्जी ढंग से बढ़ा रही हैं। सरकार से मिलीभगत के बिना यह संभव नहीं। पेट्रोल कंपनियों से ज्यादा बड़ी गुनहगार सरकार है जिसने उन्हें कीमतों से नियंत्रण मुक्त कर लोगों को लूटने का ठेका दे दिया।'
इंदौर
सुशान्त राघव ने लिखा- 'विश्व के 98 देश ऐसे हैं जहां भारत से सस्ता पेट्रोल मिलता है। क्या वहां की कंपनियां घाटे में चल रही हैं? अलग-अलग देशों की परचेजिंग पावर को ध्यान में रखते हुए देखें तो भारत में पेट्रोल की दर सबसे महंगी है। अगर यही हाल रहा तो जनता भ्रष्टाचार की तरह पेट्रोल के दामों के खिलाफ भी सड़कों पर उतर आएगी।'
जोधपुर
गोपाल अरोड़ा ने लिखा- 'सरकार ने तेल कंपनियों को नियंत्रण मुक्त कर उन्हें जनता को लूटने के लिए छोड़ दिया। तीन वर्ष पहले जब पेट्रोल का अंतरराष्ट्रीय भाव 138 डॉलर प्रति बैरल था तब भारत में पेट्रोल 50 रुपए लीटर था। अब जब भाव गिरकर 111 डॉलर प्रति बैरल हो गया तो पेट्रोल के दाम 71 रुपए लीटर जा पहुंचे।
भोपाल
रविन्द्र भदौरिया ने लिखा- 'केन्द्र सरकार पेट्रोल-डीजल से भारी-भरकम राजस्व की वसूली करती है। वर्ष 2009-10 में पेट्रोल-डीजल से 90 हजार करोड़ रुपए लोगों से वसूले गए। वर्ष 2010-11 में यह राशि एक लाख करोड़ रुपए से भी ऊपर पहुंच गई। इसके बाद राज्य सरकारें वैट और सैश के नाम पर जो शुल्क वसूलती हैं, वह अलग है।'
रायपुर
सुबोधकान्त ने लिखा- 'पेट्रोल पर लोगों की निर्भरता इतनी बढ़ गई कि दाम बढ़ते ही उनका बजट लडख़ड़ा जाता है। हमारी सरकार अदूरदर्शी है। उसे बॉयो फ्यूल उत्पादन पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में बॉयो फ्यूल की अपार संभावनाएं हैं।'
कोटा
राम स्वरूप राही के अनुसार- 'अब समय आ गया है कि हम पेट्रो-पदार्थों के विकल्पों की ओर बढ़ें। बैट्री और सौर ऊर्जा से चलने वाले वाहनों को बढ़ावा दें ताकि तेल कंपनियों का एकाधिकार खत्म हो। एथेनॉल और बॉयो फ्यूल भी विश्व भर में पेट्रो-विकल्प के तौर पर देखें जा रहे हैं।'
अलवर
निधि अग्रवाल ने लिखा- 'राजस्थान में अन्य कई राज्यों से पेट्रोल महंगा है। इसलिए पत्रिका की मुहिम 'नो व्हीकल डे' (पत्रिका: 19 सितम्बर) अच्छा सुझाव है। राजस्थान विश्वविद्यालय की तरह उम्मीद है, अन्य संस्थाएं और संगठन भी आगे आएंगे।'
सीकर
गजेन्द्र सोलंकी ने लिखा- 'पेट्रो पदार्थ वैसे भी दुनिया में बहुत सीमित मात्रा में बचे हैं। इसलिए पेट्रोल-डीजल के विकल्पों के अलावा हमारे पास कोई चारा भी नहीं है।'
उदयपुर
गजेन्द्र पालीवाल ने लिखा- 'भारत में पेट्रोल पर सरकार लालची व्यापारी की तरह 50 फीसदी तक टैक्स वसूलती है। अगर सरकार इस दर को तर्क सम्मत बना दे तो भारत में भी अमरीका व चीन की तरह सस्ता पेट्रोल मिल सकता है।'
प्रिय पाठकगण! पेट्रोल के दाम बढ़ने से लोगों की मुश्किलें बढ़ी हैं। इसलिए आम आदमी सरकार को कोस रहा है। सरकार का दायित्व है, वह तेल कंपनियों की दरें बढ़ाने पर निगरानी रखे। यह भी सच है कि हम पेट्रो-पदार्थों के विकल्पों पर जोर दें तथा पेट्रोल बचत के उपायों को भी रोजमर्रा की जिन्दगी में अपनाएं।

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जनता में गुस्सा

प्रिय पाठकगण! दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर आतंकी धमाके पर पाठकों की तीखी प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुई हैं। ऐसी घटनाओं को रोकने में विफल सरकार और नेताओं के प्रति लोगों में किस कदर गुस्सा है, इसकी साफ झलक देखी जा सकती है।
जयपुर
मनोज पूर्बिया ने लिखा- 'सात सितम्बर को टीवी चैनलों पर धमाके की खबर देखकर बहुत दुखी था। लेकिन अगले दिन सुबह अखबार (पत्रिका) में गृहमंत्री पी. चिदम्बरम का बयान पढ़कर गुस्से को काबू करना मुश्किल हो गया था। गृहमंत्री के अनुसार- दिल्ली पुलिस को जुलाई में खुफिया अलर्ट दिया गया था, लेकिन हमला नहीं रुक सका। इन्हीं गृहमंत्री महोदय ने 26/11 के मुंबई हमलों के दौरान फरमाया था मुंबई पुलिस को खुफिया जानकारी नहीं मिल पाई, इसलिए हमले हो गए। यानी एक आतंकी हमला इसलिए हुआ कि खुफिया जानकारी नहीं थी। और एक आतंकी हमला इसके बावजूद हुआ कि खुफिया जानकारी थी। आखिर चिदम्बरम देश की जनता को क्या समझते हैं। चिदम्बरम के ये बयान सही थे तो भी और गलत हैं तो भी- उन्हें गृहमंत्री का पद सुशोभित करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। 10 सितम्बर की पत्रिका में उनका बयान फिर पढ़ने के बाद तो साफ लगता है कि उन्हें अब घर बैठ जाना चाहिए। आपको याद दिलाऊं उन्होंने क्या कहा- 'कोई नहीं कह सकता कि आगे कोई आतंकी हमला नहीं होगा।' यानी जनता तैयार रहे- भारत में कहीं भी, कभी भी दिल्ली हाईकोर्ट जैसे धमाकों के लिए!'
इंदौर
राहुल मोघे ने लिखा- 'ये नेता, जो जिम्मेदार पदों पर बैठे हैं, ऐसे बयान कैसे दे सकते हैं। क्या इनकी जिम्मेदारी सिर्फ बयानों तक सीमित है। क्या इन लोगों ने अपने-अपने पदों की जिम्मेदारियां निभाने की शपथ नहीं ली। बहुत अफसोस हुआ जब हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी कह दिया- 'हमारे सिस्टम में कमी है। सिस्टम में स्पष्ट रूप से ऐसी दिक्कते हैं जिसका आतंककारी फायदा उठाते हैं।' लगातार 7 वर्ष से अधिक समय तक प्रधानमंत्री रहने के बावजूद अगर वे सिस्टम में कमियों को नहीं सुधार पाये तो दोष किसका?'
ग्वालियर
गिरीश नैथानी  ने लिखा- 'दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को बड़ी कोफ्त होती है जब लोग 9/11 की घटना के बाद अमरीका का उदाहरण देते हैं। अरे भई, यह इंडिया है। यहां और वहां फर्क है। अमरीका ने 9/11 के बाद 10 वर्षों में कोई आतंकी वारदात अमरीका की धरती पर नहीं होने दी। इंडिया 10 वर्ष में 19 वारदातें झेल गया।'
उदयपुर
दीप शिखा गुप्ता ने लिखा- 'आतंकी घटनाओं से देशवासियों में कितना रोष है, यह हाईकोर्ट परिसर में विस्फोट से घायलों को अस्पताल देखने पहुंचे नेताओं के सामने साफ नजर आ रहा था। मैं उस वक्त टीवी देख रही थी। राहुल गांधी को देखकर लोग भड़क रहे थे। और राहुल सिर झुकाए पतली गली से निकलते दीखे। नितिन गडकरी, विजय मल्होत्रा जैसे नेताओं को घायलों के परिजनों ने बोलने नहीं दिया। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को भी लोगों की नाराजगी का सामना करना पड़ा। आम तौर पर स्वागत करने वाली भीड़ राजनेताओं पर भड़क रही थी। यह सिर्फ विस्फोट में मारे गए या घायलों के परिजनों का रोष नहीं था, यह देशवासियों के रोष की अभिव्यक्ति थी।'
भोपाल
शीतल उपाध्याय ने लिखा-'हूजी या किसी आतंकी संगठन की हिम्मत कैसे हो गई मीडिया को ई-मेल करने की। लगता है भारत जैसे 'नरम राष्ट्र' को इन आतंककारियों ने धर्मशाला समझ लिया है- अफजल की फांसी रद्द करो, नहीं तो और हमले होंगे। ब्लैकमेल जैसी आतंकियों की यह चेतावनी सीने में नश्तर की तरह चुभ रही है। अगर हमारी सरकार अफजल के मामले में ढिलमुल नीति नहीं अपनाती तो क्या यह नौबत आती।'
कोटा
कमल सिंह ने लिखा-'जयपुर, बेंगलुरु, अहमदाबाद, सूरत, पुणे, वाराणसी आदि शहरों में जब-जब भी धमाके हुए गृहमंत्री ने एक ही राग अलापा- यह हमला खुफिया चूक का परिणाम नहीं था। आतंकियों ने आसान निशाने को लक्ष्य बनाकर कार्रवाई की। सवाल है आतंकी मुश्किल निशानों को क्यों लक्ष्य बनाएंगे? और जिन्हें वे आसान निशाना कहते हैं उनमें मरने वाला कोई वीआईपी नहीं आम आदमी होता है। नेताओं के खोखले वक्तव्यों में अब किसी को दिलचस्पी नहीं रह गई।'
रायपुर
सौमित्र सेन ने लिखा- 'गृहमंत्री और प्रधानमंत्री के बयानों में ही विरोधाभास है। राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में प्रधानमंत्री ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि हमारा खुफिया तंत्र कमजोर है जिसे चुस्त करने की जरूरत है। ये बयानबाजियां ही चलेंगी या कोई सख्त निर्णय भी लेगी सरकार।'
जोधपुर
नवीन परिहार ने लिखा- 'सरकार के रवैये और नेताओं के बयानों से साफ झलकता है कि यह सब ऐसे ही चलता रहेगा। बेगुनाह लोग मारे जाते रहेंगे। आतंकी हमले होते रहेंगे, क्योंकि कोई नहीं कह सकता कि आगे कोई आतंकी हमला नहीं होगा। क्या इन लोगों को राज करने का कोई हक है?'
प्रिय पाठकगण! पाठकों की प्रतिक्रियाओं का सार है कि आतंकियों का खात्मा करना सरकार का दायित्व है। आखिर लोगों को सुरक्षा के लिए आश्वस्त कौन करेगा? जब सरकार ही हताश-निराश और निरूपाय दिखेगी तो जनता का क्या होगा। शायद इसीलिए सभी पाठकों की प्रतिक्रियाओं में जितना आतंकी घटनाओं पर रोष नजर आता है उतना ही सरकार की ढिलाई पर भी गुस्सा दिखाई पड़ता है।

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भ्रष्टतंत्र बनाम जनतंत्र

मैं 27  वर्षीय युवक हूं। सार्वजनिक मुद्दों में रुचि लेता हूं। आजादी के संघर्ष को किताबों में पढ़कर रोमांचित और भावुक होता रहा हूं। जेपी के आन्दोलन के बारे में भी मैंने खूब सुना था। इसलिए जब गांधीजी की तरह एक बुजुर्ग ने देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर आन्दोलन छेड़ा तो मैं इससे भावनात्मक रूप से जुड़ गया। रोज शाम को मोमबत्ती लेकर स्टेच्यू सर्कि ल पर पहुंच जाता, लेकिन जब दिन बीतने लगे तो मैं भावुक होने लगा। अन्ना का अनशन खत्म होगा या नहीं? आठ दिन-नौ दिन-दस दिन... एक-एक दिन मुझो बहुत भारी लग रहा था। आखिर बारहवें दिन प्रधानमंत्री जी की चि_ी पाकर अन्ना ने अनशन खत्म करने की घोषणा की, तो थोड़ी राहत मिली। फिर भी मन में शंका थी, कहीं रात को उन्हें कुछ हो गया तो? मुझो नींद नहीं आई। रविवार सुबह जब उनका अनशन टूटा तो चैन आया। मैं सोचता रहा आखिर मेरी इस बेचैनी की क्या वजह थी? आजकल वास्तविक मुद्दों को लेकर ऐसी मजबूती से आन्दोलन चलाने वाले कहां बचे हैं। मेरी पीढ़ी तो यही सुनती आ रही थी। अब एक विश्वास तो जगा है, अन्याय और शोषण के खिलाफ जनता का। आगे यह हौसला निरन्तर बढ़े, इसके लिए अन्ना हजारे जैसे नेतृत्वकारियों की सख्त जरूरत है। उनका जीवन अमूल्य है- शायद यही मेरी बेचैनी की वजह थी।
- दुष्यन्त पारीक, जयपुर
इस देश के लिए भ्रष्टाचार कितना बड़ा मुद्दा है, आम आदमी को अन्दर ही अन्दर मथ रहा था। अन्ना के आह्वान पर पूरा देश सड़कों पर निकल आया। कुछ घंटे या एक-आध दिन के लिए नहीं- पूरे बारह दिनों तक जनता जमी रही। जज्बा ऐसा कि बारह महीने भी आन्दोलन चलता तो लोग डटे रहते।
- रवीन्द्र कालरा, बीकानेर
मीडिया ने इस आन्दोलन को फैलाया तथा अन्ना की मजबूती और जनता के जज्बे ने सत्ता को झुकाया। यह भ्रष्टतंत्र बनाम जनतंत्र की लड़ाई थी। जिसे सिविल सोसायटी बनाम संसद की लड़ाई बनाने की चालें भी चली गईं।
- दिनेश जैन, इन्दौर
न लड़ाई अभी खत्म हुई है, न ही मुद्दा। बहुत बड़ी विजय की खामखयाली अभी न पालें तो बेहतर होगा। जन लोकपाल बिल पर एक किरण नजर आई है। कानून बनने की राह अभी दूर है। सिविल सोसायटी और व्हीसल ब्लोअर्स के सामने आगे कई चुनौतियां खड़ी हैं।
- नरेन्द्र साहू, रायपुर
जन लोकपाल बिल आन्दोलन से अभी हमें जो हासिल हुआ है, उसे कम नहीं आंकें। आन्दोलन ने सारे राजनीतिक दलों पर एक ऐसा नैतिक दबाव पैदा कर दिया है कि भ्रष्टाचार की आगे की लड़ाई अब इतनी मुश्किल नहीं रह जाएगी, जितनी आन्दोलन की शुरुआत में लग रही थी। ऊपर से लेकर निचले पायदान तक संदेश पहुंच चुका है।
- धर्मेश हाड़ा, कोटा
प्रिय पाठकगण! लोकपाल, जन लोकपाल और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर पाठक इस स्तंभ में खुलकर राय व्यक्त करते रहे हैं। १६ अगस्त को अन्ना हजारे के अनशन शुरू करने से लेकर २८ अगस्त को अनशन समाप्त करने तक अनेक पाठकों की प्रतिक्रियाएं और प्राप्त हुई हैं। इनमें कुछ चुनींदा प्रतिक्रियाओं की बानगी आपने देखी। कुछ और प्रतिक्रियाएं भी देखें।
जबलपुर से कौशल भारद्वाज ने लिखा- 'मैं एक निजी कम्पनी में कार्यरत हूं। सुबह नौ बजे से रात नौ बजे तक ड्यूटी करता हूं। अन्ना के आन्दोलन में भाग लेने के लिए सप्ताह भर छुट्टी लेकर दिल्ली गया। फिर लौट आया, लेकिन मन वहीं अटका रहा। इसलिए घर में ज्यादातर समय टीवी चैनल पर चिपका रहता हूं।'
जोधपुर से दिनेश चन्द्र पुरोहित ने लिखा- 'मीडिया से पल-पल की खबरें मिलती रहीं। सुबह-सुबह अखबार और शाम को टीवी चैनल। पिछले दस-बारह दिन की मेरी यही दिनचर्या थी। 'पत्रिका' के 'दमन पर भारी सत्याग्रह' को मैं सबसे पहले देखता था। जन लोकपाल बिल के मुद्दे को समझने में इस पृष्ठ ने मेरी बड़ी मदद की।'
उज्जैन से कृपाशंकर ने लिखा- 'दरअसल, जन लोकपाल विधेयक एक ऐसे कानून की परिकल्पना है, जिसमें ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार पर लगाम कसने की बात कही गई है। हालांकि कानून बनना एक बात है, उसे लागू करना बिलकुल दूसरी बात है। हम कई अच्छे कानूनों का हश्र देख रहे हैं। नेता और नौकरशाही उन्हें लागू ही नहीं होने देते।'
अजमेर से भगवान चन्द्र अजमानी ने लिखा- 'जन लोकपाल विधेयक से सबसे ज्यादा वही डर रहे हैं, जो भ्रष्टाचारी हैं। बड़े-बड़े घोटालों में जिन नेताओं और अफसरों के नाम हैं, वे इसे कभी लागू करना नहीं चाहेंगे। शायद इसीलिए इतने बड़े जन आन्दोलन के बावजूद एक सशक्त लोकपाल बिल बनने में इतनी अड़चनें आ रही हैं।'
उदयपुर से गौरव मेहता ने लिखा- 'अन्ना ने सही कहा, अभी आधी जीत हुई है। भ्रष्टाचार के खिलाफ मजबूत लोकपाल कानून बनना ही काफी नहीं होगा, उसे उतनी ही मजबूती से लागू कराने की भी जरूरत पड़ेगी। इसके लिए टीम अन्ना और आम जनता को तैयार रहना होगा।'
प्रिय पाठकगण! हर जन आन्दोलन का एक संदेश है। जिसका निहितार्थ है कि हम कर्तव्य और अधिकार दोनों के प्रति जागरूक रहें। इन पर आंच आए तो संघर्ष के लिए तैयार रहें। गांधीजी और अन्ना के अहिंसक संघर्ष की तरह। इसकी शक्ति बहुत बड़ी है, जिसकी एक बानगी आपने देखी। देश कितनी ही तरक्की कर ले, भ्रष्टाचार का दैत्य उसे निगल जाएगा। इसलिए इस आन्दोलन को अपने उद्देश्य तक पहुंचना बहुत जरूरी है।

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ऐसा हो लोकपाल


पाठक इसी स्तंभ में राय व्यक्त कर चुके हैं कि देश में भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए एक लोकपाल की नियुक्ति शीघ्र होनी चाहिए। सरकार के भरोसे पिछले 42 वर्षों से लोकपाल विधेयक अटका रहा। अन्ना हजारे ने अनशन किया तो सरकार हरकत में आई। आनन-फानन में समिति बनी और तय समय में लोकसभा में विधेयक भी पेश हो गया। इसलिए अब बहस का विषय यह नहीं है कि लोकपाल की नियुक्ति हो, बल्कि यह है कि सशक्त लोकपाल की नियुक्ति हो। ऐसे लोकपाल की जो भ्रष्टाचार का खात्मा करने में सक्षम हो।
क्या सरकार ने जो विधेयक पेश किया है वह इस उद्देश्य को पूरा करता है?
या अन्ना हजारे ने जो मसौदा रखा, वह इस उद्देश्य के ज्यादा नजदीक है। यानी आज बहस का विषय है कि देश का लोकपाल कैसा हो।
जैसा अन्ना हजारे और सिविल सोसाइटी चाहती है वैसा हो, क्योंकि...
या
जैसा यूपीए सरकार और गठबंधन दल चाहते हैं वैसा हो, क्योंकि...
लोकपाल पर समूची बहस इन दो बिन्दुओं में सिमट आई है। सरकार के अपने तर्क हैं, अन्ना हजारे के अपने। एक को सरकारी लोकपाल कहा जा रहा है। दूसरे को जन लोकपाल जो अन्ना हजारे और सिविल सोसाइटी के आंदोलन का मुख्य मुद्दा है। आखिर इन दोनों में क्या फर्क है, इस पर मीडिया में खूब चर्चा हो चुकी है। अनेक विशेषज्ञों के विचार सामने आ चुके हैं। पाठकों के क्या विचार हैं, यह जानना भी महत्वपूर्ण है। लोकपाल कैसा हो-इस पर पाठकों की राय जनभावनाओं का प्रतिबिम्ब है।
भोपाल से आरिफ अहमद ने लिखा-'जैसा अन्ना हजारे और उनकी टीम चाहती है वैसा लोकपाल ही नियुक्त होना चाहिए, क्योंकि यही जनभावनाएं हैं। देश के आम नागरिकों की भावनाओं का सच्चा प्रतिनिधित्व अन्ना का जन लोकपाल ही करता है, न कि सरकारी लोकपाल जिसका मसौदा संसद में पेश किया गया है। यह कपिल सिब्बल, प्रणव मुखर्जी जैसे घाघ सत्ताधीशों ने तैयार किया है। इस विधेयक के पारित होने से भ्रष्टाचारियों का बाल तक बांका नहीं होगा।'
कोटा से ज्योति जैन ने लिखा-'यह प्रणव मुखर्जी वहीं हैं जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री को शामिल करने की सिफारिश की थी। मुखर्जी लोकपाल का मसौदा तैयार करने वाली समिति के अध्यक्ष थे और तब विपक्ष में नेता थे। लेकिन आज सत्ता में आकर उन्होंने गिरगिट की तरह रंग बदल लिया।'
जयपुर से दिनेश पालीवाल ने लिखा-'सरकारी लोकपाल विधेयक की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि यह भ्रष्टाचार की शिकायत करने वाले को ही कटघरे में खड़ा कर देता है। अगर भ्रष्टाचार की शिकायत गलत पाए जाने पर किसी को जेल हो सकती है तो कोई भ्रष्टाचार की शिकायत करेगा ही क्यों?'
इंदौर से संजय नागौरी ने लिखा-'लोकपाल ऐसा होना चाहिए, जिसे भ्रष्ट व्यक्ति को दंडित करने और उसकी सम्पत्ति जब्त करने का सम्पूर्ण अधिकार हो। केवल सिफारिश करने में लोकपाल से कोई नहीं डरेगा। दोषी व्यक्ति अपनी तिकड़म और ताकत से सरकार में पूरी दखल रखता है। इसलिए वह साफ बच निकलेगा।'
उदयपुर से कैलाशचन्द गुप्ता ने लिखा-'अन्ना हजारे का लोकपाल एक शक्तिशाली लोकपाल है, जिसकी आज देश को सख्त जरूरत है। क्योंकि देश में भ्रष्टाचार अपनी चरम स्थिति में पहुंच चुका है। लोकसभा में कुल 543 सांसदों में 162 सांसद दागी हैं। 76 सांसद तो ऐसे हैं जिन पर संगीन आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं। देश में प्रतिनिधित्व जब ऐसे लोग करेंगे तो आम जनता का क्या होगा।'
रायपुर से अनिल बिस्वाल ने लिखा-'काले धन की समस्या का समाधान सशक्त लोकपाल ही कर सकता है। सरकार द्वारा प्रस्तावित लोकपाल की कोई हैसियत नहीं होगी कि वह भ्रष्टाचारियों की काली कमाई विदेशों से लाकर जब्त कर ले। काला धन आज देश का लाइलाज रोग बन चुका है। ताज्जुब होता है जब यह सुनते हैं कि भारत का लगभग 280 लाख करोड़ रुपए स्विस बैंकों में जमा है। ये कालाधन आजादी के 64 साल में देश से भ्रष्टाचारियों ने लूटा है। अंग्रेजों ने भारत पर करीब 200 साल राज किया और करीब एक लाख करोड़ रुपए लूटे, लेकिन ये भ्रष्टाचारी तो अंग्रेजों से गए-गुजरे हैं जिन्होंने महज 64 वर्षों में देश का 280 लाख करोड़ रुपए लूट लिया।'
अजमेर से दीप साहनी ने लिखा-'लोकपाल के गठन में जब 9 में से 5 सरकार के लोग होंगे तो वे शक्तिशाली लोकपाल का चुनाव करेंगे? कौन मूर्ख होगा जो अपनी सर्वशक्तिमान सत्ता को किसी दूसरे को सौंप कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारेगा।'
श्रीगंगानगर से कुलदीप चढ्ढा ने लिखा-'लोकपाल की नियुक्ति और गठन का अधिकार नागरिकों की समिति को ही दिया जाना चाहिए। भ्रष्टाचार करने वाले ही जब लोकपाल का चयन करेंगे तो निश्चय ही एक भ्रष्ट व्यक्ति को ही चुनेंगे।'
इसके विपरीत कुछ पाठकों ने राय व्यक्त की है कि लोकपाल के मुद्दे पर अन्ना हजारे और सिविल सोसाइटी को लचीला रुख अपनाना चाहिए और प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट को मुक्त रखना चाहिए।
ग्वालियर से देवेन्द्र कौशिक ने लिखा-'अन्ना हजारे का जन लोकपाल न्याय प्रक्रिया में स्थापित सिद्धांत का उल्लंघन करता है। न्याय का सिद्धांत है कि अपराध का संज्ञान लेने वाली, जांच करने वाली तथा अभियोजन करने वाली संस्थाएं अलग-अलग होनी चाहिए। लेकिन जन लोकपाल में अकेले में सारी प्रक्रियाएं समाहित की गई हैं। लोकपाल ही पुलिस, लोकपाल ही वकील और लोकपाल ही न्यायाधीश का काम करेगा। ऐसे में जन लोकपाल में एक निरंकुश, सर्वशक्तिमान अधिपति की बू आती है।'
उज्जैन से रामकृष्ण दाधीच  ने लिखा-'अत्यन्त शक्तियों से परिपूर्ण जन लोकपाल कहीं भष्मासुर का दूसरा अवतार नहीं बन जाए।'
बीकानेर से पूनमचंद सुथार ने लिखा-'भारत में सरकारी कर्मचारियों की संख्या करोड़ों में है। अकेला जन लोकपाल इन सबके भ्रष्ट कारनामों पर कैसे नजर रखा पाएगा?'
प्रिय पाठकगण! जन लोकपाल बनाम सरकारी लोकपाल की शक्तियों और कमजोरियों पर पाठकों ने खुलकर प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं, जिनसे यह तो स्पष्ट है कि देश के लिए एक सशक्त लोकपाल की जरूरत है। सरकार का लोकपाल कहीं बहुत कमजोर तो नहीं कि उसके अस्तित्व का औचित्य ही खत्म हो जाए तथा जन लोकपाल कहीं इतना ताकतवर तो नहीं कि अधिनायक बनकर लोकतंत्र को ही लील जाए। पाठकों की ये प्रतिक्रिया इसी चिन्ता की अभिव्यक्ति है। लेकिन भ्रष्टाचार के भस्मासुर का खात्मा हो, यह हर आम आदमी चाहता है। क्योंकि वहीं इससे पीडि़त है। इसलिए लोकपाल सशक्त, स्वतंत्र और सक्षम हो-यह लोकतंत्र ही नहीं देश की सेहत के लिए भी बहुत अच्छा रहेगा।
सभी पाठकों को 65वें स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं।

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आयकर वसूली

  • क्या भारत में व्यक्तिगत आयकर की वसूली खत्म कर देनी चाहिए?
  • क्या मौजूदा आयकर प्रणाली देश के सभी आयकरदाताओं के साथ समान रूप से न्याय करती है?
  • क्या काले धन की समस्या की मुख्य वजह आयकर ढांचे की विसंगतियां हैं?
प्रिय पाठकगण!  इस बार पाठकों की बहस इन्हीं बिन्दुओं पर केन्द्रित है। पाठकों ने अपने विचार 'नहीं वसूला जाए आयकर' (पत्रिका: 24 जुलाई 2011) के संदर्भ में व्यक्त किए हैं। यह रविवारीय आवरण-कथा भारत में आयकर के 150 वर्ष के अवसर पर प्रकाशित की गई थी। ज्यादातर पाठकों ने जहां व्यक्तिगत आयकर वसूली को खत्म करने के विचार का समर्थन किया है, वहीं कई पाठक आयकर ढांचे को अधिक न्याय संगत बनाने के पक्षधर हैं।
जयपुर से जी.सी. श्रीवास्तव ने लिखा- 'आयकर का सिद्धान्त है- ज्यादा कमाने वाले से ज्यादा कर और कम कमाने वाले से कम कर, लेकिन बिल्कुल उल्टा हो रहा है। हमारी वर्तमान आयकर प्रणाली छोटे, मध्यम नौकरीपेशा वर्ग से तो पाई-पाई वसूल कर लेती है, लेकिन काली कमाई करने वाले बड़े 'मगरमच्छों' के सामने लाचार नजर आती है। हां, बीच-बीच में जो छापामारी की कवायद दिखाई पड़ती है- वह जनता की आंखों में धूल झोंकने के सिवाय कुछ नहीं। हकीकत में छापे की ये कार्रवाइयां भारत जैसे विशाल देश में काली कमाई के महासागर में बुलबुले के समान हैं। जो 728 खरब रुपए का कालाधन अब तक विदेशी बैंकों में जमा हो चुका है, वह इस सच्चाई को प्रमाणित करने के लिए काफी है। ये आंकड़े भारत में आयकर के 150 साल के इतिहास के नहीं हैं, बल्कि 1961 का आयकर कानून बनने के बाद के हैं। इसमें भी ज्यादातर काली कमाई पिछले बीस-पच्चीस वर्षों के दौरान जमा की गई।'
इंदौर से अरुण सनोलिया ने लिखा-'नौकरीपेशा छोटे आयकरदाताओं के साथ आयकर पद्धति न्याय नहीं करती। इसलिए इस वर्ग के लिए आयकर एक अनचाहा उत्तरदायित्व बन गया है। पन्द्रह से पच्चीस हजार मासिक वेतन पाने वाला देश में बहुत बड़ा तबका है। यह तबका महंगाई और दूसरे आर्थिक दबावों से त्रस्त है। इन दबावों के चलते इसे कई सामाजिक समस्याओं से भी जूझना पड़ता है। कर्ज और समस्याओं से घिरे व्यक्ति को अपने अल्प वेतन का भी कुछ हिस्सा कर के रूप में चुकाना पड़ता है। दूसरी तरफ उससे अधिक कमाने वाले गैर वेतन भोगी को जब वह मजे से कर चोरी करते पाता है, तो मन मसोस कर रह जाता है।'
भोपाल से रवि कौशिक ने लिखा- 'मुझे बहुत कोफ्त होती है, जब हमारे खून-पसीने की कमाई से वसूले गए कर राजस्व का एक बड़ा हिस्सा भ्रष्ट नेता और अफसर एक झटके से घोटालों में हड़प जाते हैं।
जोधपुर से श्याम सुन्दर ओझा ने लिखा-'आयकर में स्लैब व्यवस्था न्यायपूर्ण नहीं है। 8 लाख रुपए कमाने वाला भी 30 प्रतिशत कर चुकाए और 80 लाख कमाने वाला भी 30 प्रतिशत ही चुकाए, यह उचित नहीं। ऐसे प्रावधान लोगों को कर चोरी के लिए मजबूर करते हैं।
जबलपुर से बी.के. पटेल ने लिखा- 'आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2010-11 में देश को आयकर से कुल 4 लाख 46 हजार करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त हुआ। हालांकि देश का आकार और क्षमता को देखते हुए यह राशि बहुत कम है, लेकिन यह सच्चाई है कि यह राशि हमारे सकल राजस्व में 35 फीसदी की हिस्सेदारी निभाती है। दूसरी सच्चाई यह भी है कि करीब साढ़े चार लाख करोड़ रुपए के आयकर राजस्व में निगम कर और धन कर को छोड़ दें तो व्यक्तिगत आयकर का योगदान सिर्फ डेढ़ लाख करोड़ रुपए है, जबकि 2जी घोटाला 1.76 लाख करोड़ का है। और कई घोटालों में कई लाख करोड़ का भ्रष्टाचार सामने आ चुका है। यह धन देश के नागरिकों से वसूला गया टैक्स है, जिससे कम से कम व्यक्तिगत आयकरदाताओं को तो मुक्त रखा ही जा सकता है।'
रायपुर से राजेन्द्र साहू ने लिखा-'एक तरफ छोटे करदाताओं पर बोझ लादा जाता है, दूसरी तरफ बड़े आयकरदाताओं को आयकर संबंधी कई माफी योजनाओं के जरिए लाभ पहुंचाया जाता है। इससे काला धन जमा करने वालों को ही प्रोत्साहन मिलता है। यह पढ़कर आश्चर्य हुआ कि भारत सरकार ने 2005-06 से 2010-11 के बीच कॉरपोरेट जगत को 3 लाख 74 हजार 937 करोड़ रुपए की कर माफी दी। दूसरी तरफ हम किसानों और गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों को सरकारी अनुदानों को हड़पने का दोषी ठहराते हैं। आर्थिक सिद्धान्तों के ये दोहरे मापदंड क्यों?'
उदयपुर से अंकित सामर ने लिखा- 'देश के कुल राजस्व में आयकर की हिस्सेदारी को खत्म कर दिया गया तो हमारी अर्थव्यवस्था को ऐसा तगड़ा झटका लगेगा कि हम संभल नहीं पाएंगे। आयकर खत्म करने की बजाय आयकर तंत्र को सुधारने की ज्यादा जरूरत है।'
बीकानेर से मिथिलेश गुप्ता ने लिखा- 'आयकर का ढांचा इतना सुसंगत हो कि किसी को भी यह बाध्यकारी कानून की बजाय एक नैतिक और जरूरी नागरिक उत्तरदायित्व लगे।'
प्रिय पाठकगण! यह सही है कि आयकर के संदर्भ में अर्थशास्त्रियों व विशेषज्ञों की राय महत्वपूर्ण है। आयकर की अवधारणा, महत्व और उद्देश्य को वे अच्छी तरह परिभाषित कर सकते हैं। आयकर कानून यही इंगित करता है, लेकिन आयकरदाता और आम नागरिकों का दृष्टिकोण भी कम मायने नहीं रखता। आयकर की विसंगतियों को लोगों के अनुभवों से ही परिमार्जित किया जा सकता है। बेहतर होगा, कर नीतियों-खासकर व्यक्तिगत आय कर के मामले में जनता के विचारों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

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