RSS

रिश्वत का रोग

जयपुर के एक युवा चिकित्सक डॉ. शशांक सेन की प्रतिक्रिया है- 'हाल ही पत्रिका में प्रकाशित चिकित्सकों के भ्रष्टाचार सम्बन्धी समाचारों ने साख खोते जा रहे चिकित्सकीय पेशे को शर्मशार ही किया है। 'डॉक्टर से रिश्वत लेते डॉक्टर गिरफ्तार' (24 अप्रेल) और 'डॉक्टर के घर करोड़ों की सम्पत्ति' (संदर्भ डॉ। केतन देसाई प्रकरण, 25 अप्रेल) समाचारों को पढ़कर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति आहत हुए बिना नहीं रहेगा। यूं तो भ्रष्टाचार सब जगह है, लेकिन डॉक्टर होने के नाते मैं अपने इस पेशे के प्रति ज्यादा चिंतित हूं। हमारा पेशा औरों से भिन्न है। जिन्दगी और मौत देने वाला तो भगवान है, फिर भी करोड़ों लोग चिकित्सकों को भगवान से कम नहीं मानते। उन पर क्या बीतती होगी, जब वे ऐसे समाचार पढ़ते हैं। रिश्वतखोरी की दोनों घटनाएं शर्मनाक हैं। दोनों आरोपी चिकित्सक खास जिम्मेदारी के ओहदे पर बैठे हुए वरिष्ठजन हैं।' जोधपुर से दिवाकर सोनी ने लिखा- 'मैं यकीन से कहता हूं कि भारत समेत दुनिया में ऐसा कोई देश नहीं है, जहां चिकित्सक बी.पी.एल. श्रेणी में आता हो। भारत में भी एक सामान्य चिकित्सक को इतना अवश्य मिल जाता है कि वह आत्मसम्मान पूर्वक जीवन-यापन कर सके। इसलिए यह तो स्पष्ट है कि चिकित्सक भी अन्य भ्रष्टाचारियों की तरह लालच का शिकार हो रहे हैं। लेकिन इसके परिणाम जितने गम्भीर हैं, उतने किसी और पेशे में नहीं हैं। रिश्वतखोरी या भ्रष्टाचार भले ही चिकित्सा-कौशल से सीधे न जुड़े हों, परन्तु ये बुराइयां कहीं न कहीं रोग-निदान पर असर डालती है जो इंसानी जिन्दगी और मौत से जुड़ी हैं।'

प्रिय पाठकगण! भ्रष्टाचार सम्बन्धी समाचारों पर पाठक सदैव त्वरित प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। सम्भवत: इस 'महामारी' से हर व्यक्ति प्रभावित है। पत्रिका के सर्वे (2 मई) से भी यह जाहिर है। पाठकों ने चिकित्सा क्षेत्र के संदर्भ में फैले भ्रष्टाचार को इंगित किया है। इंदौर से देवेन्द्र राज शुक्ला ने लिखा- 'मेडिकल कौंसिल ऑफ इण्डिया एक सम्मानित संस्था है। चिकित्सा-पेशे से जुड़े मानदंड उसकी निगरानी में तय होते हैं। लेकिन जब संस्था का अध्यक्ष ही दो करोड़ की रिश्वत के आरोप में गिरफ्तार होता है तो संस्था के सम्मान को तार-तार कर देता है। दिल्ली, अहमदाबाद और अन्य ठिकानों पर सी।बी।आई. छापों में डॉ. केतन देसाई के पास करोड़ों रुपए की सम्पत्ति इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि इतनी सम्पत्ति कोई अपने वेतन से तो सात जन्मों में भी अर्जित नहीं कर सकता।'

अजमेर से धीरज गुप्ता ने लिखा- 'सर्वाधिक गम्भीर बात यह है कि डॉ। केतन देसाई को एक निजी मेडिकल कॉलेज को मान्यता देने के बदले रिश्वत लेने के आरोप में पकड़ा गया। अब तो यह भी सामने आ रहा है कि डॉ. देसाई ने देश के कई निजी मेडिकल कॉलेजों से करोड़ों की रिश्वत लेकर मेडिकल कौंसिल की अनुमति दिलवाई। रिश्वत देकर मान्यता प्राप्त करने वाली संस्थाएं मेडिकल क्षेत्र में कैसा योगदान कर रही होंगी, यह हर कोई समझा सकता है।'

भोपाल से अनुपम श्रीवास्तव के अनुसार- 'मैं ऐसे व्यक्ति को जानता हूं जिसने अपने सुपुत्र को एक निजी मेडिकल कॉलेज में लाखों रुपए रिश्वत देकर दाखिला कराया, जो फिसड्डी था। आज वह डॉक्टर बनकर धड़ल्ले से प्रैक्टिस कर रहा है और ऊंची फीस वसूल कर रहा है। उसके पिता का तर्क है, बच्चे को डॉक्टर बनाने के लिए हमने लाखों का इन्वेस्टमेंट किया था।'

हरेन्द्र बेनीवाल (बाड़मेर) ने लिखा- 'रिश्वत देकर मान्यता प्राप्त करने वाली मेडिकल कॉलेज छात्रों से वसूली प्रक्रिया अपनाती है। सीटों में हेराफेरी करके ऊंचा चंदा वसूल करती है। कम अंकों के बावजूद छात्रों को दाखिला दे देती है, जबकि ज्यादा अंकों वाले छात्रों को लटका देती है। जयपुर की एक निजी मेडिकल कॉलेज का ऐसा ही एक मामला पिछले दिनों सामने आया था।'

जयपुर से धनञ्जय शर्मा ने लिखा- 'राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल के मेडिकल ज्यूरिस्ट विभागाध्यक्ष अगर किसी डॉक्टर से ही रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़े जाएं तो फिर कहने के लिए क्या रह जाता है। यह विभाग कई जटिल मामलों का संधारण करता है। विभाग की सिफारिश और अन्वेषण पर कानून और न्याय की बुनियाद टिकी होती है। वह विभाग भी भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं है- यह सवाई मानसिंह अस्पताल के मेडिकल ज्यूरिस्ट विभागाध्यक्ष डॉ। बी.एम. गुप्ता की गिरफ्तारी से साफ हो जाता है।'

उदयपुर से शिवानी माथुर ने लिखा- 'रिश्वतखोरी देश की एक गंभीर महामारी का रू प धारण कर चुकी है। हालांकि भ्रष्टाचार के और भी कई रू प हैं, लेकिन सबसे बड़ा दैत्य तो रिश्वतखोरी ही है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में वर्ष 2008 में गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले लोगों ने मूलभूत सुविधाओं को हासिल करने के लिए 90 अरब रुपए की रिश्वत दी। अब यह राशि 100 अरब के पार जा चुकी होगी। अंदाज लगा सकते हैं कि भारत में रिश्वतखोरी की समस्या कितनी विकराल है।'

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • RSS

बर्बर माओवादी

'बर्बर नक्सली हमला' (पत्रिका 7 अप्रेल) समाचार पर पाठकों की विचारोत्तेजक प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुई हैं। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में माओवादियों ने अब तक का सबसे बड़ा हमला बोलकर एक साथ 76 जवानों को मार डाला। इस हत्याकाण्ड ने पूरे तंत्र को झाकझाोर दिया। कुछ लोगों का मानना है कि नक्सली आंदोलन शोषण की उपज है। इस आंदोलन से सहानुभूति रखने वाले कुछ राजनीतिक दलों, बुद्धिजीवियों और मानवाधिकार संगठनों के विचार व तर्कों से परे आम नागरिक भारत में माओवादियों की विचारधारा और आंदोलन को किस नजरिए से देखता है, यह जानना महत्वपूर्ण होगा।

जयपुर से हरिश्चन्द्र शुक्ला की प्रतिक्रिया है- 'दंतेवाड़ा और इससे पहले गढ़चिरौली, लालगढ़ आदि घटनाओं को सामान्य नक्सली आंदोलन समझाना भूल होगी। जैसा कि एक पूर्व सैन्य अधिकारी आर। विक्रम सिंह ने उत्तर प्रदेश के एक हिंदी दैनिक में लिखा- ये घटनाएं नक्सली आंदोलनकारियों की करतूत भर नहीं है। यह भारत पर मंडराता आंतकवाद और माओवाद की संयुक्त चुनौती का खतरा है। देश में दोनों ताकतें एक-दूसरे से कदम मिलाकर चल रही हैं। मजहबी आतंककारियों के आका पाकिस्तान में और माओवादियों के आका चीन में हैं। इन दोनों देशों की रणनीतिक घनिष्ठता का उद्देश्य भारत को खंडित कर इलाके बांटना है। सिंह का यह आकलन मुझो तो सही लगता है। देश में मुट्ठी भर समझो जाने वाले हार्डकोर माओवादियों से निपटने के लिए 37 हजार अद्र्ध सैनिक बल भी नाकाफी सिद्ध हो रहे हैं तो जरू र इसके पीछे कुछ बड़ी ताकतें काम कर रही हैं।'

सूरत से राहुल एस. मेहता ने लिखा- 'नक्सलियों को विदेशी मदद मिल रही है। दंतेवाड़ा हत्याकाण्ड के बाद गृह मंत्री पी. चिदम्बरम ने भी स्वीकार किया कि नक्सलियों को सीमा पार से हथियार मिलते हैं। (पत्रिका 9 अप्रेल) नेपाल, म्यांमार, बांग्लादेश की खुली सीमाओं से नक्सली जो हथियार प्राप्त कर रहे हैं वे उन्हें कहां से मिल रहे हैं- यह जानने की जरू रत है।'

इंदौर से अरविन्द खरे ने लिखा- 'नक्सलियों ने साठ के दशक में अपना एक राजनीतिक दल भी गठित किया था। उसी समय चीन के साथ समस्याओं की शुरुआत हुई थी। चीन आज भी जिस तरह इंच-इंच करके भारत की भूमि हड़प रहा है, उसे देखते हुए साफ है कि वह भारत का हितैषी नहीं है।'

कोलकाता से डा. प्रदीप शर्मा ने लिखा- 'यह सही है कि नक्सलवादी आंदोलन की शुरुआत गरीबों पर अत्याचार और शोषण की प्रतिक्रिया स्वरू प हुई। लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक देश में सशस्त्र विद्रोह का कोई अर्थ नहीं। माओवादियों को पंजाब के उग्रवादियों की हार से सबक सीखना चाहिए।'जबलपुर से जयकान्त दीक्षित ने लिखा- 'माओवादी अपने उद्देश्य से पूरी तरह भटक गए। चारू मजूमदार और कानू सान्याल की विचारधारा चकाचौंध में खो गई। नक्सली अब सत्ता के ख्वाब देख रहे हैं। वे दिल्ली की कुर्सी पर काबिज होना चाहते हैं। भोले-भाले आदिवासियों को वे लाल क्रांति का सपना दिखाकर लुभा रहे हैं। बेरोजगार युवकों को बाकायदा वेतन देकर भर्ती कर रहे हैं। लोकतंत्र में सत्ता प्राप्त करने का हक सभी को है- लेकिन बुलैट से नहीं बैलेट से।'

कोटा से दयानन्द वैष्णव ने लिखा- माओवादी-नक्सली बहुत खूंखार तरीके अपना रहे हैं। सी।आर.पी.एफ. के 120 हथियारबंद जवान तीन एंटीलैंड माइन वाहनों में बैठकर दंतेवाड़ा के जंगलों में गए थे। लेकिन नक्सलियों ने उन्हें जिस तरह घेरकर गोलियों से भूना और धमाके किए, उससे स्पष्ट है कि उनके पास अत्याधुनिक हथियारों की कोई कमी नहीं है। पहले नक्सलियों के पास पुलिस से लूटी हुई रायफलें ही हुआ करती थीं। वे गुरिल्ला पद्धति से छिपकर वार करते थे। लेकिन दंतेवाड़ा की घटना कुछ और ही संकेत कर रही है। माओवादियों को इतनी ताकत कहां से मिल रही है।'श्रीगंगानगर से संतोष सिंह ने लिखा- 'वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल पी.वी. नाइक ने कहा कि सशस्त्र सेनाएं घातक अभियानों के लिए प्रशिक्षित हैं, कम घातक अभियानों के लिए नहीं। (पत्रिका 8 अप्रेल) नाइक के इस वक्तव्य के बारे में मुझो यही कहना है कि नक्सली हैवानियत की हदें पार कर चुके हैं। इनके खिलाफ घातक अभियान ही चलाया जाना चाहिए। नासूर अब खत्म होना जरू री है।'

कुछ पाठकों ने उन परिस्थितियों की चर्चा भी की जिसके चलते नक्सलवाद पनपा। अजमेर से डी.डी. गर्ग के अनुसार- 'बंदूक का जवाब बंदूक से देकर कोई समस्या हल नहीं हो सकती। इस समस्या का राजनीतिक समाधान होना चाहिए। इस बारे में भाकपा (माले) के दीपंकर भट्टाचार्य ने सही कहा। (पत्रिका 10 अप्रेल) जोधपुर से दीपेन्द्र डागा ने लिखा- 'सुरक्षाबल आदिवासियों पर अत्याचार करते हैं। अतिउत्साहित अधिकारियों ने दंतेवाड़ा की घटना से कुछ दिन पहले ही जनजातियों को उनके जंगल में स्थित घरों से खदेड़ दिया था। इसका सबूत स्वयं केन्द्रीय गृह सचिव जी.के. पिल्लई का बयान है। (पत्रिका 14 अप्रेल)

उदयपुर से नीलिमा खत्री ने लिखा- 'आदिवासियों पर जुल्म पुरानी बातें हैं। छत्तीसगढ़ देश का पहला राज्य है, जहां गरीबों के लिए दो रुपए किलो चावल सरकार ने उपलब्ध कराया और आदिवासियों के लिए 'सलवा जुड़ूम' जैसा पुनर्विकास का अभियान चलाया। उसी छत्तीसगढ़ में देश का सबसे बर्बर माओवादी हमला हुआ।'

प्रिय पाठकगण! हिंसक विचारधारा चाहे वह मजहबी आतंकवाद से जुड़ी हो अथवा राजनीतिक माओवाद से- लोकतंत्र में उसका कोई स्थान नहीं है। हिंसक विचारधाराएं बार-बार नकारी जा चुकी हैं, क्योंकि ये लोकतंत्र ही नहीं मानवता की भी दुश्मन हैं।

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • RSS

सहजीवन पर बहस

सहजीवन (लिव-इन-रिलेशनशिप) पर सुप्रीम कोर्ट की राय और राधा-कृष्ण के उल्लेख से देश में बहस छिड़ी हुई है। पाठकों की लगातार प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं। इस बारे में पत्रिका का सर्वे (27 मार्च) भी मत-विमत की आधार भूमि बना है।

कोटा से डॉ. वैभव गुप्ता ने लिखा- 'सर्वे में हालांकि 82 फीसदी लोगों ने शादी किए बगैर महिला-पुरुष का साथ रहना अनुचित माना है। लेकिन शेष 18 फीसदी लोगों का सहजीवन को उचित ठहराना सोचने को मजबूर करता है कि हमारा भावी सामाजिक ढांचा कैसा बनने जा रहा है। जिस देश में विवाह को एक संस्कार समझा जाता हो, विवाह-पूर्व शारीरिक सम्बन्ध अपवित्र माने जाते हों, वहां 18 फीसदी लोगों की ऑन रिकार्ड स्वीकृति हमें एक ऐसी सच्चाई से रू बरू कराती है जिससे हम आंख मूंदे रखना चाहते हैं। जरा हमारी मौजूदा जीवन-शैली तो देखें। साफ है सहजीवन आज नहीं तो कल सामाजिक सच्चाई बनकर रहेगी।'

जयपुर से श्याम शरण बियानी ने लिखा- 'लिव-इन-रिलेशनशिप पर पत्रिका के सर्वे से प्रमाणित है कि विवाह एक मजबूत और सार्थक संस्था है, जिसे कोई तार-तार नहीं कर सकता। मैं बुजुर्गों और महिलाओं की बात नहीं करता। विवाह से पूर्व शारीरिक सम्बन्धों को 76 प्रतिशत युवाओं ने भी नकार दिया। हम युवाओं पर अक्सर भटक जाने का आरोप लगाते हैं। मेरी समझा में आज के युवा अत्यन्त समझादार और जिम्मेदार हैं। उनके नाम पर भविष्य के समाज की ऊल-जलूल कल्पनाएं करना निरर्थक हैं।'

अहमदाबाद से हरीश पारिख ने लिखा- 'आधुनिक लिव-इन-रिलेशनशिप की पौराणिक राधा-कृष्ण से तुलना करने पर मुझा जैसे कई धार्मिक व्यक्तियों को ठेस पहुंची है। गुलाब कोठारी ने 'बहस तो करें' (26 मार्च) में सही लिखा कि राधा-कृष्ण के स्वरू प को समझाने के लिए एक जन्म काफी नहीं है। एक दार्शनिक और आध्यात्मिक सम्बन्ध की वर्तमान के भोग-पिपासु और वासनामय रिश्तों से तुलना करना अनुचित है। 'भोपाल से मोहनदास आसुदानी ने लिखा- 'हमारे धार्मिक ग्रंथों में राधा का कहीं उल्लेख नहीं है। राधा की कल्पना लौकिक अवतरण है। श्रीकृष्ण से सम्बन्धित प्रमुख ग्रंथ 'महाभारत' और 'श्रीमद् भागवत महापुराण' में कहीं राधा का उल्लेख नहीं है। हरिवंश और विष्णु पुराण में भी राधा का नाम तक नहीं है। सातवी-आठवीं शताब्दी के बाद रचे गए ग्रंथों में जाकर राधा का उल्लेख आता है। राधा और कृष्ण स्त्री और पुरुष के परस्पर प्राकृतिक प्रेम, सहज आकर्षण और आवश्यकता के प्रतीक हैं।'
उदयपुर से भूपेन्द्र सिंह ने लिखा- 'जिस तेजी से प्रेम-विवाह विफल हो रहे हैं तथा जिस तादाद में तलाक के मामले बढ़ रहे हैं उसे देखते हुए लिव-इन-रिलेशनशिप में क्या खामी है? पति-पत्नी में अंडरस्टैंडिंग न हो तो कैसा विवाह? नीरस रिश्तों को ढोने से कोई फायदा नहीं। लिव-इन-रिलेशनशिप का ट्रेंड दो जनों के बीच अंडरस्टैंडिंग मजबूत करने का माध्यम है।'
इंदौर से डॉ. डी.सी. भारद्वाज ने लिखा- 'विवाह से पूर्व एक दूसरे को समझा लेना बहुत जरू री है। 40 फीसदी विवाह सिर्फ इसलिए टूटते हैं कि पति-पत्नी के बीच भावनात्मक सहयोग की कमी है। शायद इसीलिए पश्चिम के लेखक व दार्शनिक बर्टेन्ड रसेल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'मैरिज एण्ड मोरेल्स' में 'ट्रायल मैरिज' का विचार प्रस्तुत किया था। आज का लिव-इन-रिलेशनशिप इसी विचार का क्रियारूप है। 'इंदौर से ही दिनेश अहिरवार के अनुसार- 'पश्चिम की जीवन और विचार शैली से प्रभावित होकर हम कई बेसिर-पैर के निर्णय कर रहे हैं जो हमारी सेहत (संस्कृति) के लिए ठीक नहीं है। जापान, चीन जैसे देश इसीलिए तरक्की कर सके क्योंकि इन देशों ने अपने मूलभूत विचार और जीवन पर कभी दूसरे देशों को हावी नहीं होने दिया।'
बीकानेर से दुर्गेश्वरी पारीक ने लिखा- 'स्त्री-पुरुष के बीच रिश्तों को चाहे जिस ढंग से निभाएं पलड़ा स्त्री का ही हमेशा कमजोर रहता है। न्यायालय ने सहजीवन को स्वीकृति देकर कम-से-कम कानूनी तौर पर तो स्त्री के अधिकार को सुरक्षित कर दिया है।'

भरतपुर से नम्रता राजवंशी ने लिखा- सबसे ज्यादा भुगतना बच्चों को पड़ेगा। ऐसे युगलों से उत्पन्न संतान के समक्ष सामाजिक मान्यता का संकट सदैव उपस्थित रहेगा- भले ही कानूनी स्थिति कुछ भी हो।'

बेंगलूरु से दुष्यन्त मेहता ने लिखा- 'जरूरत है आज के युवाओं की स्थिति को सहानुभूतिपूर्वक समझाने की। कॅरियर, प्रतिस्पद्र्धा, तनाव और महानगर की भागमभाग जिंदगी में उन्हें कहां फुरसत है- शादी के बारे में सोचने की। शादी के बगैर साथ रहकर युवा जोड़े एक दूसरे को सुकून और संबल देते हैं। प्लीज, उनका सुकून मत छीनिए।'

जबलपुर से देवेश श्रीवास्तव के अनुसार- 'लिव-इन-रिलेशनशिप महज वासनापूर्ति का नाम है। फिर तो समलैंगिकता और पार्टनर के अलावा भी दूसरे व्यक्ति से सैक्स संबंधों को मान्य करना होगा।'

जोधपुर से प्रो. शारदा माथुर ने लिखा- 'विवाह एक संस्कार ही नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व भी है। समाज में रहते हुए आप उससे मुंह नहीं फेर सकते। आपकी जो हैसियत या शख्सियत है उसमें समाज का भी योगदान है। विवाह पुरखों का कर्ज उतारना है तो पुरखों का धर्म निबाहना भी है। इसलिए जब तक विवाह संस्था का कोई बेहतर विकल्प नहीं मिले- इसे बचाना जरूरी है। सहजीवन बेहतर तो क्या, विवाह का अभी काम-चलाऊ विकल्प भी नहीं बन पाया है।'

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • RSS

सत्ता में भागीदारी

इंदौर की सामाजिक कार्यकर्ता सुमिता चित्रे ने लिखा- '12 सितम्बर 1996 भारतीय महिलाओं के लिए ऐतिहासिक दिवस के तौर पर दर्ज है, जब लोकसभा में पहली बार महिला आरक्षण विधेयक पेश किया गया। दूसरा ऐतिहासिक दिवस 9 मार्च 2010 है, जब 14 साल बाद यह विधेयक राज्यसभा में पारित किया गया। इस ऐतिहासिक क्रम में अभी तीन कडिय़ां और जुडऩी हैं। पहली, जब यह विधेयक लोकसभा में पारित होगा। दूसरी, जब यह विधेयक देश की 14 विधानसभाओं में मंजूर होगा। और तीसरी, जब यह विधेयक भारत के राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त कर लेगा। भारत की आधी आबादी इन कडिय़ों के जुडऩे की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रही है, ताकि इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय लिखा जा सके।'

प्रिय पाठकगण! महिला आरक्षण विधेयक पर देश भर में बहस चल रही है। मीडिया में इस पर निरंतर हो रही चर्चा के मुख्य दो बिन्दु हैं।

1. महिला आरक्षण विधेयक मूल स्वरू प में पारित हो।

2. विधेयक में कुछ संशोधन होने चाहिए।

संशोधन के पक्षधरों में भी दो तरह के दृष्टिकोण हैं। पहला यह कि दलित, पिछड़ी और अल्पसंख्यक महिलाओं का अलग से कोटा निर्धारित हो। इनका तर्क है कि अन्यथा सत्ता में केवल उच्च वर्ग की महिलाएं ही काबिज हो जाएंगी। दूसरा दृष्टिकोण यह है कि आरक्षण सीटों की बजाय टिकटों का हो अर्थात प्रत्येक दल चुनावों में 33 फीसदी टिकट अनिवार्यत: महिलाओं को दें। इनका तर्क है कि सीटों पर आरक्षण लैंगिक समानता के खिलाफ है जो लोकतंत्र की मूल भावना को ठेस पहुंचाएगा। महिला आरक्षण के मूल स्वरू प में यह प्रावधान है कि यह रोटेशन से लोकसभा और विधानसभाओं की सीटों पर लागू होगा तथा सभी महिलाओं पर समान रू प से लागू होगा। इस मत के पक्षधरों का मानना है कि इससे देश में महिला सशक्तीकरण का मार्ग प्रशस्त होगा जो आगे चलकर उनके सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक उत्थान में कारगर होगा। अगर महिलाओं को बांट दिया गया अथवा टिकटों में आरक्षण दिया गया तो उन्हें कोई फायदा नहीं होगा।
अर्थात् सबके अपने-अपने तर्क हैं। इस पृष्ठभूमि में पाठकों की क्या राय है, यह जानना महत्वपूर्ण है। शायद उनकी राय मार्गदर्शनकर सके।

जयपुर से डा. पुनीतदास के अनुसार- 'लोकतंत्र का सार है कि अधिसंख्य लोगों की राय से ही कोई कार्य हो। हालात देखकर साफ है कि जिन दलों ने राज्यसभा में यह विधेयक पारित कराया, अभी उनमें भी एक राय नहीं है। यही वजह है कि लोकसभा में यह विधेयक अभी तक रखा ही नहीं गया। आखिर क्यों हम इस विधेयक के समस्त गुण-दोषों का आकलन करने से बचना चाहते हैं?'

जोधपुर से राजपाल सिंह ने लिखा- 'महिलाओं के आरक्षण पर डा. नलचिनपन की अध्यक्षता वाली संसद की स्थाई समिति ने इस विधेयक के अन्तरविरोधों के मद्देनजर इस बात पर गंभीरता से विचार किया था कि देश की उन सीटों की पहचान की जानी चाहिए जहां महिलाओं की आबादी का औसत ज्यादा है। ताकि उसीमें से 33 प्रतिशत सीटें दोहरी निर्वाचन प्रणाली के आधार पर छांट ली जाए। उनका आशय साफ था कि लोकसभा व विधानसभा के वर्तमान स्वरू प में परिवर्तन किए बिना महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है। लेकिन यह फार्मूला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। अगर इसे विधेयक में रखा जाता तो आज इसका शायद ही कोई विरोध करता।'

भोपाल से दिलीप जायसवाल ने लिखा- 'महिला आरक्षण विधेयक के स्थान पर राजनीतिक दलों के लिए यह कानून बना दिया जाए कि वे 33 फीसदी टिकट महिलाओं को आवंटित करे।'

अजमेर से डा. माया गुप्ता ने लिखा- 'तैंतीस फीसदी टिकटों का सुझााव महज एक छलावा है। सभी राजनीतिक दल टिकट आवंटन के दौरान एक ही तर्क देते हैं- टिकट उसी को जो जीत सके। यानी महिलाओं को सिर्फ हारने वाली सीटें मिलेंगी।'

अहमदाबाद से परितोष अग्निहोत्री के अनुसार- 'कोई भी राजनीतिक दल महिलाओं के प्रति उदार नहीं है। वरना आजादी के 63 साल बाद भी 544 सदस्यों की लोकसभा में केवल 59 महिलाएं ही होतीं?'

बंगलुरु से दीप राजपुरोहित ने लिखा- 'स्वीडन की संसद में वहां की 47 फीसदी महिलाओं की नुमाइंदगी है। स्वीडन में राजनीतिक दलों ने अपने आप ही महिलाओं के लिए संसद का 40 प्रतिशत टिकट का कोटा तय कर रखा है।'

बीकानेर से श्यामसुन्दर व्यास ने लिखा- 'सत्ता में महिलाओं की भागीदारी देने के मामले में भारत पाकिस्तान से भी पीछे है। इसलिए सारे विरोध छोड़कर विधेयक का सबको समर्थन करना चाहिए।'

उदयपुर की अनुराधा श्रीमाली ने लिखा- 'देश की 12 लाख पंचायतों में महिलाएं पंच-सरपंच निर्वाचित हुई हैं। जब पंचायतों में पचास फीसदी आरक्षण का विरोध नहीं हुआ तो अब 33 फीसदी पर क्यों शोर मचाया जा रहा है।'

श्रीगंगानगर से सुमित लाल अरोड़ा ने लिखा- 'इस विधेयक का सबसे कमजोर पक्ष यह है कि चुनावी सीट लॉटरी सिस्टम से रोटेशन में चलेगी। अर्थात एक तिहाई सीटों पर कोई भी महिला या पुरुष अपने क्षेत्र में पहचान नहीं बना पाएगा।'

दिल्ली से राजीव खत्री ने लिखा- 'महिला आरक्षण बिल की खामियों को बाद में भी दूर किया जा सकता है। रास्ता हमेशा खुला है। पूर्व में भी अनेक कानूनों में संशोधन किए गए हैं। फिलहाल इसे संशोधन की आड़ में लटकाए रखना अनुचित होगा। आखिर महिलाओं ने इसके लिए एक लम्बी लड़ाई जो लड़ी है।'

प्रिय पाठकगण! सत्ता में महिलाओं को उचित भागीदारी मिलनी चाहिए। यह उनका अधिकार है। ज्यादातर पाठकों की भी यही राय है। इस विधेयक का उद्देश्य भी यही है। यह लक्ष्य कैसे शीघ्र हासिल किया जा सकता है- जोर उसी पर होना चाहिए।

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • RSS

टूट गई आस

जयपुर के सेवानिवृत्त शिक्षक घनश्याम वाष्र्णेय ने लिखा-'पत्रिका के 6 मार्च के अंक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का महंगाई पर बयान पढ़कर घोर निराशा हुई। (महंगाई रोकते तो बढ़ती बेरोजगारी) इस बयान में सरकार ने महंगाई से त्रस्त जनता को जोर का झाटका धीरे से मार दिया है। यह झाटका मुझो तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों से भी बड़ा लगता है। कम-से-कम अब तक आस तो बंधी थी, क्योंकि सरकार महंगाई कम करने के लगातार आश्वासन दे रही थी।

पिछले दिनों कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी दोनों ने आश्वासन दिया था कि सरकार पूरी कोशिश कर रही है- जल्द परिणाम सामने आएंगे। (पत्रिका 6 फरवरी) अगले ही दिन मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने कहा- महंगाई का सबसे खराब दौर बीत चुका है और अब अच्छे दिन आने वाले हैं। (बुरा वक्त बीत गया, पत्रिका 7 फरवरी) इसके बाद भी सरकार महंगाई के मुद्दे पर जब-जब घिरी, उसने यही भरोसा दिलाया, महंगाई पर जल्द काबू पा लिया जाएगा। इसलिए पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाए, तो यह आस थी कि बाकी चीजों में सरकार महंगाई से त्राहि-त्राहि कर रही जनता को राहत पहुंचाएंगी। लेकिन आस टूट गई।'

कोटा के दीपसिंह हाड़ा ने लिखा- 'खाद्य वस्तुओं के दाम तो घटे नहीं, पेट्रोल-डीजल के दाम और बढ़ा दिए। यह तो कोढ़ में खाज वाली बात हुई। पेट्रोल के दाम घटने की कोई उम्मीद नहीं है। वित्त मंत्री ने साफ कहा कि वाजपेयी सरकार ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों में 33 बार बढ़ोतरी की थी। और अब तो केन्द्र सरकार को संप्रग प्रमुख सोनिया गांधी की भी हरी झंडी मिल गई।' (पत्रिका 5 मार्च)

इंदौर से गृहिणी सुषमा जैन के अनुसार- 'पेट्रोल महंगा तो समझो सब कुछ महंगा। घर-गृहस्थी की रोजमर्रा की कीमतें पहले से आसमान छू रही थीं। अब तो भगवान ही मालिक है।'

अजमेर से पुरुषोत्तम दास ने लिखा- 'अभी राजस्थान में गहलोत सरकार से एक उम्मीद और बची है। सरकार राज्य में पेट्रोल-डीजल पर वैट कम करके जनता को कुछ हद तक राहत पहुंचा सकती है।'

प्रिय पाठकगण! महंगाई को लेकर पिछले दिनों से पाठकों की प्रतिक्रियां लगातार मिल रही हैं। उच्च वर्ग को छोड़कर महंगाई से हर कोई त्रस्त है। ऐसे में सरकार की ओर से जब भी कोई बयान प्रकाशित होता है, पाठक खुलकर अपनी बात कहते हैं। शायद यही कारण है कि महंगाई के कारणों और इसके उपायों पर उनका सरकार से भिन्न व स्पष्ट दृष्टिकोण है। महंगाई क्यों बढ़ रही है- इस पर आर्थिक विश्लेषक, राजनीतिक दल और सरकार के अपने-अपने तर्क हैं, लेकिन आमजन इसे किस नजरिए से देख रहा है, इसकी बानगी पाठकों की इन प्रतिक्रियाओं से जाहिर है।

जोधपुर से गोपाल अरोड़ा ने लिखा- हमारे देश में कीमतें भी राजनीतिक उद्देश्यों से घटती-बढ़ती हैं। केन्द्र सरकार ने चुनाव से पहले पेट्रोल के दाम दस रुपए तक घटा दिए थे। हरियाणा में राज्य सरकार ने चुनाव पूर्व पेट्रोल-डीजल पर वैट की दरें काफी कम कर दी थीं। कीमतें घटाने का काम हमेशा चुनाव से पहले ही क्यों होता है?'

भोपाल से इंद्रजीत सिंह ने लिखा- 'एक तरफ तो विकास दर के मामले में हम अमरीका, जापान जैसे विकसित देशों से आगे बताए जा रहे हैं। जल्दी ही चीन को भी पीछे छोडऩे की बात कर रहे हैं। दूसरी तरफ खाद्यान्नों की कीमतों पर नियंत्रण नहीं रख पा रहे हैं। नियंत्रण तो दूर की बात, उचित वितरण प्रणाली तक कायम नहीं कर पाए हैं। जबकि हमारे भण्डारों में 2 करोड़ टन लक्ष्य के मुकाबले इस समय 4।8 करोड़ टन खाद्यान्न पड़ा हुआ है। दुनिया के दूसरे सबसे बड़े चीनी उत्पादक देश (भारत) में चीनी आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गई है।'

बेंगलुरू से डा. दीपक परिहार ने लिखा- 'माना सरकार ने किसानों की भलाई के लिए चावल, गेहूं, गन्ना आदि के समर्थन मूल्यों में अच्छी-खासी बढ़ोतरी की, जिससे इनके दाम बढ़े। लेकिन इसका वास्तविक फायदा न तो किसानों को मिला और न आम उपभोक्ताओं को। फायदा तो बड़े व्यापारी और बिचौलिए उठा रहे हैं।'

श्रीगंगानगर से प्रतिभा खत्री ने लिखा- 'काला बाजारियों और जमाखोरों के कारण कीमतें आसमान छू रही हैं। ये बड़े-बड़े जमाखोर सभी पार्टियों को चंदा देते हैं। इसलिए कोई इन पर हाथ नहीं डालता। यहां के किसानों को तो किन्नू और कपास के भी उचित दाम नहीं मिलते।'

बीकानेर से अर्थशास्त्र के विद्यार्थी देवेन्द्र पुरोहित ने लिखा- 'जिंसों की कीमतें मांग और आपूर्ति से तय होती हैं। यह सही है कि जरू री जिंसों की आपूर्ति मांग से कम रही है। लेकिन कीमतों में जो उछाल आया वह स्वाभाविक आर्थिक सिद्धांतों से कहीं मेल नहीं खाता। वर्ष 2004 से तुलना करें, तो चावल में 130 प्रतिशत, चीनी में 197 प्रतिशत तथा अरहर दाल में 252 प्रतिशत कीमतों की बढ़ोतरी अविश्वसनीय ही मानी जाएगी।' प्रिय पाठकगण! अन्य कई पाठकों के पत्रों का सार है कि महंगाई पर नियंत्रण करना सरकार का प्राथमिक दायित्व है। विकास और कीमतों में तार्किक संतुलन हो, जो उत्पादकता बढ़ाकर हासिल किया जाना चाहिए न कि कीमतें बढ़ाकर।

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • RSS

आसान निशाने!


पुणे विस्फोट पर बेंगलूरु के पाठक एस. जयरामन ने लिखा-
'फग्र्यूशन कॉलेज, पुणे की बी.ए. फस्र्ट इयर की छात्रा अनिन्दी धर ने उस दिन अपनी क्लास में पोएट्री टीचर से बड़ी मासूमियत से मृत्यु का वास्तविक अर्थ पूछा था, क्योंकि कविता में इसका जिक्र आया था। टीचर से जवाब मिला या नहीं, लेकिन अगले ही दिन खुद मौत ने उस मासूम को दबोच लिया। उन्नीस वर्षीय हंसती-मुस्कुराती यह छात्रा अपने भाई अंकिक (23), उसकी दोस्त शिल्पा (23), सहेलियां पी. सुंदरी और विनिता गडानी (22) के साथ रेस्त्रां में पार्टी मनाने आई थीं। वैलेन्टाइन डे की पूर्व संध्या थी, इसलिए रेस्त्रां में जश्न का माहौल था। तभी एक विस्फोट हुआ और ये चारों युवा हमेशा के लिए खामोश हो गए। जर्मन बेकरी रेस्त्रां की वह खुशनुमा शाम एक खौफनाक हादसे में तब्दील हो गई। हादसे में 12 लोग मारे गए, 57 घायल हुए। फिर वही सवाल, क्या ऐसे हादसे रोके नहीं जा सकते?


15 फरवरी के अंक में प्रकाशित केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम के बयान पर एक पाठक देवेश अवस्थी (जयपुर) की आवेश और व्यंग्य मिश्रित प्रतिक्रिया मिली। पहले चिदम्बरम का बयान- 'पुणे विस्फोट खुफिया चूक का परिणाम नहीं था। बल्कि आतंककारियों ने आसान निशाने को लक्ष्य बनाकर वहां धोखे से बम रखा।' देवेश ने लिखा- 'जिस तरह रेत में गर्दन छिपाकर शुतुरमुर्ग सच्चाई की अनदेखी करता है, वैसे ही गृहमंत्री कर रहे हैं। क्या चिदम्बरम देशवासियों को यह संदेश दे रहे हैं कि आतंककारियों के षड्यंत्रों की जानकारी तो सरकार को पूरी है, लेकिन उन्हें रोकना और निर्दोष लोगों को बचाना सरकार के वश में नहीं है। 'आसान निशाने' का क्या मतलब? आतंककारी धोखे से नहीं तो क्या घोषणा करके बम रखेंगे? आतंकियों ने घोषणा करके ही विस्फोट किया था। पुणे विस्फोट से सिर्फ नौ दिन पहले 5 फरवरी को इस्लामाबाद में एक रैली के दौरान जमात-उद-दावा के डिप्टी चीफ अब्दुल रहमान मक्की ने खुला एलान किया था कि जमात के ताजा हमले पुणे, दिल्ली, कानपुर और इंदौर में होंगे। क्या कर लिया सरकार ने? खुफिया चेतावनियां... रेड अलर्ट... महत्वपूर्ण व्यक्तियों की सिक्योरिटी... बस...! और आम आदमी का क्या। वह बेचारा तो हमेशा असुरक्षित ही रहेगा। आखिर 'आसान निशाना' जो है वह। सचमुच दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, जयपुर, हैदराबाद, बेंगलूरु आदि कितने ही भारतीय शहरों में हुए विस्फोट और आतंकी हमले खुफिया चूक के परिणाम थोड़े ही थे, आसान निशाना व आतंकियों के धोखे का परिणाम थे। वाह क्या खूब मुगालते में है हमारी सरकार!'

अहमदाबाद से शैलेन्द्र राजपुरोहित ने लिखा- 'मुंबई हमलों के बाद 14 माह तक आतंककारी खामोश रहे। लगा अब हमारे सुरक्षा-तंत्र ने उन्हें उनके बिलों में दुबके रहने को विवश कर दिया। वैसे ही जैसे 9/11 के बाद अमरीका ने किया। लेकिन पुणे विस्फोट ने इस भ्रम को तोड़ दिया है।'


भोपाल के अजय बैरागी के अनुसार- 'पुणे विस्फोट की गंभीरता को सरकार कम नहीं आंके। यह आतंककारियों का भारत के खिलाफ 'टेरर कैम्पेन' है। स्वयं चिदम्बरम ने राज्यसभा में स्वीकार किया था कि भारत पर हमला करने के लिए अलकायदा समेत कई आतंकी गुटों ने आपस में हाथ मिला लिए हैं। ऐसी ही चेतावनी अमरीकी रक्षा सचिव राबर्ट गेट्स ने पिछले दिनों हमारे रक्षा मंत्री ए।के। एंटनी को नई दिल्ली में दी थी। लिहाजा पुणे विस्फोट को आतंककारियों के मंसूबों की फिर से शुरुआत माना जाना चाहिए।' उपरोक्त प्रतिक्रियाओं के विपरीत कोटा से डी।.एस. रांका ने लिखा- 'आतंकी हमलों और विस्फोटों में केवल सरकार की नाकामी को कोसने से काम नहीं चलेगा। इजरायल की तरह आम भारतीयों को भी सुरक्षा और सतर्कता के नियम अपनाने होंगे।'

उदयपुर की सरोजबाला के अनुसार- 'अगर जर्मन बेकरी के बेयरे ने रेस्त्रां में पड़े लावारिस बैग को खोला नहीं होता तो 12 बेकसूर व्यक्तियों की जान नहीं जाती।'

जयपुर से रमेश शर्मा ने लिखा- मुंबई हमलों के बाद भारत सरकार ने स्पष्ट कहा था कि जब तक पाकिस्तान अपने आतंकी अड्डों को नष्ट नहीं करता भारत उससे बातचीत नहीं करेगा। अचानक क्या हो गया कि हम नई दिल्ली में 25 फरवरी को पाक से बातचीत करने जा रहे हैं। जबकि हमारे रक्षामंत्री ने अभी हाल ही (20 फरवरी अंक) बयान दिया है कि आज भी सीमापार 42 आतंककारी अड्डे कायम हैं और पाकिस्तान इन्हें नष्ट करने के प्रति गंभीर नहीं है।'

इंदौर से जितेन्द्र एस चौहान ने लिखा- 'पाक की दादागिरी तो देखिए, वह इस बातचीत में कोई भी मुद्दा उठाने की भारत को धमकी दे रहा है। उसने साफ कहा है कि वह कश्मीर का मुद्दा उठा सकता है। यहां तक कि बलूचिस्तान में कथित भारतीय हस्तक्षेप को भी उठाएगा। पाकिस्तान के नेता वार्ता के लिए भारत की रजामंदी को अपनी फतह के रू प में पेश कर रहे हैं।' कोलकाता से पीयूष खेतान ने लिखा- 'पच्चीस फरवरी को जब भारतीय विदेश सचिव निरू पमा राव पाकिस्तान के विदेश सचिव सलमान बशीर से बातचीत के लिए बैठे तो राव को सबसे पहले पाक को उसकी करतूतों के लिए हड़काना चाहिए। बातचीत के लिए माकूल माहौल तैयार करने की जिम्मेदारी अकेले भारत की नहीं है, पाक की भी है।'

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • RSS

बच्चों पर दबाव

* जनता नगर निवासी दसवीं की छात्रा स्मिता सिंह ने घर में चुन्नी के फंदे से लटक कर जान दी। (11 जनवरी)
* न्यू कॉलोनी में एविएशन की छात्रा अर्चना राठौड़ ने फंदे पर झूलकर खुदकुशी की। (16 जनवरी)
* बालाजी विहार की सी.ए. की छात्रा प्रीति दास ने ट्रेन के सामने कूदकर आत्महत्या की। (17 जनवरी)
* इंद्रा कॉलोनी में 9वीं की छात्रा गरिमा शर्मा ने फांसी लगाकर खुदकुशी की। (20 जनवरी)

'पत्रिका' में प्रकाशित इन खबरों का उल्लेख करते हुए जयपुर के पाठक पुनीत शर्मा ने लिखा- 'हम और कितनी मासूम आत्महत्याओं का इंतजार करेंगे? शहर में दस दिन में चार आत्महत्याएं! वह भी उन हाथों से जिन्होंने अभी जिन्दगी का बोझ उठाना शुरू भी नहीं किया था। जिन्दगी उनके लिए बोझिल कैसे बन गई? क्या ये घटनाएं हम सभी के लिए खतरे की गंभीर चेतावनी नहीं है? किशोर व युवा छात्र-छात्राओं में आत्महत्या की घटनाएं पूरे देश में तेजी से बढ़ रही है। आखिर विद्यार्थी-वर्ग आत्महत्या क्यों कर रहा है? कौन है इसके लिए जिम्मेदार? क्या युवाओं को असमय मौत को गले लगाने से रोका नहीं जा सकता? क्या उन्हें जिन्दगी का बेशकीमती मर्म समझाया नहीं जा सकता?'

प्रिय पाठकगण! पुनीत की तरह अन्य कई पाठकों ने भी इस ज्वलंत सामाजिक मुद्दे को उठाया है और इसके कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर सबका ध्यान आकर्षित किया है। पहले यह स्पष्ट कर दूं कि उपरोक्त जिन घटनाओं का पाठक ने उल्लेख किया है, उन सभी में आत्महत्या के अलग-अलग कारण हो सकते हैं। हर आत्महत्या दुखद और चिन्ताजनक है, लेकिन परीक्षा में विफलता, पढ़ाई का बोझ (एग्जाम स्ट्रेस) या अच्छे अंकों के लिए दबाव के चलते की जाने वाली आत्महत्या की घटनाएं जिस तेजी से बढ़ रही हैं, वे सचमुच खतरे की घण्टी है। अधिकतर पाठकों ने इसी पर चर्चा की है।

भावना परमार (उदयपुर) ने लिखा- 'अमरीका में 15 से 24 आयु वर्ग में होने वाली मौतों का दूसरा सबसे बड़ा कारण आत्महत्या है और अब भारत में इस आयु वर्ग में आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण परीक्षा में उच्च अंकों का दबाव बनता जा रहा है।'

अहमदाबाद से धर्मेश मेहता के अनुसार- 'मुंबई की तेरह वर्षीय किशोरी रू पाली शिन्दे ने इसलिए खुदकुशी की, क्योंकि उसकी मां हरदम उस पर अच्छे माक्र्स के लिए दबाव डालती थी। स्कूली छात्र सुशान्त पर भी ऐसा ही दबाव पिता ने डाला, जिसे वह बर्दाश्त नहीं कर सका और मौत को गले लगा लिया। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं। सम्भवत: इन घटनाओं के चलते ही हाल ही केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल (2 फरवरी) ने बच्चों की आत्महत्या के लिए माता-पिता को जिम्मेदार ठहराया है।'

दीपक जैन (कोटा) ने लिखा- 'कपिल सिब्बल का सीबीएसई बोर्ड में दसवीं की परीक्षा वैकल्पिक करने का निर्णय सही है। न परीक्षा होगी न माता-पिता दबाव डालेंगे।'

भीलवाड़ा से आसकरण माली ने लिखा- 'माता-पिता कर्जा लेकर बच्चों की महंगी फीस चुकाते हैं। ऊपर से ट्यूशन-कोचिंग का खर्चा भी करते हैं। इसके बावजूद बच्चा पढ़ाई में ध्यान नहीं देता तो क्या उन्हें डांटने का भी हक नहीं।'

डा. रमेश त्रिपाठी (इंदौर) के अनुसार- 'माता-पिता अपनी आकांक्षाएं बच्चों पर थोपते हैं। वे अपने अधूरे सपने बच्चों के मार्फत पूरा करना चाहते हैं। परीक्षा के दौरान कई माता-पिता तो रातभर अपने बच्चे के साथ जागते हैं। बच्चे की क्षमता और सीमाओं का आकलन किए बगैर उस पर बोझ डालना उचित नहीं। वह डिप्रेशन का शिकार हो जाएगा। टेक्सास यूनिवर्सिटी का हाल का एक अध्ययन बताता है कि 75 फीसदी किशोर-किशोरियां डिप्रेशन में सुसाइड करते हैं।'

हरि पुरोहित (बीकानेर) के अनुसार- 'बच्चा क्या पढऩा चाहता है- यह जानना माता-पिता के लिए जरू री है वरना वह परीक्षा में पास होकर भी जिन्दगी में फेल हो जाएगा।'

अनवर हुसैन (जयपुर) ने लिखा- 'एक अध्ययन के अनुसार पिछले 60 साल में किशोर उम्र के विद्यार्थियों में आत्महत्या की दर में तीन गुना इजाफा हो गया। भले जिन्दगी को लेकर अलग-अलग फलसफे हों, मगर जिन्दगी जैसी खूबसूरत कोई और नियामत नहीं। लिहाजा बचपन से बच्चों को जिन्दगी की अहमियत समझाई जानी चाहिए।'

जोधपुर से सुशान्त भट्टाचार्य ने लिखा- 'आत्महत्याओं के खिलाफ माहौल बनाया जाए। मीडिया और स्वयंसेवी संगठन इसमें कारगर भूमिका निभा सकते हैं। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर 'सेव' (सुसाइड अवेयरनेस वाइसेज ऑफ एजुकेशन) जैसे संगठनों की मदद ली जा सकती है। अवसाद ग्रस्त बच्चों के मार्गदर्शन के लिए राष्ट्रीय हेल्पलाइन हो तथा स्कूलों में काउंसलिंग व्यवस्था अनिवार्यत: लागू हो।'

राखी तनेजा (बेंगलुरू ) ने लिखा- 'कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली की प्रसिद्ध मनोविश्लेषक डा। अरुणा ब्रूटा ने यह बताकर सबको चौंका दिया कि दसवीं बोर्ड की परीक्षा शुरू होने से पहले ही राजधानी के लगभग 300 बच्चे उनके पास लाए जा चुके थे, जिन्होंने परीक्षा के दबाव के चलते आत्महत्या का प्रयास किया।'

प्रिय पाठकगण! ये हालात चिन्तनीय हैं- माता-पिता, शिक्षक, स्कूल प्रबंधक, शिक्षाविदों व सरकार सबके लिए। जीवन अनमोल है- खासकर उन कलियों के लिए जिन्हें अभी फूल बनकर खिलना है और बगिया को महकाना है। ध्यान रखें, आत्महत्या करने वाला बच्चा कहीं हमसे यह कहना तो नहीं चाहता था- गिव मी सम सनशाइन! और हमने उसे अनसुना कर दिया!!

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • RSS